मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

कैसे बने गरुड़ विष्णु के वाहन ?


कैसे हुई गरुड़ और नागों की उत्पत्ति और कैसे बने गरुड़ विष्णु के वाहन ?

आज हम आपको एक पौराणिक कथा बता रहे है जिसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है। यह कथा बताती है की इस धरती पर गरुड़ और नागों की उत्पत्ति कैसे हुई, क्यों गरुड़ नाग के दुशमन हुए, क्यों नागो की जीभ आगे से दो हिस्सों में बटी हुई है और कैसे गरुड़, भगवान विष्णु के वाहन बने ?

महर्षि कश्यप की तेरह पत्नियां थी। लेकिन विनता और कद्रू नामक अपनी दो पत्नियों से वे विशेष प्रेम करते थे। एक दिन महर्षि जब आनंद भाव में बैठे थे तो उनकी दोनों पत्नियां उनके समीप पहुंची और पति के पांव दबाने लगी। प्रसन्न होकर महर्षि ने बारी-बारी से दोनों को सम्बोधित किया- “तुम दोनों ही मुझे विशेष प्रिय हो। तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ।”

कद्रू बोली- “स्वामी ! मेरी इच्छा है कि मैं हजार पुत्रो की माँ बनूं।”

फिर महर्षि ने विनता से पूछा। विनता ने कहा- “मैं भी माँ बनना चाहती हूं स्वामी ! किन्तु हजार पुत्रो की नहीं, बल्कि सिर्फ एक ही पुत्र की। लेकिन मेरा पुत्र इतना बलवान हो कि कद्रू के हजार पुत्र भी उसकी बराबरी न कर सके।”

महर्षि बोले- “शीघ्र ही मैं एक यज्ञ करने वाला हूं। यज्ञोपरांत तुम दोनों की माँ बनने की इच्छाएं अवश्य पूरी होगी।”

महर्षि कश्यप ने यज्ञ किया। देवता और ऋषि-मुनियों ने सहर्ष यज्ञ में हिस्सा लिया। यज्ञ सम्पूर्ण करके महर्षि कश्यप पुनः तपस्या करने चले गए। कुछ माह पश्चात विनता ने दो तथा कद्रु ने एक हजार अंडे दिए। कुछ काल के पश्चात कद्रु ने अपने अंडे फोड़े तो उनमे से काले नागों के बच्चे निकल पड़े। कद्रु ने ख़ुशी से चहकते हुए विनता को पुकारा- “विनता ! देखो तो मेरे अन्डो से कितने प्यारे बच्चे बाहर निकले है।”

विनता बोली- “सचमुच बहुत खूबसूरत है कद्रू ! बधाई हो, अब मैं भी अपने दोनों अंडो को फोड़कर देखती हूं।”

यह कहकर विनता अपने दोनों अंडो के पास गई। उसने एक अंडा फोड़ दिया, लेकिन अंडे के अंदर से एक बच्चे का आधा बना शरीर देखकर वह सहम गई। बोली- “हे भगवान ! जल्दीबाजी में मैने ये क्या कर डाला। यह बच्चा तो अभी अपूर्ण है।”

तभी फूटे हुए अंडे के अंदर से बालक बोल पड़ा- “जल्दबाजी में अंडा फोड़कर तुमने बहुत बड़ा अपराध कर डाला है। फलस्वरूप तुम्हे कुछ समय तक दासता करनी होगी।”

विनता बोली- “अपराध तो मुझसे हो ही गया। लेकिन इसका निराकरण कैसे होगा पुत्र ?”

अपूर्ण बालक बोला-“दूसरे अंडे को फोड़ने में जल्दबाजी मत करना। यदि तुमने ऐसा किया तो जीवन भर दासता से मुक्त नहीं हो पाओगी। क्योंकि उसी अंडे से पैदा होने वाला तुम्हारा पुत्र तुम्हे दासता से मुक्ति दिलाएगा।”

इतना कहकर अंडे से उत्पन्न अपूर्ण बालक आकाश में उड़ गया और विनता दूसरे अंडे के पकने तक इंतजार करने लगी। समय पाकर अंडा फूटा और उसमे से एक महान तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ, जिसका नाम गरुड़ रखा गया। गरुड़ दिन-प्रतिदिन बड़ा होने लगा और कद्रू के हजार पुत्रों पर भारी पड़ने लगा। परिणामस्वरूप विनता और कद्रू के संबंध दिन-प्रतिदिन कटु से कटुतर होते गए।


फिर एक दिन जब विनता और कद्रू भृमण कर रही थी। कद्रू ने सागर के किनारे दूर खड़े सफेद घोड़े को देखकर विनता से कहा- “बता सकती हो विनता ! दूर खड़ा वह घोडा किस रंग का है ?”

