रविवार, 30 जुलाई 2017

🍶कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है

*🍶कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है🍶

*सोना*
सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।
*चाँदी*
चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।
*कांसा*
काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।
*तांबा*
तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।
*पीतल*
पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल ७ प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।
*लोहा*
लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से शरीर की शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।
*स्टील*
स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी नहीं पहुँचता।
*एलुमिनियम*
एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।
*मिट्टी*
मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त है मिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे १०० प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।
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माहवारी के समय क्यों नहीं करना चाहिए - सेक्स ( सहवास)


माहवारी के समय क्यों नहीं करना चाहिए - सेक्स ( सहवास)

माहवारी ( Menstruation Cycle )
मासी - मासी रज: स्त्रीणां रसजं स्रवति त्र्यहम |

अर्थात जो रक्त स्त्रियों में हर महीने गर्भास्य से होकर 3 दिन तक बहता है उसे रज या माहवारी कहते है | माहवारी के शुरू होने पर धीरे-धीरे स्तन , गर्भास्य और योनी की वृद्धि होनी शुरू हो जाती है | सामान्यतया माहवारी 12 -13 वर्ष से शुरू होती है और 45-50 वर्ष की आयु में माहवारी आना बंद हो जाती है जिसे रजनिवर्ती कहते है | हमारे ऋषि - मुनिओ ने माहवारी के समय सेक्स को वर्जित किया था एवं कुछ नियम व कायदे बनाए थे | लेकिन वर्तमान समय में भाग - दोड़ भरी जिंदगी में स्त्री - पुरूष दोनों के लिए इन नियम का पालन करना न तो वांछनिये है और ना ही व्यावहारिक | लेकिन फिर भी इन नियमो का पालन उतना तो करना ही चाहिए जितना व्यावहारिक और हमारे लिए लाभ दाई हो |

तो आज हम आपको बताते है माहवारी के समय ऋषि - मुनिओ ने क्या क्या नियम महिलाओ के लिए बताए थे |


ब्रह्मचारिणी
माहवारी के समय स्त्रियों को ब्रह्मचारिणी रहना चाहिए अर्थात अपने पति के साथ सहवास नहीं करना चाहिए क्यों की इससे पति की उम्र घटती है | इस नियम का पालन माहवारी के प्रथम दिन से माहवारी के अंतिम दिन तक करना चाहिए |

आचरण
माहवारी के समय महिला को कुश आसन अर्थात सीधे और लकड़ी से बने तख़्त पर सोना चाहिए |

आहार ( भोजन )
माहवारी के समय उष्ण एवं तीखे खाने से परहेज रखना चाहिए क्यों की इससे शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है एवं माहवारी में आने वाले खून में भी वर्द्धि हो जाती है या फेर माहवारी का समय बढ़ जाता है | इसलिए उसे हल्का भोजन करना चाहिए | आयुर्वेद के अनुशार इस समय महिला को जो की दूध में पकाई हुई खिचड़ी का सेवन अवश्य करना चाहिए क्यों की इससे खून में उपस्थित विकृत धातु माहवारी के साथ शरीर से बहार आजाते है |


सहवास ( Sex )
मासिक धर्म के समय Sex को ऋषि - मुनिओ ने वर्जित बताया है | इन रात्रियो में महिला के साथ Sex नहीं करना चाहिए | इससे आयु की कमी होती है और ये वैज्ञानिक तौर पर भी प्रमाणिक है की इस समय महिला के आर्तव से एक हानिकारक टोक्सिन निकलता है जो पुरुष एवं महिला दोनों के लिए हानिकारक होता है | माहवारी के काल में महिला के खून में Menstruation Toxin की उत्पति होती है जो स्वेद ( पसीने ) और स्तन्य ( स्त्री के चुचको ) से बहार निकलता है | इस लिए महिला को रज ( महाव्वारी ) के 3 दिन अस्प्रश्य माना है |

कब करे ?

