गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

भारत महान था ......वीरों की खान था ।।


PM भी सिंगल
CM भी सिंगल
TATA भी सिंगल
BATA भी सिंगल
KALAM भी सिंगल
SALMAN भी सिंगल
RAHUL भी सिंगल
YOGI भी सिंगल
और तो और BABA
RAMDEV भी सिंगल
निगाहें अब उस हरामखोर को ढूंढ रही हैं..
जिसने यह कहा था हर सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है
उस बेवकूफ आदमी के चक्कर में हमने भी शादी कर ली है
वर्ना आज हम भी कही कुछ कर गए होते
जिन्दगी एक जंग है
जबतक बीवी संग है
सीता से प्यार किया तो राम बन गये
राधा से प्यार किया तो श्याम बन गये
जबरदस्ती प्यार किया तो आशाराम बन गये और
चुपके चुपके प्यार किया तो बाबा राम रहीम बन गए

कीसी से प्यार नहीं किया तो योगी cm बन गए
प्यार करके रास्ते में छोड़ दिया तोनरेंद्र मोदी pm बन गये//

घोटाले पहले भी हुए हैं और आगे भी होंगे लेकिन आप बताइए कि क्या
• सत्यम वाला राजू भाग पाया ?
• क्या सहारा श्री भाग पाया ?
• क्या आसाराम भाग पाया ?
• क्या तेलगी भाग पाया ?
• क्या हर्षद मेहता भाग पाया ?
• क्या हितेन दलाल भाग पाया ?
नहीं सब पकड़े गये और सबको इसी देश के कानून ने दण्ड दिया
लेकिन अब ?
• ललित मोदी भाग गया
• माल्या भाग गया
• नीरव मोदी भाग गया
• नीशाल मोदी भाग गया
• केतन मेहता भाग गया
• मेहुल चौकसे भाग गया
• जयेश भाग गया।😊😊😉
कुछ तो गरबर है? 

//भारत महान था ......वीरों की खान था ।।
फ़िर भी मुगलों का गुलाम था.....क्यों??....
क्योंकि
"एक हिंदु राजा निजी विरोध के कारण दूसरे हिंदु राजा से दूर खड़ा था और मुगलों का साथ देने पर अड़ा था"

परिस्थिति आज भी वही है मोदी हिन्दुत्व के लिये खड़ा है और भ्रमित हिंदु उसे मिटाने पर अड़ा है.....!!!!
😏😏😏😏😏😏
मैने लाखों हिंदुओं को देखा हैं,
मोदी का विरोध करते

कोई एक मुस्लिम बता दो जो ओवैसी का विरोध करता हो
.
हिन्दू अपने पतन का कारण स्वयं ही है.....😢थोडा सोचो 🙏

ग्रहो का शुभ फल कब और क्यों नहीं मिलता हैं -



ग्रहो का शुभ फल कब और क्यों नहीं मिलता हैं -
सूर्य -
सूर्य का संबंध आत्मा से होता है।
यदि आपकी आत्मा, आपका मन पवित्र है और आप किसी का दिल दुखाने वाला कार्य नहीं करते हैं तो सूर्यदेव आपसे प्रसन्न रहेंगे। लेकिन किसी का दिल दुखाने (कष्ट देने), किसी भी प्रकार का टैक्स चोरी करने एवं किसी भी जीव की आत्मा को ठेस पहुंचाने पर सूर्य अशुभ फल देता है। कुंडली में सूर्य चाहे जितनी मजबूत स्थिति में हो लेकिन यदि ऐसा कोई कार्य किया है, तो वह अपना शुभ प्रभाव नहीं दे पाता। सूर्य की प्रतिकूलता के कारण व्यक्ति की मान-प्रतिष्ठा में कमी आती है और उसे पिता की संपत्ति से बेदखल होना पड़ता है।

