सोमवार, 22 मई 2017

एक औरत को आखिर क्या चाहिए होता है?

एक औरत को आखिर  क्या चाहिए होता है?
एक बार जरुर पढ़े ये छोटी सी कहानी:
राजा हर्षवर्धन युद्ध में हार गए।
हथकड़ियों में जीते हुए पड़ोसी राजा के सम्मुख पेश किए गए। पड़ोसी देश का राजा अपनी जीत से प्रसन्न था और उसने हर्षवर्धन के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा...
यदि तुम एक प्रश्न का जवाब हमें लाकर दे दोगे तो हम तुम्हारा राज्य लौटा देंगे, अन्यथा उम्र कैद के लिए तैयार रहें।
 प्रश्न है.. एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ?
इसके लिए तुम्हारे पास एक महीने का समय है हर्षवर्धन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया..
वे जगह जगह जाकर विदुषियों, विद्वानों और तमाम घरेलू स्त्रियों से लेकर नृत्यांगनाओं, वेश्याओं, दासियों और रानियों, साध्वी सब से मिले और जानना चाहा कि एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ? किसी ने सोना, किसी ने चाँदी, किसी ने हीरे जवाहरात, किसी ने प्रेम-प्यार, किसी ने बेटा-पति-पिता और परिवार तो किसी ने राजपाट और संन्यास की बातें कीं, मगर हर्षवर्धन को सन्तोष न हुआ।
महीना बीतने को आया और हर्षवर्धन को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला..
किसी ने सुझाया कि दूर देश में एक जादूगरनी रहती है, उसके पास हर चीज का जवाब होता है शायद उसके पास इस प्रश्न का भी जवाब हो..
हर्षवर्धन अपने मित्र सिद्धराज के साथ जादूगरनी के पास गए और अपना प्रश्न दोहराया।
जादूगरनी ने हर्षवर्धन के मित्र की ओर देखते हुए कहा.. मैं आपको सही उत्तर बताऊंगी परंतु इसके एवज में आपके मित्र को मुझसे शादी करनी होगी ।
जादूगरनी बुढ़िया तो थी ही, बेहद बदसूरत थी, उसके बदबूदार पोपले मुंह से एक सड़ा दाँत झलका जब उसने अपनी कुटिल मुस्कुराहट हर्षवर्धन की ओर फेंकी ।
हर्षवर्धन ने अपने मित्र को परेशानी में नहीं डालने की खातिर मना कर दिया, सिद्धराज ने एक बात नहीं सुनी और अपने मित्र के जीवन की खातिर जादूगरनी से विवाह को तैयार हो गया
तब जादूगरनी ने उत्तर बताया..
"स्त्रियाँ, स्वयं निर्णय लेने में आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं | "
यह उत्तर हर्षवर्धन को कुछ जमा, पड़ोसी राज्य के राजा ने भी इसे स्वीकार कर लिया और उसने हर्षवर्धन को उसका राज्य लौटा दिया
इधर जादूगरनी से सिद्धराज का विवाह हो गया, जादूगरनी ने मधुरात्रि को अपने पति से कहा..
चूंकि तुम्हारा हृदय पवित्र है और अपने मित्र के लिए तुमने कुरबानी दी है अतः मैं चौबीस घंटों में बारह घंटे तो रूपसी के रूप में रहूंगी और बाकी के बारह घंटे अपने सही रूप में, बताओ तुम्हें क्या पसंद है ?
सिद्धराज ने कहा.. प्रिये, यह निर्णय तुम्हें ही करना है, मैंने तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया है, और तुम्हारा हर रूप मुझे पसंद है ।
जादूगरनी यह सुनते ही रूपसी बन गई, उसने कहा.. चूंकि तुमने निर्णय मुझ पर छोड़ दिया है तो मैं अब हमेशा इसी रूप में रहूंगी, दरअसल मेरा असली रूप ही यही है।
बदसूरत बुढ़िया का रूप तो मैंने अपने आसपास से दुनिया के कुटिल लोगों को दूर करने के लिए धरा हुआ था ।
अर्थात, सामाजिक व्यवस्था ने औरत को परतंत्र बना दिया है, पर मानसिक रूप से कोई भी महिला परतंत्र नहीं है।
इसीलिए जो लोग पत्नी को घर की मालकिन बना देते हैं, वे अक्सर सुखी देखे जाते हैं। आप उसे मालकिन भले ही न बनाएं, पर उसकी ज़िन्दगी के एक हिस्से को मुक्त कर दें। उसे उस हिस्से से जुड़े निर्णय स्वयं लेने दें।