विनता बोली- “सफेद रंग का।”

कद्रू बोली- “शर्त लगाकर कह सकती हो कि घोडा सफेद रंग का ही है। मुझे तो इसकी पूंछ काले रंग की नजर आ रही है।”

विनता बोली- “तुम्हारा विचार गलत है। घोडा पूंछ समेत सफेद रंग का है।”

दोनों में काफी देर तक यही बहस छिड़ी रही। आखिर में कद्रू ने कहा- “तो फिर हम दोनों में शर्त हो गई। कल घोड़े को चलकर देखते है। यदि वह सम्पूर्ण सफेद रंग का हुआ तो मैं हारी, और यदि उसकी पूंछ काली निकली तो मैं जीत जाऊंगी। उस हालत में जो भी हम दोनों में से जीतेगी, तो हारने वाली को जितने वाली की दासी बनना पड़ेगा। बोलो तुम्हे मंजूर है ?”

विनता बोली- “मुझे मंजूर है।”

रात को ही कद्रू ने अपने सर्प पुत्रों को बुलाकर कहा- “आज रात को तुम सब उच्चेः श्रवा घोड़े की पूंछ से जाकर लिपट जाना। ताकि सुबह जब विनता देखे तो उसे घोड़े की पूंछ काली नजर आए।”

योजनानुसार नाग उच्चेः श्रवा घोड़े की पूंछ से जाकर लिपट गए। परिणामस्वरूप सुबह जब कद्रू ने विनता को घोड़े की पूंछ काले रंग की दिखाई तो वह हैरान रह गई। बोली- “ऐसा कैसे हो गया। कल तो इसकी पूंछ बिलकुल सफेद थी।”

कद्रू बोली- “खूब तसल्ली से देख लो। घोड़े की पूंछ आरम्भ से ही काली है। शर्त के मुताबित तुम हार चुकी हो। इसलिए अब तुम्हे मेरी दासी बनकर रहना पड़ेगा।”

विवशतापूर्वक विनता को कद्रू की दासता स्वीकार करनी पड़ी। माता को उदास देखकर गरुड़ ने पूछा- “क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे आप कद्रू की दासता से मुक्त हो जाए ?”

विनता बोली- “यह तो कद्रू से ही पूछना पड़ेगा। यदि वह प्रसन्न हो जाती है तो मुझे दासता से मुक्त कर देगी।”

गरुड़ अपनी माता विनता को लेकर कद्रू के पास पहुंचा और कहा- “क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप मेरी माता को अपनी दासता से मुक्त कर दे।”

कद्रू बोली- “हो सकता है। बशर्ते कि तुम मेरे पुत्रों को अमृत लाकर दे दो।”

यह सुनकर गरुड़ सोच में पड़ गया। उसने अपनी माता से पूछा- “माँ ! अमृत कहा मिलेगा जिसे लेकर मैं तुम्हे दासी जीवन से मुक्त कर संकू।”

विनता ने कहा- “अमृत का पता तुम्हारे पिता बता सकते है पुत्र ! तुम उन्हीं के पास जाकर पूछो।”

गरुड़ महर्षि कश्यप के पास पहुंचा। कश्यप अपने पुत्र को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। गरुड़ ने उनसे पूछा- “पिताश्री ! मैं अमृत लेकर अपनी माता को दासता से मुक्ति दिलाना चाहता हूं। कृपया मुझे बताइये कि अमृत कहा मिलेगा।”

महर्षि बोले- “पुत्र ! देवराज इंद्र ने अमृत की सुरक्षा के लिए बहुत व्यापक प्रबंध कर रखा है। वहां तक पहुचना कठिन है।”

गरुड़ बोला- “इंद्र ने कितनी ही कड़ी सुरक्षा प्रबंध क्यों न कर रखे हो। मगर मैं अमृत ले आऊंगा। आप मुझे सिर्फ उस स्थान का पता बता दीजिये।”

महर्षि कश्यप ने गरुड़ को इंद्र का पता बता दिया। गरुड़ ने फिर पूछा- “पिताजी ! मुझे भूख बहुत लगती है। कृपया मुझे यह भी बता दीजिये कि इस लम्बे मार्ग में क्या खाकर अपना पेट भरु।”


महर्षि बोले- “अमृत जिस स्थान पर रखा है उस सरोवर तक पहुंचने में तुम्हे वक्त लग जाएगा। इस बीच समुद्र के किनारे तुम्हे निषादों की अनेक बस्तिया मिलेगी। ये निषाद बहुत पतित है और इनके आचरण असुरो जैसे है। तुम इन्हे खाकर अपनी भूख मिटा लेना।”

गरुड़ बोला- “और उसके बाद भी मेरा पेट न भरा तो ?”

महर्षि बोले- “सरोवर के अंदर एक विशाल कछुआ रहता है और उसके साथ ही वन में एक महा भयंकर हाथी भी रहता है। दोनों ही बहुत क्रूर और आसुरी प्रवृति के है। तुम उन्हें भी खा सकते हो।”

पिता का आदेश पाते ही गरुड़ अमृत सरोवर की ओर बढ़ चला। मार्ग में उसने निषादों को खाकर अपनी भूख मिटाई। फिर अमृत सरोवर पर पहुंचकर कच्छप और हाथी को अपने पंजो में दबाया और दोनों को खाने के लिए किसी उचित जगह की तलाश में उड़ चला।”

