शनिवार, 2 सितंबर 2017

भगवान् श्री कृष्ण

👉👉 भगवान् श्री कृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है।
👉 उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है।
👉 राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।
👉 महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।
👉 उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।
👉 बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।
👉 दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है।
👉 गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।
👉 असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।
👉 मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।
👉 गोविन्द या गोपाल में "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है।
👉 श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..
👉 श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।
👉 श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।
👉 श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।।
👉 श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।
👉 दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।
👉 श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी

अनंत चतुर्दशी मुहूर्त्त

🙏 ऊँ भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी के रुप में मनाई जाती है. इस दिन अनन्त भगवान की पूजा करते हैं और संकटों से रक्षा करने वाला अनन्तसूत्रबांधा जाता है.
अनंत चतुर्दशी मुहूर्त्त
भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है. भाद्र शुक्ल चतुर्दशी को अनन्त व्रत किया जाता है. धर्म ग्रंथों के अनुसार यह तिथि सूर्योदय काल में तीन मुहूर्त्त अर्थात 6 घडी़ ग्रह करनी चाहिए यह मुख्य पक्ष होता है. शास्त्रानुसार यह तिथि पूर्वाहरण व्याएवं मध्याह्न व्यापिनी लेनी चाहिए और यह गौण पक्ष होता है. दोनों ही परिस्थितियों में भाद्र शुक्ल चतुर्दी अर्थात अनंत चौदश 5 सितम्बर 2017 को अनन्त व्रत, पूजन और सूत्र बंधन के लिए शास्त्र सम्मत उपयुक्त है. इसके अतिरिक्त यह तिथि सूर्योदय के बाद कम से कम दो मुहूर्त्त अर्थात चार घडी़ विद्यमान हो तो भी ग्रह कि जा सकती है.
अनंत चतुर्दशी कथा
अनंत चतुर्दशी के दिन अनन्त भगवान की पूजा करके संकटों से रक्षा करने वाला अनन्तसूत्रबांधा जाता है. मान्यता है कि जब पाण्डव सारा राज-पाट हारकर वनवास के दुख भोग रहे होते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें अनन्त चतुर्दशी व्रत करने को कहते हैं. श्री कृष्ण के कथन अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ पूरे विधि-विधान से इस व्रत का पालन करते हैं तथा अनन्तसूत्रधारण किया जिसके फलस्वरुप पाण्डवों को अपने समस्त कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है.
अनंत चतुर्दशी पूजा विधि |
अनंत चतुर्दशी के पूजन में व्रतकर्ता को प्रात:स्नान करके व्रत का संकल्प करना चाहिए पूजा घर में कलश स्थापित करना चाहिए, कलश पर भगवान विष्णु का चित्र स्थापित करनी चाहिए इसके पश्चात धागा लें जिस पर चौदह गांठें लगाएं इस प्रकार अनन्तसूत्र(डोरा) तैयार हो जाने पर इसे प्रभु के समक्ष रखें इसके बाद भगवान विष्णु तथा अनंतसूत्र की षोडशोपचार-विधिसे पूजा करनी चाहिए तथा ॐ अनन्तायनम: मंत्र क जाप करना चाहिए. पूजा के पश्चात अनन्तसूत्र मंत्र पढकर स्त्री और पुरुष दोनों को अपने हाथों में अनंत सूत्र बांधना चाहिए और पूजा के बाद व्रत-कथा का श्रवन करें. अनंतसूत्र बांधने लेने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए और दक्षिणा देना चाहिए एवं स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करना चाहिए.
अनंत चतुर्दशी कथा इस प्रकार है सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे सुमन्तु मुनि ने अपनी कन्या का विवाह कौण्डिन्यमुनि से कर देते हैं. उनकी पत्नी शीला अनन्त-व्रत का पालन किया करती थी अत: विवाह उपरांत भी वह अनंत भगवान का पूजन करती है और अनन्तसूत्र बांधती हैं व्रत के प्रभाव से उनका घर धन-धान्य से पूर्ण हो जाता है सदैव सुख सम्पन्नता बनी रहती है. परंतु एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के हाथ में बंधे अनन्तसूत्रपर पडती है सूत्र देखकर उन्हें यह अनुकूल नहीं लगता और वह अपनी पत्नी से इसे अपने हाथ से उतार देने को कहते हैं.
शीला ने विनम्रतापूर्वक उन्हें कहती है कि यह अनंत भगवान का सूत्र है जिसके प्रभाव से उन्हें सुख और ऎश्वर्य की प्राप्ति हुई है परंतु अपने मद में चूर ऋषि उस धागे का अपमान करते हैं और उसे जला देते हैं. इस अपराध के परिणाम स्वरुप उनका सारा सुख समाप्त हो जाता है, दीन-हीन कौण्डिन्य ऋषि अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय करते हैं और अनन्त भगवान से क्षमा याचना करते हैं. वह प्रायश्चित हेतु चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करते हैं, उनके श्रद्ध पूर्वक किए गए व्रत पालन द्वारा भगवान अनंत प्रसन्न हो उन्हें क्षमा कर देते हैं और ऋषि को पुन: ऎश्वर्य एवं सुख की प्राप्ती होती है.
🙏 अनंत भगवान कि जय , जय माता दी 🙏
🙏🌹🌹🌷🌷🌸🌸🌺🌺🌹

सोमवार, 28 अगस्त 2017

HINDUISM:

HINDUISM: The first person who translated Bhagvat Gita in Urdu was Mohammad Meherullah.Later he adopted Hinduism.
The first person who translated Bhagvat Gita in Arabic was a Palestinian named El Fateh Commando.Later he joined Iskcon in Germany and followed Hinduism.
The first person who translated Bhagvat Gita in English was Charles Wiliknos.Later he adopted Hinduism.He even said only Hinduism will survive in the world.

