शनिवार, 18 अप्रैल 2015

Shani Amavasya,

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आज 18 अप्रैल 2015 शनि अमावस : Shani Amavasya, Today, 18 april 2015 : 
(Please also see English version, below)
शनिवार दिनांक 18.04.2015 को अमावस्या तिथि पड़ रही है। शास्त्रानुसार शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या तिथि को शनि अमावास्य और शनैश्चरी अमावस्‍या कहकर भी पुकारा जाता है। शास्त्रानुसार शनिदेव का जन्म अमावस्या तिथि के दिन हुआ था। अतः अमावस्या तिथि शनिदेव को अत्यधिक प्रिय है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार किसी भी माह शनि के दिन अमावस्या तिथि पड़ने पर उसे शनि अमावस्या की संज्ञा दी जाती है।
वर्त्तमान गोचर के अनुसार सूर्यदेव अपनी उच्च राशि मेष में हैं तथा शनिवार दिनांक 18.04.2015 को चंद्रदेव भी मेष राशि मे प्रवेश करेंगे जिससे शनि अमावस्या का शुभ संयोग बनेगा। वर्त्तमान में शनिदेव मंगल की राशि वृश्चिक में गोचर कर रहे हैं तथा अपने ही नक्षत्र अनुराधा को भोग रहे हैं। शनैश्चरी अमावस्‍या का दिन शनि के कष्टों से मुक्ति पाने हेतु सर्वश्रेष्ठ है।
शनैश्चरी अमावस्या का महत्तव-
शनैश्चरी अमावस्या को न्याय के देवता शनिदेव जी का दिन माना गया है। इस दिन शनिदेव जी की पूजा विशेष रुप से की जाती है। जिन जातकों की जन्म कुंडली या राशियों पर शनि की साढ़ेसाती और ढैया का असर होता है, उनके लिये शनैश्चरी अमावस्या एक बहुत ही महत्तवपूर्ण अवसर है क्योंकि शनैश्चरी अमावस्या के अवसर शनि जी की पूजा-अर्चना करने पर शांति व अच्छे भाग्य की प्राप्ति होती है। शनैश्चरी अमावस्या के दिन भक्त विशेष अनुष्ठान आयोजित कर पितृदोष और कालसर्प दोष से भी मुक्ति पा सकते है। शनिश्चरी अमावस्या के अवसर पर सुंदरकांड, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान अष्टक आदि का पाठ करने से भी शनि ग्रह के प्रभाव से शांति मिलती है। इसके अलावा शनैश्चरी अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
शनिदेव से जुड़ी पौराणिक कथा -
मनुष्यों और देवताओं में शनिदेव को अपनी क्रूर और टेढ़ी नजर से आहत करने वाले देवता के रुप में जाना जाता है। लेकिन परम तपस्वी और योगी मुनि पिप्पलाद की दिव्य और तेजोमयी नजरों के सामलने शनिदेव जी एक क्षण भी खड़े नहीं रह सके और विकलांग होकर धरती पर गिर पड़े। शनि को इस प्रकार असहाय देखकर ब्रह्मदेव ने मुनि पिप्पलाद को मनाया, तब मुनि पिप्लाद ने मनुष्यों और देवताओं को शनिदेव के कष्टों से छुटकारा दिलाने के लिये शनि मंत्रों और स्तोत्रों की रचना की। इन मंत्रों और स्त्रोत का पाठ करने से शनि के अशुभ असर और कोप से बचाव होता है।
नमस्ते कोणसंस्थय पिङ्गलाय नमोस्तुते।
नमस्ते बभ्रुरूपाय कृष्णाय च नमोस्तु ते॥
नमस्ते रौद्र देहाय नमस्ते चान्तकाय च।
नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभो॥
नमस्ते यमदसंज्ञाय शनैश्वर नमोस्तुते॥
Shani Amavasya is also known as Shashchari Amavasya. According to our scriptures, Amavasya's holds significance on Saturdays. Performing some religious practices during this yog returns fruitful and auspicious results. These practices are helpful in removing flaws in one's kundli.
Persons going through the main and sub period of Shani, Rahu, Ketu(mahadasha and antardasha) are suggested to conduct the Shani Amavasya Puja and Daan so that quantum of suffering or debt is reduced.
The following are shani doshas for which each individual requires immediate remedy to get relief from the suffering and agony created during these doshas.:
Period of malefic shani(mahadasa or antardasa)
Period of shani sade sati
Period of shani dhaiya
Shani gayatri Mantra :
Aum Sanaischaraya Vidmahe,
Sooryaputraya Dheemahi,
Tanno Manda Prachodayat.
At present w.e.f 2nd nov 2014 shani sade sati is going on the rashi of Tula (Libra), Vrischika (Scorpio) and Dhanu (Sagittarius) whereas shani dhaiya on mesha (Aries) and Singh (Leo) rashi. The persons of these rashis are advised to go for the shani dosha remedies immediately.
- Donate these items:
In order to get auspicious results, one should donate black cow. Black cloth, urad daal, black sesame (til), black leather shoes or sippers, salt, mustard oil or can even donate grains.
You can also donate an iron utensil filled with rice. Donate as per your suitability and wish.
- Keep in mind these things while donating:
Shani daan should be made only on Saturday. One should only donate to a needy person.
- Offer these 7 things to Shani Dev on Saturday:
Offer mustard oil, akshat (rice), black urad, black til, black cloth, eatables cooked in oil.
धार्मिक शास्त्रों में शनि अमावस्या का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन किए गए उपाय शीघ्र ही शुभ फल प्रदान करते हैं। जन्मकुंडली के कई दोषों का असर इन उपायों से कम हो सकता है। वर्त्तमान में मेष व सिंह राशि पर शनि की ढैया चल रही है तथा तुला, वृश्चिक और धनु राशि पर शनि की साढ़ेसाती विद्यमान है अथवा जिस किसी की कुंडली में शनि की महादशा व अंतर्दशा चल रही है अथवा जिनको शनि के कारण कष्ट झेलने पड़ रहे हैं उनके लिए यह कष्टों से मुक्ति पाने का महत्वपूर्ण अवसर है। इस अवसर पर शनिदेव की पूजा-अर्चना, दान-उपाय करने पर शांति व अच्छे भाग्य की प्राप्ति होती है। 
1. सामर्थ्यानुसार शनि मंदिर में सरसों का तेल, साबुत काले उड़द, काले तिल, लौंग, लोहबान, मूंगफली, कागज़ी बादाम और नारियल चढ़ाएं।
2. सामर्थ्यानुसार किसी मज़दूर को काला छाता और काले चमड़े के जूते-चप्पल दान करें। 
3. बरगद के पेड़ की जड़ में गाय का कच्चा दूध चढ़ाकर उस मिट्टी से तिलक करें। 
4. गुड-उड़द से बने पुए को सरसों के तेल में तल कर भैंसों को खिलाएं।
5. किसी साधु-संयासी को लोहे का तवा या अंगीठी दान करें।
6. तेल चुपड़ी रोटी काले कुत्ते को खिलाएं।
7. काली गाय को कचोड़ी खिलाएं।
8. गरीब बालकों को रेवड़ियां बाटें।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

