गुरुवार, 13 अगस्त 2015

तंत्र में दो प्रकार की साधनाएं शास्त्र सम्मत हैं- कुलाचार और समयाचार।



कौल-कौलाचार-और सोसल मीडिया पर खिलवाड़
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तंत्र में दो प्रकार की साधनाएं शास्त्र सम्मत हैं- कुलाचार और समयाचार। कुलाचार साधना में बाह्य अनुष्ठान प्रधान है। इसका अभ्यास समहू बद्ध हाकेर किया जाता है | इसमें यज्ञाहुति, मंत्र-जप और कई प्रकार की पूजा-विधियों का प्रचलन है। समयाचार आंतरिक साधना है। यह रुद्र कमल पर ध्यान लगाकार की जाती है। बौद्धों की महायान शाखा में वज्रयान साधना-पद्धति इसी से विकसित हुई है। इसमें अनिवार्य गुरु दीक्षा के बाद साधक गुरु आज्ञा से एकांत में रहकर ध्यानावस्थित होता है। इस साधना में मानस-दर्शन मुख्य है। किसके लिए कौन सी साधना उपयुक्त है इसका निर्णय गुरु करता है। संप्रदाय भेद से तंत्र जगत के संबंध में अनेक प्रकार के मत प्रचलित हैं। इनमें वेदमार्गी, बौद्ध मार्गी, दक्षिणाचारी मंत्रमार्गी भक्तिमार्गी और ज्ञानमार्गी प्रमुख हैं। शैवों की 28 और शाक्तों में 102 परंपराएं हैं। वैष्णवों के भी अनेक तंत्र ग्रंथ और तंत्र संप्रदाय मिलते हैं। जैनों का तंत्र शास्त्र समृद्ध है पर प्रकाश में बहुत कम ही आया है। उसके प्रकाश में आने से जैन धर्म के वर्तमान स्वरूप पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का भी डर है। शायद इसीलिए जैन समाज में इस ओर प्रायः उदासीनता बरती गई है।
कौलों के आचार-विचार तथा अनुष्ठान प्रकार को कौलाचार के नाम से जाना जाता है। शाक्तमत के अनुसार साधनाक्षेत्र में तीन भावों तथा सात आचारों की विशिष्ट स्थिति होती है। पशुभाव, वीरभाव और दिव्यभाव - ये तो तीन भावों के संकेत हैं। वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणचार, वामाचार, सिद्धांताचार और कौलाचार ये पूर्वोल्लिखित भावत्रय से संबद्ध सात आचार हैं। इनमें दिव्यभाव के साधक का संबंध कौलाचार से है।
जो साधक द्वैतभावना का सर्वथा निराकरण कर देता है और उपास्य देवता की सत्ता में अपनी सत्ता डुबा कर अद्वैतानंद का आस्वादन करता है, वह तांत्रिक भाषा में दिव्य कहलाता है और उसकी मानसिक दशा दिव्यभाव कहलाती है। कौलाचार तांत्रिक आचारों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह पूर्ण अद्वैत भावना में रमनेवाले दिव्य साधक के द्वारा ही पूर्णत: गम्य और अनुसरणीय होता है।

कुल का अर्थ है कुण्डलिनी तथा अकुल का अर्थ है शिव. दोनों का सामरस्य कराने वाला कौल है.
कौल मार्ग के साधक मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन नामक पंच मकारों का सेवन करते हैं. ब्रह्मरंध्र से स्रवित मधु मदिरा है, वासना रूपी पशु का वध माँस है, इडा-पिगला के बीच प्रवाहित श्वास-प्रश्वास मत्स्य है. प्राणायाम की प्रक्रिया से इनका प्रवाह मुद्रा है तथा सहस्रार में मौज़ूद शिव से शक्ति रूप कुण्डलिनी का मिलन मैथुन है
किन्हीं आचार्यों की संमति में समयाचार ही श्रेष्ठ, विशुद्ध तांत्रिक आचार है तथा कौलाचार उससे भिन्न तांत्रिक मार्ग है। शंकराचार्य तथा उनके अनुयायी समयाचार के अनुयायी थे। तो अभिनवगुप्त तथा गौडीयशाक्त कौलाचार के अनुवर्ती थे। समयमार्ग में अंतर्योग (हृदयस्थ उपासना) का महत्व है, तो कौल मत में बहिर्योग का। पंच मकार- मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन दोनों में ही उपासना के मुख्य साधन हैं। अंतर केवल यह है कि समय मार्गी इन पदार्थों का प्रत्यक्ष प्रयोग न करके इनके स्थान पर इनके प्रतिनिधिभूत अन्य वस्तुओं (जिन्हें तांत्रिक ग्रथों में अनुकल्प कहा जाता है) का प्रयोग करता है; कौल इन वस्तुओं का ही अपनी पूजा में उपयोग करता है। सौंदर्य लहरी के भाष्यकार लक्ष्मीधर ने 41वें श्लोक की व्याख्या में कौलों के दो अवांतर भेदों का निर्देश किया है। उनके अनुसार पूर्वकौल श्री चक्र के भीतर स्थित योनि की पूजा करते हैं; उत्तरकौल सुंदरी तरुणी के प्रत्यक्ष योनि के पूजक हैं और अन्य मकारों का भी प्रत्यक्ष प्रयोग करते हैं। उत्तरकौलों के इन कुत्सापूर्ण अनुष्ठानों के कारण कौलाचार वामाचार के नाम से अभिहित होने लगा और जनसाधारण की विरक्ति तथा अवहेलना का भाजन बना। कौलाचार के इस उत्तरकालीन रूप पर तिब्बती तंत्रों का प्रभाव बहुश: लक्षित होता है। गंधर्वतंत्र, तारातंत्र, रुद्रयामल तथा विष्णायामल के कथानानुसार इस पूजा प्रकार का प्रचार महाचीन (तिब्बत) से लाकर वसिष्ठ ने कामरूप में किया। प्राचीनकाल में असम तथा तिब्बत का परस्पर धार्मिक आदान प्रदान भी होता रहा। इससे इस मत की पुष्टि के लिये आधार प्राप्त होता है।