चंद्र -
परिवार की स्त्रियों जैसे, मां, नानी, दादी, सास एवं इनके समान पद वाली स्त्रियों को कष्ट देने से चंद्र का बुरा प्रभाव प्राप्त होता है। किसी से द्वेषपूर्वक ली गई वस्तु के कारण चंद्रमा अशुभ फल देता है। चंद्रमा अशुभ हो तो व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान रहता है। उसके कार्यों में रुकावट आने लगती है और तरक्की रूक जाती है। जल घात की आशंका बढ़ जाती है। यहां तक कि व्यक्ति मानसिक रोगी भी हो सकता है।

मंगल -
मंगल का संबंध भाई-बंधुओं और राजकाज से होता है। भाई से झगड़ा करने, भाई के साथ धोखा करने से मंगल अशुभ फल देता है। अपनी पत्नी के भाई का अपमान करने पर भी मंगल अशुभ फल देता है। मंगल की प्रतिकूलता के कारण व्यक्ति जीवन में कभी स्वयं की भूमि, भवन, संपत्ति नहीं बना पाता। जो संपत्ति संचय की होती है वह भी धीरे-धीरे हाथ से छूटने लगती है।

बुध-
बहन, बेटी और बुआ को कष्ट देने, साली एवं मौसी को दुखी करने से बुध अशुभ फल देता है। किसी किन्नर को सताने से भी बुध नाराज हो जाता है और अशुभ फल देने लगता है। बुध की अशुभता के कारण व्यक्ति का बौद्धिक विकास रूक जाता है। शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए अशुभ बुध विकट स्थितियां पैदा कर सकता है।

गुरु -
अपने पिता, दादा, नाना को कष्ट देने अथवा इनके समान सम्मानित व्यक्ति को कष्ट देने एवं साधु संतों को सताने से गुरु अशुभ फल देने लगता है। जीवन में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा के कारक ग्रह बृहस्पति के रूठ जाने से जीवन अंधकारमय होने लगता है। व्यक्ति को गंभीर बीमारियां घेरने लगती है और उसका जीवन पल-प्रतिपल कष्टकारी होने लगता है। धन हानि होने लगती है और उसका अधिकांश पैसा रोग में लगने लगता है।

शुक्र -
अपने जीवनसाथी को कष्ट देने, किसी भी प्रकार के गंदे वस्त्र पहनने, घर में गंदे एवं फटे पुराने वस्त्र रखने से शुक्र अशुभ फल देता है। चूंकि शुक्र भोग-विलास का कारक ग्रह है अतः शुक्र के अशुभ फलों के परिणामस्वरूप व्यक्ति गरीबी का सामना करता है। जीवन के समस्त भोग-विलास के साधन उससे दूर होने लगते हैं। लक्ष्मी रूठ जाती है। वैवाहिक जीवन में स्थिति विवाह विच्छेद तक पहुंच जाती है। शुक्र की अशुभता के कारण व्यक्ति अपने से निम्न कुल की स्त्रियों के साथ संबंध बनाता है।

शनि -
ताऊ एवं चाचा से झगड़ा करने एवं किसी भी मेहनतकश व्यक्ति को कष्ट देने, अपशब्द कहने एवं इसी के साथ शराब, मांस खाने से शनि देव अशुभ फल देते हैं। कुछ लोग मकान एवं दुकान किराये से लेने के बाद खाली नहीं करते अथवा उसके बदले पैसा मांगते हैं तो शनि अशुभ फल देने लगता है। शनि के अशुभ फल के कारण व्यक्ति रोगों से घिर जाता है। उसकी संपत्ति छिन जाती है और वह वाहनों के कारण लगातार दुर्घटनाग्रस्त होने लगता है।

राहु -
सर्प की हत्या या उसे सताने, बड़े भाई का अपमान करने से, ननिहाल पक्ष वालों का अपमान करने से राहु अशुभ फल देता है। किसी मूक प्राणी, जानवर, पंछियों की हत्या करने, उन्हें पीटने, मारने से राहु का अशुभ परिणाम प्राप्त होता है। इससे व्यक्ति पर कोई कलंक लगता है उसे कारावास की सजा तक भोगना पड़ती है। ऐसा व्यक्ति जीवन में कभी स्थायी नहीं हो पाता और उसे यहां-वहां भटकना पड़ता है।