सोमगिरि पर्वत पर लहलहाते ऊंचे वृक्षों को देखकर जैसे ही उसने एक वृक्ष पर बैठना चाहा तो उनके भार से वृक्ष की शाखा टूटकर नीचे गिरने लगी। यह देख गरुड़ तुरंत उड़ा और दूसरे वृक्ष पर जा बैठा। जिस शाखा पर वह बैठा उस शाखा पर उसने उलटे लटके कुछ ऋषियों को तपस्या करते देखा। लेकिन वह शाखा उनके भार से टूटकर नीचे गिरने लगी। यह देख गरुड़ ने शाखा को चोंच में दबाया और हाथी तथा कच्छप को पंजे में दबाए हुए वह अपने पिता के आश्रम की ओर उड चला।

कश्यप के आश्रम में गरुड़ ने उड़ते-उड़ते अपने पिता से पूछा- “पिताजी ! मेरे भार से उस पेड़ की शाखा टूट गई है जिस पर कुछ ऋषि उलटे लटके तपस्या कर रहे थे। मुझे बताइये अब मैं इस शाखा को कहां छोडूं ?”

महर्षि कश्यप बोले- “तुमने बहुत अच्छा किया पुत्र ! जो सीधे यहां चले आए। शाखा, से उलटे लटके हुए ये बालखिल्य ऋषिगण है। अगर इन्हे कष्ट पहुंचा तो ये शाप देकर तुम्हे भस्म कर देंगे।”

गरुड़ बोले- “तो फिर बताइये अब मैं क्या करूं ?”

महर्षि बोले- “ठहरो, मैं ऋषिगण से प्रार्थना करता हूं कि वे अपना स्थान छोड़कर नीचे आ जाए।”

महर्षि कश्यप ने ऋषि गणो से प्रार्थना की। बालखिल्य ऋषियों ने कश्यप की प्रार्थना स्वीकार कर शाखा छोड़ दी और वे हिमालय में तपस्या करने चले गए। चोंच में दबी शाखा को नीचे फेंककर गरुड़ ने भी आनंद से कछुए और हाथी का आहार किया और तृप्त होकर पुनः अमृत लाने के लिए उड़ चला। गरुड़ अमृत सरोवर के पास पहुंचा तो अमृत की रक्षा करते हुए महाकाय देवो और अमृत कलश के चारो ओर घूमते हुए चक्र को देखकर वह हैरान हो गया। उसने सोचा कि ये देव और चक्र देवराज इंद्र ने अमृत कलश की सुरक्षा के लिए लगाए हुए है। चक्र में फंसकर मेरे पंख कट सकते है। इसलिए मैं अत्यंत छोटा रूप धारण कर इसके मध्य में प्रवेश करूंगा।

गरुड़ को देखकर एक देव ने कहा- “यह कोई असुर है जो वेश बदलकर अमृत चुकाने यहां तक पहुंचा है। हमे इसे खत्म कर देना चाहिए।”

दोनों देव विद्युत गति से गरुड़ पर टूट पड़े। लेकिन गरुड़ ने अपने पैने पंजो और तीखी चोंच से इन्हे इतना घायल कर दिया कि शीघ्र ही वे दोनों बेहोश होकर गिर पड़े। गरुड़ ने अमृत कलश पंजो में दबाया और वापस उड़ गया।

होश में आते ही दोनों रक्षक देव घबराए हुए इंद्र के पास पहुंचे और गरुड़ द्वारा अमृत कलश ले उड़ने की घटना बता दी।

यह सुनके इंद्र चकित होकर बोला- “ऐसा कैसे हो गया। सरोवर में रहने वाले विशाल कच्छप और तट पर रहने वाले महाकाय हाथी का क्या हुआ ?”

“उन दोनों को भी उस विशाल गरुड़ ने अपना भोजन बना लिया।”

यह सुनकर इंद्र अपनी देव सेवा की एक टुकड़ी के साथ वज्र उठाए इन्द्रपुरी से निकला और गरुड़ की खोज में बढ़ चला। आकाश मार्ग में उड़ते हुए शीघ्र ही उसने गरुड़ को देख लिया और अपना वज्र चला दिया। इंद्र के वज्र का गरुड़ पर कोई असर न हुआ। उसके डैनों से सिर्फ एक पंख वज्र से टकराकर नीचे आ गिरा। देव गरुड़ पर टूट पड़े लेकिन कुछ ही समय में गरुड़ ने उन्हें अपनी पैनी चोंच की मार से अधमरा कर दिया।

यह देख इंद्र सोचने लगा- “यह तो महान पराक्रमी है। मेरे वज्र का इस पर जरा भी असर नहीं हुआ। जबकि मेरे वज्र के प्रहार से पहाड़ तक टूट के चूर्ण बन जाते है। ऐसे पराक्रमी को शत्रुता से नहीं मित्रता से काबू में करना चाहिए।” यह सोचकर इंद्र ने गरुड़ से कहा- “पक्षीराज ! मैं तुम्हारी वीरता से बहुत प्रभावित हुआ हूं। इस अमृत कलश को मुझे सौंप दो और बदले में जो भी वर मांगना चाहते हो मांग लो।”

गरुड़ बोला- “यह अमृत मैं अपने लिए नही, अपनी माता को दासता से मुक्त कराने के लिए नाग माता को देने के लिए ले जा रहा हूं। इसलिए यह कलश मैं तुम्हे नहीं दूंगा।”

इंद्र बोला- “ठीक है, इस समय तुम कलश ले जाकर नाग माता को सौंप दो किन्तु उन्हें इसे प्रयोग मत करने देना। उचित मौका देखकर मैं वहां से यह कलश गायब कर दूंगा।”

गरुड़ बोला- “अगर मैं तुम्हारी बात को मान लूं तो मुझे बदले में क्या मिलेगा ?”

