मंगलवार, 28 जुलाई 2015

/मिथुन लग्न में नवग्रह का प्रभाव *(Planets in Gemini Lagna)



।मिथुन लग्न
मित्रों मिथुन लग्न पर चर्चा करने से पहले हमें कुछ बुद्ध के बारे में जानना होगा । एक मिथहासिक कहानी के अनुसार बुद्ध बिरहस्पति की पत्नी तारा और चंद्र देव की नाजायज औलाद थे लेकिन जब बुद्ध का जन्म हुवा तो उसकी सुंदरता देखकर चन्द्र और बिरहस्पति दोनों ने इसको अपना पुत्र माना । इसी कारण बुद्ध में चन्द्र की चंचलता और गुरु का ज्ञान पाया जाता है।
मिथुन राशि को हम देखें तो उसमे एक नर नारी के स्वरूप को दिखया गया है यानी दो विरोधाभाषी विचारधारा एक साथ। यानी दो आत्माएं एक साथ एक ही शारीर में समाई हुई है जिससे से ज्ञान की प्राप्ति एक बड़े स्तर पर हो सकती है।

बुद्ध लग्न के जातक चंचल होते है । ग्यानी और बुद्धिमान होते है। उनको किसी भी वस्तु के स्वरूप को पूरी तरह जानने और उसको दूसरों को बताने की लालसा भी होती है। वो एक छोटी सी वस्तु से लेकर पुरे ब्रह्माण्ड तक की चर्चा आपके साथ कर सकते है। लेकिन इनमे ये खूबी भी पाई जाती है की ये विषय को बदल भी बहुत जल्दी देते है और आपको बोरियत महसूस नही होने देते। इस लग्न के जातकों में एक ही विचारधारा लंबे समय तक नही चलती यानी ये कभी कुछ सोचेंगे और कुछ समय बाद किसी अन्य के बारे में।यानी ये एक जगह टिक नही पाते न ही तो विचारों से और न ही शारीरिक रूप से।

जब आप किसी के पास जाए और वो आपके साथ बात करने के साथ साथ कोई काम क्र रहा है साथ ही टीवी भी देख रहा है साथ ही बच्चे को भी कपड़े पहना रहा है तो यदि कोई जातक इतने काम एक साथ कर रहा हो तो आप समझ सकते है की उसका मिथुन लग्न होगा।
मिथुन राशि का स्वामी बुद्ध जिसे पारा भी माना गया है और जैसा आपको पता है की पारा कभी सिथर नही होता यही गुण इस लग्न के जातको में पाये जाते है यानी हमेंशा क्रिएटिव।
इस लग्न वाले जातकों पर चरित्र हीनता के आरोप नही लगते है। इनके वैवाहिक जीवन में भी कोई बहुत बड़ी प्रॉब्लम जल्दी से नही आती हालांकि पति पत्नी के विचार कम मिलना एक अलग बात है।

ये जातक छोटी छोटी बात पर भी खुश हो जाते है और कई बार इनके दिमाक में कोई ज्ञान की बात भी अचानक कौंध जाती है। इसकी बातों में आपको प्रौढ़ता ज्ञान और वाणी तीनो का समावेश मिल सकता है। ये शराब को पीते हुवे भी ईश्वर प्राप्ति के बारे मेंउपदेश देने लग सकते है और इन्ही विरोधाभाषी विचारों के कारण लोग जल्दी से इनकी बात पर विश्वास भी नही करते उसका कारण लोगों को इन जातकों को अच्छे से न समझ पाना भी होता है। ये जातक हमेशा लोगों स घिरा हुआ रहना पसन्द करते हैलोगों से मिलजुलकर रहना पसन्द करते है। इस लग्न के जातको को जीवन मे कर्म क्षेत्र में कामयाबी के लिये ऐसा काम करना चाहिए जहां अधिक से अधिक लोगों से सम्पर्क हो भीड़ रहती हो चाहे संपर्क लिखित रूप में हो।

