शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

भगवान श्री गणेश जी के १०८ नाम

1    भगवान श्री गणेश जी के १०८ नाम 

       1)     बालगणपति – Baalganapati
2) भालचन्द्र – Bhalchandra
3) बुद्धिनाथ – Buddhinath
4) धूम्रवर्ण – Dhumravarna
5) एकाक्षर – Ekakshar
6) एकदन्त – Ekdant
7) गजकर्ण – Gajkarn
8) गजानन – Gajaanan
9) गजनान – Gajnaan
10) गजवक्र – Gajvakra
11) गजवक्त्र – Gajvaktra
12) गणाध्यक्ष – Ganaadhyaksha
13) गणपति – Ganapati
14) गौरीसुत – Gaurisut
15) लम्बकर्ण – Lambakarn
16) लम्बोदर – Lambodar
17) महाबल – Mahaabal
18) महागणपति – Mahaaganapati
19) महेश्वर – Maheshwar
20) मंगलमूर्त्ति – Mangalmurti
21) मूषकवाहन – Mushakvaahan
22) निदीश्वरम – Nidishwaram
23) प्रथमेश्वर – Prathameshwar
24) शूपकर्ण – Shoopkarna
25) शुभम – Shubham
26) सिद्धिदाता – Siddhidata
27) सिद्दिविनायक – Siddhivinaayak
28) सुरेश्वरम – Sureshvaram
29) वक्रतुण्ड – Vakratund
30) अखूरथ – Akhurath
31) अलम्पत – Alampat
32) अमित – Amit
33) अनन्तचिदरुपम – Anantchidrupam
34) अवनीश – Avanish
35) अविघ्न – Avighn
36) भीम – Bheem
37) भूपति – Bhupati
38) भुवनपति – Bhuvanpati
39) बुद्धिप्रिय – Buddhipriya
40) बुद्धिविधाता – Buddhividhata
41) चतुर्भुज – Chaturbhuj
42) देवदेव – Devdev
43) देवांतकनाशकारी – Devantaknaashkari
44) देवव्रत – Devavrat
45) देवेन्द्राशिक – Devendrashik
46) धार्मिक – Dharmik
47) दूर्जा – Doorja
48) द्वैमातुर – Dwemaatur
49) एकदंष्ट्र – Ekdanshtra
50) ईशानपुत्र – Ishaanputra
51) गदाधर – Gadaadhar
52) गणाध्यक्षिण – Ganaadhyakshina
53) गुणिन – Gunin
54) हरिद्र – Haridra
55) हेरम्ब – Heramb
56) कपिल – Kapil
57) कवीश – Kaveesh
58) कीर्त्ति – Kirti
59) कृपाकर – Kripakar
60) कृष्णपिंगाश – Krishnapingash
61) क्षेमंकरी – Kshemankari
62) क्षिप्रा – Kshipra
63) मनोमय – Manomaya
64) मृत्युंजय – Mrityunjay
65) मूढ़ाकरम – Mudhakaram
66) मुक्तिदायी – Muktidaayi
67) नादप्रतिष्ठित – Naadpratishthit
68) नमस्तेSत – Namastetu
69) नन्दन – Nandan
70) पाषिण – Pashin
71) पीताम्बर – Pitaamber
72) प्रमोद – Pramod
73) पुरुष – Purush
74) रक्त – Rakta
75) रुद्रप्रिय – Rudrapriya
76) सर्वदेवात्मन – Sarvadevatmana
77) सर्वसिद्धांत – Sarvasiddhanta
78) सर्वात्मन – Sarvaatmana
79) शांभवि – Shambhavi
80) शशिवर्णम – Shashivarnam
81) शुभगुणकानन – Shubhagunakaanan
82) श्वेता – Shweta
83) सिद्धिप्रिय – Siddhipriya
84) स्कन्दपूर्वज – Skandapurvaj
85) सुमुख – Sumukha
86) स्वरुप – Swarup
87) तरुण – Tarun
88) उद्दण्ड – Uddanda
89) उमापुत्र – Umaputra
90) वरगणपति – Varganapati
91) वरप्रद – Varprada
92) वरदविनायक – Varadvinaayak
93) वीरगणपति – Veerganapati
94) विद्यावारिधि – Vidyavaaridhi
95) विघ्नहर – Vighnahar
96) विघ्नहर्त्ता – Vighnahartta
97) विघ्नविनाशन – Vighnavinashan
98) विघ्नराज – Vighnaraaj
99) विघ्नराजेन्द्र – Vighnaraajendra
100) विघ्नविनाशाय – Vighnavinashay
101) विघ्नेश्वर – Vighneshwar
102) विकट – Vikat
103) विनायक – Vinayak
104) विश्वमुख – Vshvamukh
105) यज्ञकाय – Yagyakaay
106) यशस्कर – Yashaskar
107) यशस्विन – Yashaswin
108) योगाधिप – Yogadhip