शनिवार, 20 मई 2017

आनुवंशिक वैज्ञानिक

एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत
पाकर अपने विदेश में रहने वाले
बेटे से फोन पर बात करते समय
पूँछ बैठी: ... बेटा ! कुछ पूजा-पाठ
भी करते हो या फुर्सत ही नहीं मिलती?
बेटे ने माँ को बताया - "माँ मैं एक आनुवंशिक वैज्ञानिक हूँ ... मैं अमेरिका में मानव के विकास पर  काम कर रहा हूँ ...
विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन...
क्या आपने उसके बारे में सुना है ?"



उसकी माँ मुस्कुरा कर बोली - “मैं
डार्विन के बारे में जानती हूँ, बेटा ...
मैं यह भी जानती हूँ कि तुम जो
सोचते हो कि उसने जो भी खोज
की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के
लिए बहुत पुरानी खबर है...“
“हो सकता है माँ !” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा ...
“यदि तुम कुछ होशियार हो, तो इसे
सुनो,” उसकी माँ ने प्रतिकार किया...
... “क्या तुमने दशावतार के बारे में
सुना है ? विष्णु के दस अवतार ?”
बेटे ने सहमति में कहा "हाँ ! पर
दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना ?"
माँ फिर बोली: लेना-देना है मेरे
लाल...मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम
और मि. डार्विन क्या नहीं जानते  हैं ?
पहला अवतार था मत्स्य अवतार,
यानि मछली। ऐसा इसलिए कि जीवन पानी में आरम्भ हुआ |
 यह बात सही है या नहीं ?”
बेटा अब और अधिक ध्यानपूर्वक  सुनने लगा ।
उसके बाद आया दूसरा कूर्म अवतार,
जिसका अर्थ है कछुआ, क्योंकि जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया
'उभयचर (Amphibian)' तो कछुए ने
समुद्र से जमीन की ओर विकास को दर्शाया।
तीसरा था वराह अवतार, जंगली
सूअर, जिसका मतलब जंगली
जानवर जिनमें बहुत अधिक बुद्धि
नहीं होती है | तुम उन्हें डायनासोर
कहते हो, सही है ?
बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई
चौथा अवतार था नृसिंह अवतार,
आधा मानव, आधा पशु, जंगली जानवरों
से बुद्धिमान जीवों तक विकास ।
पांचवें वामन अवतार था, बौना जो
वास्तव में लंबा बढ़ सकता था क्या
तुम जानते हो ऐसा क्यों है ? क्योंकि
मनुष्य दो प्रकार के होते थे, होमो
इरेक्टस और होमो सेपिअंस, और
होमो सेपिअंस ने लड़ाई जीत ली"
बेटा दशावतार की प्रासंगिकता पर
स्तब्ध हो रहा था जबकि उसकी माँ
पूर्ण प्रवाह में थी...
छठा अवतार था परशुराम -वे, जिनके
पास कुल्हाड़ी की ताकत थी, वो मानव
जो गुफा और वन में रहने वाला था। गुस्सैल, और सामाजिक नहीं |
सातवां अवतार था मर्यादा पुरुषोत्तम
श्री राम, सोच युक्त प्रथम सामाजिक
व्यक्ति, जिन्होंने समाज के नियम बनाए
और समस्त रिश्तों का आधार ।

 