अब प्रश्न आता है की कब करे सहवास ? तो उसके लिए बताया गया है की माहवारी के चोथे दिन या जब माहवारी के स्राव का आना बंद हो जावे तो महिला को अच्छी तरह नहा कर एवं शरीर पर तेल की मालिश कर अपने पति के सम्मुख प्रशन मन से सहवास के लिए जाना चाहिय एवं दोनों को प्रसन्न होकर एकांत में Sex करना चाहिए |

अगर पुत्र रत्न की इच्छा हो तो माहवारी के चोथे , छठे , आठवे , दसवे और बारहवे दिन की रात्रि को सहवास करना चाहिए | आयुर्वेद को मानाने वालो को पता है की इन दिवसों में आयु, आरोग्य, सौन्द्रिये और एश्व्रिये का बल अधिक होता है | इन तिथियों को सम युग्म या समतिथि कहते है | इसके अलावा पांचवी, सातवी और नवी रात्रियो में किये गए समागम से कन्या की प्राप्ति होती है | इन तिथियों को अयुग्म या विषम तिथि कहा जाता है |

ये नियम उस समय बनाए गए थे जब जनसंख्या कम थी और खाने के लिए प्रयाप्त साधन थे | स्त्रियों के पास विश्राम के लिए प्रयाप्त समय था | लेकिन वर्तमान समय में ये नियम पालन करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन प्रतीत होते है | लेकिन फिर भी हमें इनमे से कुछ नियमो का पालन अवश्य करना चाहिए जिससे हमें भी स्वास्थ्य लाभ हो |

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

हरियाली तीज



हरियाली तीज: तो इसल‍िए सुहाग‍िनें व कन्‍याएं न‍िर्जला व्रत रखकर करती हैं पार्वती जी की पूजा

हरियाली तीज: तो इसल‍िए सुहाग‍िनें व कन्‍याएं न‍िर्जला व्रत रखकर करती हैं पार्वती जी की पूजा
सावन में शुक्‍ल पक्ष की तृतीया का बड़ा महत्‍व होता है। इसे हर‍ियाली तीज के रूप में भी जाना जाता है। इस द‍िन कन्‍याएं व मह‍िलाएं अपने सुहाग के ल‍िए पार्वती जी की पूजा करती हैं...
श‍िव जी पत‍ि के रूप में
सावन के महीने में शुक्ल पक्ष की तृतीया हर‍ियाली तीज के रूप में लगभग पूरे देश में मनाई जाती है। ज‍िस समय यह त्‍योहार मनाया जाता है उस समय चारों ओर हर‍ियाली छाई रहती है। ज‍िससे मन में उमंग, आस्‍था और प्रेम का अनोखा संगम होता है। मान्‍यता है क‍ि मां पार्वती ने भगवान शिव को पत‍ि रूप में पाने के लिए कठोर तपस्‍या की थी। ऐसे में 108वें जन्म में इसी द‍िन भगवान श‍िव जी उन्‍हें पत‍ि के रूप में मि‍ले हैं। 

सोलह श्रृंगार कर होती पूजा
ऐसे में यह व्रत पत‍ि की लंबी आयु, बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य व सुखी दांपत्‍य जीवन के ल‍िए रखा जाता है। इस द‍िन माता पार्वती की पूजा बड़े धूमधाम से होती है। कुंआरी लड़क‍ियां व सुह‍ागि‍न महि‍लाएं सभी हर‍ियाली तीज पर न‍िर्जला व्रत रखती हैं। इस द‍िन सुहाग‍िन महि‍लाओं को सोलह श्रृंगार करके व‍िध‍िव‍िधान से मां पार्वती की पूजा करती हैं। पूजा अर्चना के बाद बड़े बुजुर्गों से आर्शीवाद लेना जरूरी होता है। 