मिथुन लग्न में बुध शुक्र मुख्य कारक ग्रह और शनि भी कारक ग्रह होता है/
/बुध देव की बात कर ले इसको विद्या वाणी बुद्धि का कारक और त्वचा और हर प्रकार के व्यपार का कारक होता है इसके निर्वल होने से बुद्धि की कमी त्वचा विकार जुबान की कमजोरी व्यापार में कमी होती है लेखक गणित और ज्योतिष भाषण कला हस्यप्रिय भी इससे से देखे जाते है प्रतिभा भी इससे देखि जाती है बुध कमजोर हुआ तो प्रतिभा की हानि करता है बुध एक मात्र ग्रह है जो दिन हो या रात हो अपनी शक्ति बनाये रखता है यह जिस ग्रह के साथ हो उसकी फल को बढ़ाता है अकेला बुध सारे भाव में कुछ ना कुछ सुभता लिए रखता है
 
#अस्त बुध होने पे हम इसको यह नहीं बोल सकते की यह पाप फल देगा वेदिक साहित्य के अनुसार बुध सूर्य की गोद में खेलने वाला सिसु है तो इसको अस्त का बड़ा दोष नहीं लगता अगर बुध अस्त को कोई दोष लगता तो र्ऋषि लोग शुक गुरु अस्त में सुभ कार्य शादी आदि मांगलिक कार्य बुध अस्त में भी मना करते बुध अस्त भी 2 प्रकार का होता है
1 बुध अस्त दशा में वक्री होकर सूर्य के राशि अंशो से आगे रहता है तब सूर्य से आगे रहने के कारन सुभ फल देने का एक गुण आ जाता है यह भी ध्यान रखे सूर्य से आगे रहने वाले सुभ ग्रह अपना सुभ फल अधिक देते है
2 मार्गी अवस्था में धरती के अधिक निकट रहता हुआ बड़े विम वाला होता है तब भी इसकी गति तो सूर्य से तेज़ ही रहती है बुध को अस्त जानकर दोषयुक्त नहीं समझना चाहिए नीच गत या सत्रु राशि में भी बुध को बिलकुल असुभ नहीं समझना चाहिए यह जिस राशि या ग्रह के साथ हो वेसे ही गुण खुद ले ता है भगवन विष्णु की पूजा या दुर्गा पूजा से इसकी पीड़ा से मुक्ति मिलती है मुग घी नीला कपडा गौ साला में हरा चारा दान करने से इसकी पीड़ा कम होती है
/मिथुन लग्न में नवग्रह का प्रभाव *(Planets in Gemini Lagna)
राशि चक्र की तीसरी राशि मिथुन है.आपकी कुण्डली के लग्न भाव में यह राशि है तो आपका लग्न मिथुन कहलता है.आपके लग्न के साथ प्रथम भाव में जो भी ग्रह बैठता है वह आपके लग्न को प्रभावित करता है.आपके जीवन में जो कुछ भी हो रहा है वह कहीं लग्न में बैठे हुए ग्रहों का प्रभाव तो नहीं है।
मिथुन लग्न में सूर्य (Sun in Gemini Ascendant)
मिथुन लग्न की कुण्डली में लग्न में बैठा सूर्य अपने मित्र की राशि में होता है (Sun is in a friendly sign when it is in Gemini).सूर्य के प्रभाव से व्यक्ति के चेहरे पर रक्तिम आभा छलकती है.व्यक्ति सुन्दर और आकर्षक होता है.इनका व्यक्ति उदार होता है.इनमें साहस धैर्य और पुरूषार्थ भरा होता है.बचपन में इन्हें कई प्रकार के रोगों का सामना करना होता है.युवावस्था में कष्ट और परेशानियों से गुजरना होता है.वृद्धावस्था सुख और आनन्द में व्यतीत होता है.इन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना होता है.सप्तम भाव पर सूर्य की दृष्टि होने से विवाह में विलम्ब होता है.वैवाहिक जीवन अशांत रहता है.
मिथुन लग्न में चन्द्रमा (Moon in Gemini Ascendant)
मिथुन लग्न में चन्द्रमा धन भाव का स्वामी होता है.इस राशि में चन्द्रमा लगनस्थ होने से व्यक्ति धनवान और सुखी होता है.इनका व्यक्तित्व अस्थिर होता है.मन चंचल रहता है.मनोबल ऊँचा और वाणी में कोमलता रहती है.इनके व्यक्तित्व में हठधर्मिता और अभिमान का भी समावेश रहता है.संगीत के प्रति इनके मन में प्रेम होता है.लग्न में बैठा चन्द्र सप्तम भाव को देखता है जिससे जीवनसाथी सुन्दर और ज्ञानी प्राप्त होता है.गृहस्थी सुखमय रहती है.आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है क्योकि बचत करने में ये होशियार होते हैं.चन्द्र के साथ पाप ग्रह होने पर चन्द्र का शुभत्व प्रभावित होता है अत: चन्द्र को प्रबल करने हेतु आवश्यक उपाय करना चाहिए.
मिथुन लग्न में मंगल (Mars in Gemini Ascendant)
मंगल मिथुन लग्न की कुण्डली में अकारक होता है (Mars is malefic when placed in a Gemini Ascendant Kundali). यह इस राशि में षष्ठेश और एकादशेश होता है.मिथुन लग्न में मंगल लगनस्थ होता है तो व्यक्ति को ओजस्वी और पराक्रमी बनाता है.जीवन में अस्थिरता बनी रहती है.व्यक्ति यात्रा का शौकीन होता है.सेना एवं रक्षा विभाग में इन्हें कामयाबी मिलती है.इन्हें माता पिता का पूर्ण सुख नहीं मिल पाता है.शत्रुओं से भी इन्हें कष्ट मिलता है.सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि से गृहस्थ जीवन में कई प्रकार की कठिनाईयां आती हैं.जीवनसाथी स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों से पीड़ित होता है.
