शनिवार, 4 अप्रैल 2015

गाय- शिव-महालक्ष्मी

शिवलिंग क्या है?
                                     
'' अखंडम अजन्म भानु कोटि प्रकाशम् ''


अर्थात जो अजन्मा है अखंड है और कोटि कोटि सूर्यो के प्रकाश के सामान है। जिस का जन्म ही नही हुआ उस का फिर उस के लिंग से क्या तात्पर्य है।
 ब्रह्म - अंड।
अर्थात ब्रह्माण्ड अंडे जैसे आकर का है।
शिवलिंग ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।
 पूजा से हमें शक्ति मिलती है। शिवलिंग की पूजा शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक है जो हमें सांसारिक बन्धनों से मुक्त करती है।
 इन रहस्यों को जो जानता है वो शिव भक्ति से सराबोर हो जाता है फिर वो किसी भी मजहब का क्यों न हो।
  /पुराणों के अनुसार गाय में सभी देवताओं का वास माना गया है। गाय
को किसी भी रूप में सताना घोर पाप माना गया है। उसकी हत्या
करना तो नर्क के द्वार को खोलने के समान है, जहां कई जन्मों तक दुख
भोगना होता है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो ऑक्सीजन
ग्रहण करता है और
ऑक्सीजन ही छोड़ता है, ‍जबकि मनुष्य सहित सभी प्राणी ऑक्सीजन
लेते और कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते हैं।
पेड़-पौधे इसका ठीक उल्टा करते हैं।
हिन्दू धर्म में गाय को क्यों पवित्र माना जाता है?
गाय माता : गाय ही व्यक्ति को मरने के बाद वैतरणी नदी पार
कराती है। भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। गाय के भीतर
देवताओं का वास माना गया है। दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के
अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों
आदि से श्रृंगार किया जाता है।
समृद्धि देती गाय : अथर्ववेद के अनुसार- 'धेनु सदानाम रईनाम' अर्थात
गाय समृद्धि का मूल स्रोत है। गाय समृद्धि व प्रचुरता की द्योतक है।
वह सृष्टि के पोषण का स्रोत है। वह जननी है। गाय के दूध से कई तरह के
प्रॉडक्ट (उत्पाद) बनते हैं। गोबर से ईंधन व खाद मिलती है। इसके मूत्र से
दवाएं व उर्वरक बनते हैं।
गाय का रहस्य : गाय इसलिए पूजनीय नहीं है कि वह दूध देती है और
इसके होने से हमारी सामाजिक पूर्ति होती है, दरअसल मान्यता के
अनुसार 84 लाख योनियों का सफर करके आत्मा अंतिम योनि के रूप में
गाय बनती है। गाय लाखों योनियों का वह पड़ाव है,
जहां आत्मा विश्राम करके आगे की यात्रा शुरू करती है।
गाय के शकुन :
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* गाय का कोई अपशकुन नहीं होता। जिस भू-भाग पर मकान बनाना
हो, वहां 15 दिन तक गाय-बछड़ा बांधने से वह जगह पवित्र हो जाती
है। भू-भाग से बहुत- सी आसुरी शक्तियों का नाश हो जाता है।
* गाय में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार होता है।
* गाय का मार्ग रोकना शुभ कहा गया है।
* गाय-बछड़े के एकसाथ दर्शन सफलता का प्रतीक है।
* घर के आसपास गाय होने का मतलब है कि आप सभी तरह के संकटों से
दूर रहकर सुख और समृद्धिपूर्वक जीवन जी रहे हैं।
* गाय के समीप जाने से ही संक्रामक रोग कफ, सर्दी- खांसी व जुकाम
का नाश हो जाता है।
* अचानक गाय का पूंछ मार देना भी शुभ है। काली चितकबरी गाय
का ऐसा करना तो और भी शुभ कहा गया है।
पंचगव्य : पंचगव्य कई रोगों में लाभदायक है। पंचगव्य का निर्माण गाय के
दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर
की रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाकर रोगों को दूर किया जाता है।
ऐसा कोई रोग नहीं है जिसका इलाज पंचगव्य से न किया जा सके....
                 


.॥ महालक्ष्मी अष्टकम् ॥
               ॥ ॐ श्रीं हृीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ॥
जब इन्द्रदेव ने अपना ऐश्वर्य, सम्मान खोया, तो उसे पुनः प्राप्ति हेतु उन्होंने सुख व ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी की उपासना की। महालक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु इन्द्रदेव ने लक्ष्मी की स्तुति की। इसी इन्द्र स्तुति द्वारा, उनको स्वर्ग एवं समस्त ऐश्वर्य पुनः प्राप्त हुए। इन्द्र स्तुति का पाठ शुक्रवार के दिवस विशेष प्रभावी माना गया है। वैभव, सुख, आनंद हेतु इस दिवस महालक्ष्मी की यथाविधि पूजा उपरांत इस स्तुति का पाठ करें। व्यावहारिक जीवन के दृष्टिकोण से लक्ष्मी स्तुति व्यापर में वृद्धि कर, घर परिवार में खुशहाली लाती है। संस्कृत भाषा का ज्ञान न होने पर इसके हिन्दी अर्थ का पाठ भी सुफल देता है...
इंद्र उवाच्नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥१॥
नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि ।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥२॥
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि ।
सर्वदु:खहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥३॥
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि ।
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥४॥
आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥५॥
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे ।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥६॥
 पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥७॥
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते ।
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोस्तु ते ॥८॥
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्तिमान्नर: ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥९॥
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।
द्विकालं य: पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वित: ॥१०॥
त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥११॥
॥ इतीन्द्रकृतम् महालक्ष्म्यष्टकम् सम्पूर्णम् ॥
अर्थ~
इन्द्र बोले, "श्रीपीठ पर स्थित व देवताओं से पूजित होने वाली, हे महामाये! तुम्हें नमस्कार है। हस्त में शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करने वाली, हे महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है ॥१॥
गरुड पर आरूढ हो कोलासुर को भय देने वाली एवं समस्त पापों को हरने वाली, हे भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है ॥२॥
सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली एवं सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है ॥३॥
सिद्धि, बुद्धि, भोग एवं मोक्ष देने वाली, हे मन्त्रपूत भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें सदा प्रणाम है ॥४॥
हे देवि! हे आदि-अन्त-रहित आदिशक्ति! हे महेश्वरि! हे योग से प्रकट हुई, भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है ॥५॥
तुम स्थूल सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति महोदरा हो एवं बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली हो। महालक्ष्मी तुम्हें नमस्कार है ॥६॥
 हे कमल के आसन पर विराजमान, परब्रह्मस्वरूपिणी देवि! हे परमेश्वरि! हे जगदम्ब! हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है ॥७॥
हे देवि! तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली एवं नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषिता हो। सम्पूर्ण जगत में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देने वाली हो। हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है ॥८॥
जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र का सदा पाठ करता है, वह समस्त सिद्धियों एवं राज्यवैभव को प्राप्त कर सकता है ॥९॥
जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है, उसके बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है। जो प्रतिदिन दो समय पाठ करता है, वह धन-धान्य से सम्पन्न होता है ॥१०॥
जो प्रतिदिन तीन काल पाठ करता है, उसके महान शत्रुओं का नाश हो जाता है एवं उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती हैं ॥११॥
शुभ प्रभात मित्रों, आपका दिवस मंगलमय हो.....
चलो उसका नहीं तो खुदा का थोडा एहसान लेते हैं,
वो मिन्नत से नहीं माना तो मन्नत से मांग लेते हैं..!/

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