इंद्र बोला- “तुम्हारा मनपसंद भरपेट भोजन। तब मैं तुम्हे इन्ही नागो को खाने की इजाजत दे दूंगा।”

गरुड़ बोला- “यही तो मैं चाहता हूं। नाग मेरे स्वादिष्ट भोजन है किन्तु एक ही पिता की संतान होने के कारण मैं इन्हे कहते हुए हिचकता हूं। अब मेरी हिचक दूर हो गई। अब मैं आपके कथानुसार ही कार्य करूंगा।”

यह कहकर गरुड़ अमृत कलश लेकर कद्रु के पास पहुंचा और उससे बोला- “माते ! अपनी प्रतिज्ञानुसार मैं अमृत कलश ले आया हूं। अब आप अपने वचन से मेरी माता को मुक्त कर दे।”

कद्रु ने उसी क्षण विनता को वचन से मुक्त कर दिया और अगली सुबह अमृत नागो को पिलाने का निश्चय कर वहां से चली गई। रात को उचित मौका देखकर इंद्र ने अमृत कलश उठा लिया और पुनः उसी स्थान पर पहुंचा दिया।

दूसरे दिन सुबह नाग जब वहां पहुंचे तो अमृत कलश गायब देखकर दुखी हुए। उन्होंने उस कुशा को ही जिस पर अमृत कलश रखा था चाटना आरम्भ कर दिया जिसके कारण उनकी जीभ दो हिस्सों में फट गई।

गरुड़ की मातृभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ के सम्मुख प्रकट हो गए और बोले- “मैं तुम्हारी मातृभक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूं पक्षीराज ! मैं चाहता हूं कि अब से तुम मेरे वाहन के रूप में मेरे साथ रहा करो।”

गरुड़ बोला- “मैं बहुत भाग्यशाली हूं प्रभु जो स्वयं आपने मुझे अपना वाहन बनाना स्वीकार किया। आज से मैं हर क्षण आपकी सेवा में रहूंगा और आपको छोड़कर कही नहीं जाऊंगा।”

इस तरह उसी दिन से पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन के रूप में प्रयुक्त होने लगे। गरुड़ के भगवान विष्णु की सेवा में जाते ही देवता भयमुक्त हो गए।

और चूँकि नागों के छल के कारण गरुड़ की माँ विनीता को दासता स्वीकार करनी पड़ी इसलिए नाग और गरुड़ एक दूसरे के दुशमन है।

हवन


🔥🔥🔥 हवन 🔥🔥🔥
हवन कुंड और हवन के नियमों के बारे में विशेष जानकारी
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जन्म से मृत्युपर्यन्त सोलह संस्कार या कोई शुभ धर्म कृत्य यज्ञ अग्निहोत्र के बिना अधूरा माना जाता है। वैज्ञानिक तथ्यानुसार जहाॅ हवन होता है, उस स्थान के आस-पास रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु शीघ्र नष्ट हो जाते है।

शास्त्रों में अग्नि देव को जगत के कल्याण का माध्यम माना गया है जो कि हमारे द्वारा दी गयी होम आहुतियों को देवी देवताओं तक पहुंचाते है। जिससे देवगण तृप्त होकर कर्ता की कार्यसिद्धि करते है। इसलिये पुराणों में कहा गया है।

""अग्निर्वे देवानां दूतं ""

कोई भी मन्त्र जाप की पूर्णता , प्रत्येक संस्कार , पूजन अनुष्ठान आदि समस्त दैवीय कर्म , हवन के बिना अधूरा रहता है।
हवन दो प्रकार के होते हैं वैदिक तथा तांत्रिक. आप हवन वैदिक करायें या तांत्रिक दोनों प्रकार के हवनों को कराने के लिए हवन कुंड की वेदी और भूमि का निर्माण करना अनिवार्य होता हैं. शास्त्रों के अनुसार वेदी और कुंड हवन के द्वारा निमंत्रित देवी देवताओं की तथा कुंड की सज्जा की रक्षा करते हैं. इसलिए इसे “मंडल” भी कहा जाता हैं.

हवन की भूमि👉 हवन करने के लिए उत्तम भूमि को चुनना बहुत ही आवश्यक होता हैं. हवन के लिए सबसे उत्तम भूमि नदियों के किनारे की, मन्दिर की, संगम की, किसी उद्यान की या पर्वत के गुरु ग्रह और ईशान में बने हवन कुंड की मानी जाती हैं. हवन कुंड के लिए फटी हुई भूमि, केश युक्त भूमि तथा सांप की बाम्बी वाली भूमि को अशुभ माना जाता हैं.


हवन कुंड की बनावट👉 हवन कुंड में तीन सीढियाँ होती हैं. जिन्हें “ मेखला ” कहा जाता हैं. हवन कुंड की इन सीढियों का रंग अलग – अलग होता हैं.