मिथुन लग्न में बुध (Mercury in Gemini Ascendant)
बुध मिथुन लग्न का स्वामी है (Mercury is the lord of Gemini).इस लग्न में यह शुभ और कारक ग्रह होता है.मिथुन लग्न में प्रथम भाव में बैठा बुध व्यक्ति को बुद्धिमान, वाक्पटु और उत्तम स्मरण शक्ति प्रदान करता है.इनमें प्राकृतिक तौर पर कुशल व्यवसायी के गुण मौजूद होते हैं.आर्थिक दशा सामान्य रूप से अच्छी रहती है क्योंकि आय के मामले में एक मार्ग पर चलते रहना इन्हें पसंद नहीं होता.एक से अधिक स्रोतों से आय प्राप्त करना इनके व्यक्तित्व का गुण होता है.इन्हें लेखन, सम्पादन एवं प्रकाशन के क्षेत्र में कामयाबी मिलती है.भूमि, भवन एवं वाहन का सुख मिलता है.जीवनसाथी से इन्हें सहयोग एवं प्रसन्नता मिलती है.
मिथुन लग्न में गुरू (Jupiter in Gemini Ascendant)
मिथुन लग्न में गुरू सप्तम और दशम भाव का स्वामी होता है.दो केन्द भाव का स्वामी होने से मिथुन लग्न में यह अकारक ग्रह होता है.प्रथम भाव में गुरू के साथ बुध हो तो यह गुरू के अशुभ प्रभाव में कमी लाता है.गुरू के लग्नस्थ होने से व्यक्ति सुन्दर और गोरा होता है.गुरू के प्रभाव से इन्हें सर्दी, जुकाम एवं कफ की समस्या रहती है.ये चतुर, ज्ञानी और सत्य आचरण वाले व्यक्ति होते हैं.इन्हें समाज से मान सम्मान प्राप्त होता है.गुरू की विशेषता है कि यह जिस भाव को देखता है उससे सम्बन्धित विषय में शुभ फल प्रदान करता है अत: पंचम, सप्तम एवं नवम भाव से सम्बन्धित विषय में व्यक्ति को अनुकूल परिणाम प्राप्त होता है.अगर लग्न में गुरू के साथ पाप ग्रह हों तो परिणाम कष्टकारी होता है.
मिथुन लग्न में शुक्र (Venus in Gemini Ascendant)
मिथुन लग्न की कुण्डली में शुक्र पंचमेश और द्वादशेश होता है.त्रिकोणश होने के कारण इस लग्न में शुक्र कारक ग्रह होता है.लग्न में मित्र की राशि में बैठा शुक्र शुभ प्रभाव देने वाला होता है.जिनकी कुण्डली में यह स्थिति होती है वह दुबले पतले लेकिन आकर्षक होते हैं.इनकी आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है.भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति ये अधिक लगाव रखते अत: सुख सुविधाओं में धन खर्च करना भी इन्हें पसंद होता है.समाज में सम्मानित व्यक्ति होते हैं.सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि होने से वैवाहिक जीवन में जीवनसाथी से लगाव एवं प्रेम रहता है.शुक्र के प्रभाव से इनका विवाहेत्तर अथवा विवाह पूर्व अन्य सम्बन्ध भी हो सकता है.
मिथुन लग्न में शनि (Saturn in Gemini Ascendant)
मिथुन लग्न में कुण्डली में शनि अष्टम और नवम भाव का स्वामी होता है.त्रिकोण भाव का स्वामी होने से शनि अष्टम भाव के दोष को दूर करता है (As Saturn becomes the lord of trines, it removes the blemish from the eighth house) और कारक की भूमिका निभाता है.मिथुन लग्न की कुण्डली में लग्न में बैठा शनि स्वास्थ्य के मामले में कुछ हद तक पीड़ा देता है.इसके प्रभाव से व्यक्ति दुबला पतला होता है और वात, पित्त एवं चर्मरोग से परेशान होता है.यह भाग्य को प्रबल बनाता है एवं ईश्वर के प्रति श्रद्धावान बनाता है.लग्नस्थ शनि की दृष्टि सप्तम भाव पर होने से व्यक्ति में कामेच्छा अधिक रहती है.दशम भाव पर शनि की दृष्टि राज्य पक्ष से दंड एवं कष्ट देता है.माता पिता के सम्बन्ध में कष्ट देता है.शनि व्यक्ति को परिश्रमी बनाता है.
मिथुन लग्न में राहु (Rahu in Gemini Ascendant)
राहु मिथुन लग्न में मित्र राशि में होता है.इस राशि में राहु उच्च का होने से यह व्यक्ति को चालाक और कार्य कुशल बनाता है.व्यक्ति अपना काम निकालने में होशियार होता है.इनमें साहस भरपूर रहता है.लगनस्थ राहु व्यक्ति को आकर्षक एवं हृष्ट पुष्ट काया प्रदान करता है.मिथुन लग्न की स्त्रियों को लग्नस्थ राहु संतान के संदर्भ में कष्ट देता है.राहु इनके वैवाहिक जीवन में कलह उत्पन्न करता है.इनकी कुण्डली में यह द्विभार्या योग बनाता है.
मिथुन लग्न में केतु (Ketu in Gemini Ascendant)
केतु मिथुन लग्न की कुण्डली में लगनस्थ होने से व्यक्ति में स्वाभिमान की कमी रहती है.ये स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अपेक्षा दूसरों के साथ काम करना पसंद करते हैं.व्यापार की अपेक्षा नौकरी करना इन्हें पसंद होता है.इनमें स्वार्थ की प्रवृति होती है.केतु के प्रभाव से वात एवं पित्त रोग इन्हें परेशान करता है.कामेच्छा भी इनमें प्रबल रहती है.वैवाहिक जीवन में उथल पुथल की स्थिति रहती है.विवाहेत्तर सम्बन्ध की संभावना भी केतु के कारण प्रबल रहती है.

