मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

कैसे बने गरुड़ विष्णु के वाहन ?


कैसे हुई गरुड़ और नागों की उत्पत्ति और कैसे बने गरुड़ विष्णु के वाहन ?

आज हम आपको एक पौराणिक कथा बता रहे है जिसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है। यह कथा बताती है की इस धरती पर गरुड़ और नागों की उत्पत्ति कैसे हुई, क्यों गरुड़ नाग के दुशमन हुए, क्यों नागो की जीभ आगे से दो हिस्सों में बटी हुई है और कैसे गरुड़, भगवान विष्णु के वाहन बने ?

महर्षि कश्यप की तेरह पत्नियां थी। लेकिन विनता और कद्रू नामक अपनी दो पत्नियों से वे विशेष प्रेम करते थे। एक दिन महर्षि जब आनंद भाव में बैठे थे तो उनकी दोनों पत्नियां उनके समीप पहुंची और पति के पांव दबाने लगी। प्रसन्न होकर महर्षि ने बारी-बारी से दोनों को सम्बोधित किया- “तुम दोनों ही मुझे विशेष प्रिय हो। तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ।”

कद्रू बोली- “स्वामी ! मेरी इच्छा है कि मैं हजार पुत्रो की माँ बनूं।”

फिर महर्षि ने विनता से पूछा। विनता ने कहा- “मैं भी माँ बनना चाहती हूं स्वामी ! किन्तु हजार पुत्रो की नहीं, बल्कि सिर्फ एक ही पुत्र की। लेकिन मेरा पुत्र इतना बलवान हो कि कद्रू के हजार पुत्र भी उसकी बराबरी न कर सके।”

महर्षि बोले- “शीघ्र ही मैं एक यज्ञ करने वाला हूं। यज्ञोपरांत तुम दोनों की माँ बनने की इच्छाएं अवश्य पूरी होगी।”

महर्षि कश्यप ने यज्ञ किया। देवता और ऋषि-मुनियों ने सहर्ष यज्ञ में हिस्सा लिया। यज्ञ सम्पूर्ण करके महर्षि कश्यप पुनः तपस्या करने चले गए। कुछ माह पश्चात विनता ने दो तथा कद्रु ने एक हजार अंडे दिए। कुछ काल के पश्चात कद्रु ने अपने अंडे फोड़े तो उनमे से काले नागों के बच्चे निकल पड़े। कद्रु ने ख़ुशी से चहकते हुए विनता को पुकारा- “विनता ! देखो तो मेरे अन्डो से कितने प्यारे बच्चे बाहर निकले है।”

विनता बोली- “सचमुच बहुत खूबसूरत है कद्रू ! बधाई हो, अब मैं भी अपने दोनों अंडो को फोड़कर देखती हूं।”

यह कहकर विनता अपने दोनों अंडो के पास गई। उसने एक अंडा फोड़ दिया, लेकिन अंडे के अंदर से एक बच्चे का आधा बना शरीर देखकर वह सहम गई। बोली- “हे भगवान ! जल्दीबाजी में मैने ये क्या कर डाला। यह बच्चा तो अभी अपूर्ण है।”

तभी फूटे हुए अंडे के अंदर से बालक बोल पड़ा- “जल्दबाजी में अंडा फोड़कर तुमने बहुत बड़ा अपराध कर डाला है। फलस्वरूप तुम्हे कुछ समय तक दासता करनी होगी।”

विनता बोली- “अपराध तो मुझसे हो ही गया। लेकिन इसका निराकरण कैसे होगा पुत्र ?”

अपूर्ण बालक बोला-“दूसरे अंडे को फोड़ने में जल्दबाजी मत करना। यदि तुमने ऐसा किया तो जीवन भर दासता से मुक्त नहीं हो पाओगी। क्योंकि उसी अंडे से पैदा होने वाला तुम्हारा पुत्र तुम्हे दासता से मुक्ति दिलाएगा।”

इतना कहकर अंडे से उत्पन्न अपूर्ण बालक आकाश में उड़ गया और विनता दूसरे अंडे के पकने तक इंतजार करने लगी। समय पाकर अंडा फूटा और उसमे से एक महान तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ, जिसका नाम गरुड़ रखा गया। गरुड़ दिन-प्रतिदिन बड़ा होने लगा और कद्रू के हजार पुत्रों पर भारी पड़ने लगा। परिणामस्वरूप विनता और कद्रू के संबंध दिन-प्रतिदिन कटु से कटुतर होते गए।


फिर एक दिन जब विनता और कद्रू भृमण कर रही थी। कद्रू ने सागर के किनारे दूर खड़े सफेद घोड़े को देखकर विनता से कहा- “बता सकती हो विनता ! दूर खड़ा वह घोडा किस रंग का है ?”

विनता बोली- “सफेद रंग का।”

कद्रू बोली- “शर्त लगाकर कह सकती हो कि घोडा सफेद रंग का ही है। मुझे तो इसकी पूंछ काले रंग की नजर आ रही है।”

विनता बोली- “तुम्हारा विचार गलत है। घोडा पूंछ समेत सफेद रंग का है।”

दोनों में काफी देर तक यही बहस छिड़ी रही। आखिर में कद्रू ने कहा- “तो फिर हम दोनों में शर्त हो गई। कल घोड़े को चलकर देखते है। यदि वह सम्पूर्ण सफेद रंग का हुआ तो मैं हारी, और यदि उसकी पूंछ काली निकली तो मैं जीत जाऊंगी। उस हालत में जो भी हम दोनों में से जीतेगी, तो हारने वाली को जितने वाली की दासी बनना पड़ेगा। बोलो तुम्हे मंजूर है ?”

विनता बोली- “मुझे मंजूर है।”

रात को ही कद्रू ने अपने सर्प पुत्रों को बुलाकर कहा- “आज रात को तुम सब उच्चेः श्रवा घोड़े की पूंछ से जाकर लिपट जाना। ताकि सुबह जब विनता देखे तो उसे घोड़े की पूंछ काली नजर आए।”

योजनानुसार नाग उच्चेः श्रवा घोड़े की पूंछ से जाकर लिपट गए। परिणामस्वरूप सुबह जब कद्रू ने विनता को घोड़े की पूंछ काले रंग की दिखाई तो वह हैरान रह गई। बोली- “ऐसा कैसे हो गया। कल तो इसकी पूंछ बिलकुल सफेद थी।”

कद्रू बोली- “खूब तसल्ली से देख लो। घोड़े की पूंछ आरम्भ से ही काली है। शर्त के मुताबित तुम हार चुकी हो। इसलिए अब तुम्हे मेरी दासी बनकर रहना पड़ेगा।”

विवशतापूर्वक विनता को कद्रू की दासता स्वीकार करनी पड़ी। माता को उदास देखकर गरुड़ ने पूछा- “क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे आप कद्रू की दासता से मुक्त हो जाए ?”

विनता बोली- “यह तो कद्रू से ही पूछना पड़ेगा। यदि वह प्रसन्न हो जाती है तो मुझे दासता से मुक्त कर देगी।”

गरुड़ अपनी माता विनता को लेकर कद्रू के पास पहुंचा और कहा- “क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप मेरी माता को अपनी दासता से मुक्त कर दे।”

कद्रू बोली- “हो सकता है। बशर्ते कि तुम मेरे पुत्रों को अमृत लाकर दे दो।”

यह सुनकर गरुड़ सोच में पड़ गया। उसने अपनी माता से पूछा- “माँ ! अमृत कहा मिलेगा जिसे लेकर मैं तुम्हे दासी जीवन से मुक्त कर संकू।”

विनता ने कहा- “अमृत का पता तुम्हारे पिता बता सकते है पुत्र ! तुम उन्हीं के पास जाकर पूछो।”

गरुड़ महर्षि कश्यप के पास पहुंचा। कश्यप अपने पुत्र को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। गरुड़ ने उनसे पूछा- “पिताश्री ! मैं अमृत लेकर अपनी माता को दासता से मुक्ति दिलाना चाहता हूं। कृपया मुझे बताइये कि अमृत कहा मिलेगा।”

महर्षि बोले- “पुत्र ! देवराज इंद्र ने अमृत की सुरक्षा के लिए बहुत व्यापक प्रबंध कर रखा है। वहां तक पहुचना कठिन है।”

गरुड़ बोला- “इंद्र ने कितनी ही कड़ी सुरक्षा प्रबंध क्यों न कर रखे हो। मगर मैं अमृत ले आऊंगा। आप मुझे सिर्फ उस स्थान का पता बता दीजिये।”

महर्षि कश्यप ने गरुड़ को इंद्र का पता बता दिया। गरुड़ ने फिर पूछा- “पिताजी ! मुझे भूख बहुत लगती है। कृपया मुझे यह भी बता दीजिये कि इस लम्बे मार्ग में क्या खाकर अपना पेट भरु।”


महर्षि बोले- “अमृत जिस स्थान पर रखा है उस सरोवर तक पहुंचने में तुम्हे वक्त लग जाएगा। इस बीच समुद्र के किनारे तुम्हे निषादों की अनेक बस्तिया मिलेगी। ये निषाद बहुत पतित है और इनके आचरण असुरो जैसे है। तुम इन्हे खाकर अपनी भूख मिटा लेना।”

गरुड़ बोला- “और उसके बाद भी मेरा पेट न भरा तो ?”

महर्षि बोले- “सरोवर के अंदर एक विशाल कछुआ रहता है और उसके साथ ही वन में एक महा भयंकर हाथी भी रहता है। दोनों ही बहुत क्रूर और आसुरी प्रवृति के है। तुम उन्हें भी खा सकते हो।”

पिता का आदेश पाते ही गरुड़ अमृत सरोवर की ओर बढ़ चला। मार्ग में उसने निषादों को खाकर अपनी भूख मिटाई। फिर अमृत सरोवर पर पहुंचकर कच्छप और हाथी को अपने पंजो में दबाया और दोनों को खाने के लिए किसी उचित जगह की तलाश में उड़ चला।”

सोमगिरि पर्वत पर लहलहाते ऊंचे वृक्षों को देखकर जैसे ही उसने एक वृक्ष पर बैठना चाहा तो उनके भार से वृक्ष की शाखा टूटकर नीचे गिरने लगी। यह देख गरुड़ तुरंत उड़ा और दूसरे वृक्ष पर जा बैठा। जिस शाखा पर वह बैठा उस शाखा पर उसने उलटे लटके कुछ ऋषियों को तपस्या करते देखा। लेकिन वह शाखा उनके भार से टूटकर नीचे गिरने लगी। यह देख गरुड़ ने शाखा को चोंच में दबाया और हाथी तथा कच्छप को पंजे में दबाए हुए वह अपने पिता के आश्रम की ओर उड चला।

कश्यप के आश्रम में गरुड़ ने उड़ते-उड़ते अपने पिता से पूछा- “पिताजी ! मेरे भार से उस पेड़ की शाखा टूट गई है जिस पर कुछ ऋषि उलटे लटके तपस्या कर रहे थे। मुझे बताइये अब मैं इस शाखा को कहां छोडूं ?”

