रविवार, 14 जून 2015

कुण्‍डली में कारक ग्रह और भाग्‍योदय ग्रह ===



कुण्‍डली में कारक ग्रह और भाग्‍योदय ग्रह
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 कारक ग्रह की महादशा (Mahadasha) हो, अंतरदशा हो (Anthardasha), प्रत्‍यंत्‍र दशा (Pratyantar dasha) हो या चाहे कारक ग्रह का अनुकूल गोचर (Transit) ही क्‍यों न चल रहा हो, वह साल, महीना, दिन अथवा घंटा भी आपके लिए अनुकूल (Favorable) होगा। आइए देखते हैं कि किस लग्‍न (Lagna) में कौनसा ग्रह कारक होता है और उसे किस प्रकार बल दिया जा सकता है।


मेष लग्‍न : मेष लग्‍न की कुण्‍डली में कोई एक ऐसा ग्रह नहीं होता जो एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति हो। ऐसे में पंचम भाव जो कि कुण्‍डली का त्रिकोण है, का अधिपति सूर्य है। ऐसे में मेष लग्‍न में सूर्य कुण्‍डली का कारक ग्रह होगा। किसी मेष लग्‍न के जातक को सूर्य की दशा, अंतरदशा में माणक पहनने की सलाह दी जा सकती है। बशर्ते सूर्य कोई अन्‍य योगकारक युति न बना रहा हो। ऐसे में हम कहेंगे कि मेष लग्‍न की कुण्‍डली में लग्‍न का अधिपति मंगल (Mars) और पंचम भाव का अधिपति सूर्य (Sun) कारक ग्रह हैं।

वृषभ लग्‍न : वृषभ लग्‍न में एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति शनि होता है। यह नौंवे और दसवें घर का अधिपति होता है। वृषभ लग्‍न वाले जातकों के लिए शनि की दशा, अंतरदशा अथवा प्रत्‍यंतर दशा कमोबेश अनुकूल होती है। अगर दिन देखा जाए तो शनि का नक्षत्र और दिन का कोई समय देखा जाए तो शनि की होरा वृषभ लग्‍न के जातकों के लिए अनुकूल साबित होती है। ऐसे में हम कहेंगे कि वृषभ लग्‍न में शुक्र (Venus) लग्‍नाधिपति होने के कारण और शनि (Saturn) कारक ग्रह हैं।

मिथुन लग्‍न : मिथुन द्विस्‍वभाव लग्‍न है। इसके साथ ही लग्‍न और त्रिकोण का अधिपति बुध ही है। प्रथम, पंचम और नवम भाव को त्रिकोण माना जाता है। ऐसे में बुध लग्‍न और चतुर्थ भाव का अधिपति होने के कारण कुण्‍डली का प्रमुख कारक ग्रह साबित होता है। इसके साथ ही पंचम भाव का अधिपति शुक्र भी मिथुन लग्‍न में अनुकूल प्रभाव देने वाला होता है। शुक्र के दूषित नहीं होने पर हम कह सकते हैं कि मिथुन लग्‍न में बुध (Mercury) और शुक्र (Venus) कारक ग्रह हैं।

कर्क लग्‍न: इस लग्‍न में पंचम भाव यानि त्रिकोण तथा दशम भाव यानि केन्‍द्र का अधिपति मंगल ही है। ऐसे में कर्क लग्‍न में सर्वाधिक शक्तिशाली ग्रह मंगल होता है। यही इस लग्‍न का कारक ग्रह है। अगर मंगल अनुकूल स्थिति में नहीं बैठा है और अनुकूल ग्रहों से युति नहीं बना रहा है तो जातक को मूंगे की अंगूठी अथवा लॉकेट पहनाया जा सकता है। कर्क राशि का अधिपति चंद्रमा है। ऐसे में कर्क लग्‍न के दो कारक ग्रह हमें मिलते हैं मंगल (Mars) और चंद्रमा (Moon)।
 