The first person who translated Bhagvat Gita in Hebrew was an Israeli named Bezashition le Fanah.Later he adopted Hinduism in India.
The first person who wrote Bhagvat Gita in Russian language was Novikov.Later he became devotee of Bhagwan Krishna.


Till now 283 intellectuals translated Bhagvat Gita out of which 58 were in Bengali,44 in English,12 German,4 Russian,4 French,13 Spanish,5 Arabic,3 Urdu and in many other world languages.
A funny thing,the person who translated Al Quran in Bengali was Girish Chandra Sen and he didn't convert to Islam as he read Bhagvat Gita before.
Jai Shree Krishna :)
P.S The spelling of names could be wrong,so i beg your pardon in advance.One more thing,the post is for basic knowledge.Any person twisting the context will not be entertained 🙏🙏🙏🙏

भगवान मेरे सामने तो आओ

एक धार्मिक व्यक्ति था, भगवान में उसकी बड़ी श्रद्धा थी.
उसने मन ही मन प्रभु की एक तस्वीर बना रखी थी. एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से कहा- भगवान मुझसे बात करो.
और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना. इसलिए इस बार वह जोर से चिल्लाया,
भगवान मुझसे कुछ बोलो तो और आकाश में घटाएं उमङ़ने घुमड़ने लगी बादलो की गड़गडाहट होने लगी. लेकिन आदमी ने कुछ नहीं सुना.
उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर- नीचे सब तरफ देखा
और बोला, -भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा.
पर उसने देखा ही नही,आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ - तभी एक शिशु का जन्म हुआ और उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया.

अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा - भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहाँ हो, मेरे पास हो,मेरे साथ हो और एक तितिली उड़ते हुए आकर उसके हथेली पर बैठ गयी
लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया, और उदास मन से आगे चला गया. भगवान इतने सारे रूपो में उसके सामने आया,
इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं
शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी.
हम यह तो कहते है कि ईश्वर प्रकृति के कण-कण में है,लेकिन हम उसे किसी और रूप में देखना चाहते ही नही है
इसलिए उसे कही देख ही नहीं पाते.
इसे भक्ति मे दुराग्रह भी कहते है.
भगवन अपने तरीके से आना चाहते है और हम अपने तरीके से देखना चाहते है और बात नहीं बन पाती..!!
बात तभी बनेगी जब हम भगवान को भगवान की आँखों से देखेंगे।
जयजय श्री राधे

#कैसे_56_देशो_में_इस्लाम_फैला

#कैसे_56_देशो_में_इस्लाम_फैला - ईरान 634 -651
632 ईस्वी में मुहम्मद की म्रत्यु हो गयी थी । पूरे अरब प्रायदीप पर मुसलमानो का कब्जा हो गया था । मुहम्मद की भी महत्वकांशा थी, की वो ज़्यादा से ज़्यादा आगे बढ़ता चला जाये । उसकी इन दुष्ट इच्छा को उसके इस्लामी गुंडो ने पूर्ण किया ।