आठवां अवतार था जगद्गुरु
श्री कृष्ण, राजनेता, राजनीतिज्ञ,
प्रेमी जिन्होंने ने समाज के नियमों
का आनन्द लेते हुए यह सिखाया
कि सामाजिक ढांचे में कैसे रहकर
फला-फूला जा सकता है |
नवां अवतार था भगवान बुद्ध, वे
व्यक्ति जो नृसिंह से उठे और मानव
के सही स्वभाव को खोजा । उन्होंने
मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की ।
और अंत में दसवां अवतार कल्कि
आएगा, वह मानव जिस पर तुम
काम कर रहे हो | वह मानव जो आनुवंशिक रूप से अति-श्रेष्ठ होगा।
बेटा अपनी माँ को अवाक होकर
सुनता रहा। अंत में बोल पड़ा
"यह अद्भुत है माँ, भारतीय दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है"
...पुराण अर्थपूर्ण हैं। सिर्फ आपका
देखने का नज़रिया होना चाहिए
धार्मिक या वैज्ञानिक ?
जय श्री कृष्णा

शुक्रवार, 19 मई 2017

मानव की जाग्रति---सिंहनाद---अहं ब्रह्मास्मि.


एक शेरनी गर्भवती थी, गर्भ पूरा हो चुका था, शिकारियों से भागने के लिए टीले पर गयी, उसको एक टीले पर बच्चा हो गया। शेरनी छलांग लगाकर एक टीले से दूसरे टीले पर तो पहुंच गई लेकिन बच्चा नीचे फिसल गया…

नीचे भेड़ों की एक कतार गुजरती थी, वह बच्चा उस झुंड में पहुंच गया। था तो शेर का बच्चा लेकिन फिर भी भेड़ों को दया आ गई और उसे अपने झुंड में मिला लिया…..
भेड़ों ने उसे दूध पिलाया, पाला पोसा।
शेर अब जवान हो गया. शेर का बच्चा था तो शरीर से सिंह ही हुआ लेकिन भेड़ों के साथरहकर वह खुद को भेड़ मानकर ही जीने लगा। एक दिन उसके झुंड पर एक शेर ने धावा बोला. उसको देखकर भेड़ें भांगने लगीं, शेर की नजर भेड़ों के बीच चलते शेर पर पड़ी, दोनों एक दूसरे को आश्चर्य से देखते रहे……
सारी भेंड़े भाग गईं शेर अकेला रह गया, दूसरे शेर ने इस शेर को पकड़ लिया। यह शेर होकर भी रोने लगा, मिमियाया, गिड़गिड़ाया कि छोड़ दो मुझे....
मुझे जाने दो मेरे सब संगी साथी जा रहे हैं मेरे परिवार से मुझे अलग न करो…..
दूसरे शेर ने फटकारा- "अरे मूर्ख! ये तेरे संगी साथी नहीं हैं, तेरा दिमाग फिर गया है, तू पागल हो गया है। परन्तु वह नहीं माना, वह तो स्वयं को भेंड मानकर भेड़चाल में चलता था"।
बड़ा शेर उसे घसीटता गया नदी के किनारे ले गया। दोनों ने नदी में झांका। बूढ़ा सिंह बोला- नदी के पानी में अपना चेहरा देख और पहचान...
उसने देखा तो पाया कि जिससे जीवन की भीख मांग रहा है वह तो उसके ही जैसा है। उसे बोध हुआ कि मैं तो मैं भेड़ नहीं हूं, मैं तो इस सिंह से भी ज्यादा बलशाली और तगड़ा हूं। उसका आत्म अभिमान जागा, आत्मबल से भऱकर उसने भीषण गर्जना की……
सिंहनाद था वह, ऐसी गर्जना उठी उसके भीतर से कि उससे पहाड़ कांप गए। बूढ़ा सिंह भी कांप गया।
उसने कहा- "अरे! इतने जोर से दहाड़ता है?" युवा शेर बोला- "उसने जन्म से कभी दहाड़ा ही नहीं, बड़ी कृपा तुम्हारी जो मुझे जगा दिया," इसी दहाड़ के साथ उसका जीवन रूपांतरित हो गया।
यही बात मनुष्य के संबंध में भी हैं। अगर मनुष्य यह देख ले कि जो कृष्ण और श्रीराम में हैं वह उसमें भी है।
फिर हमारे भीतर से भी वह गर्जना फूटेगी-
अहं ब्रह्मास्मि... मैं ब्रह्मा हूँ....गूंज उठेंगे पहाड़, कांप जाएंगे मन के भीतर घर बनाए सारे विकार और महसूस होगा अपने भीतर आनंद ही आनंद….
क्षत्रिय भी मैं हूँ..
ब्राहमण भी मैं हूँ..
जाट भी मैं हूँ ...
राजपुत और मराठा भी मैं हुँ..
हिला कर रख दे
जो दुष्टोँ की हस्ती..
तूफान और ज्वारभाटा भी मैँ हूँ…
बाल्मीकि भी मैं हूँ…..
विदुर नीति भी मैं हुँ..
दुष्ट सिकन्दर को हराने वाला पौरूष भी मैं हुँ…
सर्वश्रैष्ठ गुरू चाणक्य भी मैं हुँ महावीर कर्ण भी मैं हूँ
परशुराम भी मैं हूँ…
मुरलीधर मनोहर श्याम भी मैं हूँ
एक वचन की खातिर वनवासी बननेवाला मर्यादा पुरूषोतम श्रीराम भी मैं हूँ..
शिवाजी और प्रताप भी मैं हुँ..
धधकती है जो जुल्म देखकर
‘हिन्दुत्व” नाम की आग भी मैं हुँ..
हाँ मैं हिन्दू हूँ…
जात पात मैं ना बाँटो मुझको…
मैं दुनिया का केन्द्र बिन्दु हुँ…
हाँ मैं हिन्दू हूँ….

