शनिवार, 27 सितंबर 2014

देवी पुराण : जानें, शिवा कैसे बनी महाकाली, ऐसे भेजा शिव ने विवाह का प्रस्ताव

देवी पुराण :
उज्जैन। देवी की आराधना करने वाले ये मानते हैं कि इस ब्रह्मांड को संभालने वाली और इसका मूल माता आदिशक्ति हैं। पार्वती को ही मां आदिशक्ति या जगतमाता कहा जाता है। यूं तो शिवजी और पार्वतीजी से जुड़ी अनेक रोचक कथाएं हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां सती के यज्ञ में आहूत हो जाने के बाद शिव व पार्वती का मिलन कैसे हुआ और क्यों व कब से उन्हें महाकाली कहा जाने लगा। यदि नहीं तो आइए आज आपको बताते हैं देवी पुराण का एक रोचक किस्सा कि कैसे पार्वती को मिला महाकाली नाम व क्यों हैं वे शव वाहना.....

देवी पुराण के अनुसार एक समय की बात है। हिमालय और उनकी पत्नी मेना ने त्रिलोक की माता सनातनी दुर्गा की तपस्या कर उन्हें पुत्री रूप में प्राप्त करने की कामना की। उन दोनों की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं ब्रह्मरूपा जगदंबा मेना के गर्भ में आई। देवी मेना ने शुभ दिन में कमल के समान मुखवाली, सुंदर प्रभावाली जगन्माता भगवती को पुत्री रूप में जन्म दिया।
जब पर्वतराज ने सुना कि उनके घर तीन नेत्रों वाली, आठ भुजाओं वाली माथे पर चंद्र धारण किए कन्या ने जन्म लिया है। वे समझ गए कि उनके घर सूक्ष्मा परा-प्रकृति ने ही अपनी लीला से उनके यहां अवतार ग्रहण किया है। उन्होंने मां जगदंबा से सामान्य रूप में आने की प्रार्थना की। माता ने एक सुंदर कन्या का रूप धारण कर लिया। इसके बाद माता ने जगदंबा ने हिमालय और मेना देवी को ब्रह्माज्ञान और तत्वज्ञान दिया। फिर वे एक सामान्य बच्ची की तरह अपनी मां का दूध पीने लगी।
              जब शिवजी करने लगे सती की वापसी के लिए तपस्या- सती के चले जाने के बाद शिवजी अक्सर ध्यान मग्र ही रहा करते थे। इस तरह शिवजी को सती के वियोग में देखकर नारदजी चिंतित हुए। उन्होंने सोचा कि उन्हें शिव को योग से जगाकर ये बता देना चाहिए कि माता सती फिर से जन्म ले चुुकीं हैं।

इतना विचार कर नारदजी शिवजी को माता के जन्म का समाचार देते हैं। शिव समाधी से उठते ही पूछने लगते हैं कहां है मेरी सती। यहां ग्रंथकार ने कहा है कि आदि से लेकर अनंत तक शिव और पार्वती की तरह न कोई पति-पत्नी हुए न होंगे। इनका प्रेम व दांपत्य अद्वितीय है। इसके बाद नारद जी राजा हिमाचल के पास जाते हैं और उन्हें ये समझाते हैं कि पार्वती के रूप में सती ने जन्म लिया है और ये शिव की अद्र्धांगिनी बनेगी। नारद मुनि का समाचार सुनकर शिवजी ने भी सती को वापस पाने के लिए हिमाचल के एक शिखर पर तपस्या करने का मन बनाया। शिवजी ने यह संदेश हिमालय को पहुंचाया।
शिवजी के पास कब और कैसे पहुंची पार्वतीजी - शिवजी के आने का समाचार सुनते ही हिमालय ने अपने अधीनस्थों को आज्ञा दी कि जहां से गंगा का अवतरण हुआ है। वहां कोई नहीं जाएगा। जो भी वहां जाएगा वह दंड का भागी होगा। समय आने पर शिव जी वहां आए और तपस्या में लीन हो गए। इधर पार्वतीजी भी दिन-प्रतिदिन विवाह योग्य हो रही थी। एक दिन जगन्माता पार्वती ने स्वयं कहा कि मैं तपस्या में लीन शिवजी के समक्ष जाऊंगी। जब पार्वती ने ऐसा कहा तो उनकी माता मेना रोने लगीं। उनसे कहने लगी माता आप मुझे छोड़कर वन न जाएं।