अरब की सीमा से लगता #ईरान था । जिसका #पुराना_नाम #पर्शिया था ।
आज जो ईरानी मुसलमान मुसलमान बनकर ईरान में इस्लामिक शाशन चला रहे है, ईरान में कभी इनके पूर्वजो के साथ क्या हुआ था, यह लोग खुद भी शायद नही जानते, कोई और बताए तो मानने को भी तैयार नही होंगे । ईरान ही वो गैर - अरब राज्य था,जो सर्वप्रथम इस्लामी जिहाद का शिकार हुआ ।
एक छोटा सा माफिया मुसलमानो ने शुरू किया, जो अब पूरे अरब में फैलता जा रहा था , इस नए नवेले धर्म का नाम भी लोगो ने नही सुना होगा, जिसे कबूल करने के लिए लोगो को भयंकर यातना दी जा रही थी । अगर इस गुंडो के गिरोह को शुरू में ही कुचल दिया जाता, तो विश्व के हालात आज यह ना होते । इस्लाम एक सीख ह लोगोै के लिए, की किसी भी अत्याचारी को आगे ना बढ़ने दिया जाए ।उसे सुधरने काएक मौका देकर ही उसे खत्म कर दिया जाए ।
ईरान ही वह प्रथम देश था, जो इन पागल , जंगली, हिंसक पशुओं का रास्ता रोके खड़ा था । फारसी साम्राज्य इन अरबी पशुओं को परास्त करने के लिए अयोग्य ही था ।
इस्लाम के आगमन से पूर्व युद्ध के एक नियम थे , सेनाएं आपस मे लड़ती थी । जनता पर धावा नही बोला जाता था, किसी विपक्षी के युद्ध जितने के बाद भी जनता पर अत्याचार नही होता था । इस इस्लाम के गुंडो ने तो युद्ध के सारे नियम ही बदल दिए । सेना से छुपकर घुसपैठ करते, ओर आम जनता पर हमला करते । उसे मुसलमान बनाते, साथ ही अपनी लुटेरी सेना में शामिल कर लेते ।
इस्लाम कब आक्रमणों में ज़्यादा से ज़्यादा इस बार पर जोर होता था , की किस तरह नागरिकों को सताया जाए । कोई शाशक हार जाता, तो उसकी पूरी जनता को इस्लामी प्रकोप झेलना पड़ता । यह लोग लोगो से उसका धर्म छीन, उसपर इस्लाम थोप देते थे । इन जिहादियों की तलवार से पीड़ित लोग केवल मुसलमान बनकर अपना जीवन बचा सकते थे । मुसलमान बनकर यह पीड़ित लोग भी खूंखार ओर जंगली पशु बन जाते ।
प्रथम युद्ध ( नामराक ओर कासकर का युद्ध - 634
अरब प्रायद्वीप को पूरा इस्लाम की धार चखाने कब बाद इन लुटेरे पशुओं के कारवां ने दूसरे देशों की सीमाओं पर पंजा मारना शुरू किया । मुहम्मद के काल मे भी प्रयास तो हुआ था, लेकिन फारसियो की मार ऐसी पड़ी, की दुबारा हिम्मत नही हुई । काश की फारसी लोग उसी समय इन्हें अरब तक रंगेद कर मारते ।
शुरू शुरू में फारस की सीमाओं पर इन्होंने फारसी लोगो को परेशान करना शुरू किया । यूफ्रेट्स नदी के किनारे इन लोगो ने भयंकर कोहराम मचाया । वे लोग इनके आक्रमण से परेशान होकर फारसी राजा "याजदयार्ड " को अपनी रक्षा के लिए पत्र लिखा करते थे। राजा ने एक साधारण सी टोली को उनकी रक्षा के लिए भेजा । हीरा नामक शहर पर मुसलमानो ने पूर्णतः अपना कब्जा कर लिया था ।
फ़ारसी सेनिको ने इस शहर को आजाद करवा लिया । यहां से यह अरबी लोग भागकर नर्मक ( वर्तमान कूफा ) चले गए । फारसी सेना नव इन लुटेरो का पीछा किया । इस क्षेत्र से अरब के लोग परिचित थे, लेकिन फारसी नही । मुस्लिम सेना पैदल ओर ऊंट पर सवार थी, जबकि फारसी सेना घोड़ो पर सवार थी । यह इलाका रेगिस्तान का था । जहां ऊंट काम आ गए, ओर घोड़े फंस गए । अरब सेनिको ने इस युद्ध मे तीरों से ईरानी सेनिको को छलनी कर दिया । सभी फारसी सेनिको को या तो मार डाला गया, या मुसलमान बना दिया गया । ताकि अगले निशाने कास्कर पर हमला करते समय यह लुटेरे सैनिक काम आएं ।
फारस का साम्रज्य बिना चिंता के सो रहा था । उसे लगा ही नही, की अरब के सैनिक कास्कर तक पहुंच सकते है । यह वहसी मुसलमान दरिंदे अपने व्यभिचार ओर धन की भूख मिटाने भारत तक आ सकते थे, तो कास्कर कौनसा दूर था ?
फारसी शाशक ने सोचा ही नही, की इस्लाम नाम की यह छिपकली अब उन्हें निगलने जा रही है :-