शनिवार, 13 मई 2017

जानिए शरीर के किस अंग के फड़कने का क्या होता है मतलब



जानिए शरीर के किस अंग के फड़कने का क्या होता है मतलब


1. समुद्र शास्त्र के अनुसार पुरुष के शरीर का अगर बायां भाग फड़कता है तो भविष्य में उसे कोई दुखद घटना झेलनी पड़ सकती है। वहीं अगर उसके शरीर के दाएं भाग में हलचल रहती है तो उसे जल्द ही कोई बड़ी खुशखबरी सुनने को मिल सकती है। जबकि महिलाओं के मामले में यह उलटा है, यानि उनके बाएं हिस्से के फड़कने में खुशखबरी और दाएं हिस्से के फड़कने पर बुरी खबर सुनाई दे सकती है।
2. किसी व्यक्ति के माथे पर अगर हलचल होती है तो उसे भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है वहीं कनपटी के पास फड़कन पर धन लाभ होता है।
3. अगर व्यक्ति की दाईं आंख फड़कती है तो यह इस बात का संकेत है कि उसकी सारी इच्छाएं पूरी होने वाली हैं और अगर उसकी बाईं आंख में हलचल रहती है तो उसे जल्द ही कोई अच्छी खबर मिल सकती है। लेकिन अगर दाईं आंख बहुत देर या दिनों तक फड़कती है तो यह लंबी बीमारी की तरफ इशारा करता है।
4. अगर इंसान के दोनों गाल एक साथ फड़कते हैं तो इससे धन लाभ की संभावना बढ़ जाती है।
5. अगर किसी इंसान के होंठ फड़क रहे है तो इसका अर्थ है उसके जीवन में नया दोस्त आने वाला है।
6. अगर आपका दाया कन्धा फड़कता है तो यह इस बात का संकेत है कि आपको अत्याधिक धन लाभ होने वाला है। वहीं बाएं कंधे के फड़कने का संबंध जल्द ही मिलने वाली सफलता से है। परंतु अगर आपके दोनों कंधे एक साथ फड़कते हैं तो यह किसी के साथ आपकी बड़ी लड़ाई को दर्शाता है।
7. अगर आपकी हथेली में हलचल होती है तो यह यह इस बात की ओर इशारा करता है कि आप जल्द ही किसी बड़ी समस्या में घिरने वाले हैं और अगर अंगुलियां फड़कती है तो यह इशारा करता है कि किसी पुराने दोस्त से आपकी मुलाकात होने वाली है ।
8. अगर आपकी दाई कोहनी फड़कती है तो यह इस बात की तरफ इशारा करता है कि भविष्य में आपकी किसी से साथ बड़ी लड़ाई होने वाली है। लेकिन अगर बाईं कोहनी में फड़कन होती है तो यह बताता है कि समाज में आपकी प्रतिष्ठा और ओहदा बढ़ने वाला है।