केतु -
भतीजे एवं भांजे का दिल दुखाने एवं उनका हक छीनने पर केतु अशुभ फल देना है। कुत्ते को मारने एवं किसी के द्वारा मरवाने पर, किसी भी मंदिर को तोड़ने अथवा ध्वजा नष्ट करने पर, इसी के साथ ज्यादा कंजूसी करने पर केतु अशुभ फल देता है। किसी से धोखा करने व झूठी गवाही देने पर भी राहु-केतु अशुभ फल देते हैं।//





सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

शिवरात्रि पर क्यों करते हैं उपवास और जागरण

🚩🙏 शिवरात्रि पर क्यों करते हैं उपवास और जागरण
अन्न में भी मादकता होती है। भोजन करने के बाद शरीर में आलस्य और तंद्रा का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है। अन्न ग्रहण न करने से शरीर चैतन्य और जागृत रहता है। परिणामस्वरूप जिस आध्यात्मिक अनुभूति और उपलब्धि के लिए शिव उपासना की जा रही है, उसमें कोई बाधा नहीं उत्पन्न होती। भूख प्राणीमात्र की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है।
इसलिए भूख को सहन करना, तितिक्षा की वृद्धि करना है। यदि भूख पर विजय पा ली गई तो ऐसी अन्य आदतों पर विजय प्राप्त करना भी आसान हो जाता है, जो भूख के समान गहरी नहीं होतीं। इसे तेज धारा केविपरीत तैरने का प्रयोग भी समझना चाहिए।

रात्रि जागरण के संदर्भ में श्रीकृष्ण के इन वाक्यों की ओर ध्यान देना चाहिए 'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।' अर्थात जब संपूर्ण प्राणी अचेतन होकर नींद की गोद में सो जाते हैं तो संयमी, जिसने उपवासादि द्वारा इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया हो, जागकर अपने कार्यों को पूर्ण करता है। कारण साधना सिद्धि के लिए जिस एकांत और शांत वातावरण की आवश्यकता होती है, वह रात्रि से ज्यादा बेहतर और क्या हो सकती है।
यह भगवान शंकर की आराधना का प्रमुख दिन है। अन्य देवों का पूजन-अर्चन दिन में होता है, लेकिन भगवान शंकर को रात्रि क्यों प्रिय हुई और वह भी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को? यह बात विदित है कि भगवान शंकर संहार शक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हैं, अतः तमोमयी रात्रि से उनका स्नेह स्वाभाविक है। रात्रि संहारकाल की प्रतिनिधि है।
उसका आगमन होते ही सर्वप्रथम प्रकाश का संहार, जीवों की दैनिक कर्म-चेष्टाओं का संहार और अंत में निद्रा द्वारा चेतनता का संहार होकर संपूर्ण विश्व संहारिणी रात्रि की गोद में अचेत होकर गिर जाता है। ऐसी दशा में प्राकृतिक दृष्टि से शिव का रात्रि प्रिय होना सहज ही हृदयंगम हो जाता है। यही कारण है कि भगवान शंकर की आराधना न केवल इस रात्रि में अपितु सदैव प्रदोष (रात्रि प्रारंभ होने पर) समय में भी की जाती है।
शिवरात्रि का कृष्ण पक्ष में आना भी साभिप्राय है। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा पूर्ण होता है और कृष्ण पक्ष में क्षीण। उसकी वृद्धि के साथ-साथ संसार के संपूर्ण रसवान पदार्थों में वृद्धि और क्षय के साथ-साथ उनमें क्षीणता स्वाभाविक है। इस तरह क्रमशः घटते-घटते वह चंद्र अमावस्या को बिलकुल क्षीण हो जाता है। चराचर के हृदय के अधिष्ठाता चंद्र के क्षीण हो जाने से उसका प्रभाव संपूर्ण भूमंडल के प्राणियों पर भी पड़ता है। परिणामस्वरूप उनके अंतःकरण में तामसी शक्तियाँ प्रबुद्ध हो जाती हैं, जिनसे अनेक प्रकार के नैतिक एवं सामाजिक अपराधों का उदय होता है। इन्हीं शक्तियों को भूत-प्रेत आदि कहा जाता है।
ये शिवगण हैं, जिनके नियामक भूतभावन शिव हैं। दिन में जगत आत्मा सूर्य की स्थिति तथा आत्मतत्व की जागरूकता के कारण ये तामसी शक्तियाँ विशेष प्रभाव नहीं दिखा पातीं किंतु चंद्रविहीन अंधकारमयी रात्रि के आगमन के साथ ही इनका प्रभाव प्रारंभ हो जाता है। जिस प्रकार पानी आने से पहले पुल बाँधा जाता है, उसी प्रकार चंद्रक्षय तिथि आने से पहले उन तामसी शक्तियों को शांत करने के लिए इनके एकमात्र अधिष्ठाता भगवान आशुतोष की आराधना करने का विधान शास्त्रकारों ने किया है।
यही कृष्ण चतुर्दशीकी रात्रि में शिव आराधना करने का रहस्य है,
🙏🚩 जय माता दी हर हर महादेव 🙏🚩
🚩🙏🌹🌹🌺🌺🌷🌷🌸🌸