बुधवार, 27 अगस्त 2014

हल्दी [turmric] की उपयोगिता

,, प्रकृति ने हमें बहुत सी वस्तुएं दी हैं उनमें से एक है हल्दी। वैसे तो हल्दी खाने के स्वाद को बढ़ाती ही है साथ ही यह जीवन से समस्याएं भी दूर कर देती है।
नजर दोष, कुंडली में बृहस्पति को करती है मजबूत करना हो तो हल्दी कारगर सिद्ध होती है। हल्दी के इतने ज्यादा गुण है कि आप उत्तम स्वास्थ्य, धन और विवाह की मनोकामना को पूरा कर सकते हैं।
हल्दी का रंग पीला होता है। पीला रंग शुभता का प्रतीक होता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में पीले रंग को शुभ रंग माना गया है। हल्दी एक विशेष प्रकार की औषधि है जिसमें दैवीय गुण होते हैं।
खाने का स्वाद को बढ़ाती है, जीवन में संपन्नता लाती है। हल्दी नकारात्मक ऊर्जा को भी नष्ट कर देती है। हल्दी का प्रयोग हवन और औषधियों में किया जाता है।
दो चुटकी हल्दी
बृहस्पति महिलाओं के विवाह का कारक होता है। अगर कन्याएं विवाह की इच्छुक हैं तो स्नान करते समय जल में दो चुटकी पिसी हुई हल्दी मिलाइए और उससे स्नान कीजिए रोज। इसी जल से भगवान को अर्ध्य दीजिए। जल चढ़ाने के बाद लोटे के किनारे जो हल्दी लगी रह जाती है।
इसी हल्दी को अपने माथे और कंठ पर लगाएं। यह प्रयोग लगातार लगभग एक महीने तक करते रहिए। यह उपाय अगर आप गर्मियों में करते हैं तो बहुत ज्यादा प्रभावशाली होता है। उस समय सूर्य की किरणें इस हल्दी के साथ मिलकर अंदर मौजूद बृहस्पति को मजबूत कर देती हैं।
विवाह में इसलिए लगाते हैं हल्दी
कहते हैं नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने के लिए हल्दी से अच्छी कोई चीज नहीं होती है। इसलिए विवाह में हल्दी का प्रयोग किया जाता है। दरअसल विवाह के समय बहुत सारे लोग घर में आते हैं। जो तमाम तरह की निगेटिव एनर्जी को फैंकते रहते हैं।
जिससे देखा जाता है कई बहुओं और वरों की तबियत खराब हो जाती है। ऐसे में अगर उनको हल्दी लगी हो तो यह समस्या उन्हें नहीं आती यह शरीर को सुंदर भी बनाती है। औक इस पर पांच सात दिनो तक किसी भी तरही की नकारात्मक ऊर्जाका प्रभाव नही पड़ता है। ताकि वो नजर दोष से बचे रें ।
धन की प्राप्त के लिए
अगर आपके पास धन हमेशा बना रहे तो थोड़ी सी हल्दी लीजिए और जरा सा इसमें गुलाब जल मिला लीजिए। अब एक कागज लीजिए और अंगुली कागज पर 'श्रीं' लिखें। अब इसे पूजा स्थान पर रखकर धूप बत्ती दिखाकर शुद्ध कर लीजिए। अब इस कागज को मोढ़कर अपने पास रख लीजिए अब इसे अपने पर्स में रख लीजिए।
ध्यान रखिए अगर किसी गुरुवार को पुष्य नक्षत्र पढ़ता है तो इस विधि को जरूर करें। निश्चित रूप से यह प्रयोग विशेष लाभकारी होगा। इसे रखने पर आपको धन का अभाव नहीं होगा और अगर गुरु पुष्य नक्षत्र लंबे समय तक नहीं आ रहा है तो किसी भी गुरुवार को प्रातः काल कर लीजिए। हर महीने पुराना कागज जल में प्रवाहित कर दीजिए और नया कागज रख लीजिए। जब तक इस कागज पर 'श्रीं' लिखा हुआ है और तब तक आपको धन की कमी नहीं होगी।
ज्योतिष में महत्व
ज्योतिष में हर किसी भी वस्तु का संबंध ग्रह से माना गया है। हल्दी का संबंध रंगो के आधार पर अलग-अलग ग्रहों से होता है। ज्योतिष की नजर से अगर हल्दी को देखा जाए तो हल्दी कई रंगों की होती है। हल्दी पीले रंग, काले रंग और नारंगी रंग की होती है। हल्दी बृहस्पति से संबंध रखती है।
जब हल्दी कच्ची होती है तो वह अदरक की तरह दिखाई देती है। इस समय उसका छिलका हटाने पर यह नारंगी दिखाई देती है। नारंगी हल्दी मंगल से संबंध रखती है। काली हल्दी शनि से संबंध रखती है। पीली हल्दी को ज्योतिष में बृकस्पति को मजबूत करने के लिए और समस्याओं के दूर करने के लिए उपयोग में लाई जाती है।
भोजन में हल्दी
भोजन में अगर संतुलित मात्रा में हल्दी का प्रयोग करेंगे तो आपको किसी तरह की बीमारियों का समाना नहीं करना पड़ेगा। शरीर में जो विष जमा हो गया है उसको निकालने के लिए हल्दी का प्रयोग जरूर करना चाहिए। ज्यादा हल्दी के सेवन से आपको डाइजेशन भी शिकार हो सकता है। पेट या कैंसर संबंधी समस्या हो तो पीली हल्दी का दान बेहद लाभकारी माना गया है।
रोज सुबह अगर आप हल्दी का तिलक लगाए तो व्यक्ति को वाणी की शक्ति मिलती है। अगर आप माथे पर नहीं लगाते तो कंठ पर तो जरूर लगाएं ऐसे में आपकी वाणी जरूर प्रभावी होगी। जीवन में सात्विकता बढ़ती है। आप हल्दी की माला से बृहस्पति देव के मंत्र या ज्ञान के मंत्रों का जाप करते हैं तो व्यक्ति बुद्धिमान बनता है।