9. पीठ के फड़कने का अर्थ है कि आपको बहुत बड़ी समस्याओं को झेलना पड़ सकता है।
10 दाई जांघ फड़कती है तो यह इस बात को दर्शाता है कि आपको शर्मिंदगी का सामना करना पड़ेगा और बाईं जांघ के फड़कने का संबंध धन लाभ से है।
11. दाई पैर के तलवे के फड़कने का संबंध सामाजिक प्रतिष्ठा में हानि से और बाएं पैर के फड़कने का अर्थ निकट भविष्य में यात्रा से है।
12. अगर आपको अपनी भौहों के बीच हलचल महसूस होती है तो यह इस बात की तरफ इशारा करता है कि निकट भविष्य में आपको सुखदायक और खुशहाल जीवन मिलने वाला है। इसके अलावा यह इस बात का भी संकेतक है कि आप जिस भी क्षेत्र में काम कर रहे हैं आपको उसमें अनापेक्षित सफलता मिलने वाली है।
13. गले का फड़कना भी एक अच्छा संकेत है क्योंकि यह आपके लिए खुशहाली, सम्मान और आराम लाने वाला है।
14. अगर किसी व्यक्ति की कमर का सीधा हिस्सा फड़कता है तो यह इस बात का संकेत है कि भविष्य में धन लाभ की संभावनाएं हैं।
15. संपूर्ण मस्तक का फड़कना दूर स्थान की यात्रा का संकेत समझना चाहिए तथा मार्ग में परशोनियां भी आती है।
16. सिर का मध्य भाग फड़के तो धन की प्राप्ति होती है तथा परेशानियों से मुिक्त मिलती है।
17. यदि ललाट मध्य से फडक़ ने लगे तो लाभदायक यात्रायें हातेी है। यदि पूरा ललाट फड़के तो राज्य से सम्मान तथा नौकरी में प्रमोशन होता है।
18. दाहिनी आंख का मध्य भाग फड़के तो व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त कर धन अर्जित कर लेता है। दाहिनी आंख चारो तरफ से फड़के तो व्यक्ति के रागी होने की संभावना रहती है।
19. बायीं आख का फड़कना स्त्री से दुख का, वियोग का लक्षण है। बांयी आंख चारो ओर से फड़कने लगे तो विवाह के योग बनते हैं।
20. किसी व्यक्ति की नाक फड़फड़ाती हो तो उसके व्यवसाय में बढ़ोत्तरी हातेी है। किसी व्यक्ति के नाक के नथुने के अंदर फड़फड़ाहट महसूस हो तो उसे सुख मिलता है। यदि नाक की जड़े फड़के तो लडा़ई झगड़ा होने की संभावना रहती है।
21. यदि दाहिने कान का छेद फड़फडा़ ता है तो मित्र से मुलाकात होती है। यदि दाहिना कान फड़फड़ाता है तो पद बढ़े, अच्छे समाचार की प्राप्ति हो, विजय मिले।
22. यदि बांये कान का पिछला भाग फडक़ ता है तो मित्र से बुलावा आता ह अथवा कोई खुश खबरी भरा पत्र मिलता है। यदि बांया कान बजे तो बुरी खबर सुनने को मिलती है।
23. किसी स्वस्थ व्यक्ति का दाहिना गाल फड़के तो उसे लाभ होता है। सुंदर स्त्री से लाभ मिलता है।
24. किसी व्यक्ति के संतान उत्पन्न होने वाली हो और उसके बायें गाल के मध्य में फड़फड़ाहट हो तो उसके घर कन्या का जन्म होता है और जन्म होने की संभावना न हो तो पुत्री से कोई शुभ समाचार मिलता है।
