सोमवार, 16 जनवरी 2017

विविध पौराणिक एवं उपलब्ध अति दुर्लभ ग्रंथो का अध्ययन

यदि आप विविध पौराणिक एवं उपलब्ध अति दुर्लभ ग्रंथो का अध्ययन करें तो ऐसी जानकारी मिलेगी क़ि हम दंग रह जायेगें. किन्तु दुःख की बात यह है क़ि इनमें से अधिकांशतः एक दम कूट या सांकेतिक भाषा में संग्रहीत है.
इसके पीछे कारण यह है क़ि इनका दुर्जनों द्वारा दुरुपयोग न हो सके. इसलिए थोड़ा कूट का ज्ञान अति आवश्यक है. कुछ नाम दे रहें हैं आप भी अवश्य एक बार देखेगें-


बिन्दुलेखाम (मूल तमिल), अभिजात रत्न (संस्कृत में देवप्रिय संकलित), रहस्य विहाग (मूल लेखक के नाम का पता नहीं), प्रद्योत मंजरी (ऋषि विश्वप्रिय), गन्धर्व आख्यानम (कर्ण मरीचि), वृहत्संहिता (वाराह मिहिर), काला मृतम (कालिदास), पयोधि पायस ( राघवेन्द्र), भूनिधि (लेखक के नाम का पता नहीं).

इनमें से अधिकांशतः तो इतने गूढ़ है क़ि एकाएक सब कुछ प्रलाप सा लगता है. किन्तु खूब ध्यान पूर्वक देखने से धीरे धीरे स्पष्ट होता चला जाता है. हम यहाँ एक सूरदास के कूट का उदाहरण दे रहे हैं , जो हिंदी में है. तथा समझाने में सरल भी है-
कहत कत परदेशी की बात.
मंदिर अर्ध अवधि हरि बदी गयो हरि आहार चली जात.
अजया भख अनुसारत नाही कैसे के रैन सिरात.
शशि रिपु बरस भानु रिपु जुग सम हर रिपु कीन्हो घात.
मघ पंचक लेई गयो सांवरो ताते जी अकुलात.
नखत वेद ग्रह जोरी अर्ध करी सोई बनत अब खात.
सूर दास वश भई विरह के कर मीजे पछितात.
यद्यपि यह पद्य राधिका के विरह भाव का वर्णन करता है. किन्तु देखें-

कहत कत परदेशी की बात-
अर्थात कोई ऐसा होता जो परदेशी अर्थात श्याम का समाचार बताता.
मंदिर अर्धअर्थात घर का आधा या दूसरे शब्दों में जब घर की दीवार पूरी बन जाती है. तो कहते है क़ि घर आधा बन गया है. जब तक उस दीवार के ऊपर खपरैल या आज कल लेंटर नहीं पड़ जाता तब तक वह घर आधा ही कहलाता है. उस बिना खपरैल की दीवार को साधारण भाषा में पाखकहते है. यह पक्षका अपभ्रंश है. एक पक्ष पंद्रह दिन का होता है. इस प्रकार मंदिर अर्ध का तात्पर्य हुआ पंद्रह दिन.
हरि आहारहरि का एक अर्थ सिंह भी होता है. सिंह का आहार मांस होता है. मांस या महीने या दूसरे शब्दों में तीस दिन.
अजया भखअजया अर्थात बकरी. उसका भाख या भोजन अर्थात बकरी का भोजन पत्ती होती है. पत्ती या पाती या पत्री. या चिट्ठी पत्री. इस प्रकार अजया भख का अर्थ हुआ चिट्ठी पत्री.
शशि रिपुअर्थात चन्द्रमा का रिपु या चन्द्रमा का दुश्मन या दिन का समय. चन्द्रमा दिन में छिप जाता है. अर्थ हुआ दिन का समय.
भानु रिपुअर्थात सूर्य का शत्रु रात. सूर्य रात में दिखाई नहीं देता है.
हर रिपुहर का अर्थ होता है. शिवशंकर. शिवशंकर के रिपु या दुश्मन कामदेव.
मघ पंचकनक्षत्र सत्ताईस होते है. उनमें से एक मघा नक्षत्र होता है. मघ पंचक अर्थात मघा से पांचवां. तो मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त एवं चित्रा. अर्थात मघा नक्षत्र से पांचवां चित्रा नक्षत्र हुआ. चित्रा अर्थात चित्त.
नखत वेद ग्रह जोरी अर्ध करी- नक्षत्र सत्ताईस होते है. वेद चार होते है. ग्रह नौ होते है. तो सत्ताईस, चार एवं नौ जोड़ने पर चालीस हुए. अब उसका अर्ध करी अर्थात उसका आधा या दूसरे शब्दों में चालीस का आधा बीस. बीस या विष. या जहर.
इस प्रकार इस पूरे पद्य का अर्थ देखें-
राधिका जी कह रही है—- कोई ऐसा होता जो श्याम सुन्दर का समाचार बताता. पंद्रह का दिन का वादा कर गए क़ि पंद्रह दिन बाद वह मिलेगें. किन्तु एक माह बीत गया अब तक नहीं आये. चिट्ठी पत्री भी नहीं भेजते है. अब कैसे रात बीते. रात वर्ष एवं दिन युग के बराबर बीत रहा है. ऊपर से कामदेव भी सता रहा है. मेरा चित्त भी तो श्याम सुन्दर लेकर चले गए. इससे जी और भी ज्यादा अकुला रहा है. विष भी नहीं मिल रहा है जिसे खाकर अपना प्राण त्याग कर दूं. सूरदास जी कह रहे है क़ि विरह के वशीभूत राधिका हाथ मल मल कर पछता रही है.
इस प्रकार हम देख रहे है क़ि यह पद्य हिंदी में है. किन्तु किस तरह इसका अर्थ निकाला जा रहा है. तो जो संस्कृत में होगा वह तो कठिन होगा ही.

