गुरुवार, 31 मई 2018

अधिक मास क्या है


अधिक मा/स/ मल मास 16.5.2018 to 13.6.2018--अधिक मास क्या है
अधिक मास का दूसरा नाम मल मास भी है|धार्मिक शास्त्रो के हिसाब से हर तीन साल में अधिक मास आता है,मॉल मास में सरे शुभ कार्य जैसे शादी,जनेऊ,और भी मंगल कार्य नहीं किये जा सकते है|अधिक मास में भगवन विष्णु की आराधना की जाती है,इस मास में दान,तप और पूजा पाठ का बहुत महत्व है|इस मास में दो एकादशी हे जो शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की है,जिसे पद्मिनी और परमा एकादशी के नाम से जाना जाता है|इस माह में उपवास का बड़ा महत्व है,और जो व्यक्ति एक समय भोजन ग्रहण कर जमीन पर सोता है,उसकी मनोकामना जल्द ही पूर्ण होती है|अधिक मास की कथा पढ़ना या श्रवण करने से भी कष्ट दूर होते है|सूर्य की बारह संक्रांति होती है,इसलिए वर्ष में भी बारह माह होते है|ऐसा माना जाता है की सभी माह में कोई न कोई देवता हर माह का स्वामी होता है,पर इस माह का कोई स्वामी न होने से इस माह कोई भी मंगल कार्य नहीं किये जा सकते|स माह में धार्मिक स्थलों पर जाए और वहा स्नान दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है|


स्नान,दान तप का महत्व Bath, charity importance of tenacity
अधिक मास का महत्व ध्यान में रखकर किया गया दान हमें कई गुना फल प्राप्त करता है,इस माह में भगवत गीता,राम कथा और भी धार्मिक पुस्तके पढने से मन शांत रहता है,और मनुष्य सारे पापो से मुक्त हो जाता है|पुरषोत्तम मास तीन साल में एक बार आता है और इसे भगवन ने अपने नाम के साथ जोड़ा है|इसलिए इसका महत्व और भी अधिक बढ़ गया है||इस दुनिया में मनुष्य सिर्फ मोह माया के पीछे भागता रहता है,पर इस माह में पूजा पाठ के अलावा नित्य भगवत गीता का एक अध्याय आपको इन सब बातो के पर ले जाएगा|आपका मन भटकना बंद हो जाएगा|इस माह में भले ही सारे मांगलिक कार्य वर्जित है,परन्तु भगवान से सम्बंधित सारे कार्य किये जा सकते है|इस माह में धार्मिक किताबे दान कर सकते है,या फिर जो आपकी श्रद्धा से बने वो भी दान कर सकते है|ब्राह्मणो को खाना खिले|गरीबो को खाना खिले|आदि कार्य भी किये जा सकते है|
तिथि अनुसार चीजो का दान Date of donation of the visitation
प्रतिपदा के दिन चांदी बर्तन में घी का दान करे|
यदि चांदी का बर्तन न दे सके तो ताम्बे धातु का बर्तन भी चलेगा|
द्वितीय के दिन कैसे के बर्तन में सोने की कोई भी वस्तु दान करे|
तृतीया के दिन चना और चने की दाल का दान करे|
चतुर्थी के दिन खरीक दान करना चाहिए|
पंचमी के दिन गुड और तुवर की दाल का दान करना चाहिए|
षष्ठी के दिन अष्ट गंध का दान करे|
सप्तमी और अष्टमी के दिन रक्त चन्दन का दान|
नवमी के दिन केसर का दान करना शुभ होता है|
दशमी के दिन कस्तूरी का दान|
एकादशी के दिन गोरोचन और गोलोचन का दान दे|
द्वादशी के दिन शंख का दान देना चाहिए|
त्रयोदशी के दिन घंटी का दान करे|
चतुर्दशी के दिन मोती की माला दान में दे|
पूर्णिमा के दिन रत्नो का दान कर सकते है|

बुधवार, 16 मई 2018

16 मई बुधवार से 13 जुन 2018 तक अधिकमास

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🌷 *अधिक - पुरुषोत्तम मास* 🌷
🙏🏻 *16 मई बुधवार से 13 जुन 2018 तक अधिकमास रहेगा। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। ये महीना हर 3 साल में एक बार आता है। श्रीमद्भागवत पुराण में इस माह का विशेष महत्व बताया गया है।* *अधिकमास में धर्म-कर्म करने की परंपरा है। मान्यता है कि इन दिनों में भागवत कथा करने से अक्षय पुण्य मिलता है। श्रीकृष्ण की कृपा मिलती है और हमारी सभी परेशानियां दूर होती हैं।*
*यहां जानिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस माह में कौन-कौन से उपाय किए जा सकते हैं...*
1 *पहला उपाय*
*अगर आप धन लाभ पाना चाहते हैं तो अधिकमास में रोज सुबह भगवान विष्णु और लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। लक्ष्मी पूजा में दक्षिणावर्ती शंख, पीली कौड़ी, हल्दी की गांठ, गोमती चक्र, श्रीयंत्र भी रखें।*
2⃣ *दूसरा उपाय*
*बुधवार को लक्ष्मी-विष्णु पूजा के बाद घर के मुख्य द्वार पर महालक्ष्मी के चरण चिह्न लगाएं। चरण चिह्न घर के अंदर प्रवेश करते हुए लगाना चाहिए। रोज सुबह लक्ष्मी के चरणों की पूजा करें।*
3⃣ *तीसरा उपाय*
*रोज सुबह जल्दी उठें और उठते ही दोनों हथेलियां देखें। स्नान के बाद तांबे के लोटे से सूर्य को जल चढ़ाएं। सूर्य को जल चढ़ाते समय ऊँ आदित्याय नम: मंत्र का जाप करें।*
4⃣ *चौथा उपाय*
*घर के मंदिर में रोज कुछ देर श्रीमद्भागवत का पाठ करें। इस उपाय से श्रीकृष्णजी की कृपा मिलती है।*