सिंह लग्‍न : सिंह लग्‍न में भी मंगल ही कारक ग्रह की भूमिका में दिखाई देता है। चौथे भाव में स्थित वृश्चिक राशि और नवम भाव में स्थित मेष राशि का आधिपत्‍य मंगल के पास ही है। ऐसे में वह एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति बनकर उभरता है। चूंकि सिंह राशि का स्‍वामी सूर्य है। ऐस में सिंह लग्‍न के जातकों के लिए सूर्य (Sun) और मंगल (Mars) कारक ग्रह हैं। ग्रहों की स्थिति के अनुसार उन्‍हें मूंगा अथवा माणक पहनाया जा सकता है। साथ ही सूर्य और मंगल की दशा, अंतरदशा, नक्षत्र और होरा भी जातक के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल साबित होंगे।

कन्‍या लग्‍न : कन्‍या राशि का अधिपति बुध है। यहां लग्‍न यानी त्रिकोण और केन्‍द्र यानी दशम भाव का अधिपति बुध ही है। ऐसे में इस लग्‍न वाले जातकों के लिए बुध ही कारक ग्रह होगा। इसके साथ ही नवम भाव यानी त्रिकोण का अधिपति शुक्र है। भले ही कन्‍या लग्‍न में दूसरे भाव का अधिपति होने के कारण शुक्र की उतनी शुभता नहीं रहती है, लेकिन बुध का मित्र होने के कारण शुक्र को भी भाग्‍यकारक ग्रह माना जाता है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि कन्‍या लग्‍न में बुध (Marcury) और शुक्र (Venus) कारक ग्रह होंगे और जातक को आवश्‍यकता के अनुरूप पन्‍ना अथवा डायमंड पहनाया जा सकता है।
 
तुला लग्‍न : हालांकि इस लग्‍न का अधिपति शुक्र है, लेकिन शुक्र का मित्र शनि एक केन्‍द्र यानी चौथे भाव और एक त्रिकोण यानी पांचवे भाव का अधिपति है। दूसरे कोण से देखें तो तुला राशि में शनि उच्‍च का होता है। ऐसे में अगर किसी जातक का तुला लग्‍न है और शनि अनुकूल स्थिति में बैठा हो तो जातक जीवन में बहुत प्रगति करता है। शनि की दशा, अंतरदशा, नक्षत्र और होरा में अनुकूल परिणाम प्राप्‍त करता है। भले ही शुक्र लग्‍न के साथ अष्‍टम भाव का अधिपति हो, लेकिन तुला लग्‍न में शनि (Saturn) और शुक्र (Venus) दोनों ही कारक ग्रह की भूमिका में होते हैं।

वृश्चिक लग्‍न (Vrishuchik lagna) : यह कुछ कठिन लग्‍न है। वृश्चिक लग्‍न का स्‍वामी मंगल है, लेकिन मंगल की दूसरी राशि मेष छठे भाव का प्रतिनिधित्‍व करती है। दूसरी ओर एक त्रिकोण का स्‍वामी गुरु है, लेकिन गुरु की ही एक राशि धनु दूसरे भाव का प्रतिनिधित्‍व कर रही है। दूसरे त्रिकोण नवम भाव का स्‍वामित्‍व चंद्रमा के पास है। ऐसे में मात्र चंद्रमा ही पूर्णतया शुद्ध होकर वृश्चिक लग्‍न का कारक ग्रह बनता है, लेकिन चंद्रमा का उपचार भी गले में मोती का लॉकेट बनाकर पहनाने से नहीं किया जाता। ऐसे में वृश्चिक लग्‍न के जातकों को आंशिक रूप से गुरु, आंशिक रूप से मंगल (Mars) और सावधानी से चंद्रमा (Moon) का उपचार बताया जा सकता है।

धनु लग्‍न : धनु राशि का स्‍वामी गुरु है। चूंकि लग्‍न त्रिकोण का भाग है और एक केन्‍द्र यानी चतुर्थ भाव में पड़ रही राशि मीन का आधिपत्‍य भी गुरु के पास है। दूसरी ओर नवम भाव यानी त्रिकोण का स्‍वामी सूर्य भी है। ऐसे में धनु लग्‍न में हमें दो कारक ग्रह मिलते हैं। गुरु और सूर्य। धनु लग्‍न के जातक को गुरु के रत्‍न पुखराज अथवा सुनहला अथवा सूर्य के रत्‍न माणक का उपचार बताया जा सकता है। सामान्‍य तौर पर धनु लग्‍न के जातकों को गुरु (Jupiter) और सूर्य (Sun) की दशा, अंतरदशा, नक्षत्र और होरा में अनुकूल परिणाम प्राप्‍त होते हैं।

