सोमवार, 22 जनवरी 2018

"जम्बूद्वीप में नौ वर्ष हैं

नारायण कहते हैं- "जम्बूद्वीप में नौ वर्ष हैं। उन नावों वर्षों में आदिपुरुष नारायण सम्पूर्ण लोकों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से देवी सहित निवास करते हैं। इलावृतवर्ष में भगवान श्रीहरि रुद्र रूप में विराजमान हैं। ब्रह्मा के नेत्र से इनका पदुर्भाव हुआ है। इनकी प्रेयसी प्रिय सदा साथ रहती हैं। उनके क्षेत्र में दूसरा पुरुष नहीं जा सकता और न घूम ही सकता है। यदि कोई पुरुष वहाँ चला भी जाये तो तुरंत भवानी के श्राप से स्त्री रूप प्राप्त कर लेता है। यहाँ भगवान रुद्र नित्य संकर्षण की उपासना करते हैं। इन संकर्षण को भगवान विष्णु की तामस प्रकृति वाली चौथी मूर्ति कहा जाता है। ये रुद्रदेव अजन्मा हैं तथा इनका मन सदैव शांत रहता है।
ऐसे ही भद्राश्ववर्ष में भद्रश्रवा अपने कुल के प्रधान प्रधान सेवकों के साथ भगवान विष्णु के हयग्रीव स्वरूप की आराधना करते हैं।
हरिवर्ष में भगवान विष्णु नृसिंह रूप से रहते हैं। पापों को नष्ट कर देना इनका स्वभाव है। भक्तों पर ये अहेतुक कृपा रखते हैं। इस प्रदेश में दावनश्रेष्ठ प्रहलाद सदा उनकी आराधना और वंदना करते हैं।
केतुमालवर्ष में भगवान श्रीहरि कामदेव रूप से विराजते हैं। वहाँ के अधिकारी पुरुष इन्हें सदा सम्मान देते हैं। इस वर्ष की अधीश्वरी समुद्रतनया लक्ष्मी हैं। ये भगवती लक्ष्मी उत्तम स्त्रोतों से सदा श्रीहरि की उपासना करती हैं।
रम्यकवर्ष में भगवान विष्णु मत्स्य रूप से रहते हैं। उनका यह स्वरूप देवताओं द्वारा वंदित है। यहाँ मनुजी निरंतर उनका स्तवन करते हैं।
हिरण्यमयवर्ष में योगेश्वर भगवान विष्णु कश्यप रूप धारण करके विराजते हैं। अर्यमा के द्वारा इनकी स्तुति व उपासना होती है।
उत्तरकुरुवर्ष में भगवान विष्णु बारह रूप धरकर विराजते हैं। इन भगवान बारह की पृथ्वी देवी निरंतर सेवा करती हैं।
किमपुरुषवर्ष में भगवान दशरथनंदन राम के रूप में विराजमान होते है। वे सदा सीता के साथ वहाँ निवास करते हैं। जहाँ भक्तश्रेष्ठ हनुमान उनकी उपासना करते हैं।
इस भारतवर्ष में मैं आदिपुरुष हूँ और तुम (नारद) मेरी उपासना करते हो।
-देवीभागवत पुराण, अष्टमस्कन्ध


सरस्वती का धरती पर आगमन-




सरस्वती देवी की महिमा-

परमब्रह्म परमात्मा से संबंध रखने वाली वाणी, विद्या, बुद्धि, ज्ञान की जो व्यवस्था करती हैं उन्हें सरस्वती कहा जाता है। सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान इनका ही स्वरूप है। स्वर, संगीत और ताल इनके ही रूप हैं। ये विषय, ज्ञान और वाणीमई हैं। वे परम प्रसिद्ध, वाद विवाद की अधिष्ठात्री एवं शान्तमूर्ति हैं। ये हाथ में वीणा और पुस्तक लिए रहती हैं। इनका विग्रह शुद्ध सत्वमय है। ये सदाचार परायण एवं भगवान श्रीहरि की पत्नी हैं।