ब्रह्मा-विष्णु-महेश का स्वरूप है गुरु

ब्रह्मा-विष्णु-महेश का स्वरूप है गुरु...........
भगवान शिव गुरु गीता में गुरु ज्ञान को महत्वपूर्ण बताते हुए मां पार्वती से कहते हैं "मानव जीवन में जब विकट स्थिति आ जाए, हर सगा-सम्बन्धी साथ छोड़ेगा, परमात्मा भी दूर है- वह दिखाई नहीं देगा, मगर मेरा प्रतिनिधि गुरु कभी अपने शिष्य का साथ नहीं छोड़ेगा। इसलिए गुरु के प्रति अतिशय प्रेम बनाए रखिए। दुनिया के सारे नाते एक सद्गुरु में देखना। सारे संसार के प्रेम को एक सदगुरु में देखना। क्योंकि गुरु आत्मस्वरूप है सब धर्मों का है।
उसे अपने सामने अनुभव करो, जो हमारे हर संकट में साथ है, जो हमें आशीर्वाद देता है और जो गुरुओं का भी परम गुरु है जो पिताओं का भी परमपिता है, जो माताओं की भी परममाता है, सांसारिक माता-पिता को तो एक न एक दिन इंसान को छोड़कर, सब बंधन तोड़कर चले जाना हैं। लेकिन जो हर देश में हर वेश में, हर काल में, हर स्थिति में साथ देता है, उसके साथ हमारा नाता जोड़ने वाला परम का स्वरूप सद्गुरु होता है।
विश्वविख्यात गुरुभक्त रबिया बसरी ने भी गुरु महत्व के विषय में यही गाया ' हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर। अर्थात् किसी व्यक्ति से यदि हरि रूठ जाएं, तो पूरा संसार उसके विपरीत गति करने लगता है, उससे उसका भाग्य रूठ जाता है। उसी समय यदि उस अभागे को सद्गुरु की दीक्षा की प्राप्ति हो जाए तथा सद्गुरु उस पर अपनी कृपा बनाए रखें तो पुनः हरि को मनाने का मार्ग मिल जाता है। अर्थात् सद्गुरु का संबल उसे तार देता है।
परन्तु यदि किसी का गुरु ही उससे रूठ जाए तब मनुष्य के पास कोई आश्रय नहीं बचता, वह व्यक्ति बिना पतवार के दिशाहीन नाव की तरह हो जाता है, जिसका कोई भविष्य नहीं होता। इसलिए धन हाथ से निकल भी जाए तो भी कुंजी संभाले रखना, यही कुंजी फिर से द्वार खोलेगी। कभी गुरु से दूर नहीं होना, गुरु ठुकरा भी दे, रुष्ट भी हो जाए तो भी उसके प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखना।

पिता भी समझाने के लिए बच्चे को डांटता है। पिता जब डांटकर गुस्से से बच्चे को कमरे में बन्द कर देता है, तो मां की ममता रह नहीं पाती और ताला खोल कर बच्चे के प्रति प्यार दिखाती है और पिता भी मां के माध्यम से ही बच्चे को खाना आदि खिला देता है। किन्तु स्वयं बनावटी गुस्सा दिखाता है ताकि बच्चा अपनी गलती सुधार सके। जब पिता डांटता है तो मां बच्चे को समझाती है कि पिता ने भले के लिए ही डांटा है।
मां जब प्यार से बच्चे को समझाती है तो उसके अज्ञान के कपाट बन्द हो जाते हैं और ज्ञान के द्वार खुलते हैं जिससे बच्चा सन्मार्ग पर चलने लगता है। भगवान सुधरने के लिए कठोर होकर दुःख के ताले में जब इंसान को बन्द कर देता है, ताला खोल कर मां की तरह प्यार करने का काम गुरु ही किया करता है। दुनिया के प्रत्येक नाते से ऊपर है वह, किन्तु सारे जहां आकर जुड़ते हैं वह भगवान है। गुरु और शिष्य जब मिलते हैं तो प्रसन्न होते हैं भगवान।
गुरु चोट भी लगाएगा, प्यार भी करेगा और कहेगा, ‘मुझे मान या मत मान, जिसे मानने की जरूरत है उसे अवश्य मान। भगवान शिव ने गुरु को बहुत महत्व दिया। भगवान शिव कहते हैं, हे पार्वती! ब्रह्मा-विष्णु-शिव का स्वरूप है गुरु। गुरु के तीन नेत्र नहीं-फिर भी वह शिव है, चार मुख नहीं फिर भी वह ब्रह्मा है, उसकी चार भुजा नहीं फिर भी वह विष्णु है। ऐसे ब्रह्मा-विष्णु-महेश का स्वरूप है गुरु। अतः गुरु की कही बातों पर विश्वास करके आगे बढें।
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय ।
जय जय श्री राधे।
श्री राधा- कृष्ण की कृपा से आपका दिन मंगलमय हो ।
श्री कृष्ण शरणम ममः