इसीलिए ऋषियों के हजारो लाखो वर्ष की तपस्या एवं खोज के उपरांत जो रत्नों एवं औषधियों के विलक्षण प्रभाव एवं स्वरुप प्रकट हुए उनकी रक्षा एवं सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन लोगो ने उसे कूट या अंगरेजी में कोड में छिपा दिया ताकि राक्षसों, दुष्टों एवं अत्याचारियों के हाथ इनकी वास्तविकता न लग जाय. अन्यथा वे इसका प्रयोग जन हित या लोकोपयोग में नहीं बल्कि संहार के कामो में करने लगेगें.

अब हम मुख्य विषय पर आते है. समुद्र मंथन के समय समुद्र से चौदह रत्न निकले थे-

                 श्री मणि रम्भा वारुनी, अमिय शंख गजराज.
                           कल्प वृक्ष, धनु धेनु शशि धनवंतरी विष वाजि.

श्री अर्थात लक्ष्मी, मणि अर्थात कौस्तुभ मणि, रम्भा अर्थात एक अप्सरा, वारुनी अर्थात मदिरा, अमिय अर्थात अमृत, शंख अर्थात पांचजन्य शंख, गजराज अर्थात ऐरावत, कल्प वृक्ष, धनु अर्थात धनुष, धन अर्थात सुवर्ण आदि, शशि अर्थात चन्द्रमा, धनवंतरी, विष अर्थात ज़हर एवं वाजि अर्थात घोड़ा. ये ही चौदह रत्न समुद्र मंथन से प्राप्त हुए थे.

इन चौदह रत्नों के अपने अलग अलग रूप, स्थिति एवं प्रभाव के कारण ही इनके प्रयोग जन कल्याण हेतु ऋषियों ने निर्धारित किये. ताकि प्रजा इनका लाभ उठा सके. इसीलिए चौदहों भुवनो में इनके प्रभाव के अनुकूल इन्हें वितरित कर दिया गया. सुविधा के लिए चौदहों भुवनो का नाम निम्न प्रकार है-
 
भूमि से नीचे----अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल एवं पाताल
भूमि से ऊपर-==भू, भुवः, स्व, मह, जन, तप, सत्य.---ये ही चौदह भुवन होते है.
भूमि के ऊपर अंतरिक्ष में शेष बचे छ: भुवनो के लिए छ: रत्न पृथक हो गए. कारण यह पडा क़ि उनकी प्रकृति, सार्थकता या प्रभावी उपयोगिता भूमि समेत नीचे के आठ भुवनो में नहीं थी.
जैसे कौस्तुभ मणि, रम्भा नामक अप्सरा, अमृत, ऐरावत, उच्चैश्रवा घोड़ा, कल्पवृक्ष एवं लक्ष्मी आदि. भूमि समेत नीचे के आठ भुवनो में निरंतर अन्धकार को दूर करने के लिए उनकी कक्षा में स्थापित सौर मंडल के ग्रहों के आधिपत्य वाले खंडो को प्रदान किया गया.

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