सरस्वती देवी आख्यान-

देवी सरस्वती पांचों प्रकृतियों में कृष्ण द्वारा सबसे पहले पूजित हैं। कृष्ण ने सबसे पहले सरस्वती की पूजा की, जिनकी कृपा से मूर्ख व्यक्ति भी पंडित बन जाता है। तब इन कामस्वरूपिणी देवी ने भगवान कृष्ण से विवाह की इच्छा व्यक्त की। सर्वज्ञ भगवान इनका अभिप्राय समझकर सत्य, हितकर एवम सुखदायक वचन बोले- " हे साध्वी! तुम विष्णु के साथ जाओ। वे मेरे ही स्वरूप हैं। उनकी चार भजाएँ हैं। मेरे ही समान उन्हें सभी सद्गुण वर्तमान हैं। वे सदैव तरुण, अनेकों कामदेवों के समान सुंदर और सर्वसमर्थ हैं। भद्रे! तुम बैकुंठ पधारो। तुम्हारे लिए वहीं रहना हितकर होगा। वहाँ विष्णु को पति बनाकर तुम सदा के लिए सुखपूर्वक रहना। विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हैं जिनके काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे अवगुण लेशमात्र को भी नहीं हैं। वो तुम्हारा सम्मान करेंगी और विष्णु तुम दोनों से समान प्रेम करेंगे।"

फिर भगवान आगे बोले- "प्रत्येक ब्रह्मांड में माघ शुक्ल पंचमी के दिन विद्यारम्भ के समय तुम्हारी भव्य पूजा होगी। मेरे वर अनुसार कल्प कल्पान्तर तक सदा सर्वदा मनुष्य, मनुगण, योगी, सिद्ध, तपस्वी तुम्हारी सोलह उपचारों से भक्तिपूर्वक पूजा करेंगे। इस प्रकार कहकर स्वयम भगवान कृष्ण ने उनकी पूजा की। उसके बाद तो शिव, ब्रह्मा, धर्म, इंद्र आदि देवताओं के द्वारा सदा ही उनकी पूजा होने लगी।"

सरस्वती का धरती पर आगमन-


लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा ये तीन भगवान विष्णु की पत्नी हुई। एक बार सरस्वती को गंगा से ईर्ष्या हो गयी सो उन्होंने गंगा से कड़े शब्द कहे। तब शांतिस्वरूपा और परमदयालु लक्ष्मी जी ने उन्हें टोका जिस कारण सरस्वती को लगा कि लक्ष्मी गंगा का पक्ष ले रही हैं। इसलिए क्रोध से कंपती हुई सरस्वती ने कहा- "लक्ष्मी तुम गंगा का पक्ष ले रही हो। तुम बृक्ष और जल हो जाओ।" लेकिन बदले में सरस्वती को श्राप तो दूर लक्ष्मी क्रोधित भी नहीं हुईं। ये बात गंगा से नहीं देखी गयी और उन्होंने कहा- "सरस्वती तुमने निर्दोष और धीरमती लक्ष्मी को श्राप दिया है। तुम भी जल रूप होकर मतर्यलोक जाने के योग्य हो जहाँ पापी मनुष्य रहते हैं।" सरस्वती ने भी कहा- "तो तुम भी जल रूप हो जाओ और उन सभी पापियों के पापों को अंगीकार करती रहो।"

तभी वहाँ भगवान विष्णु पधारे। देवियों की कलह सुनकर वे आसन पर बैठ गए और देवियों को अपने समीप बिठाकर बोले- "लक्ष्मी! भद्रे! तुम अपनी कला से धर्मध्वज की पुत्री के रूप में भोलोक पर जाओ। वहाँ तुम अयोनिजा जन्म लेना। वहीं तुम कालांतर में वृक्ष रूप हो जाओगी। लोग तुम्हें त्रिलोक पावनी तुलसी के नाम से जानेंगे। अपनी एक कला से तुम जल रूप होकर पद्मावती नदी बन जाओ।"

फिर गंगा से कहा- "तुम अपनी कला के अंश से जल रूप होकर शिव की जटाओं में निवास करोगी। भारत में बहते हुए तुम संसार के कलुशों को धोती रहोगी। वहाँ सागर मेरी कला का अंश है जिसकी तुम भार्या बनोगी। अपने सम्पूर्ण अंश से तुम यहीं बैकुंठ में रहोगी।"