25 किसी व्यक्ति के दोनो आरे के गाल समान रूप से फडफ़डाएं तो उसे अतलु धन की प्राप्ति होती है।
26. किसी व्यक्ति का ऊपरी होठ फडफ़डायें तो शत्रुओं से हो रहे झगडे़ में समझौता हो जाता है।
27. दोनों होठ फडफडा़ यें तो कहीं से सुखद समाचार मिलता है।
28. मुंह का फड़फड़ाना पुत्र की ओर से किसी शुभ समाचार को सुनवाता है। यदि पूरा मुंह फड़के तो व्यक्ति की मनोकामनापूर्ण होती है।
29. किसी व्यक्ति की ठाडेी़ में फडफ़डा़हट का अनुभव हो तो मित्र के आगमन की सूचना देता है।
30 यदि तालु फड़के तो धन की प्राप्ति होती है। यदि बांया तालु फड़के तो व्यक्ति को जेल यात्रा करनी पड़ सकती है।
31. यदि दांत का ऊपरी भाग फडफ़ ड़ाहट करता है तो व्यक्ति को प्रसन्नता प्राप्त होती है।
32. यदि जीभ फड़के तो लड़ाई झगड़ा होता है, विजय मिलती है।
33. यदि किसी व्यक्ति की गर्दन बांयी तरफ से फड़कती हो तो धन हानि होने की आशंका तथा गर्दन दांयी तरफ से फडके तो स्वर्ण आभूषणों की प्राप्ति होती है।
34. जब किसी व्यक्ति का दाहिना कंधा फड़फड़ाहट करता है तो उसे धन संपदा मिलती है।
35. बाजू फडफ़डा़ती है तो धन और यश की प्राप्ति होती है तथा बांई ओर की बाहं फडफ़डाए तो नष्ट अथवा खोई हुई वस्तु की प्राप्ति हो जाती है।
36. किसी व्यक्ति के दाहिने हाथ का अंगूठा फड़फड़ाये तो उसकी अभिलाषा पूर्ति में विलबं होता है और हाथ की अंगुलियां फडफ़डा़यें तो अभिलाषा की पूर्ति के साथ-साथ किसी मित्र से मिलन होता है।
37. किसी व्यक्ति के दाहिने हाथ की कोहनी फड़फड़ाती है, तो किसी से झगडा़ तो होता है परतुं विजय उसे ही मिलती है आरै बायें हाथ की काहे नी फड़फडा़ यें तो धन की प्राप्ति होती है।
38. किसी व्यक्ति के हाथ की हथेली में फड़फड़ाहट हो तो ये शुभ शकुन है। उसे आने वाले समय में शुभ सपंदा की प्राप्ति होती है।
39. हथलेी के किसी काने में फडफ़डा़हट हो तो निकट भविष्य में व्यक्ति किसी विपदा में फसं जाता है।
40 बायें हाथ की हथलेी में फड़फड़ाहट हो और वह व्यक्ति रोगी हो तो उसे शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ जाता है हो।
41. जहां कमर की दाहिनी ओर की फड़फड़ाहट किसी विपदा का संकेतदेती है, वहीं बांई आरे की फड़फड़ाहट किसी शुभ समाचार का संकेत देती है।
42. छाती में फड़फडाहट होना मित्र से मिलने की सूचना, छाती के दाहिनी आरे फडफ़डा़हट हो तो विपदा का संकेत, बांयी ओर फड़फड़ाहट हो तो जीवन में सघंर्ष और मध्य में फडफ़ डाहट हो तो लाके प्रियता मिलती है।