कौल काली के उपासक होते है। उनके अनुष्ठान गुप्त होते है। इन अनुष्ठानों में मद्य, मांस, मीन, मुद्रा एवं मैथुन वर्जित नहीं हैं। उत्तर कौल, कापालिक और दिगंबर स्वयं को भैरव मानते हैं। वे नग्न होकर देवी पूजा करते हैं। कहीं कहीं कन्याओं की योनि के पूजन की भी परंपरा है। इन संप्रदायों का अधिक प्रभाव बंगाल एवं अविजित आसाम के अधिकांश क्षेत्रों में रहा है। शाक्तों में ही पूर्व कौल संप्रदाय के अनुयायी पंचमकार को प्रतीकात्मक मानते हैं। इनकी साधना विधियां भी अधिकतर सौम्य हैं | शक्तों के समयाचारी संप्रदाय में श्रीचक्र का पूजन होता है। उनकी आस्था षट्चक्रों में है। दक्षिण भारत में समयाचारी साधना का प्रचलन रहा है। आदि शंकराचार्य जैसे योगियों ने इसी प्रकार की साधना को अपनाया है और उसे आश्रय प्रदान किया है।

कौल सम्प्रदाय में दो मत हैं ~ उत्तर कौल मत और पूर्व कौल मत ! इनके अपने ~अपने आचार हैं उत्तर कौल मत के आचार को कौलाचार और पूर्व मत के आचार को समयाचार कहते हैं ! उत्तर कौल मत और उसका आचार कौलाचार रजोगुणी और तमोगुणी मिश्रित है , जबकि पूर्व कॉल और उसका आचार समयाचार पूर्णत: सात्विक है ! उत्तर कौल मत के अनुयायिओं का प्रमुख साधना केंद्र कामख्या ( असम ) है और पूर्व कौल के मानने वालों का साधना केंद्र श्रीनगर है ! इन दोनों सिद्धांतों को मिलाकर बाद में एक नया सिद्धांत प्रकाश में आया जिसे ''योगिनी कौल '' कहते हैं ! योगिनी कौल सम्प्रदाय के केंद्र की स्थापना कामख्या में हुई ! कहा भी गया है ~ कामरूप इदं शास्त्रं योगिनीनं गृहे गृहे ! यह वही प्रिय सम्प्रदाय है जिसके गर्भ से आगे चलकर '' हठयोग '' का सर्वाधिक प्रिय नाथ सम्प्रदाय प्रकाश में आया और सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ ! सुप्रसिद्ध चौरासी सिद्ध इस सम्प्रदाय से सम्बंधित थे !
इस देश में 8वीं से 11वीं सदी मध्य तक सिद्ध और नाथ नाम के मुख्य तांत्रिक संप्रदायों का बहुत प्रभाव रहा है। आज भी इन दोनों संप्रदायों के अनेक स्थानों पर बड़े-बड़े सिद्ध पीठ हैं। भारत के ग्राम्य समाज में सिद्ध एवं नाथ संप्रदाय के अनुयायियों की खासी बड़ी संख्या है। लोकभाषाओं में लिखे और बिखरे हुए इन संप्रदायों के विपुल साहित्य के विस्तृत अध्ययन के योजनाबद्ध कार्य की अपेक्षा है। इन दोनों संप्रदायों में अनेक प्रकार की साधनाओं का प्रचलन है। सिद्धों में पंचमकार वर्जित नहीं है लेकिन नाथ संप्रदाय में वर्जित है। भारतीय साहित्य शिल्प और स्थापत्य पर इन संप्रदायों का गहरा प्रभाव पड़ा है।
कौलिक की परिभाषा करते हुए कुलार्णव तन्त्र कहता है की ,कुल गोत्र को कहते हैं |यह शिव -शक्ति से उत्पन्न होता है |इसके ज्ञानवान को कौलिक कहते हैं |कुल शक्ति है ,अकुल शिव है |कुलाकुल का अनुसंधाता कौलिक कहलाता है |कौल शास्त्र उर्ध्वाम्नाय ईशानमुख से प्रवर्तित रहस्य गर्भ शास्त्र है |शिव को पार्वती जी कुलेश्वर संबोधित करती हैं और शिव उन्हें कुलेश्वरी कहते हैं |यही कुलेश्वर और कुलेश्वरी कुलाचार या कुलमार्ग में दीक्षित कौलिकों के परमाराध्य हैं |कुल मार्ग उर्ध्वाम्नाय माना गया है अर्थात यह मोक्ष मार्ग है |नाम से ही प्रमाणित हो जाता है की यह सर्वोत्तम आम्नाय है जिसे गुरुमुख से ही प्राप्त करना चाहिए |उर्ध्वाम्नाय का पर्मोपास्य बीज श्री प्रासाद्परा मंत्र माना जाता है |