जब कास्कर में मुस्लिम सेना अपना डेरा डालकर बैठ गयी, तो फारस के राजा के पास अरबो ने अपना दूत भेजा -
" हमारे सम्राट पूछते है, की क्या आप इस शर्त पर शांति के लिए सहमत होंगे कि " टायगिरिस " तक हमारे बीच सीमा हो । टायगिरिस कि पूर्वी हिस्से की ओर जो भी है हमारा, ओर पश्चिमी हिस्से की ओर जो भी हैज़ तुम्हरा । यह " टायगिरिस " पूरा प्रदेश ही ईरानियों का था ।
अपनी प्रजा पर होते अत्याचार को देख राजा ने यह शर्त मंजूर कर ली । जब इससे सहमति बन गयी, तो कुछ ही दिनों बाद दूसरा दूत भेज दिया ।
अरब मुस्लिम कमांडर इन चीफ " साद-इब्न-बागा " नाम के एक गुंडे ने अपने दूत से राजा को कहलवाया , की हम मुसलमान जमीन के भूखे नही है। यदि फारसी सम्राट को अगर शांति चाहिए, तो इस्लाम कबूल करें, या जजिया का भुगतान करें । दोनो ही विकल्पों को राजा ने अस्वीकार कर दिया । अब तो तलवार से ही यह मुद्दा सुलझ सकता था ।
"अबु-उबेद लिखता है - सऊद पार कर कास्कर पर हमला करने का आदेश 1 मार्च को दिया गया । यह हमला नही बल्कि घुसपैठ थी । फारसी राजा ने तुरंत एक सेना का गठन किया, ओर मुस्लिम लुटेरो का सामना करने की ठानी । मुसलमानो ने सेना का सामना ना कर्ज़ आतंकवादी की तरह पूरे शहर को लूटकर तबाह कर दिया । फारसी सेना ने मुसलमानो को तो पीछे धकेल दिया, लेकिन पूरा कास्कर लगभग मुसलमान बन चुका था ।
अल-जिस्र का युद्ध ( 637 )
इस लड़ाई का नेतृत्व अली कर रहा था, जो मुहम्मद का दामाद भी था । इस हनले में अली नव नेतृत्व में कई महिलाओं का अपहरण हैज़ बच्चो को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया । महिलाओ का बलात्कर होना निश्चित ही था । बूढ़े जवान सभी जिंदा तभी रह सके, जाव उन्होंने इस्लाम को कबूल कर लिया । बाकी जो धर्मप्रिय लोग थे, तड़पा तड़पा कर मार डाले गए ।
राजधानी तक इन अरबी लुटेरो ने चढ़ाई कर दी थी । खुद राजा याजदयार्ड की 3 साल की बेटी को भी मुसलमान उठा कर ले गए । अली ने सारी लूट की संपत्ति और राजकुमारी को खलीफा उमर के सामने पेश किया, इतनी मात्रा में धन संपदा देख उमर अली पर बड़ा खुश हुआ, उसने वह 3 साल की बच्ची अली को सौंप दी, अली ने उसे अपनी उपपत्नी बना लिया ।
राजा को अपनी राजकुमारी बहुत प्रिय थी । उसके कलेजे का टुकड़ा उससे अलग हो गया था । उसने ठानी की किसी भी कीमत पर वह अपनी बेटी को उन दुष्ट पशुओं के चंगुल से वापस लेकर आएगा । लेकिन अरब में घुसकर अरबियों को हराना इतना आसान नही था । पूरी की पूरी सेना अरब में मारी गयी ।
इस दुस्साहस का परिणाम अब फारसियों को भोगना था । गदासियर का युद्ध हुआ, मुसलमानो ने रात्रि में हमला कर फारसी सेना के कमांडर को पकड़ लिया, पूरी सेना के सामने ही उसे निवस्त्र कर दिया गया, सिर पर तलवारों से वार किये, ओर पूरा शरीर तीरों से छलनी कर दिया ।
4 दिन तक यह युद्ध चलता रहा, विशाल अरब सेना ईरान की राजधानी में घुस आए । राजा यार्ड को भी बंदी बना लिया । उन्हें बंदी बनाकर अरब के खलीफा के सामने पेश किया गया । जहां उनके पास इस्लाम कबूलने या मृत्यु चुनने कि शर्त रखी गयी । राजा ने मृत्यु । भरे दरबार मे उनका सिर काट दिया गया ।
जब पारस पर अरब के मुसलमानों का राज हो गया और पारसी जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाने लगे, तब फारसी शरणार्थियों का पहला समूह मध्य एशिया के खुरासान (पूर्वी ईरान के अतिरिक्त आज यह प्रदेश कई राष्ट्रों में बंट गया है) में आकर रहे। वहां वे लगभग 100 वर्ष रहे। जब वहां भी इस्लामिक उपद्रव शुरू हुआ तब फारस की खाड़ी के मुहाने पर उरमुज टापू में उसमें से कई भाग आए और वहां 15 वर्ष रहे।
आगे वहां भी आक्रमणकारियों की नजर पड़ गई तो अंत में वे एक छोटे से जहाज में बैठ अपनी पवित्र अग्नि और धर्म पुस्तकों को ले अपनी अवस्था की गाथाओं को गाते हुए खम्भात की खाड़ी में भारत के दीव नामक टापू में आ उतरे, जो उस काल में पुर्तगाल के कब्जे में था। वहां भी उन्हें पुर्तगालियों ने चैन से नहीं रहने दिया, तब वे सन् 716 ई. के लगभग दमन के दक्षिण 25 मील पर राजा यादव राणा के राज्य क्षे‍त्र 'संजान' नामक स्थान पर आ बसे।
इन फारसी शरणार्थियों ने अपनी पहली बसाहट को ‘संजान’ नाम दिया, क्योंकि इसी नाम का एक नगर तुर्कमेनिस्तान में है, जहां से वे आए थे। कुछ वर्षों के अंतराल में दूसरा समूह (खुरसानी या कोहिस्तानी) आया, जो अपने साथ धार्मिक उपकरण (अलात) लाया। स्थल मार्ग से एक तीसरे समूह के आने की भी जानकारी है। इस तरह जिन फारसियों ने इस्लाम नहीं अपनाया या तो वे मारे गए या उन्होंने भारत में शरण ली।
गुजरात के दमण-दीव के पास के क्षे‍त्र के राजा जाड़ी राणा ने उनको शरण दी और उनके अग्नि मंदिर की स्थापना के लिए भूमि और कई प्रकार की सहायता भी दी। सन् 721 ई. में प्रथम फारसी अग्नि मंदिर बना। भारतीय पारसी अपने संवत् का प्रारंभ अपने अंतिम राजा यज्दज़र्द-1 के प्रभावकाल से लेते हैं।
10वीं सदी के अंत तक इन्होंने गुजरात के अन्य भागों में भी बसना प्रारंभ कर दिया। 15वीं सदी में भारत में भी ईरान की तरह इस्लामिक क्रांति के चलते 'संजान' पर मुसलमानों के द्वारा आक्रमण किए जाने के कारण वहां के फारसी जान बचाकर पवित्र अग्नि को साथ लेकर नवसारी चले गए। अंग्रेजों का शासन होने के बाद फारसी धर्म के लोगों को कुछ राहत मिली।