1👉 हवन कुंड की सबसे पहली सीधी का रंग सफेद होता हैं.

2👉 दूसरी सीढि का रंग लाल होता हैं.

3👉 अंतिम सीढि का रंग काला होता हैं.
ऐसा माना जाता हैं कि हवन कुंड की इन तीनों सीढियों में तीन देवता निवास करते हैं.

1👉 हवन कुंड की पहली सीढि में विष्णु भगवान का वास होता हैं.

2👉 दूसरी सीढि में ब्रह्मा जी का वास होता हैं.

3👉 तीसरी तथा अंतिम सीढि में शिवजी का वास होता हैं.

हवन कुंड के बाहर गिरी सामग्री को हवन कुंड में न डालें - आमतौर पर जब हवन किया जाता हैं तो हवन में हवन सामग्री या आहुति डालते समय कुछ सामग्री नीचे गिर जाती हैं. जिसे कुछ लोग हवन पूरा होने के बाद उठाकर हवन कुंड में डाल देते हैं. ऐसा करना वर्जित माना गया हैं. हवन कुंड की ऊपर की सीढि पर अगर हवन सामग्री गिर गई हैं तो उसे आप हवन कुंड में दुबारा डाल सकते हैं. इसके अलावा दोनों सीढियों पर गिरी हुई हवन सामग्री वरुण देवता का हिस्सा होती हैं. इसलिए इस सामग्री को उन्हें ही अर्पित कर देना चाहिए।

तांत्रिक हवन कुंड 👉 वैदिक हवन कुंड के अलावा तांत्रिक हवन कुंड में भी कुछ यंत्रों का प्रयोग किया जाता हैं. तांत्रिक हवन करने के लिए आमतौर पर त्रिकोण कुंड का प्रयोग किया जाता हैं.

हवन कुंड और हवन के नियम
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हवन कुंड के प्रकार - हवन कुंड कई प्रकार के होते हैं. जैसे कुछ हवन कुंड वृताकार के होते हैं तो कुछ वर्गाकार अर्थात चौरस होते हैं. कुछ हवन कुंडों का आकार त्रिकोण तथा अष्टकोण भी होता हैं.

आहुति के अनुसार हवन कुंड बनवायें
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1👉 अगर अगर आपको हवन में 50 या 100 आहुति देनी हैं तो कनिष्ठा उंगली से कोहनी (1 फुट से 3 इंच )तक के माप का हवन कुंड तैयार करें.

2👉 यदि आपको 1000 आहुति का हवन करना हैं तो इसके लिए एक हाथ लम्बा (1 फुट 6 इंच ) हवन कुंड तैयार करें.

3👉 एक लक्ष आहुति का हवन करने के लिए चार हाथ (6 फुट) का हवनकुंड बनाएं.

4👉 दस लक्ष आहुति के लिए छ: हाथ लम्बा (9 फुट) हवन कुंड तैयार करें.

5👉 कोटि आहुति का हवन करने के लिए 8 हाथ का (12 फुट) या 16 हाथ का हवन कुंड तैयार करें.

6👉 यदि आप हवन कुंड बनवाने में असमर्थ हैं तो आप सामान्य हवन करने के लिए चार अंगुल ऊँचा, एक अंगुल ऊँचा, या एक हाथ लम्बा – चौड़ा स्थण्डिल पीली मिटटी या रेती का प्रयोग कर बनवा सकते हैं.

7👉 इसके अलावा आप हवन कुंड को बनाने के लिए बाजार में मिलने वाले ताम्बे के या पीतल के बने बनाए हवन कुंड का भी प्रयोग कर सकते हैं. शास्त्र के अनुसार इन हवन कुंडों का प्रयोग आप हवन करने के लिए कर सकते हैं. पीतल या ताम्बे के ये हवन कुंड ऊपर से चौड़े मुख के और नीचे से छोटे मुख के होते हैं. इनका प्रयोग अनेक विद्वान् हवन – बलिवैश्व – देव आदि के लिए करते हैं.

8👉 भविषयपुराण में 50 आहुति का हवन करने के लिए मुष्टिमात्र का निर्देश दिया गया हैं. भविष्यपूराण में बताये गए इस विषय के बारे में शारदातिलक तथा स्कन्दपुराण जैसे ग्रन्थों में कुछ मतभेद मिलता हैं।

हवन के नियम👉 वैदिक या तांत्रिक दोनों प्रकार के मानव कल्याण से सम्बन्धित यज्ञों को करने के लिए हवन में “मृगी” मुद्रा का इस्तेमाल करना चाहिए.


1👉 हवन कुंड में सामग्री डालने के लिए हमेशा शास्त्रों की आज्ञा, गुरु की आज्ञा तथा आचार्यों की आज्ञा का पालन करना चाहिए.

2👉 हवन करते समय आपके मन में यह विश्वास होना चाहिए कि आपके करने से कुछ भी नहीं होगा. जो होगा वह गुरु के करने से होगा.

3👉 कुंड को बनाने के लिए अड़गभूत वात, कंठ, मेखला तथा नाभि को आहुति एवं कुंड के आकार के अनुसार निश्चित किया जाना च हिए.