5⃣ *पांचवां उपाय*
*श्रीकृष्णजी के बाल स्वरूप बाल गोपाल को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।*

6⃣ *छठा उपाय*
*अभी गर्मी के दिन चल रहे हैं, इन दिनों में शिवलिंग पर ठंडा जल चढ़ाएं। इसके लिए चांदी के लोटे का उपयोग करेंगे तो शुभ रहेगा।*
7⃣ *सातवां उपाय*
*हनुमानजी के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं और ऊँ रामदूताय नम: मंत्र का जाप 108 बार करें।*
8⃣ *आठवां उपाय*
*रोज सूर्यास्त के बाद शिवलिंग के पास घी का दीपक जलाएं और महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। मंत्र- ऊँ भूर्भुवः स्वः ऊँ त्र्यम्‍बकंयजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्।*
9⃣ *नवां उपाय*
*रोज सुबह घर से निकलने से पहले श्री गणेशजी के दर्शन करें और इसके बाद काम की शुरुआत करें।*
🔟 *दसवां उपाय*
*रोज सुबह पहली रोटी गाय को खिलाएं। मछलियों को आटे की गोलियां खिलाएं।*

 
 🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞
🙏🏻🌷💐🌸🌼🌹🍀🌺💐

बुधवार, 9 मई 2018

पारद के लिंग की महिमा



वैदिक रीतियों में, पूजन विधि में, समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति में पारद से बने शिवलिंग एवं अन्य आकृतियों का विशेष महत्त्व होता है।
वैदिक रीतियों में, पूजन विधि में, समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति में पारद से बने शिवलिंग एवं अन्य आकृतियों का विशेष महत्त्व होता है। पारद जिसे अंग्रेजी में mercury भी कहते हैं , एक तरल पदार्थ होता है और इसे ठोस रूप में लाने के लिए विभिन्न अन्य धातुओं जैसे कि स्वर्ण, रजत, ताम्र सहित विभिन्न जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है। इसे बहुत उच्च तापमान पर पिघला कर स्वर्ण और ताम्र के साथ मिला कर, फिर उन्हें पिघला कर आकार दिया जाता है।
पारद को भगवान् शिव का स्वरूप माना गया है और ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाले उनके वीर्य का प्रतीक भी इसे माना जाता है। धातुओं में अगर पारद को शिव का स्वरूप माना गया है तो ताम्र को माँ पार्वती का स्वरूप। इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभर कर सामने आ जाता है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है। इसीलिए ऐसे शिवलिंग को "सुवर्ण रसलिंग" भी कहते हैं।
पारद के इस लिंग की महिमा का वर्णन कई प्राचीन ग्रंथों में जैसे कि रूद्र संहिता, पारद संहिता, रस्मर्तण्ड ग्रन्थ, ब्रह्म पुराण, शिव पुराण आदि में पाया गया है।
योग शिखोपनिषद ग्रन्थ में पारद के शिवलिंग को स्वयंभू भोलेनाथ का प्रतिनिधि माना गया है। इस ग्रन्थ में इसे "महालिंग" की उपाधि मिली है और इसमें शिव की समस्त शक्तियों का वास मानते हुए पारद से बने शिवलिंग को सम्पूर्ण शिवालय की भी मान्यता मिली है ।
इसका पूजन करने से संसार के समस्त द्वेषों से मुक्ति मिल जाती है। कई जन्मों के पापों का उद्धार हो जाता है। इसके दर्शन मात्र से समस्त परेशानियों का अंत हो जाता है। ऐसे शिवलिंग को समस्त शिवलिंगों में सर्वोच्च स्थान मिला हुआ है और इसका यथाविधि पूजन करने से
मानसिक, शारीरिक, तामसिक या अन्य कई विकृतियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है।
पौराणिक ग्रंथों में जैसे कि "रस रत्न समुच्चय" में ऐसा माना गया है कि 100 अश्वमेध यज्ञ, चारों धामों में स्नान, कई किलो स्वर्ण दान और एक लाख गौ दान से जो पुण्य मिलता है वो बस पारे के बने इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही उपासक को मिल जाता है।
अगर आप अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहते हों, योग और ध्यान में आपका मन लगता हो और मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा हो तो आपको पारे से बने शिव लिंग की उपासना करनी चाहिए। ऐसा करने से आपको मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है।
पारद एक ऐसा शुद्ध पदार्थ माना गया है जो भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है। इसकी महिमा केवल शिवलिंग से ही नहीं बल्कि पारद के कई और अचूक प्रयोगों के द्वारा भी मानी गयी है।
धातुओं में सर्वोत्तम पारा अपनी चमत्कारिक और हीलिंग प्रॉपर्टीज के लिए वैज्ञानिक तौर पर भी मशहूर है।
पारद के शिवलिंग को शिव का स्वयंभू प्रतीक भी माना गया है। रूद्र संहिता में रावण के शिव स्तुति की जब चर्चा होती है तो पारद के शिवलिंग का विशेष वर्णन मिलता है। रावण को रस सिद्ध योगी भी माना गया है, और इसी शिवलिंग का पूजन कर उसने अपनी लंका को स्वर्ण की लंका में तब्दील कर दिया था।