महर्षि कश्यप बोले- “तुमने बहुत अच्छा किया पुत्र ! जो सीधे यहां चले आए। शाखा, से उलटे लटके हुए ये बालखिल्य ऋषिगण है। अगर इन्हे कष्ट पहुंचा तो ये शाप देकर तुम्हे भस्म कर देंगे।”

गरुड़ बोले- “तो फिर बताइये अब मैं क्या करूं ?”

महर्षि बोले- “ठहरो, मैं ऋषिगण से प्रार्थना करता हूं कि वे अपना स्थान छोड़कर नीचे आ जाए।”

महर्षि कश्यप ने ऋषि गणो से प्रार्थना की। बालखिल्य ऋषियों ने कश्यप की प्रार्थना स्वीकार कर शाखा छोड़ दी और वे हिमालय में तपस्या करने चले गए। चोंच में दबी शाखा को नीचे फेंककर गरुड़ ने भी आनंद से कछुए और हाथी का आहार किया और तृप्त होकर पुनः अमृत लाने के लिए उड़ चला। गरुड़ अमृत सरोवर के पास पहुंचा तो अमृत की रक्षा करते हुए महाकाय देवो और अमृत कलश के चारो ओर घूमते हुए चक्र को देखकर वह हैरान हो गया। उसने सोचा कि ये देव और चक्र देवराज इंद्र ने अमृत कलश की सुरक्षा के लिए लगाए हुए है। चक्र में फंसकर मेरे पंख कट सकते है। इसलिए मैं अत्यंत छोटा रूप धारण कर इसके मध्य में प्रवेश करूंगा।

गरुड़ को देखकर एक देव ने कहा- “यह कोई असुर है जो वेश बदलकर अमृत चुकाने यहां तक पहुंचा है। हमे इसे खत्म कर देना चाहिए।”

दोनों देव विद्युत गति से गरुड़ पर टूट पड़े। लेकिन गरुड़ ने अपने पैने पंजो और तीखी चोंच से इन्हे इतना घायल कर दिया कि शीघ्र ही वे दोनों बेहोश होकर गिर पड़े। गरुड़ ने अमृत कलश पंजो में दबाया और वापस उड़ गया।

होश में आते ही दोनों रक्षक देव घबराए हुए इंद्र के पास पहुंचे और गरुड़ द्वारा अमृत कलश ले उड़ने की घटना बता दी।

यह सुनके इंद्र चकित होकर बोला- “ऐसा कैसे हो गया। सरोवर में रहने वाले विशाल कच्छप और तट पर रहने वाले महाकाय हाथी का क्या हुआ ?”

“उन दोनों को भी उस विशाल गरुड़ ने अपना भोजन बना लिया।”

यह सुनकर इंद्र अपनी देव सेवा की एक टुकड़ी के साथ वज्र उठाए इन्द्रपुरी से निकला और गरुड़ की खोज में बढ़ चला। आकाश मार्ग में उड़ते हुए शीघ्र ही उसने गरुड़ को देख लिया और अपना वज्र चला दिया। इंद्र के वज्र का गरुड़ पर कोई असर न हुआ। उसके डैनों से सिर्फ एक पंख वज्र से टकराकर नीचे आ गिरा। देव गरुड़ पर टूट पड़े लेकिन कुछ ही समय में गरुड़ ने उन्हें अपनी पैनी चोंच की मार से अधमरा कर दिया।

यह देख इंद्र सोचने लगा- “यह तो महान पराक्रमी है। मेरे वज्र का इस पर जरा भी असर नहीं हुआ। जबकि मेरे वज्र के प्रहार से पहाड़ तक टूट के चूर्ण बन जाते है। ऐसे पराक्रमी को शत्रुता से नहीं मित्रता से काबू में करना चाहिए।” यह सोचकर इंद्र ने गरुड़ से कहा- “पक्षीराज ! मैं तुम्हारी वीरता से बहुत प्रभावित हुआ हूं। इस अमृत कलश को मुझे सौंप दो और बदले में जो भी वर मांगना चाहते हो मांग लो।”

गरुड़ बोला- “यह अमृत मैं अपने लिए नही, अपनी माता को दासता से मुक्त कराने के लिए नाग माता को देने के लिए ले जा रहा हूं। इसलिए यह कलश मैं तुम्हे नहीं दूंगा।”

इंद्र बोला- “ठीक है, इस समय तुम कलश ले जाकर नाग माता को सौंप दो किन्तु उन्हें इसे प्रयोग मत करने देना। उचित मौका देखकर मैं वहां से यह कलश गायब कर दूंगा।”

गरुड़ बोला- “अगर मैं तुम्हारी बात को मान लूं तो मुझे बदले में क्या मिलेगा ?”

इंद्र बोला- “तुम्हारा मनपसंद भरपेट भोजन। तब मैं तुम्हे इन्ही नागो को खाने की इजाजत दे दूंगा।”

गरुड़ बोला- “यही तो मैं चाहता हूं। नाग मेरे स्वादिष्ट भोजन है किन्तु एक ही पिता की संतान होने के कारण मैं इन्हे कहते हुए हिचकता हूं। अब मेरी हिचक दूर हो गई। अब मैं आपके कथानुसार ही कार्य करूंगा।”

यह कहकर गरुड़ अमृत कलश लेकर कद्रु के पास पहुंचा और उससे बोला- “माते ! अपनी प्रतिज्ञानुसार मैं अमृत कलश ले आया हूं। अब आप अपने वचन से मेरी माता को मुक्त कर दे।”

कद्रु ने उसी क्षण विनता को वचन से मुक्त कर दिया और अगली सुबह अमृत नागो को पिलाने का निश्चय कर वहां से चली गई। रात को उचित मौका देखकर इंद्र ने अमृत कलश उठा लिया और पुनः उसी स्थान पर पहुंचा दिया।

दूसरे दिन सुबह नाग जब वहां पहुंचे तो अमृत कलश गायब देखकर दुखी हुए। उन्होंने उस कुशा को ही जिस पर अमृत कलश रखा था चाटना आरम्भ कर दिया जिसके कारण उनकी जीभ दो हिस्सों में फट गई।

गरुड़ की मातृभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ के सम्मुख प्रकट हो गए और बोले- “मैं तुम्हारी मातृभक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूं पक्षीराज ! मैं चाहता हूं कि अब से तुम मेरे वाहन के रूप में मेरे साथ रहा करो।”

गरुड़ बोला- “मैं बहुत भाग्यशाली हूं प्रभु जो स्वयं आपने मुझे अपना वाहन बनाना स्वीकार किया। आज से मैं हर क्षण आपकी सेवा में रहूंगा और आपको छोड़कर कही नहीं जाऊंगा।”

इस तरह उसी दिन से पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन के रूप में प्रयुक्त होने लगे। गरुड़ के भगवान विष्णु की सेवा में जाते ही देवता भयमुक्त हो गए।

और चूँकि नागों के छल के कारण गरुड़ की माँ विनीता को दासता स्वीकार करनी पड़ी इसलिए नाग और गरुड़ एक दूसरे के दुशमन है।

हवन


🔥🔥🔥 हवन 🔥🔥🔥
हवन कुंड और हवन के नियमों के बारे में विशेष जानकारी
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जन्म से मृत्युपर्यन्त सोलह संस्कार या कोई शुभ धर्म कृत्य यज्ञ अग्निहोत्र के बिना अधूरा माना जाता है। वैज्ञानिक तथ्यानुसार जहाॅ हवन होता है, उस स्थान के आस-पास रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु शीघ्र नष्ट हो जाते है।

शास्त्रों में अग्नि देव को जगत के कल्याण का माध्यम माना गया है जो कि हमारे द्वारा दी गयी होम आहुतियों को देवी देवताओं तक पहुंचाते है। जिससे देवगण तृप्त होकर कर्ता की कार्यसिद्धि करते है। इसलिये पुराणों में कहा गया है।

""अग्निर्वे देवानां दूतं ""

कोई भी मन्त्र जाप की पूर्णता , प्रत्येक संस्कार , पूजन अनुष्ठान आदि समस्त दैवीय कर्म , हवन के बिना अधूरा रहता है।
हवन दो प्रकार के होते हैं वैदिक तथा तांत्रिक. आप हवन वैदिक करायें या तांत्रिक दोनों प्रकार के हवनों को कराने के लिए हवन कुंड की वेदी और भूमि का निर्माण करना अनिवार्य होता हैं. शास्त्रों के अनुसार वेदी और कुंड हवन के द्वारा निमंत्रित देवी देवताओं की तथा कुंड की सज्जा की रक्षा करते हैं. इसलिए इसे “मंडल” भी कहा जाता हैं.

हवन की भूमि👉 हवन करने के लिए उत्तम भूमि को चुनना बहुत ही आवश्यक होता हैं. हवन के लिए सबसे उत्तम भूमि नदियों के किनारे की, मन्दिर की, संगम की, किसी उद्यान की या पर्वत के गुरु ग्रह और ईशान में बने हवन कुंड की मानी जाती हैं. हवन कुंड के लिए फटी हुई भूमि, केश युक्त भूमि तथा सांप की बाम्बी वाली भूमि को अशुभ माना जाता हैं.


हवन कुंड की बनावट👉 हवन कुंड में तीन सीढियाँ होती हैं. जिन्हें “ मेखला ” कहा जाता हैं. हवन कुंड की इन सीढियों का रंग अलग – अलग होता हैं.

1👉 हवन कुंड की सबसे पहली सीधी का रंग सफेद होता हैं.

2👉 दूसरी सीढि का रंग लाल होता हैं.

3👉 अंतिम सीढि का रंग काला होता हैं.
ऐसा माना जाता हैं कि हवन कुंड की इन तीनों सीढियों में तीन देवता निवास करते हैं.

1👉 हवन कुंड की पहली सीढि में विष्णु भगवान का वास होता हैं.

2👉 दूसरी सीढि में ब्रह्मा जी का वास होता हैं.

3👉 तीसरी तथा अंतिम सीढि में शिवजी का वास होता हैं.

हवन कुंड के बाहर गिरी सामग्री को हवन कुंड में न डालें - आमतौर पर जब हवन किया जाता हैं तो हवन में हवन सामग्री या आहुति डालते समय कुछ सामग्री नीचे गिर जाती हैं. जिसे कुछ लोग हवन पूरा होने के बाद उठाकर हवन कुंड में डाल देते हैं. ऐसा करना वर्जित माना गया हैं. हवन कुंड की ऊपर की सीढि पर अगर हवन सामग्री गिर गई हैं तो उसे आप हवन कुंड में दुबारा डाल सकते हैं. इसके अलावा दोनों सीढियों पर गिरी हुई हवन सामग्री वरुण देवता का हिस्सा होती हैं. इसलिए इस सामग्री को उन्हें ही अर्पित कर देना चाहिए।

तांत्रिक हवन कुंड 👉 वैदिक हवन कुंड के अलावा तांत्रिक हवन कुंड में भी कुछ यंत्रों का प्रयोग किया जाता हैं. तांत्रिक हवन करने के लिए आमतौर पर त्रिकोण कुंड का प्रयोग किया जाता हैं.