मकर लग्‍न : मकर राशि का अधिपति शनि है। शनि का मित्र शुक्र ही इस लग्‍न का कारक ग्रह साबित होता है। शुक्र की पहली राशि वृषभ मकर लग्‍न में पंचम भाव और दूसरी राशि तुला दशम भाव का प्रतिनिधित्‍व करती है। ऐसे में एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति होने के कारण शुक्र ही इस लग्‍न का कारक है, दूसरी ओर शनि तो प्रभावी भूमिका निभाता ही है। ऐसे में मकर लग्‍न के जातकों को अनुकूलता प्राप्‍त करने के लिए शुक्र (Venus) रत्‍न हीरा अथवा जरिकॉन का उपयोग करना चाहिए। कुछ मामलों में शनि (Saturn) की अनुकूलता के लिए सावधानी से नीलम धारण करना चाहिए।
 
कुंभ लग्‍न: कुंभ राशि का अधिपति शनि है, लेकिन शनि की ही दूसरी राशि मकर यहां बारहवें भाव का प्रतिनिधित्‍व्‍ कर रही है। ऐसे में कुंभ लग्‍न में आंख मूंदकर शनि का उपचार तो किया ही नहीं जा सकता। लेकिन शुक्र यहां फिर एक केन्‍द्र और ए‍क‍ त्रिकोण का अधिपति बनकर उभरता है। इस बार शुक्र की पहली राशि वृषभ कुंभ लग्‍न के चौथे भाव और दूसरी राशि तुला नवम भाव यानी त्रिकोण का आधिपत्‍य लिए हुए है। ऐसे में शुक्र का रत्‍न हीरा अथवा जरिकॉन इन जातकों को पहनाया जा सकता है। शुक्र (Venus) की दशा, अंतरदशा, नक्षत्र अथवा होरा इन जातकों के लिए अनुकूल साबित होती है।

मीन लग्‍न : मीन राशि का अधिपति गुरु है। लग्‍न खुद केन्‍द्र और त्रिकोण दोनो है। गुरु की ही राशि धनु केन्‍द्र यानि दसवें भाव का प्रतिनिधित्‍व कर रही है। ऐसे में मीन लग्‍न का कारक ग्रह गुरु (Jupiter) ही होगा। इसके साथ पंचम भाव का चंद्रमा अगर निर्दोष हो, यानी किसी पाप ग्रह अथवा छह आठ बारह भाव के अधिपति के साथ न हो तो चंद्रमा भी कारक भी भूमिका निभाता है। ऐसे में मीन लग्‍न के जातक को गुरु के रत्‍न पुखराज और सुनहला तथा चंद्रमा (Moon) के रत्‍न मोती का उपचार बताया जा सकता है। इन जातकों के लिए गुरु की दशा, अंतरदशा, नक्षत्र और होरा अनुकूल सिद्ध होते हैं।

बुधवार, 10 जून 2015

सात फेरों के सात वचन



/सात फेरों के सात वचन





विवाह के बाद कन्या वर के वाम अंग में बैठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है। कन्या द्वारा वर से लिए जाने वाले सात वचन इस प्रकार है।
प्रथम वचन
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!
(यहाँ कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
किसी भी प्रकार के धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य माना गया है। जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है। पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है।
द्वितीय वचन
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
(कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
यहाँ इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृष्टि का आभास होता है। आज समय और लोगों की सोच कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि अमूमन देखने को मिलता है--गृहस्थ में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद की स्थिति उत्पन होने पर पति अपनी पत्नि के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देता है। उपरोक्त वचन को ध्यान में रखते हुए वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए।
तृतीय वचन
जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!
(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ।)
चतुर्थ वचन
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!
(कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ।)
इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती है। विवाह पश्चात कुटुम्ब पौषण हेतु पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऐसी स्थिति में गृहस्थी भला कैसे चल पाएगी। इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हो सके। इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो, पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे।
पंचम वचन
स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!
(इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है। वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है। बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नी से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते। अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नी से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नी का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है।
षष्ठम वचनः
न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!
(कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं। विवाह पश्चात कुछ पुरुषों का व्यवहार बदलने लगता है। वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नी को डाँट-डपट देते हैं। ऐसे व्यवहार से पत्नी का मन कितना आहत होता होगा। यहाँ पत्नी चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्हीं दुर्व्यसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले।
सप्तम वचनः
परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!
(अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है। इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है।
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मंगलवार, 9 जून 2015

सुन्दरकाण्ड के पाठ--क़र्ज़ चुकान!