/शनि साढेसाती के तीन चरण :-

दामपत्य जीवन पर शनि देव की नजर होती है अब यदि 7वें भाव मे वो खुद विराजमान हो तो भई जीवन साथी के होते हुए भी लगाव नी होने देता और पहले शादी टलती जाती है एक उम्र भी लग जाती है रिश्ते आते है लेकिन बात नी बनती एक कारण ऐ भी है की जातक काम की वजह से परेशान रहता है अब सप्तम भाव विवाह एवं जीवनसाथी का घर माना जाता है.इस भाव शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है.इस भाव में शनि होने पर व्यक्ति की शादी सामान्य आयु से विलम्ब से होती है.सप्तम भाव में शनि अगर नीच का होता है तब यह संभावना रहती है कि व्यक्ति काम पीड़ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे काफी बड़ा होता है.शनि के साथ सूर्य की युति अगर सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है एवं कलह से घर अशांत रहता है .चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं.अब केतू महाराज लगन मे हो या पाचवे भाव मे शुक्र भी पाप पिडित हो तो सतांन भी नही होती है होके मर भी जाती है या एक होगी तो दूसरी होती नी या मान लो शादी 30-36 मे हुई सतांन सुख उम्र के 42-48 के बीच देता है पहली हो भी गयी तो उसे कोई न कोई तकलीफ जरूर होती है और गुरू राहु भी एक साथ हो या आपस मे देखते हो तो विवाह सुख भोग ही नी पाते ऐ भी देखा गया है एक सतांन हुयी खासतर बेटी तो उसे पिता सुख नी मिल पाता ।/
शनि साढेसाती के तीन चरण :-

शनि साढेसाती (Shani Sade Sati) में शनि तीन राशियों पर गोचर करते है. तीन राशियों पर शनि के गोचर को साढेसाती (Shani Sade Sati) के तीन चरण के नाम से भी जाना जाता है. अलग- अलग राशियों के लिये शनि के ये तीन चरण अलग - अलग फल देते है. शनि कि साढेसाती के नाम से ही लोग भयभीत रहते है.
जिस व्यक्ति को यह मालूम हो जाये की उसकी शनि की साढेसाती चल रही है, वह सुनकर ही व्यक्ति मानसिक दबाव में आ जाता है. आने वाले समय में होने वाली घटनाओं को लेकर तरह-तरह के विचार उसके मन में आने लगते है.
शनि की साढेसाती को लेकर जिस प्रकार के भ्रम देखे जाते है. वास्तव में साढेसाती का रुप वैसा बिल्कुल नहीं है. आईये शनि के चरणों को समझने का प्रयास करते है-
साढेसाती चरण-फल विभिन्न राशियों के लिये
साढेसाती का प्रथम चरण (first step of Shani Sade Sati) - वृ्षभ, सिंह, धनु राशियों के लिये कष्टकारी होता है. द्वितीय चरण या मध्य चरण- मेष, कर्क, सिंह, वृ्श्चिक, मकर राशियों के लिये अनुकुल नहीं माना जाता है. व अन्तिम चरण- मिथुन, कर्क, तुला, वृ्श्चिक, मीन राशि के लिये कष्टकारी माना जाता है.
इसके अतिरिक्त तीनों चरणों के लिये शनि की साढेसाती निम्न रुप से प्रभाव डाल सकती है-
प्रथम चरण :-
इस चरणावधि में व्यक्ति की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है. आय की तुलना में व्यय अधिक होते है. विचारें गये कार्य बिना बाधाओं के पूरे नहीं होते है. धन विषयों के कारण अनेक योजनाएं आरम्भ नहीं हो पाती है. अचानक से धन हानि होती है. व्यक्ति को निद्रा में कमी का रोग हो सकता है. स्वास्थय में कमी के योग भी बनते है. विदेश भ्रमण के कार्यक्रम बनकर -बिगडते रह्ते है. यह अवधि व्यक्ति की दादी के लिये विशेष कष्टकारी सिद्ध होती है. मानसिक चिन्ताओं में वृ्द्धि होना सामान्य बात हो जाती है. दांम्पय जीवन में बहुत से कठिनाई आती है. मेहनत के अनुसार लाभ नहीं मिल पाते है.
द्वितीय चरण :-
व्यक्ति को शनि साढेसाती की इस अवधि में पारिवारिक तथा व्यवसायिक जीवन में अनेक उतार-चढाव आते है. उसे संबन्धियों से भी कष्ट होते है. व्यक्ति को अपने संबन्धियों से कष्ट प्राप्त होते है. उसे लम्बी यात्राओं पर जाना पड सकता है. घर -परिवार से दूर रहना पड सकता है. व्यक्ति के रोगों में वृ्द्धि हो सकती है. संपति से संम्बन्धित मामले परेशान कर सकते है.
मित्रों का सहयोग समय पर नहीं मिल पाता है. कार्यो के बार-बार बाधित होने के कारण व्यक्ति के मन में निराशा के भाव आते है. कार्यो को पूर्ण करने के लिये सामान्य से अधिक प्रयास करने पडते है. आर्थिक परेशानियां भी बनी रह सकती है.
तीसरा चरण :-
शनि साढेसाती के तीसरे चरण में व्यक्ति के भौतिक सुखों में कमी होती है. उसके अधिकारों में कमी होती है. आय की तुलना में व्यय अधिक होते है. स्वास्थय संबन्धी परेशानियां आती है. परिवार में शुभ कार्यो बाधित होकर पूरे होते है. वाद-विवाद के योग बनते है. संतान से विचारों में मतभेद उत्पन्न होते है. संक्षेप में यह अवधि व्यक्ति के लिये कल्याण कारी नहीं रह्ती है. जिस व्यक्ति की जन्म राशि पर शनि की साढेसाती का तीसरा चरण चल रहा हों, उस व्यक्ति को वाद-विवादों से बचके रहना चाहिए.

पीडित् चन्द्र करता है मन को अवसाद ग्रस्त

*****पीडित् चन्द्र करता है मन को अवसाद ग्रस्त**************
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आधुनिक भागदौड के इस जीवन में कभी न कभी हर व्यक्ति डिप्रेशन अर्थात अवसाद का शिकार हो ही जाता है।. डिप्रेशन आज इतना आम हो चुका है कि लोग इसे बीमारी के तौर पर नहीं लेते और नजरअंदाज कर देते हैं। किन्तु ऎसा करने का परिणाम कभी कभी बहुत ही बुरा हो सकता है।