4👉 अगर इस कार्य में कुछ ज्यादा या कम हो जाते हैं तो इससे रोग शोक आदि विघ्न भी आ सकते हैं.

5👉 इसलिए हवन को तैयार करवाते समय केवल सुन्दरता का ही ध्यान न रखें बल्कि कुंड बनाने वाले से कुंड शास्त्रों के अनुसार तैयार करवाना चाहिए।

हवन करने के फायदे
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1👉 हवन करने से हमारे शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं.

2👉 हवन करने से आस – पास का वातावरण शुद्ध हो जाता हैं.

3👉 हवन ताप नाशक भी होता हैं.

4👉 हवन करने से आस–पास के वातावरण में ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ जाती हैं.

हवन से सम्बंधित कुछ आवश्यक बातें
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अग्निवास का विचार
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तिथि वार के अनुसार अग्नि का वास पृथ्वी ,आकाश व पाताल लोक में होता है। पृथ्वी का अग्नि वास समस्त सुख का प्रदाता है लेकिन आकाश का अग्नि वास शारीरिक कष्ट तथा पाताल का धन हानि कराता है। इसलिये नित्य हवन , संस्कार व अनुष्ठान को छोड़कर अन्य पूजन कार्य में हवन के लिये अग्निवास अवश्य देख लेना चाहिए।


हवन कार्य में विशेष सावधानियां
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मुँह से फूंक मारकर, कपड़े या अन्य किसी वस्तु से धोक देकर हवन कुण्ड में अग्नि प्रज्ज्वलित करना तथा जलती हुई हवन की अग्नि को हिलाना - डुलाना या छेड़ना नही चाहिए।

हवन कुण्ड में प्रज्ज्वलित हो रही अग्नि शिखा वाला भाग ही अग्नि देव का मुख कहलाता है। इस भाग पर ही आहुति करने से सर्वकार्य की सिद्धि होती है। अन्यथा

कम जलने वाला भाग नेत्र - यहाँ आहुति डालने पर अंधापन ,

धुँआ वाला भाग नासिका - यहां आहुति डालने से मानसिक कष्ट ,

अंगारा वाला भाग मस्तक - यहां आहुति डालने पर धन नाश तथा काष्ठ वाला भाग अग्नि देव का कर्ण कहलाता है यहां आहुति करने से शरीर में कई प्रकार की व्याधि हो जाती है। हवन अग्नि को पानी डालकर बुझाना नही चाहिए।

विशेष कामना पूर्ति के लिये अलग अलग होम सामग्रियों का प्रयोग भी किया जाता है।

सामान्य हवन सामग्री ये है
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तिल, जौं, चावल ,सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , पानड़ी , लौंग , बड़ी इलायची , गोला , छुहारे , सर्वोषधि ,नागर मौथा , इन्द्र जौ , कपूर काचरी , आँवला ,गिलोय, जायफल, ब्राह्मी तुलसी किशमिश, बालछड़ , घी आदि ......

हवन समिधाएँ
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कुछ अन्य समिधाओं का भी वाशिष्ठी हवन पद्धति में वर्णन है । उसमें ग्रहों तथा देवताओं के हिसाब से भी कुछ समिधाएँ बताई गई हैं। तथा विभिन्न वृक्षों की समिधाओं के फल भी अलग-अलग कहे गये हैं।

यथा-नोः पालाशीनस्तथा।
खादिरी भूमिपुत्रस्य त्वपामार्गी बुधस्य च॥
गुरौरश्वत्थजा प्रोक्त शक्रस्यौदुम्बरी मता ।
शमीनां तु शनेः प्रोक्त राहर्दूर्वामयी तथा॥
केतोर्दभमयी प्रोक्ताऽन्येषां पालाशवृक्षजा॥

आर्की नाशयते व्याधिं पालाशी सर्वकामदा।
खादिरी त्वर्थलाभायापामार्गी चेष्टादर्शिनी।
प्रजालाभाय चाश्वत्थी स्वर्गायौदुम्बरी भवेत।
शमी शमयते पापं दूर्वा दीर्घायुरेव च ।
कुशाः सर्वार्थकामानां परमं रक्षणं विदुः ।
यथा बाण हारणां कवचं वारकं भवेत ।
तद्वद्दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारिका॥
यथा समुत्थितं यन्त्रं यन्त्रेण प्रतिहन्यते ।
तथा समुत्थितं घोरं शीघ्रं शान्त्या प्रशाम्यति॥

अब समित (समिधा) का विचार कहते हैं, सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मङ्गल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की, और केतु की कुशा की समिधा कही गई है । इनके अतिरिक्त देवताओं के लिए पलाश वृक्ष की समिधा जाननी चाहिए । मदार की समिक्षा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है। जिस प्रकार बाण के प्रहारों को रोकने वाला कवच होता है, उसी प्रकार दैवोपघातों को रोकने वाली शान्ति होती है। जिस प्रकार उठे हुए अस्त्र को अस्त्र से काटा जाता है, उसी प्रकार (नवग्रह) शान्ति से घोर संकट शान्त हो जाते हैं।