16वीं सदी में सूरत में जब अंग्रेजों ने फैक्टरियां खोली तो बड़ी संख्या में फारसी कारीगर और व्यापारियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। अंग्रेज भी उनके माध्यम से व्यापार करते थे जिसके लिए उन्हें दलाल नियुक्त कर दिया जाता था। कालांतर में ‘बॉम्बे’ अंग्रेजों के हाथ लग गया और उसके विकास के लिए कारीगरों आदि की आवश्यकता थी। विकास के साथ ही फारसियों ने बंबई की ओर रुख किया।
इस तरह फारसी धर्म के लोग दीव और दमण के बाद गुजरात के सूरत में व्यापार करने लगे और फिर वे बंबई में बस गए।
वर्तमान में भारत में फारसियों की जनसंख्या लगभग 1 लाख है जिसका 70% मुंबई में रहते हैं।
#गर्व_से_कहो....#हम_हिन्दू_हैं !!
साभार :- **कट्टर हिन्दू**
#कैसे_56_देशो_में_इस्लाम_फैला - ईरान 634 -651
632 ईस्वी में मुहम्मद की म्रत्यु हो गयी थी । पूरे अरब प्रायदीप पर मुसलमानो का कब्जा हो गया था । मुहम्मद की भी महत्वकांशा थी, की वो ज़्यादा से ज़्यादा आगे बढ़ता चला जाये । उसकी इन दुष्ट इच्छा को उसके इस्लामी गुंडो ने पूर्ण किया ।
अरब की सीमा से लगता #ईरान था । जिसका #पुराना_नाम #पर्शिया था ।
आज जो ईरानी मुसलमान मुसलमान बनकर ईरान में इस्लामिक शाशन चला रहे है, ईरान में कभी इनके पूर्वजो के साथ क्या हुआ था, यह लोग खुद भी शायद नही जानते, कोई और बताए तो मानने को भी तैयार नही होंगे । ईरान ही वो गैर - अरब राज्य था,जो सर्वप्रथम इस्लामी जिहाद का शिकार हुआ ।
एक छोटा सा माफिया मुसलमानो ने शुरू किया, जो अब पूरे अरब में फैलता जा रहा था , इस नए नवेले धर्म का नाम भी लोगो ने नही सुना होगा, जिसे कबूल करने के लिए लोगो को भयंकर यातना दी जा रही थी । अगर इस गुंडो के गिरोह को शुरू में ही कुचल दिया जाता, तो विश्व के हालात आज यह ना होते । इस्लाम एक सीख ह लोगोै के लिए, की किसी भी अत्याचारी को आगे ना बढ़ने दिया जाए ।उसे सुधरने काएक मौका देकर ही उसे खत्म कर दिया जाए ।
ईरान ही वह प्रथम देश था, जो इन पागल , जंगली, हिंसक पशुओं का रास्ता रोके खड़ा था । फारसी साम्राज्य इन अरबी पशुओं को परास्त करने के लिए अयोग्य ही था ।
इस्लाम के आगमन से पूर्व युद्ध के एक नियम थे , सेनाएं आपस मे लड़ती थी । जनता पर धावा नही बोला जाता था, किसी विपक्षी के युद्ध जितने के बाद भी जनता पर अत्याचार नही होता था । इस इस्लाम के गुंडो ने तो युद्ध के सारे नियम ही बदल दिए । सेना से छुपकर घुसपैठ करते, ओर आम जनता पर हमला करते । उसे मुसलमान बनाते, साथ ही अपनी लुटेरी सेना में शामिल कर लेते ।
इस्लाम कब आक्रमणों में ज़्यादा से ज़्यादा इस बार पर जोर होता था , की किस तरह नागरिकों को सताया जाए । कोई शाशक हार जाता, तो उसकी पूरी जनता को इस्लामी प्रकोप झेलना पड़ता । यह लोग लोगो से उसका धर्म छीन, उसपर इस्लाम थोप देते थे । इन जिहादियों की तलवार से पीड़ित लोग केवल मुसलमान बनकर अपना जीवन बचा सकते थे । मुसलमान बनकर यह पीड़ित लोग भी खूंखार ओर जंगली पशु बन जाते ।
प्रथम युद्ध ( नामराक ओर कासकर का युद्ध - 634
अरब प्रायद्वीप को पूरा इस्लाम की धार चखाने कब बाद इन लुटेरे पशुओं के कारवां ने दूसरे देशों की सीमाओं पर पंजा मारना शुरू किया । मुहम्मद के काल मे भी प्रयास तो हुआ था, लेकिन फारसियो की मार ऐसी पड़ी, की दुबारा हिम्मत नही हुई । काश की फारसी लोग उसी समय इन्हें अरब तक रंगेद कर मारते ।
शुरू शुरू में फारस की सीमाओं पर इन्होंने फारसी लोगो को परेशान करना शुरू किया । यूफ्रेट्स नदी के किनारे इन लोगो ने भयंकर कोहराम मचाया । वे लोग इनके आक्रमण से परेशान होकर फारसी राजा "याजदयार्ड " को अपनी रक्षा के लिए पत्र लिखा करते थे। राजा ने एक साधारण सी टोली को उनकी रक्षा के लिए भेजा । हीरा नामक शहर पर मुसलमानो ने पूर्णतः अपना कब्जा कर लिया था ।
फ़ारसी सेनिको ने इस शहर को आजाद करवा लिया । यहां से यह अरबी लोग भागकर नर्मक ( वर्तमान कूफा ) चले गए । फारसी सेना नव इन लुटेरो का पीछा किया । इस क्षेत्र से अरब के लोग परिचित थे, लेकिन फारसी नही । मुस्लिम सेना पैदल ओर ऊंट पर सवार थी, जबकि फारसी सेना घोड़ो पर सवार थी । यह इलाका रेगिस्तान का था । जहां ऊंट काम आ गए, ओर घोड़े फंस गए । अरब सेनिको ने इस युद्ध मे तीरों से ईरानी सेनिको को छलनी कर दिया । सभी फारसी सेनिको को या तो मार डाला गया, या मुसलमान बना दिया गया । ताकि अगले निशाने कास्कर पर हमला करते समय यह लुटेरे सैनिक काम आएं ।
फारस का साम्रज्य बिना चिंता के सो रहा था । उसे लगा ही नही, की अरब के सैनिक कास्कर तक पहुंच सकते है । यह वहसी मुसलमान दरिंदे अपने व्यभिचार ओर धन की भूख मिटाने भारत तक आ सकते थे, तो कास्कर कौनसा दूर था ?
फारसी शाशक ने सोचा ही नही, की इस्लाम नाम की यह छिपकली अब उन्हें निगलने जा रही है :-
जब कास्कर में मुस्लिम सेना अपना डेरा डालकर बैठ गयी, तो फारस के राजा के पास अरबो ने अपना दूत भेजा -
" हमारे सम्राट पूछते है, की क्या आप इस शर्त पर शांति के लिए सहमत होंगे कि " टायगिरिस " तक हमारे बीच सीमा हो । टायगिरिस कि पूर्वी हिस्से की ओर जो भी है हमारा, ओर पश्चिमी हिस्से की ओर जो भी हैज़ तुम्हरा । यह " टायगिरिस " पूरा प्रदेश ही ईरानियों का था ।
अपनी प्रजा पर होते अत्याचार को देख राजा ने यह शर्त मंजूर कर ली । जब इससे सहमति बन गयी, तो कुछ ही दिनों बाद दूसरा दूत भेज दिया ।