हल्दी की माला पहन सकते हैं ध्यान रहे कि आपको त्वचा संबंधी कोई एलर्जी न हो इससे भी आपको प्रभाव बढ़ता है।

नैरत्य दिशा का महत्व -

भवन निर्माण में भंडार गृह या भंडारण कक्ष (स्टोर रूम) मुख्य योजना का एक अहम हिस्सा रहता है। भंडार गृह बनाने के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य हैं कि वर्षभर के लिए अन्न का भंडारण किया जा सके और जरूरी वस्तुओं का संचय भी हो सके।
यदि आपके पास पर्याप्त जगह है तो अन्न के भंडारण और अन्य वस्तुओं के संचय के लिए अलग-अलग कक्ष बनाए जाने चाहिए लेकिन अगर जगह का अभाव है तो एक ही कक्ष से दोनों उपयोग लिए जा सकते हैं। यहां भंडार गृह संबंधी प्रमुख वास्तु सुझाव दिए जा रहे हैं जो पारिवारिक समृद्धता को संभव बनाते हैं।
भंडार गृह में न रखें अनुपयोगी चीजें
  • अन्नादि के भंडार कक्ष का द्वार नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में होना चाहिए।
  • अगर वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में अन्ना कक्ष या अन्न भंडार गृह बनाया जाता है तो अन्न की कभी कमी नहीं होती है। घर में धन-धान्य बना रहता है।
  • अन्न का वार्षिक संग्रहण दक्षिणी अथवा पश्चिमी दीवार के समीप किया जाना चाहिए।
  • अन्न कक्ष या अन्ना भंडार गृह में डिब्बे या कनस्तर को खाली नहीं रहने दें। अगर कोई डिब्बा पूरी तरह खाली हो रहा हो तो भी उसमें कुछ मात्रा में अन्न बचा देना चाहिए। यह समृद्धि के लिए जरूरी माना जाता है।
  • अन्न भंडार कक्ष में घी, तेल, मिट्टी का तेल एवं गैस सिलेन्डर आदि को आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में रखना चाहिए।
  • अन्न के भंडार कक्ष में ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में शुद्ध और पवित्र जल से भरा हुआ मिट्टी का एक पात्र रखा जाना चाहिए। इस बात का खयाल रखें कि यह पात्र खाली न हो।
  • अन्न कक्ष में अगर विष्णु और लक्ष्मी का चित्र या प्रतिमा हो तो उससे समृद्धि प्राप्त होती है।
  • रोज उपयोग में आने वाले खाद्यान्न को कक्ष के उत्तर-पश्चिमी भाग में रखा जाना चाहिए।
  • पूर्व दिशा में अगर भंडार गृह हो तो घर के मुखिया को अपनी आजीविका के लिए ज्यादा यात्रा करनी पड़ती है। वह अक्सर घर से बाहर ही रहता है।
  • आग्नेय कोण में अगर भंडार कक्ष का निर्माण किया जाए तो मुखिया की आमदनी हमेशा कम ही पड़ती है।
  • दक्षिण दिशा में भंडार कक्ष बनाने पर घर के सदस्यों के बीच आपसी मतभेद हो सकते हैं। इस तरह के भंडार कक्ष से घर में अशांति बनी रहती है।
  • संयुक्त भंडार कक्ष भवन के पश्चिमी अथवा उत्तर-पश्चिमी भाग में बनाया जाना चाहिए।
  • संयुक्त भंडार गृह में अन्ना वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में रखा जाना चाहिए।
  • अगर संयुक्त रूप से भंडार कक्ष का उपयोग किया जाता है तो उसमें ऐसी चीजें नहीं रखना चाहिए जो हमारे लिए पूरी तरह अनुपयोगी हैं।
  • संयुक्त भंडार गृह में अन्य चीजों का भंडारण दक्षिणी और पश्चिमी दीवार की ओर किया जाना चाहिए।