फिर सरस्वती से कहा- "तुम अपनी कला से सरस्वती नामक नदी बनकर बहो जो परमपवित्र और संसार के दुखों से मुक्त करने वाली होगी।"

भारत में पधारने से उनका नाम भारती हुआ, ब्रह्मा पर अनुग्रह करने के कारण वे ब्राह्मी कहलाई और वचनों की अधिठात्री होने से वाणी नाम से विख्यात हुई। भगवान विष्णु का एक नाम सरस्वान है, उनकी पत्नी होने के कारण ही उनका नाम सरस्वती हुआ। नदी रूप पधारकर वे देवी परम पवित्र तीर्थ बन गयीं।

- देवी भागवत पूराण, नवम स्कंध

शनिवार, 6 जनवरी 2018

ज्योतिषीय उपाय और उनका आधार



ज्योतिषीय उपाय और उनका आधार

मित्रों हर रोज जब भी कोई पोस्ट करता हूँ तो कुछ ऐसे मित्र होते है की वो कहते है की मेरा अमुक ग्रह इस भाव में है इसके क्या उपाय करूं | लेकिन किसी एक ग्रह के आधार पर कभी भी उपाय लाभदायक सिद्ध नही होते | उपाय करते समय हमे लग्न कुंडली में ग्रहों की सिथ्ती के साथ वर्षफल और दशा कर्म का ध्यान रखना पड़ता है | इसिलिय आज उपाय के उपर ये मेरी एक पुरानी पोस्ट में कुछ नया जोड़ते हुवे दोबारा कर रहा हूँ ताकि आप समझ सके की उपाय ऐसे ही नही होते उनके पीछे छुपे हुवे रहस्य को जानकार किये जाने पर ही लाभ मिल पाता है | 

लाल किताब के कुछ उपाय जितने लाभदायक होते है उतने ही वो नुकसानदायक भी सिद्ध हो सकते है यदि उनको सही न किया जाए तो और इसमें वर्षफल में ग्रहों की सिथ्ति काफी अहम भूमिका निभाती है | कोई भी उपाय करने से पहले आपको ये पता होना चाहिए की आप ये उपाय किसलिय कर रहे है और इसके क्या लाभ और नुक्सान हो सकते है |
आप जब भी कोई उपाय करते है तो उस उपाय के पीछे कोई न कोई लोजिक अवस्य अवस्य होता है हालाँकि बहुत से लोग से ही कंही से भी पढकर उपाय करना सुरु कर देते है और फिर बोलते है की मै इतने उपाय कर चूका हूँ मुझे कोई फायदा नही हुआ |  
 