शनिवार, 25 जुलाई 2015

तांत्रिक समाज---सम्पूर्ण रक्षा विधान-




तांत्रिक समाज---सम्पूर्ण रक्षा विधान--1
साधना में रक्षा का अत्यधिक महत्व होता है । रक्षाविहीन देह से इतर योनिआँ बड़ी सरलता से सम्पर्क कर लेती हैं और साधना के दौरान हमारी साधनात्मक उर्जा को आत्मसात कर लेती हैं । इसके परिणाम स्वरूप हमार मन उस इतर योनि के साथ जुड़ जाने के कारण विक्षिप्त हो जाता है और हमारा साधना में मन नहीं लगता । कभी हम बिमार पड़ जाते हैं ,तो कभी सर घूमने लग जाता है। हर एक साधक के अपने - अपने अनुभव हैं। एक साधक को शुद्ध एवं प्रमाणिक रक्षा मंत्र का ज्ञान अवश्य होना चाहिए क्योंकि जहाँ रक्षा मंत्र साधना के समय होने वाले अनिष्ट से हमें बचाता है , वहीं दूसरी ओर उस मंत्र के प्रमुख देवी / देवता को हमारे साथ रहने के लिए विवश कर देता है । अरे भाई !!!!! मंत्र के देवता साथ होंगे तभी तो वह रक्षा करेंगे !! जिसका सीधा सा अर्थ है कि आपको उस देवी / देवता का सान्निध्य प्राप्त होगा!!
यहाँ एक बात और कहना चाहूंगा कि मैं जो साधनाएँ एवं प्रयोग यहाँ देता हूँ वो पूरी तरह परख कर ही देता हूँ । मैं कोई आसमान से नहीं गिरा हूँ । अपने आप को बस एक साधारण साधक समझता हूँ और वही बने रहना चाहता हूँ । कई साधक मुझसे एसी साधनाएँ माँग लेते हैं जो मैंने की ही नहीं होती हैं तो मैं Direct उन्हें मना कर देता हूँ , क्योंकि मैं आपके कीमती समय का महत्व समझता हूँ । आपको एसे ही कहीं से भी उठाकर साधना नहीं दे सकता जो आपका समय एवं धन नष्ट करे । मित्रों !!! मैंने भी एक साधारण साधक की तरह तंत्र का यह ज्ञान तंत्र की किताबों , तंत्र Websites एवं कई तांत्रिको से प्राप्त किया है । लेकिन आपको प्रदान करने से पहले खुद परखा !!! दूध रिड़क कर जो माखन निकला सिर्फ वोही आपके सामने है। मेरा उद्देश्य मात्र आपके जीवन को आनंदमय बनाना है और जब तक जिंदा हूँ एसा करता रहूँगा ॥