  • संयुक्त भंडारगृह के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में जल का पात्र रखना शुभकर रहता है और परिवार में शांति और समृद्धि में वृद्धि करता है।
·         भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक का बहुत महत्व माना गया है। कहते हैं कि देवों में सर्वप्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की उपासना और धन, वैभव व ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी की पूजा स्वस्तिक के बिना अधूरी है।
·         किसी भी देवता या देवियों की पूजा के पहले कई प्रकार के चौक आंगन या पूजास्थल पर बनाए जाते है जिसके साथ स्वस्तिक बनाने की परंपरा है।
·          
·         ब्रह्माण्ड का प्रतीक
·          
·         स्वस्तिक को सूर्य और विष्णु का प्रतीक माना जाता है। सविन्त सूत्र के अनुसार इसे मनोवांछित फलदायक सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने वाला और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है।
·          
·         माना जाता है कि स्वस्तिक ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। इसके मध्य भाग को विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रह्मा जी के चार मुख और चारों हाथों को चार वेदों के रूप माना गया है। देवताओं के चारों ओर घूमनेवाले आभामंडल का चिन्ह ही स्वस्तिक के आकार का होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ माना गया है।
·          
·         'स्वस्तिक' का अर्थ
·          
·         'स्वस्तिक' में 'स्वस्ति' का अर्थ है - क्षेम, मंगल इत्यादि प्रकार की शुभता एवं 'क' अर्थात कारक या करने वाला। मान्यता है कि धर्मग्रंथ श्रुति द्वारा प्रतिपादित यह युक्तिसंगत भी है। श्रुति, अनुभूति तथा युक्ति इन तीनों में इसका एक समान वर्णन किया गया है यह प्रयागराज में होने वाले संगम के समान हैं।
·          
·         दिशाएं चार होती हैं, खड़ी तथा सीधी रेखा खींचकर जो घन चिन्ह जैसा आकार बनता है यह आकार चारों दिशाओं का द्योतक सर्वत्र है। इसलिए यह देवताओं का शुभ स्वस्तिक करने वाला है और इसके गति सिद्ध चिन्ह को 'स्वस्तिक' कहा गया है।
·          
·         सात समुंदर पार
·          
·         स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, विश्व के कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में पहचाना जाता है। यूनान, फांस, रोम, मिस्त्र, ब्रिटेन, अमरीका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन है।
·          
·         स्वस्तिक की रेखाओं को कुछ विद्वान अग्नि उत्पन्न करने वाली अश्वत्थ (पीपल) की दो लकड़ियां मानते हैं। प्राचीन मिस्त्र के लोग स्वस्तिक को निर्विवाद रूप से काष्ठ दण्डों का प्रतीक मानते थे। यज्ञ में अग्नि मंथन के कारण इसे प्रकाश का भी प्रतीक माना जाता है।
·          
·         लोगों का मानना है कि स्वस्तिक सूर्य का प्रतीक है। जैन धर्मावलम्बी अक्षत पूजा के समय स्वस्तिक चिह्न बनाकर तीन बिन्दु बनाते हैं। स्वस्तिक की रेखाओं को कुछ विद्वान अग्नि उत्पन्न करने वाली अश्वत्थ तथा पीपल की दो लकड़ियां मानते हैं।