उपाय के रूप में जो मुख्य रूप से किये जाते है उनमे किसी भी ग्रह से सम्बन्धित वस्तु को जल में बहाना , या उसे जमीन में दबाना या उसका दान करना , सम्बन्धित ग्रह के मन्त्र जप करना , सम्बन्धित ग्रह के रत्न धारण करना , उस ग्रह से सम्बन्धित जानवर को उस ग्रह से सम्बन्धित वस्तु खिलाना , उस से सम्बन्धित रिश्तेदार जानवर, पेड़ पोधों की सेवा करना और उस से सम्बन्धित वस्तु को घर में कायम करना |
यदि आप कोई भी उपाय करते है तो उसके पीछे छिपे हुवे रहस्य को आपको अवस्य समझना चाहिए इसिलिय आज उन रहस्यों को खोल रहा हूँ |
जब भी आप किसी ग्रह की वस्तु को जल प्रवाह करते है या जमीन में दबाते है तो उस साल के लिय आप उस ग्रह के प्रभाव को खत्म कर रहे होते है ऐसे में आपको ये विशेष ध्यान रखना होता है की ऐसे उपाय से उस ग्रह के कारक रिश्तेदार को नुक्सान होने की पूरी सम्भवना बन जाती है जैसे की एक उपाय है की मंगल अस्ठ्म में हो तो शहद का बर्तन जमीन में दबाना होता है ऐसे में जैसे की मंगल भाई का कारक ग्रह होता है और तीसरा भाव भाई को दर्शाता है ऐसे में यदि तीसरा भाव पाप प्रभाव में हो तो ऐसे उपाय से ये सम्भव है की आपके भाई को उस साल कोई मुसीबत का सामना करना पड़ जाए | इसी तरह से शनी जो की मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है और आप के निचे मजदूर कार्य करते है और वर्षफल में और लग्न कुंडली में शनी अच्छे भाव में आया हुआ है और आप शनी से सम्बन्धित वस्तु जल प्रवाह कर देते है तो आपको अपने व्यवसाय में नुक्सान होना सम्भव हो जाता है | साथ ही इस बात का ध्यान रखे की यदि चन्द्र के दुश्मन ग्रह की वस्तु आप जल प्रवाह कर रहे है तो आप अपने चन्द्र को कमजोर कर रहे है ऐसे में आपको कुंडली में चन्द्र की सिथ्ती का विशेष ध्यान रखना आवश्यक हो जाता है |
किसी भी ग्रह के मन्त्र जप आप उस सिथ्ती में करे जब कुंडली में वो ग्रह कारक होकर कमजोर हो रहा हो तो उस ग्रह के मन्त्र जप करने से उसका रत्न धारण कर उसे मजबूत करके उसके शुभ फलों में बढ़ोतरी की जा सकती है \ लेकिन यदि आप किसी बिज मन्त्र का जप करते है और उस मन्त्र का पहला अक्सर आपकी कुंडली में त्रिक भाव में पड़ने वाली राशि में आता है तो फिर आपको लाभ की जगह नुक्सान होने की पूरी सम्भावना रहती है |
यदि कोई ग्रह कुंडली में अशुभफल देने वाला सिद्ध हो रहा है तो आप उसके दान कर सकते है | लेकिन यदि आप किसी अच्छे फल देने वाले ग्रह का दान करते है तो उसमे आपको हानि होने की पूरी सम्भवना रहती है |
एक उपाय है की ग्रह से सम्बन्धित वस्तु उसी के जानवर को खिलाना जैसे की हम किसी ग्रह को नस्ट नही सकते तो ऐसे में उस ग्रह को काबू करने के लिय हम उसी ग्रह की वस्तु को उसी से सम्बन्धित जानवर को खिला देते है जैसे की यदि शुक्र अशुभ फल देने वाला सिद्ध हो रहा है तो हम शुक्र की गाय को शुक्र की ज्वार को खिला देते है और शुक्र खुद उसे खाकर नस्ट करके गोबर में तब्दील कर देता है और हमे शुक्र से सम्बन्धित अशुभ फलों में कमी हो जाती है | ऐसे ही यदि सूर्य अशुभ फल दे रहा है तो तो हम भूरी चीटियों को गुड डालकर उसके अशुभ प्रभाव में कमी करते है |

इसी तरह किसी ग्रह से सम्बन्धित वस्तु को घर में कायम किया जा सकता है जैसे की दुसरे भाव में चन्द्र उंच होता है कालपुरुष की कुंडली में ऐसे में इस भाव के चन्द्र के शुभ फलों में बढ़ोतरी के लिय चन्द्र माता से चावल चन्द्र लेकर अपने कमरे में कायम करे तो ऐसे में ये चावल जैसे जैसे पुराने होते जाते है चन्द्र के शुभ फल में बडोतरी होती जाती है |

एक ख़ास बात की लाल किताब में हर भाव के हिसाब से ग्रह के उपाय बदलते है और यदि किसी अन्य ग्रह के साथ युति हो तो उसका उपाय अलग होता है इसिलिय इस बात का विशेष ध्यान आपको रखना होता है |