हवन कुंड और हवन के नियम
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हवन कुंड के प्रकार - हवन कुंड कई प्रकार के होते हैं. जैसे कुछ हवन कुंड वृताकार के होते हैं तो कुछ वर्गाकार अर्थात चौरस होते हैं. कुछ हवन कुंडों का आकार त्रिकोण तथा अष्टकोण भी होता हैं.

आहुति के अनुसार हवन कुंड बनवायें
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1👉 अगर अगर आपको हवन में 50 या 100 आहुति देनी हैं तो कनिष्ठा उंगली से कोहनी (1 फुट से 3 इंच )तक के माप का हवन कुंड तैयार करें.

2👉 यदि आपको 1000 आहुति का हवन करना हैं तो इसके लिए एक हाथ लम्बा (1 फुट 6 इंच ) हवन कुंड तैयार करें.

3👉 एक लक्ष आहुति का हवन करने के लिए चार हाथ (6 फुट) का हवनकुंड बनाएं.

4👉 दस लक्ष आहुति के लिए छ: हाथ लम्बा (9 फुट) हवन कुंड तैयार करें.

5👉 कोटि आहुति का हवन करने के लिए 8 हाथ का (12 फुट) या 16 हाथ का हवन कुंड तैयार करें.

6👉 यदि आप हवन कुंड बनवाने में असमर्थ हैं तो आप सामान्य हवन करने के लिए चार अंगुल ऊँचा, एक अंगुल ऊँचा, या एक हाथ लम्बा – चौड़ा स्थण्डिल पीली मिटटी या रेती का प्रयोग कर बनवा सकते हैं.

7👉 इसके अलावा आप हवन कुंड को बनाने के लिए बाजार में मिलने वाले ताम्बे के या पीतल के बने बनाए हवन कुंड का भी प्रयोग कर सकते हैं. शास्त्र के अनुसार इन हवन कुंडों का प्रयोग आप हवन करने के लिए कर सकते हैं. पीतल या ताम्बे के ये हवन कुंड ऊपर से चौड़े मुख के और नीचे से छोटे मुख के होते हैं. इनका प्रयोग अनेक विद्वान् हवन – बलिवैश्व – देव आदि के लिए करते हैं.

8👉 भविषयपुराण में 50 आहुति का हवन करने के लिए मुष्टिमात्र का निर्देश दिया गया हैं. भविष्यपूराण में बताये गए इस विषय के बारे में शारदातिलक तथा स्कन्दपुराण जैसे ग्रन्थों में कुछ मतभेद मिलता हैं।

हवन के नियम👉 वैदिक या तांत्रिक दोनों प्रकार के मानव कल्याण से सम्बन्धित यज्ञों को करने के लिए हवन में “मृगी” मुद्रा का इस्तेमाल करना चाहिए.


1👉 हवन कुंड में सामग्री डालने के लिए हमेशा शास्त्रों की आज्ञा, गुरु की आज्ञा तथा आचार्यों की आज्ञा का पालन करना चाहिए.

2👉 हवन करते समय आपके मन में यह विश्वास होना चाहिए कि आपके करने से कुछ भी नहीं होगा. जो होगा वह गुरु के करने से होगा.

3👉 कुंड को बनाने के लिए अड़गभूत वात, कंठ, मेखला तथा नाभि को आहुति एवं कुंड के आकार के अनुसार निश्चित किया जाना च हिए.

4👉 अगर इस कार्य में कुछ ज्यादा या कम हो जाते हैं तो इससे रोग शोक आदि विघ्न भी आ सकते हैं.

5👉 इसलिए हवन को तैयार करवाते समय केवल सुन्दरता का ही ध्यान न रखें बल्कि कुंड बनाने वाले से कुंड शास्त्रों के अनुसार तैयार करवाना चाहिए।

हवन करने के फायदे
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1👉 हवन करने से हमारे शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं.

2👉 हवन करने से आस – पास का वातावरण शुद्ध हो जाता हैं.

3👉 हवन ताप नाशक भी होता हैं.

4👉 हवन करने से आस–पास के वातावरण में ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ जाती हैं.

हवन से सम्बंधित कुछ आवश्यक बातें
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अग्निवास का विचार
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तिथि वार के अनुसार अग्नि का वास पृथ्वी ,आकाश व पाताल लोक में होता है। पृथ्वी का अग्नि वास समस्त सुख का प्रदाता है लेकिन आकाश का अग्नि वास शारीरिक कष्ट तथा पाताल का धन हानि कराता है। इसलिये नित्य हवन , संस्कार व अनुष्ठान को छोड़कर अन्य पूजन कार्य में हवन के लिये अग्निवास अवश्य देख लेना चाहिए।


हवन कार्य में विशेष सावधानियां
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मुँह से फूंक मारकर, कपड़े या अन्य किसी वस्तु से धोक देकर हवन कुण्ड में अग्नि प्रज्ज्वलित करना तथा जलती हुई हवन की अग्नि को हिलाना - डुलाना या छेड़ना नही चाहिए।

हवन कुण्ड में प्रज्ज्वलित हो रही अग्नि शिखा वाला भाग ही अग्नि देव का मुख कहलाता है। इस भाग पर ही आहुति करने से सर्वकार्य की सिद्धि होती है। अन्यथा

कम जलने वाला भाग नेत्र - यहाँ आहुति डालने पर अंधापन ,

धुँआ वाला भाग नासिका - यहां आहुति डालने से मानसिक कष्ट ,

अंगारा वाला भाग मस्तक - यहां आहुति डालने पर धन नाश तथा काष्ठ वाला भाग अग्नि देव का कर्ण कहलाता है यहां आहुति करने से शरीर में कई प्रकार की व्याधि हो जाती है। हवन अग्नि को पानी डालकर बुझाना नही चाहिए।

विशेष कामना पूर्ति के लिये अलग अलग होम सामग्रियों का प्रयोग भी किया जाता है।

सामान्य हवन सामग्री ये है
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तिल, जौं, चावल ,सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , पानड़ी , लौंग , बड़ी इलायची , गोला , छुहारे , सर्वोषधि ,नागर मौथा , इन्द्र जौ , कपूर काचरी , आँवला ,गिलोय, जायफल, ब्राह्मी तुलसी किशमिश, बालछड़ , घी आदि ......

हवन समिधाएँ
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कुछ अन्य समिधाओं का भी वाशिष्ठी हवन पद्धति में वर्णन है । उसमें ग्रहों तथा देवताओं के हिसाब से भी कुछ समिधाएँ बताई गई हैं। तथा विभिन्न वृक्षों की समिधाओं के फल भी अलग-अलग कहे गये हैं।

यथा-नोः पालाशीनस्तथा।
खादिरी भूमिपुत्रस्य त्वपामार्गी बुधस्य च॥
गुरौरश्वत्थजा प्रोक्त शक्रस्यौदुम्बरी मता ।
शमीनां तु शनेः प्रोक्त राहर्दूर्वामयी तथा॥
केतोर्दभमयी प्रोक्ताऽन्येषां पालाशवृक्षजा॥

आर्की नाशयते व्याधिं पालाशी सर्वकामदा।
खादिरी त्वर्थलाभायापामार्गी चेष्टादर्शिनी।
प्रजालाभाय चाश्वत्थी स्वर्गायौदुम्बरी भवेत।
शमी शमयते पापं दूर्वा दीर्घायुरेव च ।
कुशाः सर्वार्थकामानां परमं रक्षणं विदुः ।
यथा बाण हारणां कवचं वारकं भवेत ।
तद्वद्दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारिका॥
यथा समुत्थितं यन्त्रं यन्त्रेण प्रतिहन्यते ।
तथा समुत्थितं घोरं शीघ्रं शान्त्या प्रशाम्यति॥

अब समित (समिधा) का विचार कहते हैं, सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मङ्गल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की, और केतु की कुशा की समिधा कही गई है । इनके अतिरिक्त देवताओं के लिए पलाश वृक्ष की समिधा जाननी चाहिए । मदार की समिक्षा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है। जिस प्रकार बाण के प्रहारों को रोकने वाला कवच होता है, उसी प्रकार दैवोपघातों को रोकने वाली शान्ति होती है। जिस प्रकार उठे हुए अस्त्र को अस्त्र से काटा जाता है, उसी प्रकार (नवग्रह) शान्ति से घोर संकट शान्त हो जाते हैं।

ऋतुओं के अनुसार समिधा के लिए इन वृक्षों की लकड़ी विशेष उपयोगी सिद्ध होती है।

वसन्त-शमी
ग्रीष्म-पीपल
वर्षा-ढाक, बिल्व
शरद-पाकर या आम
हेमन्त-खैर
शिशिर-गूलर, बड़

यह लकड़ियाँ सड़ी घुनी, गन्दे स्थानों पर पड़ी हुई, कीडे़-मकोड़ों से भरी हुई न हों, इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।

विभिन्न हवन सामग्रियाँ और समिधाएं विभिन्न प्रकार के लाभ देती हैं। विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता देती हैं।

प्राचीन काल में रोगी को स्वस्थ करने हेतु भी विभिन्न हवन होते थे। जिसे वैद्य या चिकित्सक रोगी और रोग की प्रकृति के अनुसार करते थे पर कालांतर में ये यज्ञ या हवन मात्र धर्म से जुड़ कर ही रह गए और इनके अन्य उद्देश्य लोगों द्वारा भुला दिए गये।

सर भारी या दर्द होने पर किस प्रकार हवन से इलाज होता था इस श्लोक से देखिये :-
श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितलं मनःशिला।। गन्धाश्चा गुरुपत्राद्या धूमं मुर्धविरेचनम्।।
(चरक सू* 5/26-27)

अर्थात अपराजिता , मालकांगनी , हरताल, मैनसिल, अगर तथा तेज़पात्र औषधियों को हवन करने से शिरो विरेचन होता है।
परन्तु अब ये चिकित्सा पद्धति विलुप्त प्राय हो गयी है।

रोग और उनके नाश के लिए प्रयुक्त होने वाली हवन सामग्री
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१.👉 सर के रोग, सर दर्द, अवसाद, उत्तेजना, उन्माद मिर्गी आदि के लिए
ब्राह्मी, शंखपुष्पी , जटामांसी, अगर , शहद , कपूर , पीली सरसो

२.👉 स्त्री रोगों, वात पित्त, लम्बे समय से आ रहे बुखार हेतु बेल, श्योनक, अदरख, जायफल, निर्गुण्डी, कटेरी, गिलोय इलायची, शर्करा, घी, शहद, सेमल, शीशम

३.👉 पुरुषों को पुष्ट बलिष्ठ करने और पुरुष रोगों हेतु सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , अश्वगंधा , पलाश , कपूर , मखाने, गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , लौंग , बड़ी इलायची , गोला

४.👉 पेट एवं लिवर रोग हेतु भृंगराज, आमला , बेल , हरड़, अपामार्ग, गूलर, दूर्वा , गुग्गुल घी , इलायची

५👉 श्वास रोगों हेतु वन तुलसी, गिलोय, हरड , खैर अपामार्ग, काली मिर्च, अगर तगर, कपूर, दालचीनी, शहद, घी, अश्वगंधा, आक, यूकेलिप्टिस।