वुधवार को करने योग्य कार्य

ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक दिन का संबंध ग्रहों की सत्ता पर आधारित है। बुधवार का दिन बुध देव को समर्पित है। बुध देव बुद्धि व चतुराई के दाता हैं। जीवन में सफलता पाने के लिए बुद्धि और चतुराई का समावेश होना अत्यंत अवश्यक है।
बुधवार का दिन बुध ग्रह से संबंधित है, जिसके अधिपति स्वयं लक्ष्मी नारायण विष्णु हैं। लक्ष्मी तभी प्रसन्न होंगी जब नारायण प्रसन्न रहेंगे। अत:बुधवार को किया गया धन संग्रह अधिक संमय तक स्थायी रहता है इसलिए धन की वृद्धि से जुड़े सभी कार्यों के लिए बुधवार सर्वश्रेष्ठ वार है ।
यदि बुधवार के दिन किसी शुभ कार्य के लिए जा रहे हैं तो गणेश जी को मोदक प्रसाद के रूप में चढ़ाएं और फिर प्रसाद ग्रहण करके लक्ष्य की ओर निकलें। ऐसा करने पर आपके सभी कार्य समय पर पूर्ण होंगे और सफलता प्राप्त होगी।
इसके लिए धन प्रबंध बहुत आवश्यक है। बुधवार के दिन कोई भी व्यापार प्रारंभ किया जाए तो उसमें सफलता की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। वणिक वर्ग के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे बुधवार के दिन किसी को भी धन नहीं दें। बुधवार का दिन धन संग्रह के लिए है ना कि धन देने के लिए।
इस दिन किए जाने योग्य कार्य, बैंक में जमा खाता खुलवाना, बीमा करवाना, धन का आदान प्रदान करना, रूपए पैसों का लेन देन करना, इन्वेस्टमेन्ट करना, गोदाम में माल भरना इत्यादि कार्य करने शुभ रहते हैं।
हम जिस घर में रहते हैं उसकी बनावट, दिशाएं और घर में पचंतत्वों के उचित समावेश का हमारे जीवन पर काफी प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही हमारे आस-पास भवन के आस-पास के वातावरण में उगने वाले पेड़ पौधों का शुभ प्रभाव पड़ता है।
इसलिए घर के सामने लॉन में पेड़ पौधे लगाना चाहिए। इस संबंध में वास्तुशास्त्र के विद्वानों का अलग-अलग मत है। घर के बाहर पेड़ लगाते समय ध्यान रखना चाहिए कि पेड़ भवन से इतनी दूर लगाए जाएं कि सुबह 9 बजे से लेकर तीसरे प्रहर यानी तीन बजे तक पेड़ की छाया मकान पर न पड़े। इसके साथ ही कुछ ऐसे ही वास्तु टिप्स...