"निर्जला एकादशी का वर्णन"



जाने रहस्य। "लव-कुश जन्म कथा" के समय
"निर्जला एकादशी का वर्णन"

माता सीता (शक्ति)
वनदेवी के रुप में बाल्मिकजी आश्रम में रह रही
गर्भवती सीताजी के जब प्रसव का समय आया...
तब आदिशक्तियोगमाया ....
(दाईं) बन बाल्मिक आश्रम में आ गई और पूरे आश्रम में ही योगमाया का पहरा आरम्भ हो गया।
यह पावन दिन "ज्येष्ठ-शुक्ल-एकादशी" यानि

"निर्जला-एकादशी" नाम से जाना जाता है।

"क्योंकि सीताजी ने प्रसव-पीडा महसूस होते ही
जल का भी त्याग कर दिया था"
इसीलिए यह दिन "निर्जला-एकादशी" कहलाता है

योगमाया ने "आया-रुप" में आते ही
आश्रम में सीताजी की सभी सेविकाओं को
सीता-कुटी से बाहर निकाल अन्दर से दरवाजा बन्द कर दिया

योगमाया के प्रभाव से ही सीताजी भी अचेत हो गई थी
तीखी गर्मी में दिन के 12 बजने वाले थे...
तभी सीताजी के गर्भ से एक यक्ष-शिशु ने जन्म लिया
सीताजी के नवजात-शिशु को यक्ष-योनि में देखते ही योगमाया ने उस बालक को एक कपडे में लपेट लिया और धीरे से
दरवाजा खोल आकाश-मार्ग की ओर उड चली।

जब आश्रम की सेविकाओं ने दाईं को बच्चे सहित आकाश की ओर भागते देखा...तो वे रोती-चिखती चिल्लाती बाल्मिकजी के पास पहुँची और जोर जोर से रोते हुए...नवजात शिशु के गायब होने की खबर देने लगी।

तब बाल्मिकजी ने उन सेविकाओं को डाँटते हुए चुप करा दिया कि बच्चा तो मेरे पास है..फिर बेमतलब का
शौर, रोना धोना किसलिए।
बाल्मिकजी को भय था कि सेविकाओं के तीखे रुदन क्रन्दन का शौर...बाल्मिक आश्रम के बाहर शत्रुघ्न की सेना के पडाव तक पहुँचेगा तो
खबर अयोध्यापति राम तक भी पहुँचेगी

सभी सेविकाएँ डर से सकपका चुप हो, अपने अन्य कामों में लग गई।
लेकिन बाल्मिकजी चिन्तित हो उठे
सेविकाओं को तो डाँट कर चुप करा दिया..लेकिन जब सीताजी अपने बालक को माँगेगी, तब क्या होगा?

इस प्रकार चिन्तित बाल्मिकजी ने भी तुरन्त ही
योगसमाधि धारण कर आदिशक्तियोगमाया का ध्यान लगाया
और ध्यान-समाधि के दौरान ही योगमाया की देवकृपा से
बाल्मिकजी की हथेली में दो बून्दें अमृत की आ छलकी
बाल्मिकजी ने भी तुरन्त ही पास में रखे घास के बने
दो खिलौनों पर मन्त्रोंचार सहित उन अमृत की बून्दों का प्रयोग किया और योगमाया के प्रभाव से
वे दोनों खिलौने भी जिवित शिशु रुप में बदल गए।

तभी बाल्मिकजी फुरती से उठे...दोनों शिशुओं को बगल में थामें सीताजी कुटी की ओर दौडते गए तथा दोनों शिशुओं को
सीताजी की बगल में लिटाते हुए..
तुरन्त उल्टे पाँव भागते हुए अपनी कुटी में आ गए।

जैसे शिशु सीताजी की बगल में गए, उसी पल योगमाया का पहरा भी खत्म हुआ और दोनों नवजात शिशु रोने लगे
उन लाडले कुमारों के रुदन से सीताजी को होश आया और
अपनी गोद में दो शिशुओं को देख गदगद् हो उठी

महर्षि बाल्मिक आज्ञा से ही शत्रुघ्न ने दोनों बच्चों का नामकरण संस्कार पूरा कराते हुए हीरे-मोतियों की माला से
बच्चों का अभिनन्दन किया और
बाल्मिकजी ने उन बच्चों को लव और कुश नाम से पुकारा।

लेकिन शत्रुघ्न भी बनदेवी रुपी सीताजी को पहचान नहीं पाया।
सिया बर राम चन्द्र की जय