हवन में आहुति डालने के बाद क्या करें
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आहुति डालने के बाद तीन प्रकार के क्षेत्रों का विभाजित करने के बाद मध्य भाग में पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना करें. इसके बाद आठों दिशाओं की कल्पना करें. आठों दिशाओं के नाम हैं – पूर्व अग्नि, दक्षिण, नीऋति, पश्चिम, वायव्य, उत्तर तथा इशान।

हवन की पूर्णाहुति में ब्राह्मण भोजन
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""ब्रह्स्पतिसंहिता "" के अनुसार यज्ञ हवन की पूर्णाहुति वस्तु विशेष से कराने पर निम्न संख्या में ब्राह्मण भोजन अवश्य कराना चाहिए।

पान - 5 ब्राह्मण
पक्वान्न - 10 ब्राह्मण
ऋतुफल - 20 ब्राह्मण
सुपारी - 21 ब्राह्मण
नारियल - 100 ब्राह्मण
घृतधारा - 200 ब्राह्मण

हवन यज्ञ आदि से सम्बंधित समस्त जानकारियो के लिये ""यज्ञ मीमांसा "" देखे।
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लॉक डाउन

मध्य युग में पुरे यूरोप पे राज करने वाला रोम ( इटली ) नष्ट होने के कगार पे आ गया , मध्य पूर्व को अपने कदमो से रोदने वाला ओस्मानिया साम्राज्य ( ईरान , टर्की ) अब घुटनो पर हैं , जिनके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था , उस ब्रिटिश साम्राज्य के वारिश बर्मिंघम पैलेस में कैद हैं , जो स्वयं को आधुनिक युग की सबसे बड़ी शक्ति समझते थे , उस रूस के बॉर्डर सील हैं , जिनके एक इशारे पर दुनिया क नक़्शे बदल जाते हैं , जो पूरी दुनिया के अघोषित चौधरी हैं , उस अमेरिका में





लॉक डाउन हैं और जो आने वाले समय में सबको निगल जाना चाहते थे , वो चीन , आज मुँह छिपता फिर रहा है और सबकी गालिया खा रहा है।
एक जरा से परजीवी ने विश्व को घुटनो पर ला दिया ? न एटम बम काम आ रहे न पेट्रो रिफाइनारी ? मानव का सारा विकास एक छोटे से जीवाणु से सामना नहीं कर पा रहा ?? क्या हुआ , निकल गयी हेकड़ी ?? बस इतना ही कमाया था आपने इतने वर्षों में ,की एक छोटे से जीव ने घरो में कैद कर दिया ???
और ये सब देश आशा भरी नज़रो से देख रहे हैं हमारे देश की तरफ , उस भारत की ओर जिसका सदियों अपमान करते रहे , रोंदते रहे , लूटते रहे । एक मामूली से जीव ने आपको आपकी औकात बता दी
भारत जानता है कि युद्ध अभी शुरू हुआ है जैसे जैसे ग्लोवल वार्मिंग बढ़ेगी , ग्लेशियरो की बर्फ पिघलेगी , और आज़ाद होंगे लाखो वर्षो से बर्फ की चादर में कैद दानवीय विषाणु , जिनका न आपको परिचय है और न लड़ने की कोई तयारी , ये कोरोना तो झांकी है , चेतावनी है , उस आने वाली विपदा की , जिसे आपने जन्म दिया है।मेनचेस्टर की औध्योगिक क्रांति और हारवर्ड की इकोनॉमिक्स संसार को अंत के मुहाने पे ले आयी ।।।
क्या आप जानते हैं, इस आपदा से लड़ने का तरीका कहाँ छुपा है ? तक्षशिला के खंडहरो में , नालंदा की राख में , शारदा पीठ के अवशेषों में , मार्तण्डय के पत्थरो में ।।
सूछ्म एवं परजीवियों से मनुष्य का युद्ध नया नहीं है , ये तो सृष्टि के आरम्भ से अनवरत चल रहा है , और सदैव चलता रहेगा , इस से लड़ने के लिए के लिए हमने हर हथियार खोज भी लिया था , मगर आपके अहंकार, आपके लालच , स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की हठ धर्मिता ने सब नष्ट कर दिया ।
क्या चाहिए था आपको???? स्वर्ण एवं रत्नो के भंडार ? यूँ ही मांग लेते , राजा बलि के वंशज और कर्ण के अनुयायी आपको यूँ ही दान में दे देते ।सांसारिक वैभव को त्यागकर आंतरिक शांति की खोज करने वाले समाज के लिए वे सब यूँ भी मूल्य हीन ही थे , ले जाते ।मगर आपने ये क्या किया , विश्व वंधुत्वा की बात करने वाले समाज को नष्ट कर दिया ? जिस बर्बर का मन आया वही भारत चला आया , रोदने ,लूटने , मारने , जीव में शिव को देखने वाले समाज को नष्ट करने ।
*कोई विश्व विजेता बनने के लिए तक्ष शिला को तोड़ कर चला गया, कोई सोने की चमक में अँधा होकर सोमनाथ लूट कर ले गया , तो कोई किसी खुद को ऊँचा दिखाने के लिए नालंदा की किताबो को जला गया , किसी ने बर्बरता को जिताने के लिए शारदा पीठ टुकड़े टुकड़े कर दिया , तो किसी ने अपने झंडे को ऊंचा दिखाने के लिए विश्व कल्याण का केंद्र बने गुरुकुल परंपरा को ही नष्ट कर दिया ।और आज करुण निगाहों से देख रहे हैं उसी पराजित, अपमानित , पद दलित , भारत भूमि की ओर , जिसने अभी अभी अपने घावों को भरके अंगड़ाई लेना आरम्भ किया है ।*
किन्तु , हम फिर भी निराश नहीं करेंगे , फिर से माँ भारती का आँचल आपको इस संकट की घडी में छाँव देगा , श्रीराम के वंशज इस दानव से भी लड़ लेंगे ,
किन्तु...
*किन्तु, मार्ग उन्ही नष्ट हुए हवन कुंडो से निकलेगा , जिन्हे कभी आपने अपने पैरों की ठोकर से तोडा था ।आपको उसी नीम और पीपल की छाँव में आना होगा , जिसके लिए आपने हमारा उपहास किया था ।आपको उसी गाय की महिमा को स्वीकार करना होगा , जिसे आपने अपने स्वाद का कारण बना लिया ।उन्ही मंदिरो में जाके घंटा नाद करना होगा , जिनको कभी आपने तोडा था।उन्ही वेदो को पढ़ना होगा ,, जिन्हे कभी अट्टहास करते हुए नष्ट किया था।उसी चन्दन तुलसी को मष्तक पर धारण करना होगा , जिसके लिए कभी हमारे मष्तक धड़ से अलग किये गए थे ।*
ये प्रकृति का न्याय है और आपको स्वीकारना होगा।
*फिर कहता हूँ , इस दुनिया को अगर जीना है , तो सोमनाथ में सर झुकाने आना ही होगा , तक्षशिला के खंडहरो से माफ़ी मांगनी ही होगी , नालंदा की ख़ाक छाननी ही होगी । मंदिरों के घंटानाद से तीव्र साउंड फ्रिकवेंसी से कई वायरस मर जाते हैं यह आपने स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया है ।हाथ जोड़कर अभिवादन करना आपने शुरू कर दिया है ।बहुत जल्दी भारत की छांव में पूरी तरह आपको आना पड़ेगा*
सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामया ,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

श्री रुद्री पाठ

श्री रुद्री पाठ
ॐ अथात्मानग्ं शिवात्मानग् श्री रुद्ररूपं ध्यायेत् ॥
शुद्धस्फटिक संकाशं त्रिनेत्रं पंच वक्त्रकम् ।
गंगाधरं दशभुजं सर्वाभरण भूषितम् ॥
नीलग्रीवं शशांकांकं नाग यज्ञोप वीतिनम् ।
व्याघ्र चर्मोत्तरीयं च वरेण्यमभय प्रदम् ॥
कमंडल्-वक्ष सूत्राणां धारिणं शूलपाणिनम् ।
ज्वलंतं पिंगलजटा शिखा मुद्द्योत धारिणम् ॥
वृष स्कंध समारूढम् उमा देहार्थ धारिणम् ।
अमृतेनाप्लुतं शांतं दिव्यभोग समन्वितम् ॥
दिग्देवता समायुक्तं सुरासुर नमस्कृतम् ।
नित्यं च शाश्वतं शुद्धं ध्रुव-मक्षर-मव्ययम् ।
सर्व व्यापिन-मीशानं रुद्रं वै विश्वरूपिणम् ।
एवं ध्यात्वा द्विजः सम्यक् ततो यजनमारभेत् ॥
अथातो रुद्र स्नानार्चनाभिषेक विधिं व्या॓क्ष्यास्यामः ।
आदित एव तीर्थे स्नात्वा उदेत्य शुचिः प्रयतो ब्रह्मचारी शुक्लवासा देवाभिमुखः स्थित्वा आत्मनि देवताः स्थापयेत् ॥
प्रजनने ब्रह्मा तिष्ठतु । पादयोर्-विष्णुस्तिष्ठतु । हस्तयोर्-हरस्तिष्ठतु । बाह्वोरिंद्रस्तिष्टतु ।
जठरे‌ अग्निस्तिष्ठतु । हृद॑ये शिवस्तिष्ठतु ।
कंठे वसवस्तिष्ठंतु । वक्त्रे सरस्वती तिष्ठतु ।नासिकयोर्-वायुस्तिष्ठतु ।
नयनयोश्-चंद्रादित्यौ तिष्टेताम् । कर्णयोरश्विनौ तिष्टेताम् ।
ललाटे रुद्रास्तिष्ठंतु । मूर्थ्न्यादित्यास्तिष्ठंतु ।
शिरसि महादेवस्तिष्ठतु । शिखायां वामदेवास्तिष्ठतु ।
पृष्ठे पिनाकी तिष्ठतु । पुरतः शूली तिष्ठतु ।
पार्श्ययोः शिवाशंकरौ तिष्ठेताम् । सर्वतो वायुस्तिष्ठतु ।
ततो बहिः सर्वतो‌ ग्निर्-ज्वालामाला-परिवृतस्तिष्ठतु ।
सर्वेष्वंगेषु सर्वा देवता यथास्थानं तिष्ठंतु ।
माग्ं रक्षंतु ।
अ॒ग्निर्मे॑ वा॒चि श्रि॒तः । वाग्धृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
वा॒युर्मे॓ प्रा॒णे श्रि॒तः । प्रा॒णो हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
सूर्यो॑ मे॒ चक्षुषि श्रि॒तः । चक्षु॒र्-हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि
च॒द्रमा॑ मे॒ मन॑सि श्रि॒तः । मनो॒ हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ ।अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि।
दिशो॑ मे॒ श्रोत्रे॓ श्रि॒ताः ।श्रोत्र॒ग्॒ं॒ हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि
आपोमे॒ रेतसि श्रि॒ताः । रेतो हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
पृ॒थि॒वी मे॒ शरी॑रे श्रि॒ताः । शरी॑र॒ग्॒ं॒ हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
ओ॒ष॒धि॒ व॒न॒स्पतयो॑ मे॒ लोम॑सु श्रि॒ताः । लोमा॑नि॒ हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
इंद्रो॑ मे॒ बले॓ श्रि॒तः । बल॒ग्॒ं॒ हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
प॒र्जन्यो॑ मे॒ मू॒र्द्नि श्रि॒तः । मू॒र्धा हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
ईशा॑नो मे॒ म॒न्यौ श्रि॒तः । म॒न्युर्-हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
आ॒त्मा म॑ आ॒त्मनि॑ श्रि॒तः । आ॒त्मा हृद॑ये । हृद॑यं॒ मयि॑ । अ॒हम॒मृते॓ । अ॒मृतं॒ ब्रह्म॑णि ।
पुन॑र्म आ॒त्मा पुन॒रायु॒ रागा॓त् । पुनः॑ प्रा॒णः पुन॒राकू॑त॒मागा॓त् । वै॒श्वा॒न॒रो र॒श्मिभि॑र्-वावृधा॒नः । अ॒ंतस्ति॑ष्ठ॒त्वमृत॑स्य गो॒पाः ॥
ॐ अस्य श्री रुद्राध्याय प्रश्न महामंत्रस्य, अघोर ऋषिः, अनुष्टुप् चंदः, संकर्षण मूर्ति स्वरूपो यो‌ सावादित्यः परमपुरुषः स एष रुद्रो देवता ।
नमः शिवायेति बीजम् । शिवतरायेति शक्तिः । महादेवायेति कीलकम् ।
श्री सांब सदाशिव प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
ॐ अग्निहोत्रात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
दर्शपूर्ण मासात्मने तर्जनीभ्यां नमः ।
चातुर्-मास्यात्मने मध्यमाभ्यां नमः ।
निरूढ पशुबंधात्मने अनामिकाभ्यां नमः ।
ज्योतिष्टोमात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
सर्वक्रत्वात्मने करतल करपृष्ठाभ्यां नमः ॥
अग्निहोत्रात्मने हृदयाय नमः ।
दर्शपूर्ण मासात्मने शिरसे स्वाहा ।
चातुर्-मास्यात्मने शिखायै वषट् ।
निरूढ पशुबंधात्मने कवचाय हुम् ।
ज्योतिष्टोमात्मने नेत्रत्रयाय वौषट् ।
सर्वक्रत्वात्मने अस्त्रायफट् ।
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बंधः ॥
ध्यानं-----------------