  • विशाल वृक्षों में कैथ वृक्ष घर के उत्तर में वट वृक्ष, पूर्व में गूलर दक्षिण में तथा पीपल पश्चिम लगाना शुभ होता है।
  • घर के पूर्व में ऊंची इमारतें या विशाल वृक्ष नहीं होने चाहिए। इसके साथ ही देवालय, मठ, मकान सूर्य की जीवनदायिनी किरणें और वायु से वंचित रहे वह शुभफलदायी नहीं होता।
  • पाकड़, गूलर, आम, नीम, सुही, बहेड़ा, कांटे वाला बरगद, पीपल, कैथ, इमली की लकड़ियों को निर्माण कार्य में नहीं लगाना चाहिए।
  • ऐसे पौधे जिनके लिए केवल जल ही पर्याप्त है जैसे मनीप्लांट को किसी भी कक्ष में पूर्व दिशा, उत्तर दिशा या ईशान कोण में भी रखा जा सकता है।
  • आजकल बोनजाई का प्रचलन है। किसी भी कक्ष में यदि बोनजाई रखना हो तो इसके लिए पश्चिम की ओर या दक्षिण की ओर रखना चाहिए।
  • घर के पास कांटे वाले पौधे जैसे बेर की झाड़ी, अकोआ, महुआ आदि नहीं लगाना चाहिए। अगर पहले से हैं तो इन्हें कटवा दें। यदि इन्हें कटवाना चाहते हैं तो इनके बीच शुभदायक पौधे जैसे अशोक, शाल, कटहल लगा देना चाहिए।
  • घर के सामने आंगन में गुलाब, गेंदा, रात की रानी, बेला आदि सुगंध वाले पौधे गमलों में या ऐसे ही लगाएं कि दूर से नजर आएं। अशोक के पेड़ घर के सामने नहीं लगाना चाहिए। यह शुभ होते हैं। यह घर को शुद्ध रखते हैं।