यदि किसी ग्रह से सम्बन्धित रिश्तेदार या जानवर की हम सेवा करते है तो उसका १००% हमे फल मिलता है जैसे चन्द्र के लिय माँ बुद्ध के लिय बहन बुआ बेटी आदि और यदि उस से सम्बन्धित पेड़ आदि की सेवा करते है तो पचास प्रतिसत फल मिल जाता है जैसे शनी के लिए किक्र गुरु के लिय पीपल आदि | यदि किसी पथर रत्न को धारण करते है तो 25% तक उस ग्रह के हमे फले मिलते है हालाँकि रत्न के बारे में अलग अलग विद्वानों के अलग अलग मत है लेकिन मेरी नजर में जितने भी श्रेष्ठ ज्योत्षी है उनका ये ही मत है की रत्न का ज्यादा प्रभाव न होकर यदि आप उस ग्रह के मन्त्र जप करते है उस से सम्बन्धित रिश्तेदारों ककी सेवा करते है तो उसका पूर्ण प्रभाव आपको मिलता है| रत्न को यदि प्राण प्र्तिस्ठित करवा करे धारण करते है तो फिर इसमें कोई स हक नही की उसका प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ जाता है |
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जय श्री राम///

ग्रह और हम===



ग्रह और हम===========

ग्रहों के आपस के सम्बन्धों के प्रति बहुत ही मजेदार बात भारतीय ज्योतिष ने प्रदान की है,हर ग्रह जिन्दा है हर ग्रह देवता है और हर ग्रह हमेशा हमारे पास है,हर ग्रह आपस में हर काम कर रहा है,जैसे गुरु पिता है,चन्द्र माता है,मंगल भाई है,बुध बहिन बुआ बेटी है,शुक्र पत्नी है,शनि चाचा है,राहु स्वसुर और केतु नाना है,यही ग्रह शरीर के अन्दर भी हैं जो हमेशा साथ रहते है,सूर्य शरीर और नाम,पहिचान आदि है,चन्द्र शरीर मे पानी की मात्रा है,मंगल शरीर में खून है,बुध शरीर में नसें और स्नायु तन्त्र है,गुरु दिमाग है,शुक्र जनन इन्द्रिय और शरीर की मोहक अदा है,शनि बाल,खाल और हर अंग की रक्षा करने वाला हिस्सा है,राहु विद्या कल्पना है और केतु हाथ पैर कान,और शरीर को सहायता देने वाले हिस्से हैं,यही ग्रह हिन्दू मतानुसार पूजा में भी साथ रहते है,सूर्य विष्णु है,चन्द्र भगवान शिव हैं,मंगल हनुमानजी है,बुध दुर्गा जी है,गुरु भगवान इन्द्र है,ब्रह्माजी है,शुक्र लक्ष्मी है,शनि भैरों है,राहु सरस्वती है,और केतु गणेशजी है|

घर में प्रयोग होने वाली वस्तुओं में हल्दी गुरु है घी शुक्र है मीठा मंगल है गुड सूर्य है दुश चन्द्र है मूंग बुद्ध है काले तिल शनी है तो काले सफेद मिक्स तिल केतु है तो कोयले राहू है |
रंग में सूर्य क सुनहरा तो चन्द्र शुक्र का सफेद मंगल का लाल बुद्ध का हरा गुरु का पिला तो शनी का नीला तो राहू का स्लेटी है केतु दोरंगा है |
गाडी में मालवाहक गाडी शनी की है तो घुमने फिरने के लिय गाडी शुक्र है तो गाडी के पहिये केतु है तो सडक शनी है | तो सडक के ब्रेकर राहू है तो पुलिस चैक पोस्ट राहू मंगल का संयुक्त रूप है , तो सडक पर इशारा करने वाले निशाँन केतु है |
मन्दिर गुरु का है तो उस पर फहराने वाली ध्वजा केतु की है तो उसमे बजने वाला संख बुद्ध का है |
रत्नों में माणिक्य सूर्य मोती चन्द्र का मूंगा मंगल का पन्ना बुद्ध का पुखराज गुरु का तो ओपल और हीरा शुक्र का नीलम शनी का तो गोमेद राहू और लहसुनिया केतु का होता है |
धतुवों में सोना गुरु का ताम्बा सूर्य मंगल का , चांदी शुक्र चन्द्र की तो स्टील लोहा शनी का तो अलुमुनिय्म राहू का तो कलई बुद्ध की होती है |
इस तरह हमारे जीवन में काम आने वाली हर चीज किसी न किसी ग्रह को दर्शाती है | कुछ व्स्तुवें संयुक्त गरहों को दर्शाती है | आप इनमे से आपकी कुंडली में जो शुभ फल देने वाले ग्रह है उनका ज्यादा प्रयोग करके उसे मजबूत कर सकते है तो जो अशुभ फल देने वाले ग्रह है उनकी वस्तु को दान करके अशुभ फल में कमी कर सकते है | जय श्री राम