आपाताल-नभःस्थलांत-भुवन-ब्रह्मांड-माविस्फुरत्-ज्योतिः स्फाटिक-लिंग-मौलि-विलसत्-पूर्णेंदु-वांतामृतैः ।
अस्तोकाप्लुत-मेक-मीश-मनिशं रुद्रानु-वाकांजपन् ध्याये-दीप्सित-सिद्धये ध्रुवपदं विप्रो‌உभिषिंचे-च्चिवम् ॥
ब्रह्मांड व्याप्तदेहा भसित हिमरुचा भासमाना भुजंगैः कंठे कालाः कपर्दाः कलित-शशिकला-श्चंड कोदंड हस्ताः
त्र्यक्षा रुद्राक्षमालाः प्रकटितविभवाः शांभवा मूर्तिभेदाः रुद्राः श्रीरुद्रसूक्त-प्रकटितविभवा नः प्रयच्चंतु सौख्यम् ॥
ॐ ग॒णाना॓म् त्वा ग॒णप॑तिग्ं हवामहे क॒विं क॑वी॒नामु॑प॒मश्र॑वस्तमम् । ज्ये॒ष्ठ॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणस्पद॒ आ नः॑ शृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑स्सीद॒ साद॑नम् ॥
ॐ महागणपतये॒ नमः ॥
ॐ शं च॑ मे॒ मय॑श्च मे प्रि॒यं च॑ मे‌ नुका॒मश्च॑ मे॒ काम॑श्च मे सौमनस॒श्च॑ मे भ॒द्रं च॑ मे॒ श्रेय॑श्च मे॒ वस्य॑श्च मे॒ यश॑श्च मे॒ भग॑श्च मे॒ द्रवि॑णं च मे य॒ंता च॑ मे ध॒र्ता च॑ मे॒ क्षेम॑श्च मे॒ धृति॑श्च मे॒ विश्वं॑ च मे॒ मह॑श्च मे स॒ंविच्च॑ मे॒ ज्ञात्रं॑ च मे॒ सूश्च॑ मे प्र॒सूश्च॑ मे॒ सीरं॑ च मे ल॒यश्च॑ म ऋ॒तं च॑ मे॒‌உमृतं॑ च मे‌உय॒क्ष्मं च॒ मे‌உना॑मयच्च मे जी॒वातु॑श्च मे दीर्घायु॒त्वं च॑ मे‌உनमि॒त्रं च॒ मे‌ भ॑यं च मे सु॒गं च॑ मे॒ शय॑नं च मे सू॒षा च॑ मे॒ सु॒दिनं॑ च मे ॥
ॐ शांतिः॒ शांतिः॒ शांतिः॑ ॥
श्री रुद्र प्रश्नः
कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता
चतुर्थं वैश्वदेवं काण्डम् पञ्चमः प्रपाठकः
ॐ नमो भगवते॑ रुद्राय ॥
ॐ नम॑स्ते रुद्र म॒न्यव॑ उ॒तोत॒ इष॑वे॒ नमः॑ ।
नम॑स्ते अस्तु॒ धन्व॑ने बा॒हुभ्या॑मु॒त ते॒ नमः॑ ।
या त॒ इषुः॑ शि॒वत॑मा शि॒वं ब॒भूव॑ ते॒ धनुः॑ ।
शि॒वा श॑र॒व्या॑ या तव॒ तया॑ नो रुद्र मृडय ।
या ते॑ रुद्र शि॒वा त॒नूरघो॒रा‌ पा॑पकाशिनी ।
तया॑ नस्त॒नुवा॒ शन्त॑मया॒ गिरि॑शन्ता॒भिचा॑कशीहि ।
यामिषुं॑ गिरिशन्त॒ हस्ते॒ बिभ॒र्ष्यस्त॑वे ।
शि॒वां गि॑रित्र॒ तां कु॑रु॒ मा हिग्ं॑सीः॒ पुरु॑षं॒ जग॑त् ।
शि॒वेन॒ वच॑सा त्वा॒ गिरि॒शाच्छा॑वदामसि ।
यथा॑ नः॒ सर्व॒मिज्जग॑दय॒क्ष्मग्ं सु॒मना॒ अस॑त् ।
अध्य॑वोचदधिव॒क्ता प्र॑थ॒मो दैव्यो॑ भि॒षक् ।
अहीग्॑‍श्च॒ सर्वां॓ज॒म्भय॒न्त्सर्वा॓श्च यातुधा॒न्यः॑ ।
अ॒सौ यस्ता॒म्रो अ॑रु॒ण उ॒त ब॒भ्रुः सु॑म॒ङ्गलः॑ ।
ये चे॒माग्ं रु॒द्रा अ॒भितो॑ दि॒क्षु श्रि॒ताः स॑हस्र॒शो‌ वैषा॒ग्॒ं॒ हेड॑ ईमहे ।
अ॒सौ यो॑‌ वसर्प॑ति॒ नील॑ग्रीवो॒ विलो॑हितः ।
उ॒तैनं॑ गो॒पा अ॑दृश॒न्-नदृ॑शन्-नुदहा॒र्यः॑ ।
उ॒तैनं॒ विश्वा॑ भू॒तानि॒ स दृ॒ष्टो मृ॑डयाति नः ।
नमो॑ अस्तु नील॑ग्रीवाय सहस्रा॒क्षाय॒ मी॒ढुषे॓ ।
अथो॒ ये अ॑स्य॒ सत्वा॑नो॒‌ हं तेभ्यो॑‌ कर॒न्नमः॑ ।
प्रमुं॑च॒ धन्व॑न॒स्-त्व॒मु॒भयो॒रार्त्नि॑ यो॒र्ज्याम् ।
याश्च ते॒ हस्त॒ इष॑वः॒ परा॒ ता भ॑गवो वप ।
अ॒व॒तत्य॒ धनु॒स्त्वग्ं सह॑स्राक्ष॒ शते॑षुधे ।
नि॒शीर्य॑ श॒ल्यानां॒ मुखा॑ शि॒वो नः॑ सु॒मना॑ भव ।
विज्यं॒ धनुः॑ कप॒र्दिनो॒ विश॑ल्यो॒ बाण॑वाग्म् उ॒त ।
अने॑श॒न्-नस्येष॑व आ॒भुर॑स्य निष॒ङ्गथिः॑ ।
या ते॑ हे॒तिर्-मी॑डुष्टम॒ हस्ते॑ ब॒भूव॑ ते॒ धनुः॑ ।
तया॒‌ स्मान्, वि॒श्वत॒स्-त्वम॑य॒क्ष्मया॒ परि॑ब्भुज ।
नम॑स्ते अ॒स्त्वायुधा॒याना॑तताय धृ॒ष्णवे॓ ।
उ॒भाभ्या॑मु॒त ते॒ नमो॑ बा॒हुभ्यां॒ तव॒ धन्व॑ने ।
परि॑ ते॒ धन्व॑नो हे॒तिर॒स्मान्-वृ॑णक्तु वि॒श्वतः॑ ।
अथो॒ य इ॑षु॒धिस्तवा॒रे अ॒स्मन्निधे॑हि॒ तम् ॥ 1 ॥
ॐ शम्भ॑वे॒ नमः॑ ।
नम॑स्ते अस्तु भगवन्-विश्वेश्व॒राय॑ महादे॒वाय॑ त्र्यम्ब॒काय॑ त्रिपुरान्त॒काय॑ त्रिकाग्निका॒लाय॑ कालाग्निरु॒द्राय॑ नील॒कण्ठाय॑ मृत्युञ्ज॒याय॑ सर्वेश्व॑राय॑ सदाशि॒वाय॑ श्रीमन्-महादे॒वाय॒ नमः॑ ॥1||
नमो॒ हिर॑ण्य बाहवे सेना॒न्ये॑ दि॒शां च॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ वृ॒क्षेभ्यो॒ हरि॑केशेभ्यः पशू॒नां पत॑ये॒ नमो॒ नमः॑ स॒स्पिञ्ज॑राय॒ त्विषी॑मते पथी॒नां पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ बभ्लु॒शाय॑ विव्या॒धिने‌உन्ना॑नां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॒ हरि॑केशायोपवी॒तिने॑ पु॒ष्टानां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ भ॒वस्य॑ हे॒त्यै जग॑तां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ रु॒द्राया॑तता॒विने॒ क्षेत्रा॑णां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमः॑ सू॒तायाहं॑त्याय॒ वना॑नां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॒ रोहि॑ताय स्थ॒पत॑ये वृ॒क्षाणां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ म॒न्त्रिणे॑ वाणि॒जाय॒ कक्षा॑णां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ भुव॒न्तये॑ वारिवस्कृ॒ता-यौष॑धीनां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नम॑ उ॒च्चैर्-घो॑षायाक्र॒न्दय॑ते पत्ती॒नां पत॑ये॒ नमो॒ नमः॑ कृत्स्नवी॒ताय॒ धाव॑ते॒ सत्त्व॑नां॒ पत॑ये॒ नमः॑ ॥ 2 ॥