व‍िवाह की रुकावटें दूर होती 
हर‍ियाली तीज को लेकर यह भी माना जाता है क‍ि ज‍िन लड़क‍ियों के व‍िवाह में देरी होती है। इस व्रत को करने से उन्‍हें माता पार्वती की व‍िशेष कृपा म‍िलती है। उनके व‍िवाह में आने वाली रुकावटें दूर हो जाती हैं। वहीं नवि‍वाह‍िताओं के ल‍िए यह द‍िन और ज्‍यादा खास होता है। व‍िवाह के बाद मायके में उनकी यह पहली हर‍ियाली तीज होती हैं। इस द‍िन पूजा के बाद कई जगहों पर रंगबिरंगे परिधानों में झूले झूलने व लोकगीत आद‍ि गाने का भी र‍िवाज है।

संकलन

रविवार, 23 जुलाई 2017

गंगा स्नान

॥ गंगा स्नान कथा॥
एक समय शिव जी महाराज पार्वती के साथ हरिद्वार में घूम रहे थे । पार्वती जी ने देखा कि सहस्त्रों मनुष्य गंगा में नहा-नहाकर हर-हर गंगेकहते चले जा रहे हैं परंतु प्राय: सभी दुखी और पाप परायण हैं । तब पार्वती जी ने बड़े आश्चर्य से शिव जी से पूछा कि " हे देव ! गंगा में इतनी बार स्नान करने पर भी इनके पाप और दुखों का नाश क्यों नहीं हुआ ? क्या गंगा में सामर्थ्य नहीं रही ?’
शिवजी ने कहा, ‘‘ प्रिये ! गंगा में तो वही सामर्थ्य है, परंतु इन लोगों ने पापनाशिनी गंगा में स्नान ही नहीं किया है तब इन्हें लाभ कैसे हो ?’’
पार्वती जी ने आश्चर्य से कहा कि - ‘‘ स्नान कैसे नहीं किया ? सभी तो नहा-नहा कर आ रहे हैं ? अभी तक इनके शरीर भी नहीं सूखे हैं ।’’
शिवजी ने कहा, ‘‘ये केवल जल में डुबकी लगाकर आ रहे हैं । तुम्हें कल इसका रहस्य समझाऊंगा ।’’
दूसरे दिन बड़े जोर की बरसात होने लगी । गलियां कीचड़ से भर गईं । एक चौड़े रास्ते में एक गहरा गड्ढा था, चारों ओर लपटीला कीचड़ भर रहा था । शिवजी ने लीला से ही वृद्ध रूप धारण कर लिया और दीन-विवश की तरह गड्ढे में जाकर ऐसे पड़ गए, जैसे कोई मनुष्य चलता-चलता गड्ढे में गिर पड़ा हो और निकलने की चेष्टा करने पर भी न निकल पा रहा हो ।
पार्वती जी को उन्होंने यह समझाकर गड्ढे के पास बैठा दिया कि -- " देखो, तुम लोगों को सुना-सुनाकर यूं पुकारती रहो कि मेरे वृद्ध पति अकस्मात गड्ढे में गिर पड़े हैं कोई पुण्यात्मा इन्हें निकालकर इनके प्राण बचाए और मुझ असहाय की सहायता करे । शिवजी ने यह और समझा दिया कि जब कोई गड्ढे में से मुझे निकालने को तैयार हो तब इतना और कह देना कि ' भाई ! मेरे पति सर्वथा निष्पाप हैं इन्हें वही छुए जो स्वयं निष्पाप हो यदि आप निष्पाप हैं तो इनके हाथ लगाइए नहीं तो हाथ लगाते ही आप भस्म हो जाएंगे ।’’