ऋतुओं के अनुसार समिधा के लिए इन वृक्षों की लकड़ी विशेष उपयोगी सिद्ध होती है।

वसन्त-शमी
ग्रीष्म-पीपल
वर्षा-ढाक, बिल्व
शरद-पाकर या आम
हेमन्त-खैर
शिशिर-गूलर, बड़

यह लकड़ियाँ सड़ी घुनी, गन्दे स्थानों पर पड़ी हुई, कीडे़-मकोड़ों से भरी हुई न हों, इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।

विभिन्न हवन सामग्रियाँ और समिधाएं विभिन्न प्रकार के लाभ देती हैं। विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता देती हैं।

प्राचीन काल में रोगी को स्वस्थ करने हेतु भी विभिन्न हवन होते थे। जिसे वैद्य या चिकित्सक रोगी और रोग की प्रकृति के अनुसार करते थे पर कालांतर में ये यज्ञ या हवन मात्र धर्म से जुड़ कर ही रह गए और इनके अन्य उद्देश्य लोगों द्वारा भुला दिए गये।

सर भारी या दर्द होने पर किस प्रकार हवन से इलाज होता था इस श्लोक से देखिये :-
श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितलं मनःशिला।। गन्धाश्चा गुरुपत्राद्या धूमं मुर्धविरेचनम्।।
(चरक सू* 5/26-27)

अर्थात अपराजिता , मालकांगनी , हरताल, मैनसिल, अगर तथा तेज़पात्र औषधियों को हवन करने से शिरो विरेचन होता है।
परन्तु अब ये चिकित्सा पद्धति विलुप्त प्राय हो गयी है।

रोग और उनके नाश के लिए प्रयुक्त होने वाली हवन सामग्री
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१.👉 सर के रोग, सर दर्द, अवसाद, उत्तेजना, उन्माद मिर्गी आदि के लिए
ब्राह्मी, शंखपुष्पी , जटामांसी, अगर , शहद , कपूर , पीली सरसो

२.👉 स्त्री रोगों, वात पित्त, लम्बे समय से आ रहे बुखार हेतु बेल, श्योनक, अदरख, जायफल, निर्गुण्डी, कटेरी, गिलोय इलायची, शर्करा, घी, शहद, सेमल, शीशम

३.👉 पुरुषों को पुष्ट बलिष्ठ करने और पुरुष रोगों हेतु सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , अश्वगंधा , पलाश , कपूर , मखाने, गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , लौंग , बड़ी इलायची , गोला

४.👉 पेट एवं लिवर रोग हेतु भृंगराज, आमला , बेल , हरड़, अपामार्ग, गूलर, दूर्वा , गुग्गुल घी , इलायची

५👉 श्वास रोगों हेतु वन तुलसी, गिलोय, हरड , खैर अपामार्ग, काली मिर्च, अगर तगर, कपूर, दालचीनी, शहद, घी, अश्वगंधा, आक, यूकेलिप्टिस।

हवन में आहुति डालने के बाद क्या करें
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आहुति डालने के बाद तीन प्रकार के क्षेत्रों का विभाजित करने के बाद मध्य भाग में पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना करें. इसके बाद आठों दिशाओं की कल्पना करें. आठों दिशाओं के नाम हैं – पूर्व अग्नि, दक्षिण, नीऋति, पश्चिम, वायव्य, उत्तर तथा इशान।

हवन की पूर्णाहुति में ब्राह्मण भोजन
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""ब्रह्स्पतिसंहिता "" के अनुसार यज्ञ हवन की पूर्णाहुति वस्तु विशेष से कराने पर निम्न संख्या में ब्राह्मण भोजन अवश्य कराना चाहिए।

पान - 5 ब्राह्मण
पक्वान्न - 10 ब्राह्मण
ऋतुफल - 20 ब्राह्मण
सुपारी - 21 ब्राह्मण
नारियल - 100 ब्राह्मण
घृतधारा - 200 ब्राह्मण

हवन यज्ञ आदि से सम्बंधित समस्त जानकारियो के लिये ""यज्ञ मीमांसा "" देखे।
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लॉक डाउन

मध्य युग में पुरे यूरोप पे राज करने वाला रोम ( इटली ) नष्ट होने के कगार पे आ गया , मध्य पूर्व को अपने कदमो से रोदने वाला ओस्मानिया साम्राज्य ( ईरान , टर्की ) अब घुटनो पर हैं , जिनके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था , उस ब्रिटिश साम्राज्य के वारिश बर्मिंघम पैलेस में कैद हैं , जो स्वयं को आधुनिक युग की सबसे बड़ी शक्ति समझते थे , उस रूस के बॉर्डर सील हैं , जिनके एक इशारे पर दुनिया क नक़्शे बदल जाते हैं , जो पूरी दुनिया के अघोषित चौधरी हैं , उस अमेरिका में