कुछ ऐसा ही वर्णन बाणासुर राक्षस के लिए भी माना जाता है। उसे भी पारे के शिवलिंग की उपासना के तहत अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने का वर प्राप्त हुआ था।
ऐसी अद्भुत महिमा है पारे के शिवलिंग की। आप भी इसे अपने घर में स्थापित कर घर में समस्त दोषों से मुक्त हो सकते हैं। लेकिन ध्यान अवश्य रहे कि साथ में शिव परिवार को भी रख कर पूजन करें।
पारद के कुछ अचूक उपायों का विवरण निम्नलिखित है, जिन्हें आप स्वयं प्रयोग कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति कर सकते हैं:
1. अगर आप अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहते हों, योग और ध्यान में आपका मन लगता हो और मोक्ष के प्राप्ति की इच्छा हो तो आपको पारे से बने शिवलिंग की उपासना करनी चाहिए। ऐसा करने से आपको मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है।
2. अगर आपको जीवन में कष्टों से मुक्ति नहीं मिल रही हो, बीमारियों से आप ग्रस्त रहते हों, लोग आपसे विश्वासघात कर देते हों, बड़ी-बड़ी बीमारियों से ग्रस्त हों तो पारद के शिवलिंग को यथाविधि शिव परिवार के साथ पूजन करें। ऐसा करने से आपकी समस्त परेशानियां ख़त्म हो जाएंगी और बड़ी से बड़ी बीमारियों से भी मुक्ति मिल जाएगी।
3. अगर आपको धन सम्पदा की कमी बनी रहती है तो आपको पारे से बने हुए लक्ष्मी और गणपति को पूजा स्थान में स्थापित करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जहां पारे का वास होता है वहां माँ लक्ष्मी का भी वास हमेशा रहता है। उनकी उपस्थिति मात्र से ही घर में धन लक्ष्मी का हमेशा वास रहता है।
4. अगर आपके घर में हमेशा अशांति, क्लेश आदि बना रहता हो, अगर आप को नींद ठीक से नहीं आती हो, घर के सदस्यों में अहंकार का टकराव और वैचारिक मतभेद बना रहता हो तो आपको पारद निर्मित एक कटोरी में जल डाल कर घर के मध्य भाग में रखना चाहिए। उस जल को रोज़ बाहर किसी गमले में डाल दें। ऐसा करने से धीरे-धीरे घर में सदस्यों के बीच में प्रेम बढ़ना शुरू हो जाएगा और मानसिक शान्ति की अनुभूति भी होगी।
पारद को पाश्चात्य पद्धति में उसके गुणों की वजह से Philospher's stone भी बोला जाता है। आयुर्वेद में भी इसके कई उपयोग हैं।
5. अगर आप उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, हृदय रोग से परेशान हैं, या फिर अस्थमा, डायबिटीज जैसी जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हैं तो आपको पारद माल जिसे अच्छे शुभ मुहूर्त में पहननी चाहिए। ऐसा करने से आपकी बीमारियों में सुधार तो होगा ही आप शान्ति भी महसूस करेंगे और रोगमुक्त भी हो जाएंगे।
पारे के शिवलिंग के पूजन की महिमा तो ऐसी है कि उसे बाणलिंग से भी उत्तम माना गया है। जीवन की समस्त समस्याओं के निदान के लिए पारद के उपयोग एवं इससे सम्बंधित उपाय अत्यंत प्रभावशाली हैं। यदि इनका आप यथाविधि अभिषेक कर, पूर्ण श्रद्धा से पूजन करेंगे तो जीवन में सुख और शान्ति अवश्य पाएंगे।

पुत्र प्राप्ति के लिए ज्योतिष अनुसार गर्भाधान का तरीका

पुत्र प्राप्ति के लिए ज्योतिष अनुसार गर्भाधान का तरीका
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ज्योतिषीय ग्रंथों एवं आयुर्वेद के मतानुसार पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।
यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।

👉 चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।
👉 पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।
👉 छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।

👉 सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।
👉 आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।
👉 नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।
👉 दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।
👉 ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
👉 बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।
👉 तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।
👉 चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।
👉 पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।
👉 सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।
व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘संस्कार विधि’ में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।
दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।
2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।
प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।
*चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।