नमः॒ सह॑मानाय निव्या॒धिन॑ आव्या॒धिनी॑नां॒ पत॑ये नमो॒ नमः॑ ककु॒भाय॑ निष॒ङ्गिणे॓ स्ते॒नानां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ निष॒ङ्गिण॑ इषुधि॒मते॑ तस्क॑राणां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॒ वञ्च॑ते परि॒वञ्च॑ते स्तायू॒नां पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ निचे॒रवे॑ परिच॒रायार॑ण्यानां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमः॑ सृका॒विभ्यो॒ जिघाग्ं॑सद्भ्यो मुष्ण॒तां पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑‌உसि॒मद्भ्यो॒ नक्त॒ञ्चर॑द्भ्यः प्रकृ॒न्तानां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नम॑ उष्णी॒षिने॑ गिरिच॒राय॑ कुलु॒ञ्चानां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नम॒ इषु॑मद्भ्यो धन्वा॒विभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नम॑ आतन्-वा॒नेभ्यः॑ प्रति॒दधा॑नेभ्यश्च वो॒ नमो॒ नम॑ आ॒यच्छ॒॑द्भ्यो विसृ॒जद्-भ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमो‌உस्स॑द्भ्यो॒ विद्य॑द्-भ्यश्च वो॒ नमो॒ नम॒ आसी॑नेभ्यः॒ शया॑नेभ्यश्च वो॒ नमो॒ नमः॑ स्व॒पद्भ्यो॒ जाग्र॑द्-भ्यश्च वो॒ नमो॒ नम॒स्तिष्ठ॑द्भ्यो॒ धाव॑द्-भ्यश्च वो॒ नमो॒ नमः॑ स॒भाभ्यः॑ स॒भाप॑तिभ्यश्च वो॒ नमो॒ नमो॒ अश्वे॒भ्यो‌ श्व॑पतिभ्यश्च वो॒ नमः॑ ॥ 3 ॥
नम॑ आव्या॒धिनी॓भ्यो वि॒विध्य॑न्तीभ्यश्च वो॒ नमो॒ नम॒ उग॑णाभ्यस्तृगं-ह॒तीभ्यश्च॑ वो॒ नमो॒ नमो॑ गृ॒त्सेभ्यो॑ गृ॒त्सप॑तिभ्यश्च वो॒ नमो॒ नमो॒ व्राते॓भ्यो॒ व्रात॑पतिभ्यश्च वो॒ नमो॒ नमो॑ ग॒णेभ्यो॑ ग॒णप॑तिभ्यश्च वो॒ नमो॒ नमो॒ विरू॑पेभ्यो वि॒श्वरू॑पेभ्यश्च वो॒ नमो॒ नमो॑ मह॒द्भ्यः॑, क्षुल्ल॒केभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमो॑ र॒थिभ्यो॒‌உर॒थेभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमो॒ रथे॓भ्यो॒ रथ॑पतिभ्यश्च वो॒ नमो॒ नमः॑ सेना॓भ्यः सेना॒निभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमः॑, क्ष॒त्तृभ्यः॑ सङ्ग्रही॒तृभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नम॒स्तक्ष॑भ्यो रथका॒रेभ्य॑श्च वो॒ नमो॑ नमः॒ कुला॑लेभ्यः क॒र्मारे॓भ्यश्च वो॒ नमो॒ नमः॑ पु॒ञ्जिष्टे॓भ्यो निषा॒देभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमः॑ इषु॒कृद्भ्यो॑ धन्व॒कृद्-भ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमो॑ मृग॒युभ्यः॑ श्व॒निभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमः॒ श्वभ्यः॒ श्वप॑तिभ्यश्च वो॒ नमः॑ ॥ 4 ॥
नमो॑ भ॒वाय॑ च रु॒द्राय॑ च॒ नमः॑ श॒र्वाय॑ च पशु॒पत॑ये च॒ नमो॒ नील॑ग्रीवाय च शिति॒कण्ठा॑य च॒ नमः॑ कप॒र्धिने॑ च॒ व्यु॑प्तकेशाय च॒ नमः॑ सहस्रा॒क्षाय॑ च श॒तध॑न्वने च॒ नमो॑ गिरि॒शाय॑ च शिपिवि॒ष्टाय॑ च॒ नमो॑ मी॒ढुष्ट॑माय॒ चेषु॑मते च॒ नमो॓ ह्र॒स्वाय॑ च वाम॒नाय॑ च॒ नमो॑ बृह॒ते च॒ वर्षी॑यसे च॒ नमो॑ वृ॒द्धाय॑ च स॒ंवृध्व॑ने च॒ नमो॒ अग्रि॑याय च प्रथ॒माय॑ च॒ नम॑ आ॒शवे॑ चाजि॒राय॑ च॒ नमः॒ शीघ्रि॑याय च॒ शीभ्या॑य च॒ नम॑ ऊ॒र्म्या॑य चावस्व॒न्या॑य च॒ नमः॑ स्त्रोत॒स्या॑य च॒ द्वीप्या॑य च ॥ 5 ॥
नमो॓ ज्ये॒ष्ठाय॑ च कनि॒ष्ठाय॑ च॒ नमः॑ पूर्व॒जाय॑ चापर॒जाय॑ च॒ नमो॑ मध्य॒माय॑ चापग॒ल्भाय॑ च॒ नमो॑ जघ॒न्या॑य च॒ बुध्नि॑याय च॒ नमः॑ सो॒भ्या॑य च प्रतिस॒र्या॑य च॒ नमो॒ याम्या॑य च॒ क्षेम्या॑य च॒ नम॑ उर्व॒र्या॑य च॒ खल्या॑य च॒ नमः॒ श्लोक्या॑य चा‌ वसा॒न्या॑य च॒ नमो॒ वन्या॑य च॒ कक्ष्या॑य च॒ नमः॑ श्र॒वाय॑ च प्रतिश्र॒वाय॑ च॒ नम॑ आ॒शुषे॑णाय चा॒शुर॑थाय च॒ नमः॒ शूरा॑य चावभिन्द॒ते च॒ नमो॑ व॒र्मिणे॑ च वरू॒धिने॑ च॒ नमो॑ बि॒ल्मिने॑ च कव॒चिने॑ च॒ नमः॑ श्रु॒ताय॑ च श्रुतसे॑नाय॒ च ॥ 6 ॥
नमो॑ दुन्दु॒भ्या॑य चाहन॒न्या॑य च॒ नमो॑ धृ॒ष्णवे॑ च प्रमृ॒शाय॑ च॒ नमो॑ दू॒ताय॑ च प्रहि॑ताय च॒ नमो॑ निष॒ङ्गिणे॑ चेषुधि॒मते॑ च॒ नम॑स्-ती॒क्ष्णेष॑वे चायु॒धिने॑ च॒ नमः॑ स्वायु॒धाय॑ च सु॒धन्व॑ने च॒ नमः॒ स्रुत्या॑य च॒ पथ्या॑य च॒ नमः॑ का॒ट्या॑य च नी॒प्या॑य च॒ नमः॒ सूद्या॑य च सर॒स्या॑य च॒ नमो॑ ना॒द्याय॑ च वैश॒न्ताय॑ च॒ नमः॒ कूप्या॑य चाव॒ट्या॑य च॒ नमो॒ वर्ष्या॑य चाव॒र्ष्याय॑ च॒ नमो॑ मे॒घ्या॑य च विद्यु॒त्या॑य च॒ नम ई॒ध्रिया॑य चात॒प्या॑य च॒ नमो॒ वात्या॑य च॒ रेष्मि॑याय च॒ नमो॑ वास्त॒व्या॑य च वास्तु॒पाय॑ च ॥ 7 ॥
नमः॒ सोमा॑य च रु॒द्राय॑ च॒ नम॑स्ता॒म्राय॑ चारु॒णाय॑ च॒ नमः॑ श॒ङ्गाय॑ च पशु॒पत॑ये च॒ नम॑ उ॒ग्राय॑ च भी॒माय॑ च॒ नमो॑ अग्रेव॒धाय॑ च दूरेव॒धाय॑ च॒ नमो॑ ह॒न्त्रे च॒ हनी॑यसे च॒ नमो॑ वृ॒क्षेभ्यो॒ हरि॑केशेभ्यो॒ नम॑स्ता॒राय॒ नम॑श्श॒म्भवे॑ च मयो॒भवे॑ च॒ नमः॑ शङ्क॒राय॑ च मयस्क॒राय॑ च॒ नमः॑ शि॒वाय॑ च शि॒वत॑राय च॒ नम॒स्तीर्थ्या॑य च॒ कूल्या॑य च॒ नमः॑ पा॒र्या॑य चावा॒र्या॑य च॒ नमः॑ प्र॒तर॑णाय चो॒त्तर॑णाय च॒ नम॑ आता॒र्या॑य चाला॒द्या॑य च॒ नमः॒ शष्प्या॑य च॒ फेन्या॑य च॒ नमः॑ सिक॒त्या॑य च प्रवा॒ह्या॑य च ॥ 8 ॥
नम॑ इरि॒ण्या॑य च प्रप॒थ्या॑य च॒ नमः॑ किग्ंशि॒लाय॑ च॒ क्षय॑णाय च॒ नमः॑ कप॒र्दिने॑ च॒ पुल॒स्तये॑ च॒ नमो॒ गोष्ठ्या॑य च॒ गृह्या॑य च॒ नम॒स्-तल्प्या॑य च॒ गेह्या॑य च॒ नमः॑ का॒ट्या॑य च गह्वरे॒ष्ठाय॑ च॒ नमो॓ हृद॒य्या॑य च निवे॒ष्प्या॑य च॒ नमः॑ पाग्ं स॒व्या॑य च रज॒स्या॑य च॒ नमः॒ शुष्क्या॑य च हरि॒त्या॑य च॒ नमो॒ लोप्या॑य चोल॒प्या॑य च॒ नम॑ ऊ॒र्म्या॑य च सू॒र्म्या॑य च॒ नमः॑ प॒र्ण्याय च पर्णश॒द्या॑य च॒ नमो॑‌ पगु॒रमा॑णाय चाभिघ्न॒ते च॒ नम॑ आख्खिद॒ते च॒ प्रख्खिद॒ते च॒ नमो॑ वः किरि॒केभ्यो॑ दे॒वाना॒ग्ं॒ हृद॑येभ्यो॒ नमो॑ विक्षीण॒केभ्यो॒ नमो॑ विचिन्व॒त्-केभ्यो॒ नम॑ आनिर् ह॒तेभ्यो॒ नम॑ आमीव॒त्-केभ्यः॑ ॥ 9 ॥
द्रापे॒ अन्ध॑सस्पते॒ दरि॑द्र॒न्-नील॑लोहित ।
ए॒षां पुरु॑षाणामे॒षां प॑शू॒नां मा भेर्मा‌ रो॒ मो ए॑षां॒ किञ्च॒नाम॑मत् ।
या ते॑ रुद्र शि॒वा त॒नूः शि॒वा वि॒श्वाह॑भेषजी ।
शि॒वा रु॒द्रस्य॑ भेष॒जी तया॑ नो मृड जी॒वसे॓ ॥
इ॒माग्ं रु॒द्राय॑ त॒वसे॑ कप॒र्दिने॓ क्ष॒यद्वी॑राय॒ प्रभ॑रामहे म॒तिम् ।
यथा॑ नः॒ शमस॑द् द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे॒ विश्वं॑ पु॒ष्टं ग्रामे॑ अ॒स्मिन्नना॑तुरम् ।
मृ॒डा नो॑ रुद्रो॒त नो॒ मय॑स्कृधि क्ष॒यद्वी॑राय॒ नम॑सा विधेम ते ।