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

श्राद्धमें पितरोंकी तृप्ति



दूसरे की भूमिपर श्राद्ध
नहीं करना चाहिये। जंगल, पर्वत,
पुण्यतीर्थ और देवमन्दिर ये
दूसरेकी भुमिमें नहीं आते; क्योंकि इनपर
किसीका स्वामित्व नहीं होता ।
- कूर्मपुराण
श्राद्धमें पितरोंकी तृप्ति ब्राह्मणोंके
द्वारा ही होती है।
-स्कन्दपुराण
श्राद्धकालमें आये हुए अतिथिका अवश्य सत्कार करे। उस समय
अतिथिका सत्कार न करनेसे वह श्राद्ध कर्मके सम्पूर्ण
फलको नष्ट कर देता है।
- वराहपुराण
जहाँ रजस्वला स्त्री, चाण्डाल और सुअर श्राद्धके
अन्नपर दृष्टि डाल देते हैं, वह अन्न प्रेत
ही ग्रहण करते हैं।
-स्कन्दपुराण
श्राद्धमें पहले अग्निको ही भाग अर्पित
किया जाता है। अग्निमें हवन करनेके बाद जो पितरोंके निमित्त
पिण्डदान किया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस दूषित
नहीं करते।
- महाभारत, अनु. ९२।११-१२
जो अज्ञानी मनुष्य अपने घर श्राद्ध करके फिर
दुसरे घर भोजन करता है, वह पाप
का भागी होता है और उसे श्राद्धका फल
नहीं मिलता।
- स्कन्दपुराण
एक हाथसे लाया गया जो अन्न (अन्नपात्र) ब्राह्मणोंके आगे
परोसा जाता है, उस अन्नको राक्षस छीन लेते हैं।
- मनुस्मृति ३।२२५
वस्त्रके बिना कोई क्रिया, यज्ञ, वेदाध्ययन और
तपस्या नहीं होती । अतः श्राद्धकालमें
वस्त्रका दान विशेषरुपसे करना चाहिये।
-ब्रह्मपुराण
श्राद्ध और हवनके समय तो एक हाथसे पिण्ड एवं आहुति दे,
पर तर्पणमें दोनों हाथोंसे जल देना चाहिये।
- पद्मपुराण,नारदपुराण,मत्स्यपुराण,ब्रह्मपुराण,लघुयमस्मृति
श्राद्धके पिण्डोंको गौ, ब्राह्मण या बकरीको खिला दे
अथवा अग्नि या पानीमें छोड दे ।
- मनुस्मृति ३।२६०, महाभारत,अनु. १४५
जो सफेद तिलोंसे पितरोंका तर्पण करता है, उसका किया हुआ
तर्पण व्यर्थ होता है ।
- पद्मपुराण
रात्रिमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये, उसे
राक्षसी कहा गया है। दोनों सन्ध्याओंमें
तथा पूर्वाह्णकालमें भी श्राद्ध
नहीं करना चाहिये ।
- मनु.