विवादों से सुरक्षा =निदान

 कोर्ट-कचहरी के चक्करों में कहीं आप अपना सुख, पैसा और मान तो नहीं गंवा रहे
आदि-अनादिकाल से ही मनुष्य सुख और शांति के साथ जीवन जीना चाहता रहा है और उसके लिए पूरे प्रयास भी करता रहता है। इस चाहत के बावजूद भी जीवन में कई बार न चाहते हुए भी ऐसी स्थितियां निर्मित हो जाती हैं कि न चाहते हुए भी विवाद हो जाते हैं और कभी-कभी वह इतने बढ़ते चले जाते हैं कि मामला कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाता है। कोर्ट-कचहरी के इस चक्कर में पड़कर आदमी अपना सुख-चैन, पैसा, मान-सम्मान इत्यादि तक गंवा बैठता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? ऐसे कौन-से कारण होते हैं जो ऐसी स्थितियां निर्मित कर देते हैं?
विवाद की स्थिति पैदा करने में भाग्य के साथ वास्तु की भी अहम् भूमिका होती है। कुछ घरों में ऐसे वास्तुदोष होते हैं जो वह निवास करने वालों में गलत विचार, गलत आदतें, लालच, क्रोध, दगाबाजी, इत्यादि पापकर्म के लिए प्रेरित करते हैं। यही कारक आगे चलकर विवाद पैदा कर अदालती कार्यवाही का कारण बन जाते हैं।
मैं यहां पर कुछ ऐसे वास्तुदोषों का उल्लेख कर रहा हूं जो उपरोक्त स्थितियों को निर्मित करने में अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं -
1 यदि घर का पूर्व और आग्नेय निचले हों और वायव्य तथा पश्चिम ऊंचे हों तो प्लाट के मालिक की कईयों से दुश्मनी होती है। इस कारण कोर्ट-कचहरी होती है, जिससे उसे मानसिक व्यथाओं का सामना करना पड़ता है।
2 यदि घर के आग्नेय की ओर ऊंचाई हो और भूमिगत पानी स्रोत, कुंआ, टंकी, बोरिंग, चेम्बर, नाली इत्यादि पूर्व और आग्नेय के बीच में या आग्नेय और दक्षिण के बीच में हो तो शत्रु से परेशानी होती है और उनसे विवाद होते हैं जो अदालत तक जाते हैं।
3 जिस भवन के आग्नेय में ऊंचाई और वायव्य में नीचाई हो तो वहां रहने वालों के विरोधियों से विवाद के कारण मुकदमेबाजी चलती है।
4 घर का नैऋत्य कोण निचला होने पर वहां शेड या कमरे आदि का निर्माण करने से आमदनी होने पर भी प्लाट का मालिक सुखमय जीवन नहीं बिता पाता, उसके दुश्मनो की संख्या बढ़ती है और उनसे विवाद चलते रहते हैं।
5 अगर घर का वायव्य कोण निचला हो और वहां कमरा या शेड़ का निर्माण हो या पश्चिम और वायव्य के बीच में या वायव्य और उत्तर के बीच में किए जाएं तो शत्रुता बढ़ती है जिस कारण कोर्ट-कचहरी के चक्कर भी काटने पड़ते हैं।
6 केवल घर के आग्नेय कोण में बढ़ाव होता तो अदालती कार्यवाहियों के कारण परेशानी होती है।
7 यदि दक्षिण के साथ मिलकर घर के आग्नेय कोण में बढ़ाव होता तो परिवारिक झगड़े, बीमारियां, मानसिक व्यथा, अशान्ति और धन नष्ट होगें कई बार पारिवारिक झगड़े अदालत तक पहुंच जाते हैं।
8 अगर घर के वायव्य में केवल कोने में बढ़ाव होता तो दुश्मनों की संख्या बढ़ जाएगी। दुश्मनों से विवाद होने के कारण सुख का अभाव होता है और परिवार के सम्मान में कमी होती है।
9 घर की दक्षिण दिशा स्थित द्वार यदि आग्नेय कोण को देखें तो उस घर में चोरी होने के सम्भावना रहती है जिस कारण कोर्ट-कचहरी भी जाना पड़ता है।
10 जिस घर में ईशान से नैऋत्य निम्न हो और वहां भूमिगत पानी का स्रोत कुंआ, टंकी, बोरिंग इत्यादि हो और घर के पानी की निकासी ईशान से नैऋत्य की ओर हो तो उस घर में रहने वालो की अन्य लोगों से दुश्मनी बढ़ेगी और जिद के कारण उन्हें अदालत के चक्कर काटने पडेंगे, जिससे उनका धन नष्ट होगा।
11 घर का केवल उत्तर वायव्य कोण बढ़ा हो तो अदालती कार्यवाही, अग्निभय एवं चोरी की सम्भावना बनी रहती है।
12 यदि घर का वायव्य कोण ईशान से निम्न हो और साथ ही भूमिगत पानी स्रोत या गड्ढे भी हों तो घरवाले अदालती कार्यवाही से जूझते रहेंगे।
13 जिन घरों में पूजा घरों में साफ-सफाई नहीं रहती वहां अंधेरा रहता है या घर का कबाड़ पड़ा रहता है उन घरों में रहने वालों को शत्रुओं से समस्याएं रहती हैं, इस कारण विवाद होते रहते हैं।
14 जिस घर में स्टोर रूम या गोडाऊन अन्य कमरों की तुलना में बड़े रहते हैं, साथ ही वहां पर अंधेरा भी रहता हो तो वहां रहने वाले कुछ इस तरह के बेवकूफों जैसे कार्य करते हैं कि उनकी लोगों के साथ शत्रुता हो जाती है जो विवाद का कारण बनती है।
15 कई मकान बहुत सुंदर होते हैं, किन्तु उनकी कम्पाउण्ड वाल, सिक्यूरिटी का कमरा या घर का कोई कोना टूटा-फूटा हो, रंग-रोगन निकला हुआ हो, किसी तरह खराब हालत में हो तो यह तय है कि ऐसे घरों में रहने वालों को शत्रु परेशान करते हैं।
विवाद पैदा होते हैं।
उपरोक्त वास्तुदोषों को दूर करके विवादों से और कोर्ट-कचहरी के चक्कर से बचा जा सकता है।