यच्छं च॒ योश्च॒ मनु॑राय॒जे पि॒ता तद॑श्याम॒ तव॑ रुद्र॒ प्रणी॑तौ ।
मा नो॑ म॒हान्त॑मु॒त मा नो॑ अर्भ॒कं मा न॒ उक्ष॑न्तमु॒त मा न॑ उक्षि॒तम् ।
मा नो॑‌ वधीः पि॒तरं॒ मोत मा॒तरं॑ प्रि॒या मा न॑स्त॒नुवो॑ रुद्र रीरिषः ।
मा न॑स्तो॒के तन॑ये॒ मा न॒ आयु॑षि॒ मा नो॒ गोषु॒ मा नो॒ अश्वे॑षु रीरिषः ।
वी॒रान्मा नो॑ रुद्र भामि॒तो‌ व॑धीर्-ह॒विष्म॑न्तो॒ नम॑सा विधेम ते ।
आ॒रात्ते॑ गो॒घ्न उ॒त पू॑रुष॒घ्ने क्ष॒यद्वी॑राय सु॒म्-नम॒स्मे ते॑ अस्तु ।
रक्षा॑ च नो॒ अधि॑ च देव ब्रू॒ह्यथा॑ च नः॒ शर्म॑ यच्छ द्वि॒बर्हा॓ः ।
स्तु॒हि श्रु॒तं ग॑र्त॒सदं॒ युवा॑नं मृ॒गन्न भी॒ममु॑पह॒न्तुमु॒ग्रम् ।
मृ॒डा ज॑रि॒त्रे रु॑द्र॒ स्तवा॑नो अ॒न्यन्ते॑ अ॒स्मन्निव॑पन्तु॒ सेना॓ः ।
परि॑णो रु॒द्रस्य॑ हे॒तिर्-वृ॑णक्तु॒ परि॑ त्वे॒षस्य॑ दुर्म॒ति र॑घा॒योः ।
अव॑ स्थि॒रा म॒घव॑द्-भ्यस्-तनुष्व मीढ्-व॑स्तो॒काय॒ तन॑याय मृडय ।
मीढु॑ष्टम॒ शिव॑मत शि॒वो नः॑ सु॒मना॑ भव ।
प॒र॒मे वृ॒क्ष आयु॑धन्नि॒धाय॒ कृत्तिं॒ वसा॑न॒ आच॑र॒ पिना॑कं॒ बिभ्र॒दाग॑हि ।
विकि॑रिद॒ विलो॑हित॒ नम॑स्ते अस्तु भगवः ।
यास्ते॑ स॒हस्रग्ं॑ हे॒तयो॒न्यम॒स्मन्-निव॒पन्तु ताः ।
स॒हस्रा॑णि सहस्र॒धा बा॑हु॒वोस्तव॑ हे॒तयः॑ ।
तासा॒मीशा॑नो भगवः परा॒चीना॒ मुखा॑ कृधि ॥ 10 ॥
स॒हस्रा॑णि सहस्र॒शो ये रु॒द्रा अधि॒ भूम्या॓म् ।
तेषाग्ं॑ सहस्रयोज॒ने‌व॒धन्वा॑नि तन्मसि ।
अ॒स्मिन्-म॑ह॒त्-य॑र्ण॒वे॓‌न्तरि॑क्षे भ॒वा अधि॑ ।
नील॑ग्रीवाः शिति॒कण्ठा॓ः श॒र्वा अ॒धः, क्ष॑माच॒राः ।
नील॑ग्रीवाः शिति॒कण्ठा॒ दिवग्ं॑ रु॒द्रा उप॑श्रिताः ।
ये वृ॒क्षेषु॑ स॒स्पिञ्ज॑रा॒ नील॑ग्रीवा॒ विलो॑हिताः ।
ये भू॒ताना॒म्-अधि॑पतयो विशि॒खासः॑ कप॒र्दि॑नः ।
ये अन्ने॑षु वि॒विध्य॑न्ति॒ पात्रे॑षु॒ पिब॑तो॒ जनान्॑ ।
ये प॒थां प॑थि॒रक्ष॑य ऐलबृ॒दा॑ य॒व्युधः॑ ।
ये ती॒र्थानि॑ प्र॒चर॑न्ति सृ॒काव॑न्तो निष॒ङ्गिणः॑ ।
य ए॒ताव॑न्तश्च॒ भूयाग्ं॑सश्च॒ दिशो॑ रु॒द्रा वि॑तस्थि॒रे ।
तेषाग्ं॑ सहस्रयोज॒ने‌व॒धन्वा॑नि तन्मसि ।
नमो॑ रु॒ध्रेभ्यो॒ ये पृ॑थि॒व्यां ये॓‌न्तरि॑क्षे ये दि॒वि येषा॒मन्नं॒ वातो॑ व॒र्-ष॒मिष॑व॒स्-तेभ्यो॒ दश॒ प्राची॒र्दश॑ दक्षि॒णा दश॑ प्र॒तीची॒र्-दशो-दी॑ची॒र्-दशो॒र्ध्वास्-तेभ्यो॒ नम॒स्ते नो॑ मृडयन्तु॒ ते यं द्वि॒ष्मो यश्च॑ नो॒ द्वेष्टि॒ तं वो॒ जम्भे॑ दधामि ॥ 11 ॥
त्र्यं॑बकं यजामहे सुग॒न्धिं पु॑ष्टि॒वर्ध॑नम् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्-मृत्यो॑र्-मुक्षीय॒ मा‌ मृता॓त् ।
यो रु॒द्रो अ॒ग्नौ यो अ॒प्सु य ओष॑धीषु॒ यो रु॒द्रो विश्वा॒ भुव॑ना वि॒वेश॒ तस्मै॑ रु॒द्राय॒ नमो॑ अस्तु ।
तमु॑ ष्टु॒हि॒ यः स्वि॒षुः सु॒धन्वा॒ यो विश्व॑स्य॒ क्षय॑ति भेष॒जस्य॑ ।
यक्ष्वा॓म॒हे सौ॓मन॒साय॑ रु॒द्रं नमो॓भिर्-दे॒वमसु॑रं दुवस्य ।
अ॒यं मे॒ हस्तो॒ भग॑वान॒यं मे॒ भग॑वत्तरः ।
अ॒यं मे॓ वि॒श्वभे॓षजो॒‌यग्ं शि॒वाभि॑मर्शनः ।
ये ते॑ स॒हस्र॑म॒युतं॒ पाशा॒ मृत्यो॒ मर्त्या॑य॒ हन्त॑वे ।
तान् य॒ज्ञस्य॑ मा॒यया॒ सर्वा॒नव॑ यजामहे ।
मृ॒त्यवे॒ स्वाहा॑ मृ॒त्यवे॒ स्वाहा॓ ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय विष्णवे मृत्यु॑र्मे पा॒हि ॥
प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो मा॑ विशा॒न्तकः । तेनान्नेना॓प्याय॒स्व ॥
सदाशि॒वोम् ।
ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑
ॐ अग्ना॑विष्णो स॒जोष॑से॒माव॑र्धन्तु वां॒ गिरः॑ ।
द्यु॒म्नैर्-वाजे॑भिराग॑तम् ।
वाज॑श्च मे प्रस॒वश्च॑ मे॒ प्रय॑तिश्च मे॒ प्रसि॑तिश्च मे धी॒तिश्च॑ मे क्रतु॑श्च मे॒ स्वर॑श्च मे॒ श्लोक॑श्च मे॒ श्रा॒वश्च॑ मे॒ श्रुति॑श्च मे॒ ज्योति॑श्च मे॒ सुव॑श्च मे प्रा॒णश्च॑ मे‌ पा॒नश्च॑ मे व्या॒नश्च॒ मे‌ सु॑श्च मे चि॒त्तं च॑ म॒ आधी॑तं च मे॒ वाक्च॑ मे॒ मन॑श्च मे॒ चक्षु॑श्च मे॒ श्रोत्रं॑ च मे॒ दक्ष॑श्च मे॒ बलं॑ च म॒ ओज॑श्च मे॒ सह॑श्च म॒ आयु॑श्च मे ज॒रा च॑ म आ॒त्मा च॑ मे त॒नूश्च॑ मे॒ शर्म॑ च मे॒ वर्म॑ च॒ मे‌ ङ्गा॑नि च मे॒‌ स्थानि॑ च मे॒ परूग्ं॑षि च मे॒ शरी॑राणि च मे ॥ 1 ॥
जैष्ठ्यं॑ च म॒ आधि॑पत्यं च मे म॒न्युश्च॑ मे॒ भाम॑श्च॒ मे‌ म॑श्च॒ मे‌ म्भ॑श्च मे जे॒मा च॑ मे महि॒मा च॑ मे वरि॒मा च॑ मे प्रथि॒मा च॑ मे व॒र्ष्मा च॑ मे द्राघु॒या च॑ मे वृ॒द्धं च॑ मे॒ वृद्धि॑श्च मे स॒त्यं च॑ मे श्र॒द्धा च॑ मे॒ जग॑च्च मे॒ धनं॑ च मे॒ वश॑श्च मे॒ त्विषि॑श्च मे क्री॒डा च॑ मे॒ मोद॑श्च मे जा॒तं च॑ मे जनि॒ष्यमा॑णं च मे सू॒क्तं च॑ मे सुकृ॒तं च॑ मे वि॒त्तं च॑ मे॒ वेद्यं॑ च मे भूतं च॑ मे भवि॒ष्यच्च॑ मे सु॒गं च॑ मे सु॒पथं च म ऋ॒द्धं च म ऋद्धिश्च मे क्लु॒प्तं च॑ मे॒ क्लुप्ति॑श्च मे म॒तिश्च॑ मे सुम॒तिश्च॑ मे ॥ 2 ॥
शं च॑ मे॒ मय॑श्च मे प्रि॒यं च॑ मे‌ नुका॒मश्च॑ मे॒ काम॑श्च मे सौमनस॒श्च॑ मे भ॒द्रं च॑ मे॒ श्रेय॑श्च मे॒ वस्य॑श्च मे॒ यश॑श्च मे॒ भग॑श्च मे॒ द्रवि॑णं च मे य॒न्ता च॑ मे ध॒र्ता च॑ मे॒ क्षेम॑श्च मे॒ धृति॑श्च मे॒ विश्वं॑ च मे॒ मह॑श्च मे स॒ंविच्च॑ मे॒ ज्ञात्रं॑ च मे॒ सूश्च॑ मे प्र॒सूश्च॑ मे॒ सीरं॑ च मे ल॒यश्च॑ म ऋ॒तं च॑ मे॒‌ मृतं॑ च मे‌ य॒क्ष्मं च॒ मे‌ ना॑मयच्च मे जी॒वातु॑श्च मे दीर्घायु॒त्वं च॑ मे‌ नमि॒त्रं च॒ मे‌ भ॑यं च मे सु॒गं च॑ मे॒ शय॑नं च मे सू॒षा च॑ मे॒ सु॒दिनं॑ च मे ॥ 3 ॥
ऊर्क्च॑ मे सू॒नृता॑ च मे॒ पय॑श्च मे॒ रस॑श्च मे घृ॒तं च॑ मे॒ मधु॑ च मे॒ सग्धि॑श्च मे॒ सपी॑तिश्च मे कृ॒षिश्च॑ मे॒ वृष्टि॑श्च मे॒ जैत्रं॑ च म॒ औद्भि॑द्यं च मे र॒यिश्च॑ मे॒ राय॑श्च मे पु॒ष्टं च मे॒ पुष्टि॑श्च मे वि॒भु च॑ मे प्र॒भु च॑ मे ब॒हु च॑ मे॒ भूय॑श्च मे पू॒र्णं च॑ मे पू॒र्णत॑रं च॒ मे‌ क्षि॑तिश्च मे॒ कूय॑वाश्च॒ मे‌ न्नं॑ च॒ मे‌ क्षु॑च्च मे व्री॒हय॑श्च मे॒ यवा॓श्च मे॒ माषा॓श्च मे॒ तिला॓श्च मे मु॒द्गाश्च॑ मे ख॒ल्वा॓श्च मे गो॒धूमा॓श्च मे म॒सुरा॓श्च मे प्रि॒यङ्ग॑वश्च॒ मे‌உण॑वश्च मे श्या॒माका॓श्च मे नी॒वारा॓श्च मे ॥ 4 ॥