कुल परमेश्वर की शक्ति है ,उनकी सामर्थ्य है ,उनकी उर्ध्वता है ,स्वातंत्र्य ,वीर्य ,ओज ,पिंड और संविदात्मक परमात्मा का शरीर भी कुल है |कुल परमशक्ति है |लयोदय का चित्स्वरूप ,स्वभाव का अमल्बोध ,सर्व कर्तृत्व विभूषित विभु ,सर्वेश्वर का विस्तार आत्मस्वरूप है |यहाँ तक की यह शरीर भी कुल ही है |कुल की इस व्यापक दृष्टि के अनुसार इस अनुभूति को आत्मसात करने वाला साधक मन ,वाणी ,और कर्म से उक्त रुढियों की मर्यादा में रहकर जो कुछ करता है वाही कुल्याग माना जाता है |कुल पूजन क्रम में पंचमकार का महत्त्व है किन्तु वास्तविक अर्थ इनके भिन्न हैं जैसा की आज स्थूल रूप से इनका उपयोग होता है |वस्तुतः कुलाचार में पंचमकार आनंद के व्यंजक माने गए हैं |आनंद स्वयं ब्रह्मरूप ही होता है |
जो गुण शास्त्रीय कौलिकों के माने जाते हैं और जो वास्तविक गुण हैं वह आज देखने को नहीं मिलते |इस मार्ग को सर्वथा गोपनीय रखा जाता है ,किन्तु आज यह मार्ग सोसल मीडिया पर खुलेआम दिख रहा ,वह भी मूल रूप में नहीं अपितु अत्यंत विकृत रूप में |खुद को कौलिक और कौलाचार्य कहने वालों की भीड़ लगी है जबकि वास्तविक कौलिक बताता नहीं की वह कौल साधक है |कौलिक स्वार्थ रहित मोक्ष मार्गी होता है किन्तु आज स्वार्थ और भोग में लिप्त देखा जा रहा |जो भिन्न मार्गी हैं जिन्हें कुछ भी पता नहीं वह भी खुद को कौलिक कहते हैं ||जिसे कौलिकों का मूल मंत्र तक नहीं पता वह खुद को कौलिक बता मूर्ख बता रहा और भैरवी साधना कराने का दावा कर रहा |जो जीवन भर शाबर मंत्र से साधना करते रहे वह कौलिक साधक बने बठे हैं ,जबकि वह मूल कौल न होकर योगिनी कौल के अंतर्गत आते हैं |मूल कौल साधना और योगिनी कौल साधना में भारी अंतर है |इन भ्रमों में युवकों और युवतियों का शोषण भी हो रहा और लूट भी हो रही |कौल साधना अति गोपनीय और कुंडलिनी साधना है जो मोक्ष का लक्ष्य करती है ,जबकि आज भोग लक्ष्य हो रहा |
जो सम्प्रदाय आज तक समाज के लिए सर्वाधिक गोपनीय रहे हैं ,वाही सोसल मीडिया पर आज सर्वाधिक प्रचारित हैं जैसे कौल ,अघोरी ,कापालिक आदि |कौल ,अघोरी ,कापालिक ,नाथ ,योगी आदि अपने नाम के आगे लगाने की परंपरा चल पड़ी है |जबकि यह सब सम्प्रदाय और मार्ग हैं |ऐसा क्यों करते हैं लोग ,क्योकि लोग इनसे प्रभावित हों ,जुड़े और उस प्रभाव का लाभ इन्हें मिले |जो नाम गुरु और आश्रम द्वारा दिया जाता है उसे ही सर्वाधिक सार्वजनिक किया जा रहा |जो कुछ नहीं जानते और किसी सम्प्रदाय से ठीक से दीक्षित नहीं वह भी नाथ ,योगी ,कौल ,अघोरी लगा रहे ,,फर्जी आई डी के भैरव ,अघोरी ,भैरवी की बाढ़ है |क्यों क्योकि नाम से जनमानस इज्जत देता है ,डरता है ,,उसका लाभ उठाया जा सके ,मूर्ख बनाया जा सके |क्या इससे जो वास्तविक साधक और सम्प्रदाय हैं उनकी इज्जत नहीं जा रही ,उनका अपमान नहीं होगा ,जब उनके नाम पर लोग लुटे जायेंगे |लोग कौलिकों ,अघोरियों ,नाथों को गलत बोलेंगे जबकि वास्तविक साधक की कोई गलती नहीं

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