प्रस्तुत प्रयोग आपकी पूरी तरह रक्षा करने में समर्थ है । कभी - कभी भूत बाधा से ग्रसित व्यक्ति का भूत!! झाड़ने वाले पर ही आक्रमण कर देता है एसी स्थिति में यदि उस तांत्रिक ने अपनी पहले से रक्षा नहीं की हो , तो उसे बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है । कई बार साधक के मन में यह डर रहता है कि कहीं जो साधना वो कर रहा है वो गलत होने पर कोई विपरीत प्रभाव ना डाल दे तो वो साधक भी इस प्रयोग को कर सकता है ।
साधक को इसका प्रयोग श्मशान साधना के समय अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह एक स्वयं सिद्ध रक्षा मंत्र है जो साधक की चारों ओर से रक्षा करता है ।
॥ प्रयोग विधि ॥
इस प्रयोग को करने के लिए साधक को चाहिए कि वो पीले वस्त्र एवं आसन का उपयोग करे तथा आसन पर वीरासन में बैठ जाए । फिर सरसों के दाने मुट्ठी में लेकर दसों दिशाओं में फेंकते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण पाँच बार करे ।
॥ मन्त्र ॥
॥ हूं हूं ह्रीं ह्रीं कालिके घोर दंष्ट्रे प्रचंड चंडनायिके दानवान दारय हन हन शरीरे महाविघ्न छेदय छेदय स्वाहा हूं फट् ॥
( HOOM HOOM HREEM  HREEM KALIKE GHOR DANSHTRE PARCHAND CHANDNAYIKE DAANVAAN DARYA HAN HAN SHARIRE MAHAVIGHAN SHEDYA SHEDYA SWAHA HOOM PHAT )
इस मंत्र को आप अपने नित्य पूजन के समय कर सकते हैं । इस मंत्र के प्रभाव से भगवान भैरव सारा दिन साधक की रक्षा करते हैं । इस मंत्र का सबसे बड़ा लाभ ही यह है कि रक्षा और दिग्बंधन एक साथ हो जाता है आपको अलग से कोई मंत्र पड़ने की आवश्यकता नहीं है । अगर साधक वैसे भी इसका 5 बार रोज़ उच्चारण करता रहे तब भी भगवान भैरव साधक को रक्षा प्रदान करते हैं । लेकिन यह तो आप भी जानते हैं कि विशिष्ट साधना एवं प्रयोग पद्धति का महत्व भी विशिष्ट होता है ।
॥ मेरा अनुभव ॥
मैं इस मंत्र का नित्य 5 बार जप करता हूँ । इस मंत्र से मन का सारा भय समाप्त हो जाता है और मुझे हमेशा अपने इर्दगिर्द एक सुरक्षा घेरा सा महसूस होता है ॥
ॐ भं भैरवाय नम: !!!!!!!!!!