डिप्रेशन मानसिक लक्षणों के अतिरिक्त शारीरिक लक्षण प्रकट करता है,जिनमे छाती में दर्द,दिल की धडकन में तेजी,कमजोरी,आलस और शिरोव्यथा(सिर दर्द) सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का मन किसी काम-धंधे में नहीं लगता,उसके स्वभाव में चिडचिडापन आ जाता है,उदासी रहने लगती है और वह शारीरिक स्तर पर भी थका थका सा अनुभव करता है। वैसे तो यह बीमारी किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को कभी भी हो सकती है,किन्तु अनुभव सिद्ध है कि बहुधा इस रोग से पीडित किशोरावस्था के जातक तथा स्त्रियां अधिक होती हैं.कारण,कि इस रोग का केद्रबिन्दु मन हैं ओर मन भावुक व्यक्ति को अपनी चपेट में जल्दी लेता है।जैसा कि आप सब लोग जानते ही हैं कि स्त्रियों को सृ्ष्टि नें पुरूषों की तुलना में अधिक भावनात्मक बनाया है (परन्तु आधुनिक परिवेश में देखा जाए तो इसका भी अपवाद है,इसी समाज में आपको ऎसी भी स्त्रियां देखने को मिल जाएंगी जो कि निर्दयता में हिंसक जीवों को भी पीछे छोड दें) दूसरा,किशोरावस्था के जातक इस रोग की चपेट में अधिक आते हैं, क्यों कि उनका मन अपने आगामी भविष्य के अकल्पनीय स्वपन संजोने लगता है। स्वपनों की असीमित उडान के पश्चात जब यथार्थ के ठोस धरातल से उनका सामना होता है तो मन अवसादग्रस्त होने लगता है।
डिप्रेशन जैसे मानसिक रोगों का केन्द्रबिन्दु मन है। मन जो कि शरीर का बहुत ही सूक्ष्म अव्यव होता है,लेकिन आन्तरिक एवं बाह्य सभी प्रकार की क्रियायों को यही प्रभावित करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अवसाद(डिप्रेशन)मूल रूप से मस्तिष्क में रसायनिक स्त्राव के असंतुलन के कारण होता है,किन्तु वैदिक ज्योतिष अनुसार इस रोग का दाता, मन को संचालित करने वाला ग्रह चन्द्रमा तथा व्यक्ति की जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव के स्वामी को माना जाता है। अगर चंद्रमा या चतुर्थेश नीच राशी में स्थित हो, अथवा षष्ठेश के साथ युति हो,या फिर राहू या केतु के साथ युति होकर कुंडली में ग्रहण योग निर्मित हो रहा हो तो इस रोग की उत्पति होती है।
इस रोग से पीडित व्यक्ति का सबसे पहले तो वातावरण परिवर्तित कर देना चाहिए,लेकिन यह समझ लेना गलत होगा कि सिर्फ वातावरण के परिवर्तन से रोग मुक्ति संभव है। इसके अतिरिक्त उसके आत्मविश्वास को जगाने का प्रयास करते रहना चाहिए, साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सुझाव तथा उपाए भी इसके निवारणार्थ यहां दिए जा रहे हैं;—–
1.रोगी को चांदी के पात्र (गिलास आदि) में जल,शर्बत इत्यादि शीतल पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
2.सोमवार तथा पूर्णिमा की रात्री को चावल,दूध,मिश्री,चीनी,खीर,सफेद वस्त्र,चांदी इत्यादि वस्तुओं
का दान करना चाहिए।
3.आशावादी बनें। प्रत्येक स्थिति में आशावादी दृ्ष्टिकोण अपनाऎं। अपनी असफलताओं को नहीं वरन सफलताओं को याद करें।
4.एकांत में न रहें। बाहर निकले,दूसरों से मेलजोल बढाएं और उनमें दिलचस्पी लें।
5.कभी भी खाली न बैठे क्यों कि अगर आप खाली बैठेंगे तो मन को अपनी उडान भरने का समय मिलेगा,जिससे भांती भांती के कुविचार उत्पन होने लगेंगे।
6.हो सके तो बेहतर मनोंरंजक साहित्य पढें,सिद्ध पुरूषों के प्रवचन सुनें,व्यायाम-योग-ध्यान साधना इत्यादि विधियों को अपनाऎं।
उपरोक्त उपायों एवं सुझावों को अपनाएं तथा अपने घर परिवार,समाज के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें,दूसरों की खुशियों में अपने लिए खुशियां ढूंढने का प्रयास करें……….जिससे आपका जीवन भी खुशियों से महके उठे।

..शुभमस्तु……………………..कल्याणमस्तु

मगंल दोष

मगंल दोष से सभी वाकिफ है और इसका असर भी सबको मालूम है लेकिन इस दोष से डराया भी बहुत जाता है मागंलिक होना हर समय अशुभ नी होता मगंल के साथ शुभ ग्रह हो तो मागलिक दोष कम तथा भगं भी हो जाता है यानी मगंल के साथ गुरू हो तो यह भगं हो जाता है फिर देखते कैसे फल मे होता है



जब मंगल कुंडली के 1, 4, 7, 8 या 12 वें स्थान पर हो तो यह एक मंगल दोष है और ऐसे जातक को मांगलिक कहा जाता है। हमारे समाज में मंगल दोष की उपस्थिति एक बहुत बड़ा डर या भ्रम बन गया है। यहां तक की ज्योतिष की लिखी हुई पुरानी किताबों में भी मंगल दोष के बारे में मतभेद हैं, क्या क्या अपवाद उपलब्ध हैं और निवारण के उपाय क्या हैं। जो भी हो मंगल दोष को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह वैवाहिक जीवन में समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए विवाह से पहले मंगल दोष के लिए कुंडली मिलाना अनिवार्य है। यह भी जरुरी है कि कुंडली का विश्लेषण करें और यह पता लगाएं कि कुंडली में मंगल दोष है या नहीं।
यदि मंगल 1ले भाव में रख कर 4, 7 और 8 भाव पर दृष्टि करता है। तो १ हाउस व्यक्ति के चरित्र व को दर्शाता है। इस कारण से व्यक्ति बहुत आवेगी और तुरंत गुस्सा करनेवाला हो सकता है। मंगल से दृष्ट 4 थां भाव ,घर, गाड़ी, अग्नि, रसायन या बिजली से दुर्घटना को दर्शाता है। दृष्ट 7 वें भाव में वैवाहिक जीवन में बाधायें आती हैं। 8 वें भाव में होने से भयंकर दुर्घटना हो सकती है। इस प्रकार लग्न में मंगल का बैठना अशुभ माना जाता है।
यदि मंगल 4 थें भाव में बैठा है तो यह 4 के साथ 7, 10 और 11 को भी प्रभावित करेगा। हमने 4 और 7 के प्रभावित प्रभावों को देखा है। प्रभावित 10वां भाव व्यवसाय में तेजी से बदलाव, अनिद्रा और पिता से तनाव का कारण हो सकता है। 11 वें भाव के प्रभावित होने से चोरी या दुर्घटना में हानि हो सकती है। इसलिए 4 थे भाव में मंगल बहुत अच्छा नहीं है।
यदि मंगल 7 वें भाव में हो तो यह 10, 1 और2 को प्रभावित करता है। 7वां भाव वैवाहिक जीवन और जीवनसाथी का स्थान होता है। इसलिए यहां मंगल का होना वैवाहिक जीवन में कठिनाइयों का सूचक है। 2 रे भाव में मंगल पारिवारिक सदस्यों के बीच विवाद पैदा करता है। मतभेद के कारण परिवार में ख़ुशी की कमी और समस्याएं आ सकती हैं। पैसे खो सकते हैं या खर्च की अधिकता हो सकती है। इसलिए 7 वें भाव में मंगल कठिनाइयों को बढ़ा सकता है।
यदि मंगल 8 वें घर में बैठा है तो यह 11, 2 और 3 को प्रभावित करेगा। व्यक्ति आग, रसायन या बिजली से जानलेवा दुर्घटना का शिकार हो सकता है। यदि 3रां घर मंगल से दृष्ट है तो भाई बहन में तनाव होता है। यह व्यक्ति को बहुत कठोर और हठी बना देता है। इसलिए 8 वें घर में मंगल का होना अच्छा नहीं है।
अगर मंगल 12 वें भाव में हो तो यह 3, 6 और 7 भाव को प्रभावित करता है। 12 वां भाव व्यक्ति की आदतों को दर्शाता है। इससे व्यक्ति खर्च की अधिकता के बोझ तले दब जाता है। व्यक्ति को हाइपर टेंशन के साथ ही पेट से जुड़ी और खून से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए 12 हाउस में मंगल का होना भी अशुभ है। इसलिए सबसे अधिक दामपत्य जीवन मे मगंल को प्रभावी माना गया है