अरब मुस्लिम कमांडर इन चीफ " साद-इब्न-बागा " नाम के एक गुंडे ने अपने दूत से राजा को कहलवाया , की हम मुसलमान जमीन के भूखे नही है। यदि फारसी सम्राट को अगर शांति चाहिए, तो इस्लाम कबूल करें, या जजिया का भुगतान करें । दोनो ही विकल्पों को राजा ने अस्वीकार कर दिया । अब तो तलवार से ही यह मुद्दा सुलझ सकता था ।
"अबु-उबेद लिखता है - सऊद पार कर कास्कर पर हमला करने का आदेश 1 मार्च को दिया गया । यह हमला नही बल्कि घुसपैठ थी । फारसी राजा ने तुरंत एक सेना का गठन किया, ओर मुस्लिम लुटेरो का सामना करने की ठानी । मुसलमानो ने सेना का सामना ना कर्ज़ आतंकवादी की तरह पूरे शहर को लूटकर तबाह कर दिया । फारसी सेना ने मुसलमानो को तो पीछे धकेल दिया, लेकिन पूरा कास्कर लगभग मुसलमान बन चुका था ।
अल-जिस्र का युद्ध ( 637 )
इस लड़ाई का नेतृत्व अली कर रहा था, जो मुहम्मद का दामाद भी था । इस हनले में अली नव नेतृत्व में कई महिलाओं का अपहरण हैज़ बच्चो को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया । महिलाओ का बलात्कर होना निश्चित ही था । बूढ़े जवान सभी जिंदा तभी रह सके, जाव उन्होंने इस्लाम को कबूल कर लिया । बाकी जो धर्मप्रिय लोग थे, तड़पा तड़पा कर मार डाले गए ।
राजधानी तक इन अरबी लुटेरो ने चढ़ाई कर दी थी । खुद राजा याजदयार्ड की 3 साल की बेटी को भी मुसलमान उठा कर ले गए । अली ने सारी लूट की संपत्ति और राजकुमारी को खलीफा उमर के सामने पेश किया, इतनी मात्रा में धन संपदा देख उमर अली पर बड़ा खुश हुआ, उसने वह 3 साल की बच्ची अली को सौंप दी, अली ने उसे अपनी उपपत्नी बना लिया ।
राजा को अपनी राजकुमारी बहुत प्रिय थी । उसके कलेजे का टुकड़ा उससे अलग हो गया था । उसने ठानी की किसी भी कीमत पर वह अपनी बेटी को उन दुष्ट पशुओं के चंगुल से वापस लेकर आएगा । लेकिन अरब में घुसकर अरबियों को हराना इतना आसान नही था । पूरी की पूरी सेना अरब में मारी गयी ।
इस दुस्साहस का परिणाम अब फारसियों को भोगना था । गदासियर का युद्ध हुआ, मुसलमानो ने रात्रि में हमला कर फारसी सेना के कमांडर को पकड़ लिया, पूरी सेना के सामने ही उसे निवस्त्र कर दिया गया, सिर पर तलवारों से वार किये, ओर पूरा शरीर तीरों से छलनी कर दिया ।
4 दिन तक यह युद्ध चलता रहा, विशाल अरब सेना ईरान की राजधानी में घुस आए । राजा यार्ड को भी बंदी बना लिया । उन्हें बंदी बनाकर अरब के खलीफा के सामने पेश किया गया । जहां उनके पास इस्लाम कबूलने या मृत्यु चुनने कि शर्त रखी गयी । राजा ने मृत्यु । भरे दरबार मे उनका सिर काट दिया गया ।
जब पारस पर अरब के मुसलमानों का राज हो गया और पारसी जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाने लगे, तब फारसी शरणार्थियों का पहला समूह मध्य एशिया के खुरासान (पूर्वी ईरान के अतिरिक्त आज यह प्रदेश कई राष्ट्रों में बंट गया है) में आकर रहे। वहां वे लगभग 100 वर्ष रहे। जब वहां भी इस्लामिक उपद्रव शुरू हुआ तब फारस की खाड़ी के मुहाने पर उरमुज टापू में उसमें से कई भाग आए और वहां 15 वर्ष रहे।
आगे वहां भी आक्रमणकारियों की नजर पड़ गई तो अंत में वे एक छोटे से जहाज में बैठ अपनी पवित्र अग्नि और धर्म पुस्तकों को ले अपनी अवस्था की गाथाओं को गाते हुए खम्भात की खाड़ी में भारत के दीव नामक टापू में आ उतरे, जो उस काल में पुर्तगाल के कब्जे में था। वहां भी उन्हें पुर्तगालियों ने चैन से नहीं रहने दिया, तब वे सन् 716 ई. के लगभग दमन के दक्षिण 25 मील पर राजा यादव राणा के राज्य क्षे‍त्र 'संजान' नामक स्थान पर आ बसे।
इन फारसी शरणार्थियों ने अपनी पहली बसाहट को ‘संजान’ नाम दिया, क्योंकि इसी नाम का एक नगर तुर्कमेनिस्तान में है, जहां से वे आए थे। कुछ वर्षों के अंतराल में दूसरा समूह (खुरसानी या कोहिस्तानी) आया, जो अपने साथ धार्मिक उपकरण (अलात) लाया। स्थल मार्ग से एक तीसरे समूह के आने की भी जानकारी है। इस तरह जिन फारसियों ने इस्लाम नहीं अपनाया या तो वे मारे गए या उन्होंने भारत में शरण ली।
गुजरात के दमण-दीव के पास के क्षे‍त्र के राजा जाड़ी राणा ने उनको शरण दी और उनके अग्नि मंदिर की स्थापना के लिए भूमि और कई प्रकार की सहायता भी दी। सन् 721 ई. में प्रथम फारसी अग्नि मंदिर बना। भारतीय पारसी अपने संवत् का प्रारंभ अपने अंतिम राजा यज्दज़र्द-1 के प्रभावकाल से लेते हैं।
10वीं सदी के अंत तक इन्होंने गुजरात के अन्य भागों में भी बसना प्रारंभ कर दिया। 15वीं सदी में भारत में भी ईरान की तरह इस्लामिक क्रांति के चलते 'संजान' पर मुसलमानों के द्वारा आक्रमण किए जाने के कारण वहां के फारसी जान बचाकर पवित्र अग्नि को साथ लेकर नवसारी चले गए। अंग्रेजों का शासन होने के बाद फारसी धर्म के लोगों को कुछ राहत मिली।
16वीं सदी में सूरत में जब अंग्रेजों ने फैक्टरियां खोली तो बड़ी संख्या में फारसी कारीगर और व्यापारियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। अंग्रेज भी उनके माध्यम से व्यापार करते थे जिसके लिए उन्हें दलाल नियुक्त कर दिया जाता था। कालांतर में ‘बॉम्बे’ अंग्रेजों के हाथ लग गया और उसके विकास के लिए कारीगरों आदि की आवश्यकता थी। विकास के साथ ही फारसियों ने बंबई की ओर रुख किया।
इस तरह फारसी धर्म के लोग दीव और दमण के बाद गुजरात के सूरत में व्यापार करने लगे और फिर वे बंबई में बस गए।
वर्तमान में भारत में फारसियों की जनसंख्या लगभग 1 लाख है जिसका 70% मुंबई में रहते हैं।
#गर्व_से_कहो....#हम_हिन्दू_हैं !!
साभार :- **कट्टर हिन्दू**