मुस्लिम साधनाओं के मुख्य नियम


मुस्लिम साधनाओं के मुख्य नियम
साधकजनों!! कल मैंने मुस्लिम वशीकरण साधना पोस्ट की थी जिसे काफी लोगों ने पसंद किया और साथ ही साथ विरोध भी किया क्योंकि जब कोई इन्सान अच्छे कार्य के लिए निकलता है तब उसका विरोध होना स्वभाविक ही है । परन्तु मित्रों!! मुझे विरोध की चिंता नहीं है अगर मेरे हितैशी आप मेरे साथ हैं । मैंने कल अपनी पोस्ट में चमेली के तेल का दीपक इस्तेमाल करने के लिए कहा था जिसे बाद में मैंने सरसों का तेल कर दिया क्योंकि कुछ साधक कह रहे थे कि उनके इलाके में चमेली का तेल नहीं मिलता । यह बात सच है कि कुछ मुस्लिम साधनाओं में चमेली का तेल इस्तेमाल होता है और कुछ में सरसों का पर कल की साधना में आप दोनों ही इस्तेमाल कर सकते हैं । सरसों का तेल सर्वत्र उपलब्ध होता है इसलिए मैंने आप लोगों की सुविधा का ध्यान रखते हुए एसा किया । मुझे आपको शुद्ध साधनात्मक  ज्ञान देना है सो देता रहुँगा, इसके लिए हर मुश्किल का सामना करने के लिए तैयार हूँ ॥
आजकी यह पोस्ट आपको मुस्लिम साधनाओं के कुछ महत्वपूर्ण नियमों की जानकारी देने के लिए है । क्योंकि बिना नियमों के कोई भी साधना सफल ही नहीं हो सकती । मुस्लिम साधनाओं के नियम निम्नलिखित हैं :-
1.मुस्लिम साधनाओं में वज्रासन का प्रयोग किया जाता है ।
2. वस्त्र स्वच्छ एवं धुले हुए इस्तेमाल करने चाहिए ।
3. असत्य भाषण से बचना चाहिए और यथासंभव कम बोलना चाहिए क्योंकि हम जितना ज्यादा बोलेंगे मुख से असत्य तो निकलेगा ही साथ ही साथ हमारी उर्जा भी ज्यादा नष्ट होगी ।
4. इस्लामिक साधनाओं में माला को उल्टा फेरा जाता है यानि माला को घड़ी की दिशा के विपरीत(Anticlockwise) फेरते हैं । माला फेरते समय सुमेरू का उलंघन नहीं किया जाता और सुमेरू आने पर माला को पलट कर फिर जपा जाता है। इन साधनाओं में "तस्बी" का उपयोग होता है । तस्बी को हिंदी में "विद्युत माला" कहा जाता है जो कि हरे रंग की होती है और अँधेरे में चमकती है ।
5.साधना स्थल साफ़ एवं शांत होना चाहिए । साधना स्थल पर गंदगी नहीं फैलानी चाहिए । हर रोज़ पोचा लगाना चाहिए । एक बात का विशेष ध्यान रखें कि शौचालय के पास कभी साधना नहीं करनी चाहिए और कमरे में भी शौचालय नहीं होना चाहिए ।
6. साधक को मन, वचन एवं कर्म से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।
7. साधक को शौच के बाद स्नान और लघु शंका के बाद हाथ पैर धोने चाहिए ।
8. मुस्लिम साधनाओं और अमलों में चमड़े से बनी हुई वस्तुओं से परहेज़ रखना चाहिए क्योंकि इन साधनाओं में  मुस्लिम पाक जिन्नातों की शक्ति मुख्यतः कार्य करती है ।
9. इन साधनाओं को करने के दिनों में और साधनाएँ और पूजा पाठ जैसे गायत्री मंत्र जप , शाबर साधनाएँ नहीं करनी  चाहिए क्योंकि इससे साधना में जो शक्ति संचार होता है उसका क्रम अवरोधित हो जाता है और साधना में सफलता के अवसर कम हो जाते हैं ।
10. माला को जमीन के स्पर्श से बचाना चाहिए ।
11. सभी प्रकार की इस्लामिक साधनाओं में इत्र का प्रयोग तो होता ही है ज्यादातर इत्र को कानों पे रूई द्वारा  लगाया जाता है और कपड़ों पे छिड़का जाता है । इनमें  2 तरह के इत्र सबसे ज्यादा उपयोग किए जाते हैं 1. हीना का 2. गुलाब का । साधना में जिस इत्र का प्रयोग करने के लिए कहा गया हो उसी का प्रयोग करें और अगर कोई भी इत्र ना दिया हो तो हीना के इत्र का प्रयोग करें ।
11. अगर साधना में पुष्पों का प्रयोग करने के लिए कहा गया हो तो हमेशा तीव्र सुगन्धित पुष्पों का ही उपयोग करना चाहिए । गुलाब और चमेली के पुष्प इस दृष्टि से उत्तम हैं ।
12. साधना करने के बाद कुछ मिष्ठान का वितरण हमेशा करना चाहिए । इस बात को लोग हमेशा नज़रअंदाज़ कर देते हैं ,वो लोग यह नहीं जानते कि एसा करने से उनकी सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है ।
13. अगर साधना में भोग लगाने के लिए बोला गया हो तो दूध से बनी सफेद मिठाई का प्रयोग किया जा सकता हैं इसके लिए सफेद बर्फी उपयुक्त है ।
14. अगर धुप का उपयोग करने के लिए बोला हो तो लोहबान का ही प्रयोग करें । लोहबान को हर मुस्लिम साधना में इस्तेमाल करने से साधना अपना पूर्ण  प्रभाव देती है ।
15.अगर संभव हो तो साधना के दौरान  मुस्लिम टोपी और तहमत(मुस्लिम लूँगी) धारण करनी चाहिए ।
16. साधना में सूती आसन का ही उपयोग करना चाहिए ।
17. अगर यंत्र बनाने के लिए बोला गया हो तो जिस वृक्ष की कलम का उपयोग करने के लिए कहा गया हो और जिस स्याही का प्रयोग करने को कहा हो उसका ही इस्तेमाल करना चाहिए । अगर यंत्र बनाते समय कलम टूट जाए तो उस साधना को बंद कर देना चाहिए और किसी अन्य मुहूर्त पे उस साधना को पुनः करना चाहिए । टूटी कलम और यंत्र को किसी मजार के पास रख आएँ ।
18. इस्लामिक दिनों के नाम :-
1. इतवार - रविवार
2. पीर - सोमवार
3. मंगल - मंगलवार
4. बुध - बुधवार
5. जुमेरात - गुरुवार
6. जुमा - शुक्रवार
7. शनिचर - शनिवार
इन नियमों का पालन अवश्य करें क्योंकि मैं आपको सफल होते हुए ही देखना चाहता