विगत कई पोस्टो मे मैने उपाय दिए है । अछे जोतिर विद से सलाह लेके ही मगंल की स्थतिनुसार उपाय करे ।/

/शनि देव के भाव के अनुसार उपाय

/शनि देव के भाव के अनुसार उपाय

यदि शनि आपकी कुंडली के पहले भाव में है तो कारोबार चलाने के लिय काला सुरमा वीरान जगह जाकर दबाय । तवा अंगीढ़ी किसी साधु को दान करे ।
दूसरे घर में है तो 43 दिन लगातार मन्दिर में नंगे पैर जाकर अपने अपराधों की छमा मांगे । माथे पर तैल न लगाय ।
तीसरे घर में है तो घर की दहलीज को लोहे की किल से किल दें ।शराब मांस का प्रयोग न करे ।आंखो की दवाई का दान करे ।
चोथे घर में है तो कुवे में दूध गीराय ।bussiness क लिय मछलियों को चावल खिलाय । शराब पराइ औरत से दूर रहे ।
पांचवे घर में है तो एक मुठि बादाम मन्दिर मे चढ़ाकर उसमे से आधे घर में लाकर रखे औलाद सही रहेगी । घर में सोना चांदी तम्बा एक स्थान पर कायम करे ।
छटे घर में है तो बीमारी क समय तैल से भरे बर्तन में अपना मुँह देखकर उसे खड़े पानी मे दबाय । जन्मदिन पर चमड़े क जूते मशीन नय घर पर न लाय ।
यदि 7 भाव में है तो कारोबार क लिय काली बांसुरी में खंड भरकर वीरान जगह दबाय। साझेदारी में काम न करे ।
।
8 भाव में है तो नहाने क पानी में थोड़ा ददुध डालकर नहाय । पैर क नीचे लकड़ी रखे । चांदी पहने ।
9 भाव में है तो घर की छत् पर ईंधन और कबाड़ न रखे । गुरु गढ़ की वस्तुए जैसे चने की दाल मन्दिर में देने से लाभ होगा ।
10वे भाव में है तो एक जगह टिक कर काम करे । दुसरो का आदर करे । काम की मण्दी हालत में दाडि मुछ क बाल कम रखे ।
।
11वे है तो 43 दिन लगातार शराब भूमि पर गीराय । बाहर जाते समय पानी से भरा घड़ा सामने रखे ।चांदी क गिलास में पानी पिय ।
12वें में है तो घर की अंधेरी कोढ़रि मे प्रकाश की व्यवस्था न करे । 12 बादाम काले वस्त्र में बांधकर उस कोढ़री के दक्षिण कोने में रखे ।

नोट ये सभी लाल किताब क उपाय है। लाल किताब में लग्न का कोई चक्कर नही होता । आपका कोई भी लग्न हो आप ये उपाय कर सकते हो 