स्वामी रामतीर्थ

स्वामी रामतीर्थ की ख्याति अमेरिका में दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी। लोग उन्हें 'जिन्दा मसीहा' कहते थे और वैसा ही आदर-सम्मान भी देते थे। कई चर्चों, क्लबों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने के लिए उन्हें बुलाया जाता था।


उनके व्याख्यानों में बहुत भीड़ होती थी। बड़े-बड़े प्राध्यापक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, वकील, धार्मिक जनता और पादरी इत्यादि सभी प्रकार के लोग उनके विचार सुनने के लिए आया करते थे। कभी-कभी तो इतनी भीड़ हो जाती थी कि हॉल में खड़े होने तक की जगह नहीं रहती थी। इस भीड़ में पुरुष-महिलाएँ सभी सम्मिलित होते थे। कभी-कभी पुरुषों से महिलाएँ अधिक हो जाया करती थीं, जो बहुत ध्यान से स्वामीजी का व्याख्यान सुनती थीं।

व्याख्यान के अंत में स्वामी रामतीर्थ श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर भी देते थे। एक शाम को मनोरिना नाम की एक सुन्दर युवती ने अपने प्रश्नों के लिए स्वामी जी से अलग समय माँगा। स्वामी जी ने दूसरे दिन सुबह मिलने को कहा।

दूसरे दिन वह युवती स्वामी रामतीर्थ से मिलने के लिए उनके निवास स्थान पर आयी। उसने स्वामी जी से कहाः "मैं एक धनी पिता की पुत्री हूँ। मैं संसार भर में आपके नाम से कॉलेज, स्कूल, पुस्तकालय और अस्पताल खोलना चाहती हूँ। सारी दुनिया में आपके नाम से मिशन खुलवा दूँगी और प्रत्येक देश तथा नगर में आपके वेदांत के प्रचार का सफल प्रबंध करवा दूँगी।"