लॉक डाउन हैं और जो आने वाले समय में सबको निगल जाना चाहते थे , वो चीन , आज मुँह छिपता फिर रहा है और सबकी गालिया खा रहा है।
एक जरा से परजीवी ने विश्व को घुटनो पर ला दिया ? न एटम बम काम आ रहे न पेट्रो रिफाइनारी ? मानव का सारा विकास एक छोटे से जीवाणु से सामना नहीं कर पा रहा ?? क्या हुआ , निकल गयी हेकड़ी ?? बस इतना ही कमाया था आपने इतने वर्षों में ,की एक छोटे से जीव ने घरो में कैद कर दिया ???
और ये सब देश आशा भरी नज़रो से देख रहे हैं हमारे देश की तरफ , उस भारत की ओर जिसका सदियों अपमान करते रहे , रोंदते रहे , लूटते रहे । एक मामूली से जीव ने आपको आपकी औकात बता दी
भारत जानता है कि युद्ध अभी शुरू हुआ है जैसे जैसे ग्लोवल वार्मिंग बढ़ेगी , ग्लेशियरो की बर्फ पिघलेगी , और आज़ाद होंगे लाखो वर्षो से बर्फ की चादर में कैद दानवीय विषाणु , जिनका न आपको परिचय है और न लड़ने की कोई तयारी , ये कोरोना तो झांकी है , चेतावनी है , उस आने वाली विपदा की , जिसे आपने जन्म दिया है।मेनचेस्टर की औध्योगिक क्रांति और हारवर्ड की इकोनॉमिक्स संसार को अंत के मुहाने पे ले आयी ।।।
क्या आप जानते हैं, इस आपदा से लड़ने का तरीका कहाँ छुपा है ? तक्षशिला के खंडहरो में , नालंदा की राख में , शारदा पीठ के अवशेषों में , मार्तण्डय के पत्थरो में ।।
सूछ्म एवं परजीवियों से मनुष्य का युद्ध नया नहीं है , ये तो सृष्टि के आरम्भ से अनवरत चल रहा है , और सदैव चलता रहेगा , इस से लड़ने के लिए के लिए हमने हर हथियार खोज भी लिया था , मगर आपके अहंकार, आपके लालच , स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की हठ धर्मिता ने सब नष्ट कर दिया ।
क्या चाहिए था आपको???? स्वर्ण एवं रत्नो के भंडार ? यूँ ही मांग लेते , राजा बलि के वंशज और कर्ण के अनुयायी आपको यूँ ही दान में दे देते ।सांसारिक वैभव को त्यागकर आंतरिक शांति की खोज करने वाले समाज के लिए वे सब यूँ भी मूल्य हीन ही थे , ले जाते ।मगर आपने ये क्या किया , विश्व वंधुत्वा की बात करने वाले समाज को नष्ट कर दिया ? जिस बर्बर का मन आया वही भारत चला आया , रोदने ,लूटने , मारने , जीव में शिव को देखने वाले समाज को नष्ट करने ।
*कोई विश्व विजेता बनने के लिए तक्ष शिला को तोड़ कर चला गया, कोई सोने की चमक में अँधा होकर सोमनाथ लूट कर ले गया , तो कोई किसी खुद को ऊँचा दिखाने के लिए नालंदा की किताबो को जला गया , किसी ने बर्बरता को जिताने के लिए शारदा पीठ टुकड़े टुकड़े कर दिया , तो किसी ने अपने झंडे को ऊंचा दिखाने के लिए विश्व कल्याण का केंद्र बने गुरुकुल परंपरा को ही नष्ट कर दिया ।और आज करुण निगाहों से देख रहे हैं उसी पराजित, अपमानित , पद दलित , भारत भूमि की ओर , जिसने अभी अभी अपने घावों को भरके अंगड़ाई लेना आरम्भ किया है ।*
किन्तु , हम फिर भी निराश नहीं करेंगे , फिर से माँ भारती का आँचल आपको इस संकट की घडी में छाँव देगा , श्रीराम के वंशज इस दानव से भी लड़ लेंगे ,
किन्तु...
*किन्तु, मार्ग उन्ही नष्ट हुए हवन कुंडो से निकलेगा , जिन्हे कभी आपने अपने पैरों की ठोकर से तोडा था ।आपको उसी नीम और पीपल की छाँव में आना होगा , जिसके लिए आपने हमारा उपहास किया था ।आपको उसी गाय की महिमा को स्वीकार करना होगा , जिसे आपने अपने स्वाद का कारण बना लिया ।उन्ही मंदिरो में जाके घंटा नाद करना होगा , जिनको कभी आपने तोडा था।उन्ही वेदो को पढ़ना होगा ,, जिन्हे कभी अट्टहास करते हुए नष्ट किया था।उसी चन्दन तुलसी को मष्तक पर धारण करना होगा , जिसके लिए कभी हमारे मष्तक धड़ से अलग किये गए थे ।*
ये प्रकृति का न्याय है और आपको स्वीकारना होगा।
*फिर कहता हूँ , इस दुनिया को अगर जीना है , तो सोमनाथ में सर झुकाने आना ही होगा , तक्षशिला के खंडहरो से माफ़ी मांगनी ही होगी , नालंदा की ख़ाक छाननी ही होगी । मंदिरों के घंटानाद से तीव्र साउंड फ्रिकवेंसी से कई वायरस मर जाते हैं यह आपने स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया है ।हाथ जोड़कर अभिवादन करना आपने शुरू कर दिया है ।बहुत जल्दी भारत की छांव में पूरी तरह आपको आना पड़ेगा*
सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामया ,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्