12 ज्योतिर्लिंगों में एक : रामेश्वरम तीर्थ

12 ज्योतिर्लिंगों में एक :
रामेश्वरम तीर्थ
रामेश्वरम हिंदुओं का एक पवित्र तीर्थ है। यह तमिल नाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। यह तीर्थ हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। इसके अलावा यहां स्थापित शिवलिंग बारह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।भारत के उत्तर मे काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है। रामेश्वरम चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण-पूर्व में है। यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार द्वीप है। बहुत पहले यह द्वीप भारत की मुख्य भूमि के साथ जुड़ा हुआ था, परन्तु बाद में सागर की लहरों ने इस मिलाने वाली कड़ी को काट डाला, जिससे वह चारों ओर पानी से घिरकर टापू बन गया। यहां भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व एक पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिसपर चढ़कर वानर सेना लंका पहुंची व वहां विजय पाई। बाद में राम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुषकोटि नामक स्थान पर यह सेतु तोड़ दिया था। आज भी इस ३० मील (४८ कि.मी) लंबे आदि-सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देते हैं। यहां के मंदिर के तीसरे प्राकार का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है।
रामेश्वरम पहुंचने वाला पुल
जिस स्थान पर यह टापु मुख्य भूमि से जुड़ा हुआ था, वहां इस समय ढाई मील चौड़ी एक खाड़ी है। शुरू में इस खाड़ी को नावों से पार किया जाता था। बताया जाता है, कि बहुत पहले धनुष्कोटि से मन्नार द्वीप तक पैदल चलकर भी लोग जाते थे। लेकिन १४८० ई में एक चक्रवाती तूफान ने इसे तोड़ दिया। में आज से लगभग चार सौ वर्ष पहले कृष्णप्पनायकन नाम के एक राजा ने उसे पर पत्थर का बहुत बड़ा पुल बनवाया। अंग्रेजो के आने के बाद उस पुल की जगह पर रेल का पुल बनाने का विचार हुआ। उस समय तक पुराना पत्थर का पुल लहरों की टक्कर से हिलकर टूट चुका था। एक जर्मन इंजीनियर की मदद से उस टूटे पुल का रेल का एक सुंदर पुल बनवाया गया। इस समय यही पुल रामेश्वरम् को भारत से रेल सेवा द्वारा जोड़ता है। यह पुल पहले बीच में से जहाजों के निकलने के लिए खुला करता था। (देखें:चित्र) इस स्थान पर दक्षिण से उत्तर की और हिंद महासागर का पानी बहता दिखाई देता है। उथले सागर एवं संकरे जलडमरूमध्य के कारण समुद्र में लहरे बहुत कम होती है। शांत बहाव को देखकर यात्रियों को ऐसा लगता है, मानो वह किसी बड़ी नदी को पार कर रहे हों।
निर्माण काल
रामेश्वरम् से दक्षिण में कन्याकुमारी नामक प्रसिद्ध तीर्थ है। रत्नाकर कहलानेवाली बंगाल की खाडी यहीं पर हिंद महासागर से मिलती है। रामेश्वरम् और सेतु बहुत प्राचीन है। परंतु रामनाथ का मंदिर उतना पुराना नहीं है। दक्षिण के कुछ और मंदिर डेढ़-दो हजार साल पहले के बने है, जबकि रामनाथ के मंदिर को बने अभी कुल आठ सौ वर्ष से भी कम हुए है। इस मंदिर के बहुत से भाग पचास-साठ साल पहले के है।
रामेश्वरम का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है। यह उत्तर-दक्षिणमें १९७ मी. एवं पूर्व-पश्चिम १३३ मी. है। इसके परकोटे की चौड़ाई ६ मी. तथ ऊंचाई ९ मी. है। मंदिर के प्रवेशद्वार का गोपुरम ३८.४ मी. ऊंचा है। यह मंदिर लगभग ६ हेक्टेयर में बना हुआ है।
मंदिर में विशालाक्षी जी के गर्भ-गृह के निकट ही नौ ज्योतिर्लिंग हैं, जो लंकापति विभीषण द्वारा स्थापित बताए जाते हैं। रामनाथ के मंदिर में जो ताम्रपट है, उनसे पता चलता है कि ११७३ ईस्वी में श्रीलंका के राजा पराक्रम बाहु ने मूल लिंग वाले गर्भगृह का निर्माण करवाया था। उस मंदिर में अकेले शिवलिंग की स्थापना की गई थी। देवी की मूर्ति नहीं रखी गई थी, इस कारण वह नि:संगेश्वर का मंदिर कहलाया। यही मूल मंदिर आगे चलकर वर्तमान दशा को पहुंचा है।
बाद में पंद्रहवीं शताब्दी में राजा उडैयान सेतुपति और निकटस्थ नागूर निवासी वैश्य ने १४५० में इसका ७८ फीट ऊंचा गोपुरम निर्माण करवाया था। बाद में मदुरई के एक देवी-भक्त ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। सोलहवीं शताब्दी में दक्षिणी भाग के द्वितीय परकोटे की दीवार का निर्माण तिरुमलय सेतुपति ने करवाया था। इनकी व इनके पुत्र की मूर्ति द्वार पर भी विराजमान है। इसी शताब्दी में मदुरई के राजा विश्वनाथ नायक के एक अधीनस्थ राजा उडैयन सेतुपति कट्टत्तेश्वर ने नंदी मण्डप आदि निर्माण करवाए। नंदी मण्डप २२ फीट लंबा, १२ फीट चौड़ा व १७ फीट ऊंचा है। रामनाथ के मंदिर के साथ सेतुमाधव का मंदिर आज से पांच सौ वर्ष पहले रामनाथपुरम् के राजा उडैयान सेतुपति और एक धनी वैश्य ने मिलकर बनवाया था।
सत्रहवीं शताब्दी में दलवाय सेतुपति ने पूर्वी गोपुरम आरंभ किया। १८वीं शताब्दी में रविविजय सेतुपति ने देवी-देवताओं के शयन-गृह व एक मंडप बनवाया। बाद में मुत्तु रामलिंग सेतुपति ने बाहरी परकोटे का निर्माण करवाया। १८९७ – १९०४ के बीच मध्य देवकोट्टई से एक परिवार ने १२६ फीट ऊंचा नौ द्वार सहित पूर्वीगोपुरम निर्माण करवाया। इसी परिवार ने १९०७-१९२५ में गर्भ-गृह की मरम्मत करवाई। बाद में इन्होंने १९४७ में महाकुम्भाभिषेक भी करवाया।
स्थापत्य

रामेश्वरम् का मंदिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुंदर नमूना है। इसके प्रवेश-द्वार चालीस फीट ऊंचा है। प्राकार में और मंदिर के अंदर सैकड़ौ विशाल खंभें है, जो देखने में एक-जैसे लगते है ; परंतु पास जाकर जरा बारीकी से देखा जाय तो मालूम होगा कि हर खंभे पर बेल-बूटे की अलग-अलग कारीगरी है।
रामनाथ की मूर्ति के चारों और परिक्रमा करने के लिए तीन प्राकार बने हुए है। इनमें तीसरा प्राकार सौ साल पहले पूरा हुआ। इस प्राकार की लंबाई चार सौ फुट से अधिक है। दोनों और पांच फुट ऊंचा और करीब आठ फुट चौड़ा चबूतरा बना हुआ है। चबूतरों के एक ओर पत्थर के बड़े-बड़े खंभो की लम्बी कतारे खड़ी है। प्राकार के एक सिरे पर खडे होकर देखने पर ऐसा लगता है मारो सैकड़ों तोरण-द्वार का स्वागत करने के लिए बनाए गये है। इन खंभों की अद्भुत कारीगरी देखकर विदेशी भी दंग रह जाते है। यहां का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है।
रामनाथ के मंदिर के चारों और दूर तक कोई पहाड़ नहीं है, जहां से पत्थर आसानी से लाये जा सकें। गंधमादन पर्वत तो नाममात्र का है। यह वास्तव में एक टीला है और उसमें से एक विशाल मंदिर के लिए जरूरी पत्थर नहीं निकल सकते। रामेश्वरम् के मंदिर में जो कई लाख टन के पत्थर लगे है, वे सब बहुत दूर-दूर से नावों में लादकर लाये गये है। रामनाथ जी के मंदिर के भीतरी भाग में एक तरह का चिकना काला पत्थर लगा है। कहते है, ये सब पत्थर लंका से लाये गये थे।
रामेश्वरम् के विशाल मंदिर को बनवाने और उसकी रक्षा करने में रामनाथपुरम् नामक छोटी रियासत के राजाओं का बड़ा हाथ रहा। अब तो यह रियासत तमिल नाडु राज्य में मिल गई हैं। रामनाथपुरम् के राजभवन में एक पुराना काला पत्थर रखा हुआ है। कहा जाता है, यह पत्थर राम ने केवटराज को राजतिलक के समय उसके चिह्न के रूप में दिया था। रामेश्वरम् की यात्रा करने वाले लोग इस काले पत्थर को देखने के लिए रामनाथपुरम् जाते है। रामनाथपुरम् रामेश्वरम् से लगभग तैंतीस मील दूर है।
कथा