पार्वती जी तथास्तुकह कर गड्ढे के किनारे बैठ गईं और आने-जाने वालों को सुना-सुनाकर शिवजी की सिखाई हुई बात कहने लगीं । गंगा में नहाकर लोगों के दल के दल आ रहे हैं । सुंदर युवती को यूं बैठी देख कर कइयों के मन में पाप आया, कई लोक लज्जा से डरे तो कइयों को कुछ धर्म का भय हुआ, कई कानून से डरे । कुछ लोगों ने तो पार्वती जी को यह भी सुना दिया कि ' मरने दे बुड्ढे को क्यों उसके लिए रोती है ?' आगे और कुछ दयालु सच्चरित्र पुरुष थे, उन्होंने करुणावश हो युवती के पति को निकालना चाहा परंतु पार्वती के वचन सुनकर वे भी रुक गए । उन्होंने सोचा कि ' हम गंगा में नहाकर आए हैं तो क्या हुआ, पापी तो हैं ही, कहीं होम करते हाथ न जल जाएं । बूढ़े को निकालने जाकर इस स्त्री के कथनानुसार हम स्वयं भस्म न हो जाएं ।' किसी का साहस नहीं हुआ । सैंकड़ों आए, सैंकड़ों ने पूछा और चले गए । संध्या हो चली । शिवजी ने कहा, ‘‘ पार्वती ! देखा, आया कोई सच्चे ह्रदय से गंगा में नहाने वाला है ?’’
थोड़ी देर बाद एक जवान हाथ में लोटा लिए हर-हर गंगे करता हुआ निकला, पार्वती ने उसे भी वही बात कही । युवक का हृदय करूणा से भर आया । उसने शिवजी को निकालने की तैयारी की । पार्वती ने रोक कर कहा कि ‘‘ भाई यदि तुम सर्वथा निष्पाप नहीं होगे तो मेरे पति को छूते ही जल जाओगे ।’’
उसने उसी समय बिना किसी संकोच के दृढ़ निश्चय के साथ पार्वती से कहा कि " माता ! मेरे निष्पाप होने में तुझे संदेह क्यों होता है ? देखती नहीं मैं अभी गंगा नहाकर आया हूं । भला, गंगा में गोता लगाने के बाद भी कभी पाप रहते हैं ? तेरे पति को निकालता हूं । युवक ने लपककर बूढ़े को ऊपर उठा लिया "। शिव-पार्वती ने उसे अधिकारी समझकर अपना असली स्वरूप प्रकट कर उसे दर्शन देकर कृतार्थ किया । शिवजी ने पार्वती से कहा कि ‘‘इतने लोगों में से इस एक ने ही गंगा स्नान किया है ।’’

इसी दृष्टांत के अनुसार जो लोग बिना श्रद्धा और विश्वास के केवल दंभ के लिए गंगा स्नान करते हैं उन्हें वास्तविक फल नहीं मिलता परंतु इसका यह मतलब नहीं कि गंगा स्नान व्यर्थ जाता है । गंगा स्नान का बहुत पुण्य भी है ।

पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता |

पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता |



अब एक बात ध्यान दें की स्त्री में गुणसूत्र xx होते है और पुरुष में xy होते है ।
इनकी सन्तति में माना की पुत्र हुआ (xy गुणसूत्र). इस पुत्र में y गुणसूत्र पिता से ही आया यह तो निश्चित ही है क्यू की माता में तो y गुणसूत्र होता ही नही !
और यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र). यह गुण सूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है ।
१. xx गुणसूत्र ;-
xx गुणसूत्र अर्थात पुत्री . xx गुणसूत्र के जोड़े में एक x गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आता है . तथा इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है ।
२. xy गुणसूत्र ;-
xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र . पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्यू की माता में y गुणसूत्र है ही नही । और दोनों गुणसूत्र असमान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता केवल ५ % तक ही होता है । और ९ ५ % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है ।
तो महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ । क्यू की y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है की यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है ।
बस इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था ।
वैदिक गोत्र प्रणाली और y गुणसूत्र । Y Chromosome and the Vedic Gotra System
अब तक हम यह समझ चुके है की वैदिक गोत्र प्रणाली य गुणसूत्र पर आधारित है अथवा y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है ।
उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है तो उस व्यक्ति में विधमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है या कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल है ।
चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नही होता यही कारन है की विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है ।
वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारन यह है की एक ही गोत्र से होने के कारन वह पुरुष व् स्त्री भाई बहिन कहलाये क्यू की उनका पूर्वज एक ही है ।
परन्तु ये थोड़ी अजीब बात नही? की जिन स्त्री व् पुरुष ने एक दुसरे को कभी देखा तक नही और दोनों अलग अलग देशों में परन्तु एक ही गोत्र में जन्मे , तो वे भाई बहिन हो गये .?
इसका एक मुख्य कारन एक ही गोत्र होने के कारन गुणसूत्रों में समानता का भी है । आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी ।
ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।
इस गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके, इसलिये विवाह से पहले #कन्यादान कराया जाता है और गोत्र मुक्त कन्या का पाणिग्रहण कर भावी वर अपने कुल गोत्र में उस कन्या को स्थान देता है, यही कारण था कि विधवा विवाह भी स्वीकार्य नहीं था। क्योंकि, कुल गोत्र प्रदान करने वाला पति तो मृत्यु को प्राप्त कर चुका है।
इसीलिये, कुंडली मिलान के समय वैधव्य पर खास ध्यान दिया जाता और मांगलिक कन्या होने से ज्यादा सावधानी बरती जाती है।
आत्मज़् या आत्मजा का सन्धिविच्छेद तो कीजिये।
आत्म+ज या आत्म+जा ।
आत्म=मैं, ज या जा =जन्मा या जन्मी। यानी जो मैं ही जन्मा या जन्मी हूँ।
यदि पुत्र है तो 95% पिता और 5% माता का सम्मिलन है। यदि पुत्री है तो 50% पिता और 50% माता का सम्मिलन है। फिर यदि पुत्री की पुत्री हुई तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा, फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा, इस तरह से सातवीं पीढ़ी मेंपुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा।
अर्थात, एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है, और यही है सात जन्मों का साथ।
लेकिन, जब पुत्र होता है तो पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है, और यही क्रम अनवरत चलता रहता है, जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं, अर्थात यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है।
इसीलिये, अपने ही अंश को पित्तर जन्मों जन्म तक आशीर्वाद देते रहते हैं और हम भी अमूर्त रूप से उनके प्रति श्रधेय भाव रखते हुए आशीर्वाद आशीर्वाद ग्रहण करते रहते हैं, और यही सोच हमें जन्मों तक स्वार्थी होने से बचाती है, और सन्तानों की उन्नति के लिये समर्पित होने का सम्बल देती है।
एक बात और, माता पिता यदि कन्यादान करते हैं, तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कन्या को कोई वस्तु समकक्ष समझते हैं, बल्कि इस दान का विधान इस निमित किया गया है कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुल धात्री बनने के लिये, उसे गोत्र मुक्त होना चाहिये। डीएनए मुक्त हो नहीं सकती क्योंकि भौतिक शरीर में वे डीएनए रहेंगे ही, इसलिये मायका अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है, गोत्र यानी पिता के गोत्र का त्याग किया जाता है। तभी वह भावी वर को यह वचन दे पाती है कि उसके कुल की मर्यादा का पालन करेगी यानी उसके गोत्र और डीएनए को करप्ट नहीं करेगी, वर्णसंकर नहीं करेगी, क्योंकि कन्या विवाह के बाद कुल वंश के लिये #रज् का रजदान करती है और मातृत्व को प्राप्त करती है। यही कारण है कि हर विवाहित स्त्री माता समान पूज्यनीय हो जाती है।
यह रजदान भी कन्यादान की तरह उत्तम दान है जो पति को किया जाता है।

यह सुचिता अन्य किसी सभ्यता में दृश्य ही नहीं है।