सुन्दरकाण्ड के पाठ से बहुत सारे लाभ होते है उनमे से कुछ हम यहाँ बता रहे है –

१) इसका पाठ करने से विद्यार्थियों को विशेष लाभ मिलता है, ये आत्मविश्वासमें बढोतरी करता है और परीक्षा में अच्छे अंक लाने में मददगार होता है, बुद्धि कुशाग्र होती है, अगर बहुत छोटे बच्चे है तो उनके माता या पिता उनकेलिए इसका पाठ करे.
२) इसका पाठ मन को शांति और सुकून देता है मानसिक परेशानियों और व्याधियो से ये छुटकारा दिलवाने में कारगर है,
३) जिन लोगो को गृह कलेश की समस्या है इस पाठ से उनको विशेष फल मिलते है,
४) अगर घर का मुखिया इसका पाठ घर में रोज करता है तो घर का वातावरण अच्छा रहता है,
५) घर में या अपने आप में कोई भी नकारात्मक शक्ति को दूर करने का ये अचूक उपाय है,
६) अगर आप सुनसान जगह पर रहते है और किसी अनहोनी का डर लगा रहता हो तो उसस्थान या घर पर इसका रोज पाठ करने से हर प्रकार की बाधा से मुक्ति मिलती हैऔर आत्मबल बढ़ता है.
७) जिनको बुरे सपने आते हो रात को अनावश्यक डर लगता हो इसके पाठ निश्चित से आराम मिलेगा.
८) जो लोग क़र्ज़ से परेशान है उनको ये पाठ शांति भी देता है और क़र्ज़ मुक्ति में सहायक भी होता है,
९) जिस घर में बच्चे माँ पिता जी के संस्कार को भूल चुके हो, गलत संगत मेंलग गए हो और माँ पिता जी का अनादर करते हो वहा भी ये पाठ निश्चित लाभकारीहोता है.
१०) किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक रोग भले क्यों न हो इसका पाठ लाभकारी होता है.
११) भूत प्रेत की व्याधि भी इस पाठ को करने से स्वतः ही दूर हो जाती है.
१२) नौकरी में प्रमोशन में भी ये पाठ विशेष फलदाई होता है.
१३) घर का कोई भी सदस्य घर से बाहर हो आपको उसकी कोई जानकारी मिल पा रही हो या न भी मिल पा रही हो तो भी आप अगर इसका पाठ करते है तो सम्बंधितव्यक्ति की निश्चित ही रक्षा होगी, और आपको चिंता से भी राहत मिलेगी.
और इसके अलावा ऐसे बहुत से लाभ है जो सुन्दरकाण्ड से मिलते है आप सभी इसपाठ का लाभ उठाये और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस करे, जीवन सार्थकबनाये इस पाठ के मदद से हर दिन को नए उत्साह से जिए और परेशानियों सेनिजात पाए..//



क़र्ज़ चुकाने में परेशानी का सामना करना पड़े तब ये करें
जब लिया हुआ क़र्ज़ चुकाने में अत्यधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हो तो..प्रतिदिन भगवान गणेश के मंदिर पैदल चलकर जाए और उनको दूर्वा अर्पित करके गजेन्द्र-मोक्ष का पाठ करे..जल्द ही आपकी समस्या का समाधान मिलने लगेगा..
कर्ज निवारण के उपाय:
- श्रीगणेश को प्रतिदिन दूर्वा और मोदक का भोग लगाएं।

- श्रीगणेश का अथर्वशीर्ष का पाठ प्रति बुधवार करें।

- शिवलिंग पर प्रतिदिन कच्चा दूध चढ़ाएं।
- शनिवार को ऋणमुक्तेश्वर महादेव का पूजन करें।

- मंगल की भातपूजा, दान, होम और जप करें।

- मंगल एवं बुधवार को कर्ज का लेन-देन न करें।

- लाल, सफेद वस्त्रों का अधिकतम प्रयोग करें।/