अश्मा च॑ मे॒ मृत्ति॑का च मे गि॒रय॑श्च मे॒ पर्व॑ताश्च मे॒ सिक॑ताश्च मे॒ वन॒स्-पत॑यश्च मे॒ हिर॑ण्यं च॒ मे‌ य॑श्च मे॒ सीसं॑ च॒ मे त्रपु॑श्च मे श्या॒मं च॑ मे लो॒हं च॑ मे‌ ग्निश्च॑ म आप॑श्च मे वी॒रुध॑श्च म॒ ओष॑धयश्च मे कृष्णप॒च्यं च॑ मे‌ कृष्णपच्यं च॑ मे ग्रा॒म्याश्च॑ मे प॒शव॑ आर॒ण्याश्च॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पन्तां वि॒त्तं च॑ मे॒ वित्ति॑श्च मे भू॒तं च॑ मे भूति॑श्च मे॒ वसु॑ च मे वस॒तिश्च॑ मे॒ कर्म॑ च मे॒ शक्ति॑श्च॒ मे‌உर्थ॑श्च म॒ एम॑श्च म इति॑श्च मे॒ गति॑श्च मे ॥ 5 ॥
अ॒ग्निश्च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मे॒ सोम॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मे सवि॒ता च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मे॒ सर॑स्वती च म॒ इन्द्र॑श्च मे पू॒षा च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मे॒ बृह॒स्पति॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मे मि॒त्रश्च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मे॒ वरु॑णश्च म॒ इन्द्र॑श्च मे॒ त्वष्ठा॑ च म॒ इन्द्र॑श्च मे धा॒ता च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मे॒ विष्णु॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मे‌ श्विनौ॑ च म॒ इन्द्र॑श्च मे म॒रुत॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मे॒ विश्वे॑ च मे दे॒वा इन्द्र॑श्च मे पृथि॒वी च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मे‌உन्तरि॑क्षं च म॒ इन्द्र॑श्च मे द्यौश्च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मे॒ दिश॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मे मू॒र्धा च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मे प्र॒जाप॑तिश्च म॒ इन्द्र॑श्च मे ॥ 6 ॥
अ॒ग्ं॒शुश्च॑ मे र॒श्मिश्च॒ मे‌ दा॓भ्यश्च॒ मे‌ धि॑पतिश्च म उपा॒ग्ं॒शुश्च॑ मे‌உन्तर्या॒मश्च॑ म ऐन्द्रवाय॒वश्च॑ मे मैत्रावरु॒णश्च॑ म आश्वि॒नश्च॑ मे प्रतिप्र॒स्थान॑श्च मे शु॒क्रश्च॑ मे म॒न्थी च॑ म आग्रय॒णश्च॑ मे वैश्वदे॒वश्च॑ मे ध्रु॒वश्च॑ मे वैश्वान॒रश्च॑ म ऋतुग्र॒हाश्च॑ मे‌உतिग्रा॒ह्या॓श्च म ऐन्द्रा॒ग्नश्च॑ मे वैश्वदे॒वश्च॑ मे मरुत्व॒तीया॓श्च मे माहे॒न्द्रश्च॑ म आदि॒त्यश्च॑ मे सावि॒त्रश्च॑ मे सारस्व॒तश्च॑ मे पौ॒ष्णश्च॑ मे पात्नीव॒तश्च॑ मे हारियोज॒नश्च॑ मे ॥ 7 ॥
इ॒ध्मश्च॑ मे ब॒र्हिश्च॑ मे॒ वेदि॑श्च मे॒ दिष्णि॑याश्च मे॒ स्रुच॑श्च मे चम॒साश्च॑ मे॒ ग्रावा॑णश्च मे॒ स्वर॑वश्च म उपर॒वाश्च॑ मे‌धि॒षव॑णे च मे द्रोणकल॒शश्च॑ मे वाय॒व्या॑नि च मे पूत॒भृच्च॑ म आधव॒नीय॑श्च म॒ आग्नी॓ध्रं च मे हवि॒र्धानं॑ च मे गृ॒हाश्च॑ मे॒ सद॑श्च मे पुरो॒डाशा॓श्च मे पच॒ताश्च॑ मे‌ वभृथश्च॑ मे स्वगाका॒रश्च॑ मे ॥ 8 ॥
अ॒ग्निश्च॑ मे घ॒र्मश्च॑ मे॒‌र्कश्च॑ मे॒ सूर्य॑श्च मे प्रा॒णश्च॑ मे‌श्वमे॒धश्च॑ मे पृथि॒वी च॒ मे‌உदि॑तिश्च मे॒ दिति॑श्च मे॒ द्यौश्च॑ मे॒ शक्व॑रीर॒ङ्गुल॑यो॒ दिश॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ता॒मृक्च॑ मे॒ साम॑ च मे॒ स्तोम॑श्च मे॒ यजु॑श्च मे दी॒क्षा च॑ मे॒ तप॑श्च म ऋ॒तुश्च॑ मे व्र॒तं च॑ मे‌ होरा॒त्रयो॓र्-दृ॒ष्ट्या बृ॑हद्रथन्त॒रे च॒ मे य॒ज्ञेन॑ कल्पेताम् ॥ 9 ॥
गर्भा॓श्च मे व॒त्साश्च॑ मे॒ त्र्यवि॑श्च मे त्र्य॒वीच॑ मे दित्य॒वाट् च॑ मे दित्यौ॒ही च॑ मे॒ पञ्चा॑विश्च मे पञ्चा॒वी च॑ मे त्रिव॒त्सश्च॑ मे त्रिव॒त्सा च॑ मे तुर्य॒वाट् च॑ मे तुर्यौ॒ही च॑ मे पष्ठ॒वाट् च॑ मे पष्ठौ॒ही च॑ म उ॒क्षा च॑ मे व॒शा च॑ म ऋष॒भश्च॑ मे वे॒हच्च॑ मे‌ न॒ड्वां च मे धे॒नुश्च॑ म॒ आयु॑र्-य॒ज्ञेन॑ कल्पतां प्रा॒णो य॒ज्ञेन॑ कल्पताम्-अपा॒नो य॒ज्ञेन॑ कल्पतां॒ व्या॒नो य॒ज्ञेन॑ कल्पतां॒ चक्षु॑र्-य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ग्॒ श्रोत्रं॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पतां॒ मनो॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पतां॒ वाग्-य॒ज्ञेन॑ कल्पताम्-आ॒त्मा य॒ज्ञेन॑ कल्पतां य॒ज्ञो य॒ज्ञेन॑ कल्पताम् ॥ 10 ॥
एका॑ च मे ति॒स्रश्च॑ मे॒ पञ्च॑ च मे स॒प्त च॑ मे॒ नव॑ च म॒ एका॑दश च मे॒ त्रयो॒दश च मे॒ पञ्च॑दश च मे स॒प्तद॑श च मे॒ नव॑दश च म॒ एक॑विग्ंशतिश्च मे॒ त्रयो॑विग्ंशतिश्च मे॒ पञ्च॑विग्ंशतिश्च मे स॒प्त विग्ं॑शतिश्च मे॒ नव॑विग्ंशतिश्च म॒ एक॑त्रिग्ंशच्च मे॒ त्रय॑स्त्रिग्ंशच्च मे॒ चत॑स्-रश्च मे॒‌ष्टौ च॑ मे॒ द्वाद॑श च मे॒ षोड॑श च मे विग्ंश॒तिश्च॑ मे॒ चतु॑र्विग्ंशतिश्च मे॒‌ष्टाविग्ं॑शतिश्च मे॒ द्वात्रिग्ं॑शच्च मे॒ षट्-त्रिग्ं॑शच्च मे चत्वारि॒ग्॒ंशच्च॑ मे॒ चतु॑श्-चत्वारिग्ंशच्च मे‌ ष्टाच॑त्वारिग्ंशच्च मे॒ वाज॑श्च प्रस॒वश्चा॑पि॒जश्च क्रतु॑श्च॒ सुव॑श्च मू॒र्धा च॒ व्यश्नि॑यश्-चान्त्याय॒नश्-चान्त्य॑श्च भौव॒नश्च॒ भुव॑न॒श्-चाधि॑पतिश्च ॥ 11 ॥
ॐ इडा॑ देव॒हूर्-मनु॑र्-यज्ञ॒नीर्-बृह॒स्पति॑रुक्थाम॒दानि॑ शग्ंसिष॒द्-विश्वे॑-दे॒वाः सू॓क्त॒वाचः॒ पृथि॑विमात॒र्मा मा॑ हिग्ंसी॒र्-म॒धु॑ मनिष्ये॒ मधु॑ जनिष्ये॒ मधु॑ वक्ष्यामि॒ मधु॑ वदिष्यामि॒ मधु॑मतीं दे॒वेभ्यो॒ वाच॒मुद्यासग्ंशुश्रूषे॒ण्या॓म् मनु॒ष्ये॓भ्य॒स्तं मा॑ दे॒वा अ॑वन्तु शो॒भायै॑ पि॒तरो‌नु॑मदन्तु ॥
ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