मुल्लांक 2 वालो के लिए कैसा होगा साल 2018

मुल्लांक 2 वालो के लिए कैसा होगा साल 2018?? जानिये मुझसे
-मूलांक 2 का ग्रह चन्द्रमा है . ज़िनका मुल्लांक 2 है उनका मन चन्द्रां के तरह शांत होता है पर कभी कभी इनका मन विचलित भी हो जाते हैं .
-2, 20, 11 और 29 तारीख को जन्मे लोग चन्द्रमा के गुणों के भरपूर रहते हैं।
-उनका दिल बहुत ही कोमाल होता हैं .
-कल्पनाशील और मधुर भाषी और
-इनका मन स्थिर नहीं रहता।
-एक कार्य लंबे समय तक नहीं कर पाते।
- जिनका मूलांक 2 है, इस वर्ष उन्हें सुख-समृद्धि व सफलता देगा।
-व्यवसाय व नौकरी में विकास होगा।
-मनचाहा करियर बनेगा।
-घर में मांगलिक कार्य होंगे।
-विवाह व संतान की प्राप्ति होगी।
-संतान की उन्नति होगी।
-नए काम जो चालू नहीं हो सके, वे होंगे। मन पर नियंत्रण रखें।
-आत्मविश्वास बनाए रखें।
-प्रेम-प्रसंग में सावधानी आवश्यक है।
-वर्ष के मध्य में सभी स्वप्न पूरे होंगे।
शुभ दिन- 2, 4, 6, 7, 9, 11, 20 और 29 तारीखें.
शुभ रंग- हल्के चमकीले रंग और सफेद रंग.
शुभ दिन- सोमवार.
शुभ रत्न- मोती चांदी की अंगूठी में धारण करें
शुभ देवता- शिवजी और चन्द्र देवता अनुकूल रहेंगे।
'ॐ नम: शिवाय' मंत्र जपने से सुख-शांति रहेगी।
स्वास्थ्य- कोई मांसिक बीमारी हो सकती हैं , मांसिक शांति भग हो सकती है . घर के कालाह से बचे .
-पेट के रोग व छूत की बीमारियों से बचें।
-टहलना और योगक्रिया करने से और खानपान की सतर्कता से रोगों से बचा जा सकता है.
-पानी अधिक हो, ऐसे स्थान पर भाग्योदय होगा।
-सच्चे मित्रों की परख होना आवश्यक है अन्यथा धोखा मिलेगा .
-धन-संपत्ति, सम्मान आदि में मनमाफिक लाभ होगा।