स्वामी रामतीर्थ ने उसके उत्तर में इतना ही कहा कि "दुनिया में जितने भि धार्मिक मिशन है, वे सब राम के ही मिशन हैं। राम अपने नाम की छाप से कोई अलग मिशन चलाना नहीं चाहता क्योंकि राम कोई नयी बात तो कहता नहीं है। राम जो कुछ कहता है, वह शाश्वत सत्य है। राम के पैदा होने से हजारों वर्ष पूर्व वेदों और उपनिषदों ने दुनिया को यही संदेश सुनाया है, जो राम आप लोगों के समक्ष यहाँ अमेरिका में प्रस्तुत कर रहा है। नाम तो केवल एक ईश्वर का ही ऐसा है, जो सदा-सदा रहेगा। व्यक्तिगत नाम तो ओस की बूँद की तरह नाशवान है।"

उस युवती ने जब बार-बार खैराती अस्पताल और कॉलेज इत्यादि खोलने तथा भारतीय विद्यार्थियों की सहायता की बात कही, तब स्वामी रामतीर्थ ने बहुत शांतिपूर्ण ढंग से पूछा कि "आखिर आपकी आंतरिक इच्छा क्या है ? आप चाहती क्या हैं ?" इस सीधे प्रश्न पर उस युवती ने स्वामी रामतीर्थ को घूरकर देखा, कुछ झिझकी व शर्मायी। फिर रहस्यमय चितवनि से देखकर मुस्करायी और बोली कि "मैं कुछ नहीं चाहती। केवल मैं अपना नाम मिसेज राम लिखना चाहती हूँ। मैं आपके नजदीक-से-नजदीक रहकर आपकी सेवा करना चाहती हूँ। बस, केवल इतना ही कि आप मुझे अपना लें।"

स्वामी रामतीर्थ अपने स्वभाव के अनुसार खिलखिलाकर हँस पड़े और बोलेः "राम न तो मास्टर है, न मिस। न मिस्टर है, न मिसेज। जब राम मास्टर ही नहीं तो उसकी मिसेज होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता !"

वह युवती लज्जित होकर व्याकुल हो उठी। उसकी प्यारभरी एक मुस्कराहट से अन्य लोग अपनी सुध खो बैठे थे और यह भारतीय स्वामी उसकी प्रार्थना का यों अनादर कर रहा है ! वह खीझकर बोलीः "जब तुम मास्टर और मिस्टर कुछ नहीं हो तो तुम क्या हो ?"

स्वामी रामतीर्थ फिर मुस्कराये और बोलेः "राम एक मिस्ट्री है, एक रहस्य है।" वह युवती अब बिल्कुल बौखला उठीः "नहीं, नहीं राम ! मैं फिलॉस्फी नहीं चाहती। मैं तुम्हें दिल से प्यार करती हूँ। मुझे आत्महत्या से बचाओ। मैं तुमसे नजदीक का रिश्ता चाहती हूँ।"

स्वामी रामतीर्थ शांतिपूर्वक बोलेः "ठीक है, मुझे मंजूर है।" युवती के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। स्वामी रामतीर्थ ने कहा कि "मैं तुमसे नजदीक-से-नजदीक तो हूँ ही। कहने को हम दोनों अलग-अलग दिखायी देते हैं किंतु आत्मा के रिश्ते से हम तुम दोनों एक ही हैं। इससे और ज्यादा नजदीक का रिश्ता क्या हो सकता है !" युवती इस उत्तर से पागल हो उठी। वह कहने लगीः "फिर वही फिलॉस्फी !" उसने परेशानी दिखलाते हुए कहा कि "मैं आत्मा का रिश्ता नहीं चाहती। मैं तुमसे शारीरिक नजदीकी का (हाड़-मांस का) रिश्ता चाहती हूँ। राम ! मुझे निराश मत करो। मैं तुमसे प्यार की भीख माँगती हूँ। बस, और कुछ नहीं।"

स्वामी रामतीर्थ शांत भाव से बैठे थे। वे तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने कहाः "जानती हो हाड़ और मांस का नजदीक-से-नजदीक का रिश्ता माँ और बेटे का ही होता है। माँ के खून और हाड़-मांस से बेटे का खून और हाड़-मांस बनता है। बस, आज से तुम मेरी माँ हुई और मैं तुम्हारा बेटा।"

यह उत्तर सुनकर युवती ने अपना माथा पीट लिया और बोलीः "आपने पूर्णरूप से परास्त कर दिया। राम ! तुम्हारा दिल पत्थर का है। सचमुच मैं पागल हो जाऊँगी ! मैं क्या करूँ स्वामी ! मैं क्या करूँ ?" युवती ने अपनी दोनों हथेलियाँ अपनी दोनों आँखों पर रखीं और फूट-फूटकर रोने लगी। उधर स्वामी रामतीर्थ ने भी अपनी आँखें बंद कर लीं और वे समाधिस्थ हो गये। जब उनकी समाधि खुली तो उन्होंने देखा कि वह युवती कमरे से बाहर जा चुकी थी।

उस घटना के पश्चात वह युवती बराबर स्वामी रामतीर्थ के व्याख्यानों में आती तो रही, किंतु दूर एक कोने में बैठकर रोती रहती थी। एक दिन स्वामी रामतीर्थ ने व्याख्यान के पश्चात उसे अपने पास बुलाकर बहुत समझा-बुझाकर शांत कर दिया। बाद में वह स्वामी रामतीर्थ की भक्त बन गई और उनकी इण्डो-अमेरिकन सोसाइटी की एक प्रमुख संरक्षक भी रही।
स्वामी रामतीर्थ ने मात्र 33 बर्ष की आयु में जलसमाधि लेकर नश्वर देह का त्याग कर दिया था