रामेश्वरम् के विख्यात मंदिर की स्थापना के बारें में यह रोचक कहानी कही जाती है। सीताजी को छुड़ाने के लिए राम ने लंका पर चढ़ाई की थी। उन्होने लड़ाई के बिना सीताजी को छुड़वाने का बहुत प्रयत्न किया, पर जब राम सफलता न मिली तो विवश होकर उन्होने युद्ध किया। इस युद्ध में रावण और उसके सब साथी राक्षस मारे गये। रावण भी मारा गया; और अन्ततः सीताजी को मुक्त कराकर श्रीराम वापस लौटे। इस युद्ध हेतु राम को वानर सेना सहित सागर पार करना था, जो अत्यधिक कठिन कार्य था।
रावण भी साधारण राक्षस नहीं था। वह पुलस्त्य महर्षि का नाती था। चारों वेदों का जाननेवाला था और था शिवजी का बड़ा भक्त। इस कारण राम को उसे मारने के बाद बड़ा खेद हुआ। ब्रह्मा-हत्या का पाप उन्हें लग गया। इस पाप को धोने के लिए उन्होने रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना करने का निश्चय किया। यह निश्चय करने के बाद श्रीराम ने हनुमान को आज्ञा दी कि काशी जाकर वहां से एक शिवलिंग ले आओ। हनुमान पवन-सुत थे। बड़े वेग से आकाश मार्ग से चल पड़े। लेकिन शिवलिंग की स्थापना की नियत घड़ी पास आ गई। हनुमान का कहीं पता न था। जब सीताजी ने देखा कि हनुमान के लौटने मे देर हो रही है, तो उन्होने समुद्र के किनारे के रेत को मुट्ठी में बांधकर एक शिवलिंग बना दिया। यह देखकर राम बहुत प्रसन्न हुए और नियम समय पर इसी शिवलिंग की स्थापना कर दी। छोटे आकार का सही शिवलिंग रामनाथ कहलाता है।
बाद में हनुमान के आने पर पहले छोटे प्रतिष्ठित छोटे शिवलिंग के पास ही राम ने काले पत्थर के उस बड़े शिवलिंग को स्थापित कर दिया। ये दोनों शिवलिंग इस तीर्थ के मुख्य मंदिर में आज भी पूजित हैं। यही मुख्य शिवलिंग ज्योतिर्लिंग है।
सेतु का पौराणिक संदर्भ
पूरे भारत, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व एशिया के कई देशों में हर साल दशहरे पर और राम के जीवन पर आधारित सभी तरह के नृत्य-नाटकों में सेतु बंधन का वर्णान किया जाता है। राम के बनाए इस पुल का वर्णन रामायण में तो है ही, महाभारत में भी श्री राम के नल सेतु का जिक्र आया है। कालीदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। अनेक पुराणों में भी श्रीरामसेतु का विवरण आता है। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में इसे एडम्स ब्रिज के साथ-साथ राम सेतु कहा गया है। नासा और भारतीय सेटेलाइट से लिए गए चित्रों में धनुषकोडि से जाफना तक जो एक पतली सी द्वीपों की रेखा दिखती है, उसे ही आज रामसेतु के नाम से जाना जाता है। इसी पुल को बाद में एडम्स ब्रिज का नाम मिला। यह सेतु तब पांच दिनों में ही बन गया था। इसकी लंबाई १०० योजन व चौड़ाई १० योजन थी। इसे बनाने में उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया था।
तीर्थ