पार्वतीजी ने उन्हें समझाया और हिमालय के उस शिखर की और निकल पड़ीं। जहां शिवजी तपस्या में रत थे। पार्वती माता वहीं वन में रहने लगीं। महादेवी शिव के समीप रहकर उनकी सेवा तो कर रही थी, लेकिन शिव उन पर प्रसन्न नहीं हुए। इससे सारे देवता भी बहुत चिंतित हो गए, क्योंकि उस समय तीनों लोकों में तारकासुर ने ब्रह्मा से मिले वरदान के कारण हाहाकार मचा रखा था। उसने इंद्र को पराजित कर उसका सिंहासन छिन लिया था। तीनों लोकों में उसका अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था। सभी देवता ये जानते थे कि इस राक्षस का संहार सिर्फ शिव के पुत्र ही कर सकते हैं। इसलिए देवताओं ने एक उपाय करने की सोची।पार्वतीजी ने उन्हें समझाया और हिमालय के उस शिखर की और निकल पड़ीं। जहां शिवजी तपस्या में रत थे। पार्वती माता वहीं वन में रहने लगीं। महादेवी शिव के समीप रहकर उनकी सेवा तो कर रही थी, लेकिन शिव उन पर प्रसन्न नहीं हुए। इससे सारे देवता भी बहुत चिंतित हो गए, क्योंकि उस समय तीनों लोकों में तारकासुर ने ब्रह्मा से मिले वरदान के कारण हाहाकार मचा रखा था। उसने इंद्र को पराजित कर उसका सिंहासन छिन लिया था। तीनों लोकों में उसका अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था। सभी देवता ये जानते थे कि इस राक्षस का संहार सिर्फ शिव के पुत्र ही कर सकते हैं। इसलिए देवताओं ने एक उपाय करने की सोची।
शिव और शिवा के मिलन के लिए देवताओं ने किया कौन सा उपाय- इंद्र और अन्य देवताओं ने शिवा और शिव के मिलन के लिए कामदेव का सहयोग लेने की सोची। इंद्र ने कामदेव से कहा आप सभी में प्रेमात्मक प्रवृति बढ़ाते हैं। आपको शिवजी में काम जगाकर सारे संसार की रक्षा करनी होगी। यह सुनकर वसन्त को साथ लेकर कामदेव अपनी पत्नी रति को लेकर शिव जी के पास पहुंचे। वहां कई दिनों तक रूकें। पर्वत के सारे प्राणि काम पीड़ित हो गए, लेकिन शिवजी का ध्यान भंग न हुआ। यह देख कामदेव खिन्न हो गए, उन्होंने तुरंत शिवजी पर कामबाण चलाया।
वह बाण सीधा भगवान शंकर के  वाम भाग में लगा। शिवजी समागम करने को उत्सुक हो गए। अपने मन पर यह प्रभाव देख शिवजी ने सोचा कि इस विकार का कारण क्या है। वे समझ गए कि कामदेव ने ही मेरा अतिक्रमण किया है। ऐसा सोचकर रुद्र क्रोध से जल उठे। उन्हें इस तरह क्रोधित देख कामदेव सहायता के लिए देवताओं को पुकारने लगे। सभी देवता शिवजी से शांत होने की प्रार्थना करने लगे, लेकिन शिवजी का तीसरा नेत्र खुल गया और कामदेव भस्म हो गए।
 कैसे शांत हुआ भगवान शंकर का क्रोध- शिवजी के नेत्र से निकली व अग्रि सारे ब्रह्मांड को जलाने लगी। कामदेव की यह दशा देखकर उनकी पत्नी रति रोने लगी। वह देवी पार्वती के पास पहुंची और उनसे अपने पति के लिए प्रार्थना करने लगी। माता पार्वती ने रति को शांत किया और उनके पति को जीवनदान दिलवाने का वादा कर शिवजी के पास पहुंची। वे बोली मुझ आद्यशक्ति ने आपको पाने के लिए कितना तप किया। फिर आपने कामदेव को क्यों नष्ट कर दिया। पार्वती के ये वचन सुनकर शिव आश्चर्य चकित रह गए। वे मुस्कुराने लगे और बोले में इस निर्जन वन में कितने दिनों से तपस्यारत हूं। आज मैं बहुत प्रसन्न हूं।

अपनी प्रिया सती को सामने देख रहा हूं। यह सुनकर देवी पार्वती बोलीं मैं पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेकर आपको पतिरूप में प्राप्त करने आई हूं। यह बोलकर माता आद्यशक्ति शिवजी के सामने अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुई। यह देखकर शिव रोमांचित और आनंदित हो गए। शिवजी बोले आप इस संपूर्ण जगत की माता हैं। शिवे मैं इसी वर के लिए आपसे प्रार्थना करता हूं। जहां-जहां आपका यह सुंदर कालीरूप स्थापित हो वहां मेरे हृदय में आप स्थापित हो और आप आज से इस संसार में शव वाहना मां महाकाली के नाम से विख्यात होंगी। यह सुनकर माता बोलीं ऐसा ही हो और फिर गौरी के रूप में परिणत हो गईं। उसके बाद शिवजी ने काम देव को फिर स्वस्थ कर दिया।
शिवजी ने कैसे पहुंचाया पार्वतीजी के पिता तक विवाह का प्रस्ताव- यह सब घटना होने के बाद शिवजी और पार्वतीजी तपस्या में लीन हो गए। दोनों ने एक-दूसरे का ध्यान करते हुए। लगभग तीन हजार साल तपस्या की। यह देखकर फिर देवता चिंतित हो गए। कामदेव ने दोनों से जाकर तपस्या से जागने की प्रार्थना की। पार्वतीजी ने कहा मैं अपने पिता की आज्ञा के बिना शिवजी को पतिरूप में स्वीकार नहीं कर सकती।


मां इतना कहकर अपनी सखियों के साथ अपने पिता के घर की ओर चल दीं। भगवान शिव ने पार्वती को प्राप्त करने के लिए सप्तऋिषियों का स्मरण किया। वे सभी महर्षि शिवजी के पास पहुंचे। उन्होंने महादेव से पूछा भगवन आप ने हम लोगों का स्मरण क्यों किया है। तब शिव ने कहा मेरी माया मुझे छोड़कर चली गई है। मैं उनसे विवाह करना चाहता हूं, लेकिन उनका कहना है कि जब उनके पति हिमालय मुझे बुलाकर उनका पाणिग्रहण नहीं करवाते हैं।

वो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त नहीं होगी। इसलिए आप लोग जाइए और हिमालय से बात कीजिए। तब सारे महर्षि हिमालय के यहां पहुंचते हैं और हिमालय से अपनी पुत्री को शिवजी के लिए देने की प्रार्थना करते हैं। नारदजी एक बार फिर हिमालय को पार्वती के पूर्वजन्म में सती होने की कथा सुनाते हैं। तब हिमालय कहते हैं ऋषिगण में अपनी पुत्री को शिवजी की प्रिया बनाना चाहता हूं। आप किसी शुभ समय उनके पास जाएं और मेरा यह संदेश उन्हें दें।

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