रविवार, 31 दिसंबर 2017

अब अपना नववर्ष मनाएंगे ।।

हवा लगी पश्चिम की ,



सब कुप्पा होकर फूल गए ।
ईस्वी सन तो याद रहा ,
पर अपना संवत्सर भूल गए ।।

चारों तरफ नए साल का ,
ऐसा मचा है हो-हल्ला ।
बेगानी शादी में नाचे ,
जैसे कोई दीवाना अब्दुल्ला ।।

धरती ठिठुर रही सर्दी से ,
घना कुहासा छाया है ।
कैसा ये नववर्ष है ,
जिससे सूरज भी शरमाया है ।।

सूनी है पेड़ों की डालें ,
फूल नहीं हैं उपवन में ।
पर्वत ढके बर्फ से सारे ,
आतुरता से फागुन का ।
जैसे रस्ता देख रही हो ,
सजनी अपने साजन का ।।

अभी ना उल्लासित हो इतने ,
आई अभी बहार नहीं ।
हम अपना नववर्ष मनाएंगे ,
न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं ।।

लिए बहारें आँचल में ,
जब चैत्र प्रतिपदा आएगी ।
फूलों का श्रृंगार करके ,
धरती दुल्हन बन जाएगी ।।

मौसम बड़ा सुहाना होगा ,
दिल सबके खिल जाएँगे ।
झूमेंगी फसलें खेतों में ,
हम गीत खुशी के गाएँगे ।।

उठो खुद को पहचानो ,
यूँ कब तक सोते रहोगे तुम ।
चिन्ह गुलामी के कंधों पर ,
कब तक ढोते रहोगे तुम ।।

अपनी समृद्ध परंपराओं का ,
आओ मिलकर मान बढ़ाएंगे ।
आर्यवृत के वासी हैं हम ,

हवा लगी पश्चिम की ,
सब कुप्पा होकर फूल गए ।
ईस्वी सन तो याद रहा ,
पर अपना संवत्सर भूल गए ।।

चारों तरफ नए साल का ,
ऐसा मचा है हो-हल्ला ।
बेगानी शादी में नाचे ,
जैसे कोई दीवाना अब्दुल्ला ।।

धरती ठिठुर रही सर्दी से ,
घना कुहासा छाया है ।
कैसा ये नववर्ष है ,
जिससे सूरज भी शरमाया है ।।


सूनी है पेड़ों की डालें ,
फूल नहीं हैं उपवन में ।
पर्वत ढके बर्फ से सारे ,
रंग कहां है जीवन में ।।

बाट जोह रही सारी प्रकृति ,
आतुरता से फागुन का ।
जैसे रस्ता देख रही हो ,
सजनी अपने साजन का ।।

अभी ना उल्लासित हो इतने ,
आई अभी बहार नहीं ।
हम अपना नववर्ष मनाएंगे ,
न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं ।।

लिए बहारें आँचल में ,
जब चैत्र प्रतिपदा आएगी ।
फूलों का श्रृंगार करके ,
धरती दुल्हन बन जाएगी ।।

मौसम बड़ा सुहाना होगा ,
दिल सबके खिल जाएँगे ।
झूमेंगी फसलें खेतों में ,
हम गीत खुशी के गाएँगे ।।

उठो खुद को पहचानो ,
यूँ कब तक सोते रहोगे तुम ।
चिन्ह गुलामी के कंधों पर ,
कब तक ढोते रहोगे तुम ।।

अपनी समृद्ध परंपराओं का ,
आओ मिलकर मान बढ़ाएंगे ।
आर्यवृत के वासी हैं हम ,
अब अपना नववर्ष मनाएंगे ।।

🚩जय माँ भारती 🚩जय माँ भारती