रामेश्वरम् शहर और रामनाथजी का प्रसिद्ध मंदिर इस टापू के उत्तर के छोर पर है। टापू के दक्षिणी कोने में धनुषकोटि नामक तीर्थ है, जहां हिंद महासागर से बंगाल की खाड़ी मिलती है। इसी स्थान को सेतुबंध कहते है। लोगों का विश्वास है कि श्रीराम ने लंका पर चढाई करने के लिए समुद्र पर जो सेतु बांधा था, वह इसी स्थान से आरंभ हुआ। इस कारण धनुष-कोटि का धार्मिक महत्व बहुत है। यही से कोलम्बो को जहाज जाते थे। अब यह स्थान चक्रवाती तूफान में बहकर समाप्त हो गया है।
गन्धमादन पर्वत
रामेश्वरम् शहर से करीब डेढ़ मील उत्तर-पूर्व में गंधमादन पर्वत नाम की एक छोटी-सी पहाड़ी है। हनुमानजी ने इसी पर्वत से समुद्र को लांघने के लिए छलांग मारी थी। बाद में राम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए यहीं पर विशाल सेना संगठित की थी। इस पर्वत पर एक सुंदर मंदिर बना हुआ है, जहां श्रीराम के चरण-चिन्हों की पूजा की जाती है। इसे पादुका मंदिर कहते हैं।
रामेश्वरम् की यात्रा करनेवालों को हर जगह राम-कहानी की गूंज सुनाई देती है। रामेश्वरम् के विशाल टापू का चप्पा-चप्पा भूमि राम की कहानी से जुड़ी हुई है। किसी जगह पर राम ने सीता जी की प्यास बुझाने के लिए धनुष की नोंक से कुआं खोदा था, तो कहीं पर उन्होनें सेनानायकों से सलाह की थी। कहीं पर सीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया था तो किसी अन्य स्थान पर श्रीराम ने जटाओं से मुक्ति पायी थी। ऐसी सैकड़ों कहानियां प्रचलित है। यहां राम-सेतु के निर्माण में लगे ऐसे पत्थर भी मिलते हैं, जो पानी पर तैरते हैं। मान्यता अनुसार नल-नील नामक दो वानरों ने उनको मिले वरदान के कारण जिस पाषाण शिला को छूआ, वो पानी पर तैरने लगी और सेतु के काम आयी। एक अन्य मतानुसार ये दोनों सेतु-विद्या जानते थे।
अन्य तीर्थ
यात्रा का रथ
रामेश्वर के मंदिर में जिस प्रकार शिवजी की दो मूर्तियां है, उसी प्रकार देवी पार्वती की भी मूर्तियां अलग-अलग स्थापित की गई है। देवी की एक मूर्ति पर्वतवर्द्धिनी कहलाती है, दूसरी विशालाक्षी। मंदिर के पूर्व द्वार के बाहर हनुमान की एक विशाल मूर्ति अलग मंदिर में स्थापित है।
सेतु माधव
रामेश्वरम् का मंदिर है तो शिवजी का, परन्तु उसके अंदर कई अन्य मंदिर भी है। सेतुमाधव का कहलानेवाले भगवान विष्णु का मंदिर इनमें प्रमुख है।
बाईस कुण्ड
रामनाथ के मंदिर के अंदर और परिसर में अनेक पवित्र तीर्थ है। इनमें प्रधान तीर्थो (जल कुण्ड) की संख्यां चौबीस थी, किंतु दो कुंड सूख गए हैं और अब बाइस शेष हैं। ये वास्तव में मीठे जल के अलग-अलग कुंए है। ‘कोटि तीर्थ’ जैसे एक दो तालाब भी है। इन तीर्थो में स्नान करना बड़ा फलदायक पाप-निवारक समझा जाता है। वैज्ञानिक का कहना है कि इन तीर्थो में अलग-अलग धातुएं मिली हुई है। इस कारण उनमें नहाने से शरीर के रोग दूर हो जाते है और नई ताकत आ जाती है। बाईसवें कुण्ड में पहले २१ का मिला-जुला जल आता है।
विल्लीरणि तीर्थ
रामेश्वरम् के मंदिर के बाहर भी दूर-दूर तक कई तीर्थ है। प्रत्येक तीर्थ के बारें में अलग-अलग कथाएं है। यहां से करीब तीन मील पूर्व में एक गांव है, जिसका नाम तंगचिमडम है। यह गांव रेल मार्ग के किनारे हो बसा है। वहां स्टेशन के पास समुद्र में एक तीर्थकुंड है, जो विल्लूरणि तीर्थ कहलाता है। समुद्र के खारे पानी बीच में से मीठा जल निकलता है, यह बड़े ही अचंभे की बात है। कहा जाता है कि एक बार सीताजी को बड़ी प्यास लगी। पास में समुद्र को छोड़कर और कहीं पानी न था, इसलिए राम ने अपने धनुष की नोक से यह कुंड खोदा था।
तंगचिडम स्टेशन के पास एक जीर्ण मंदिर है। उसे ‘एकांत’ राम का मंदिर कहते है। इस मंदिर के अब जीर्ण-शीर्ण अवशेष ही बाकी हैं। रामनवमी के पर्व पर यहां कुछ रौनक रहती है। बाकी दिनों में बिलकुल सूना रहता है। मंदिर के अंदर श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान और सीता की बहुत ही सुंदर मूर्तिया है। धुर्नधारी राम की एक मूर्ति ऐसी बनाई गई है, मानो वह हाथ मिलाते हुए कोई गंभीर बात कर रहे हो। दूसरी मूर्ति में राम सीताजी की ओर देखकर मंद मुस्कान के साथ कुछ कह रहे है। ये दोनों मूर्तियां बड़ी मनोरम है। यहां सागर में लहरें बिल्कुल नहीं आतीं, इसलिए एकदम शांत रहता है। शायद इसीलिए इस स्थान का नाम एकांत राम है।
कोद्ण्ड स्वामि मंदिर
रामेश्वरम् के टापू के दक्षिण भाग में, समुद्र के किनारे, एक और दर्शनीय मंदिर है। यह मंदिर रमानाथ मंदिर पांच मील दूर पर बना है। यह कोदंड ‘स्वामी को मंदिर’ कहलाता है। कहा जाता है कि विभीषण ने यहीं पर राम की शरण ली थी। रावण-वध के बाद राम ने इसी स्थान पर विभीषण का राजतिलक कराया था। इस मंदिर में राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां देखने योग्य है। विभीषण की भी मूर्ति अलग स्थापित है।
सीता कुण्ड
रामेश्वरम् को घेरे हुए समुद्र में भी कई विशेष स्थान ऐसे बताये जाते है, जहां स्नान करना पाप-मोचक माना जाता है। रामनाथजी के मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने बना हुआ सीताकुंड इनमें मुख्य है। कहा जाता है कि यही वह स्थान है, जहां सीताजी ने अपना सतीत्व सिद्व करने के लिए आग में प्रवेश किया था। सीताजी के ऐसा करते ही आग बुझ गई और अग्नि-कुंड से जल उमड़ आया। वही स्थान अब ‘सीताकुंड’ कहलाता है। यहां पर समुद्र का किनारा आधा गोलाकार है। सागर एकदम शांत है। उसमें लहरें बहुत कम उठती है। इस कारण देखने में वह एक तालाब-सा लगता है। यहां पर बिना किसी खतरें के स्नान किया जा सकता है। यहीं हनुमान कुंड में तैरते हुए पत्थर भी दिखाई देते हैं।
आदि-सेतु
रामेश्वरम् से सात मील दक्षिण में एक स्थान है, जिसे ‘दर्भशयनम्’ कहते है; यहीं पर राम ने पहले समुद्र में सेतु बांधना शुरू किया था। इस कारण यह स्थान आदि सेतु भी कहलाता है।
रामेश्वरम शहर
रामेश्वरम् के समुद्र में तरह-तरह की कोड़ियां, शंख और सीपें मिलती है। कहीं-कहीं सफेद रंग का बड़ियास मूंगा भी मिलता है। रामेश्वरम् केवल धार्मिक महत्व का तीर्थ ही नहीं, प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी दर्शनीय है। मद्रास से रेल-गाड़ी यात्रियों को करीब बाईस घंटे में रामेश्वरम् पहुंचा देती है। रास्ते में पामबन स्टेशन पर गाड़ी बदलनी पड़ती है।

हर-हर महादेव।