परी साधना
परी साधना !!!!!! सौभाग्य और सौंदर्य का अद्भुत मिश्रण होती है । आपके जीवन पथ को पूर्णतः निष्कंटक बनाने का काम करती है एक परी । आपके जीवन में चाहे कितनी ही बड़ी मुश्किल कयूँ ना हो बस अपनी छोटी सी मदभरी मुस्कान से उस मुश्किल को आपके जीवन से एसे निकाल फेंकती है जैसे वो पहले थी ही नहीं । आपका कोई भी काम हो चाहे कितना ही बड़ा हो परी के लिए तो वो एक मामूली सी बात है । वो जीवन भर एक सच्ची प्रेमिका / सहेली की भांति आपकी हर एक आज्ञा का पालन करती है । मुझे यह साधना एक अति पवित्र आत्मा के आवाहन से प्राप्त हुई थी । यह बहुत ही तीक्ष्ण साधना है । इस साधना को वो ही कर सकता है जिसका हृदय पत्थर का हो यानि जो जीवन की किसी भी परिस्थिति से विचलित ना होता हो ।
मैं एसी साधना किसी को नहीं देता , परन्तु मेरे एक शिष्य की स्थिति अति गम्भीर है , इसलिए यह साधना दे रहा हूँ ताकि उसके साथ-साथ अन्य साधक भी इसका लाभ उठा सकें । मुझे आप सब की चिंता है और आप लोगों की कामनाओं तथा दुखों का आभास है । मैं तो बस यही चाहता हूँ कि आपका जीवन व्यर्थ ना जाए बल्कि आप अपने जीवन के समस्त सुखों को भोगकर अंततः मोक्ष प्राप्त कर सकें । एक बात और कहना चाहता हूँ कि यह साधना आपको पूरी Facebook या अन्य किसी तंत्र की Website पे नहीं मिलेगी । यह इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि बहुत से पाखंडी जो भोले -भाले साधकों को लूटते हैं इसे Copy paste करके अपने नाम से Post ना कर सकें ।