** गूंजा के अनेकानेक प्रयोग एंवम लाभ **

** गूंजा के अनेकानेक प्रयोग एंवम लाभ **


गुंजा एक फली का बीज है। इसको धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसकी बेल काफी कुछ मटर की तरह ही लगती है किन्तु अपेक्षाकृत मजबूत काष्ठीय तने वाली। इसे अब भी कहीं कहीं आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक सुनार इसे सोना तोलने के काम में लेते थे क्योंकि इनके प्रत्येक दाने का वजन लगभग बराबर होता है करीब 120 मिलीग्राम। ये हमारे जीवन में कितनी बसी है इसका अंदाज़ा मुहावरों और लोकोक्तियों में इसके प्रयोग से लग जाता है।
यह तंत्र शास्त्र में जितनी मशहूर है उतनी ही आयुर्वेद में भी। आयुर्वेद में श्वेत गूंजा का ही अधिक प्रयोग होता है औषध रूप में साथ ही इसके मूल का भी जो मुलैठी के समान ही स्वाद और गुण वाली होती है। इसीकारण कई लोग मुलैठी के साथ इसके मूल की भी मिलावट कर देते हैं।
वहीं रक्त गूंजा बेहद विषैली होती है और उसे खाने से उलटी दस्त पेट में मरोड़ और मृत्यु तक सम्भव है। आदिवासी क्षेत्रों में पशु पक्षी मारने और जंगम विष निर्माण में अब भी इसका प्रयोग होता है।
गुंजा की तीन प्रजातियां मिलती हैं:-
1• रक्त गुंजा: लाल काले रंग की ये प्रजाति भी तीन तरह की मिलती है जिसमे लाल और काले रंगों का अनुपात 10%, 25% और 50% तक भी मिलता है।
ये मुख्यतः तंत्र में ही प्रयोग होती है।
श्वेत गुंजा • श्वेत गुंजा में भी एक सिरे पर कुछ कालिमा रहती है। यह आयुर्वेद और तंत्र दोनों में ही सामान रूप से प्रयुक्त होती है। ये लाल की अपेक्षा दुर्लभ होती है।
काली गुंजा: काली गुंजा दुर्लभ होती है, आयुर्वेद में भी इसके प्रयोग लगभग नहीं हैं हाँ किन्तु तंत्र प्रयोगों में ये बेहद महत्वपूर्ण है।
इन तीन के अलावा एक अन्य प्रकार की गुंजा पायी जाती है पीली गुंजा ये दुर्लभतम है क्योंकि ये कोई विशिष्ट प्रजाति नहीं है किन्तु लाल और सफ़ेद प्रजातियों में कुछ आनुवंशिक विकृति होने पर उनके बीज पीले हो जाते हैं। इस कारण पीली गूंजा कभी पूर्ण पीली तो कभी कभी लालिमा या कालिमा मिश्रित पीली भी मिलती है।
इस चमत्कारी वनस्पति गुंजा के कुछ प्रयोग:-
1• सम्मान प्रदायक :
शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा।
2• कारोबार में बरकत
किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।
3"• ज्ञान-बुद्धि वर्धक :
(क) गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है।
(ख) यदि सफेद गुंजा के 11 या 21 दाने अभिमंत्रित करके विद्यार्थियों के कक्ष में उत्तर पूर्व में रख दिया जाये तो एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति में लाभ होता है।
4• वर-वधू के लिए :
विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है।
5• पुत्रदाता :
शुभ मुहुर्त में श्वेत गुंजा की जड़ लाकर दूध से धोकर, सफेद चन्दन पुष्प से पूजा करके सफेद धागे में पिरोकर। “ऐं क्षं यं दं” मंत्र के ग्यारह हजार जाप करके स्त्री या पुरूष धारण करे तो संतान सुख की प्राप्ती होती है।
6• वशीकरण -
(क) आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.
(ख) गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.
( गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.
7• विद्वेषण में प्रयोग :
किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है।
8• विष-निवारण :
गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये। यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें।
इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।
9• दिव्य दृष्टि :-
(क) अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :
भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं।
(ख) गुप्त धन दर्शन :
अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।
10• शत्रु में भय उत्पन्न :
गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।
11• शत्रु दमन प्रयोग :
यदि लड़ाई झगड़े की नौबत हो तो काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा।
12• रोग - बाधा
(क) कुष्ठ निवारण प्रयोग :
गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।
(ख)अंधापन समाप्त :
गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं।नेत्रों की सफाई होती है आँखों का जाल कटता है।
देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।
(ग) वाजीकरण:
श्वेत गुंजा की जड को गाय के शुद्ध घृत में पीसकर लेप तैयार करें। यह लेप शिश्न पर मलने से कामशक्ति की वृद्धि के साथ स्तंभन शक्ति में भी वृद्धि होती है।
13: नौकरी में बाधा
राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।
**दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:
1• काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
2• दिवाली के दिन अपने गल्‍ले के नीचे काली गुंजा जंगली बेल के दाने डालने से व्‍यवसाय में हो रही हानि रूक जाती है।
3• दिवाली की रात घर के मुख्‍य दरवाज़े पर सरसों के तेल का दीपक जला कर उसमें काली गुंजा के 2-4 दाने डाल दें। ऐसा करने पर घर सुरक्षित और समृद्ध रहता है।
4• होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पाँचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।
5• घर से अलक्ष्मी दूर करने का लघु प्रयोग-
ध्यानमंत्र :
ॐ तप्त-स्वर्णनिभांशशांक-मुकुटा रत्नप्रभा-भासुरीं ।
नानावस्त्र-विभूषितां त्रिनयनां गौरी-रमाभ्यं युताम् ।
दर्वी-हाटक-भाजनं च दधतीं रम्योच्चपीनस्तनीम् ।
नित्यं तां शिवमाकलय्य मुदितां ध्याये अन्नपूर्णश्वरीम् ॥
मन्त्र :
ॐ ह्रीम् श्रीम् क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि मामाभिमतमन्नं देहि-देहि अन्नपूर्णों स्वाहा ।
विधि :
जब रविवार या गुरुवार को पुष्प नक्षत्र हो या नवरात्र में अष्टमी के दिन या दीपावली की रात्रि या अन्य किसी शुभ दिन से इस मंत्र की एक माला रुद्राक्ष माला से नित्य जाप करें । जाप से पूर्व भगवान श्रीगणेश जी का ध्यान करें तथा भगवान शिव का ध्यान कर नीचे दिये ध्यान मंत्र से माता अन्नपूर्णा का ध्यान करें ।
इस मंत्र का जाप दुकान में गल्ले में सात काली गुंजा के दाने रखकर शुद्ध आसन, (कम्बल आसन, या साफ जाजीम आदि ) पर बैठकर किया जाए तो व्यापार में आश्चर्यजनक लाभ महसूस होने गेगा ।
6• कष्टों से छुटकारे हेतु
यदि संपूर्ण दवाओं एवं डाक्टर के इलाज के बावजूद भी यदि घुटनों और पैरों का दर्द दूर नहीं हो रहा हो तो रवि पुष्य नक्षत्र, शनिवार या शनि आमवस्या के दिन यह उपाय करें। प्रात:काल नित्यक्रम से निवृत हो स्नानोपरांत लोहे की कटोरी में श्रद्धानुसार सरसों का तेल भरें। 7 चुटकी काले तिल, 7 लोहे की कील और 7 लाल और 7 काली गुंजा उसमें डाल दें। तेल में अपना मुंह देखने के बाद अपने ऊपर से 7 बार उल्टा उसारकर पीपल के पेड़ के नीचे इस तेल का दीपक जला दें 21 परिक्रमा करें और वहीं बैठकर 108 बार
ऊँ शं विधिरुपाय नम:।।
इस मंत्र का जाप करें। ऐसा 11 शनिवार करें। कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

पीली गुंजा:
1• पीले रंग की गुंजा के बीज ,हल्दी की गांठे, सात कौडियों की पूजा अर्चना करके श्री लक्ष्मीनारायण भगवान के मंत्रों से अभिमंत्रित करके पूजा स्थान में रखने से दाम्पत्य सुख एवं परिवार,मे एकता तथा आर्थिक व्यावसायिक सिद्धि मिलती है
2• इसकी माला या ब्रेसलेट धारण करने से व्यक्ति का चित्त शांत रहता है, तनाव से मुक्ति मिलती है।
3• पीत गुंजा की माला गुरु गृह को अनुकूल करती है।
4• अनिद्रा से पीड़ित लोगों को इसकी माला धारण करने से लाभ मिलता है।
5• बड़ी उम्र के जो लोग स्वप्न में डरते हैं या जिन्हें अक्सर ये लगता है की कोई उनका गला दबा रहा है उन्हें इसकी माला या ब्रेसलेट पहनना चाहिए।