॥ साधना विधि ॥

इस साधना को आपको श्मशान में करना है । यह मात्र 1 दिन की साधना है । आपको पूर्णिमा पर इस साधना को करना होगा , क्योंकि इस दिन यह पवित्र  योनिआँ अति शक्तिशाली हो जाती हैं और अपने पूर्ण प्रभाव के साथ सिद्ध होती हैं । आपको करना क्या है कि स्नान करके श्मशान में रात के पूरे 10 बजे प्रवेश करना है । उत्तर दिशा की ओर मुख कर इस साधना को करना होता है । सबसे पहले आसन जाप पढ़ना है और फिर शरीर कीलन मंत्र पढ़कर अपने चारों ओर लोहे की छुरी से एक गोल चक्र बनाना है । इसके पश्चात लोहबान की अगरबत्ती जलाकर गुरु एवं गणपति जी का मानस पूजन करना है और उनसे साधना हेतु आज्ञा माँगनी है । अब आपको मंत्र जप प्रारम्भ करना होगा , जिसमें आप रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करेंगे जोकि प्राण-प्रतिष्ठित होगी । इस साधना में आसन एवं वस्त्र श्वेत होंगे । आपको लगातार मंत्र जप करते जाना है जब तक कि परी हाज़िर ना हो जाए । जैसे - जैसे आप मंत्र जप करते जाएँगे वैसे - वैसे सारा श्मशान जागृत होता चला जाएगा । कभी आपके सामने अति क्रूर इतर योनिआँ आएगीं और आपके उपर झपटेगीं , तो कभी जंगली जानवर और अन्य जीव आपकी साधना खंडित करने की कोशिश करेंगे । आपको बस किसी भी हालत में उस सुरक्षा चक्र से बाहर नहीं आना है नहीं तो वो इतर योनिआँ आपको नुकसान पहुँचा सकतीं हैं और आप पागल भी हो सकते हैं। अगर आप अपनी साधना से विचलित ना हुए तो कुछ देर के बाद सारा श्मशान शांत हो जाएगा और आपको आसमान से नीचे की ओर आती हुई एक परी नज़र आएगी जो बहुत ही सुंदर होगी । जब वो आपके पास आए तो पहले से लाकर रखे हुए गुलाब के पुष्पों की वर्षा उसके उपर कर दें और उससे वचन माँगे कि " आप    मुझे वचन दें कि मैं जब भी इस मंत्र का
एक बार उच्चारण करूंगा आपको आना होगा और जो मैं कहूँगा वो करना होगा
तथा आपको आजीवन मेरे साथ मेरी प्रेमिका के रूप में रहना पड़ेगा "। इस तरह वो परी आपके वश में हो जाएगी और आप उससे कुछ भी करवा सकते हैं ।
॥ मन्त्र ॥---बा हिसार हनसद हिसार जिन्न देवी परी ज़ेर वह एक खाई दूसरी अगन पसारी गर्व दीगर जां मिलाईके असवार धनात ॥
॥ नोट ॥
साधकों !!! वो परी आपकी हर बात मानेगी पर आपको एक बात का ख्याल रखना है कि उस परी के साथ सम्भोग बिल्कुल नहीं करना है नहीं तो वो आपको छोड़कर चली जाएगी और फिर कभी सिद्ध नहीं होगी । वो आपको इस दुष्कर्म के बदले श्राप भी दे सकती है । इसलिए वो साधक ही इस साधना को करें जो खुद पर नियंत्रण रख सकें ।
॥ मेरा अनुभव ॥
जब मैंने यह साधना की थी तो लगभग 3 घंटे के बाद मेरे आगे और पीछे दो Cobra आकर बैठ गए थे । थोड़ी देर के पश्चात वो चले गये और फिर 2 सांड लड़ते हुए तेजी से मेरी तरफ आ रहे थे । उस समय एसा लगा कि अगर मैं अपनी जगह से ना उठा तो वो मुझे कुचल देंगे । पर मैंने दिल पर पत्थर रखा और मंत्र जप करता रहा । उसके पश्चात् बहुत ही भयानक सूरत वाले प्रेत हाज़िर हुए जो लगातार मुझ तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे । मैं थोड़ा सा तो डरा फिर सोचा कि जब तक इस सुरक्षा चक्र में हूँ ये मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते । बस फिर क्या था मेरे होंसले के आगे परी को हार माननी पड़ी और वो मुझे सिद्ध हो गई ।