बुधवार, 27 अगस्त 2014

फेंगसुई -घड़ी का उचित तरह से रखना



कहते हैं चलना ही जिंदगी है। क्या आप जानते हैं कि आपके दीवार पर टंगी घड़ी आपके सुख-समृद्धि भी लेकर आती है? जी हां, वास्तु और फेंगशुई के नियम कुछ ऐसा ही कहते हैं। सुख और समृद्धि की बात करें तो घड़ी का आकार, दीवार की दिशा, घड़ी का स्लो चलना जैसी तमाम चीजें इससे जुड़ी हैं। आइए, आज जानें घड़ी को कहां और कैसे रखना आपके लिए सुख लाती है और कहां और कैसे रखना आपके लिए परेशानी का सबब बन सकती है...
 फेंगशुई के नियम कहते हैं कि घड़ी का आकार भी आपके लिए लक लेकर आता है। घड़ी खरीदते लमय ध्यान रखें कि यह गोल, अंडाकार, अष्टभुजाकार या फिर षट्भुजाकार हो। यह आपके लिए पॉज़िटिव एनर्जी और खुशियों को लेकर आता है।
,,,,,,घड़ी को दीवार पर टांगते समय सिर्फ खूबसूरती का ख्याल न रखें, बल्कि इस बात का भी ध्यान रखें कि जहां आप इसे टांग रहे हैं वह घर की दक्षिण दीवार तो नहीं है। वास्तु और फेंगशुई को पीछे भी रखे दें तो विज्ञान भी इस दिशा को नेगेटिव एनर्जी से भरपूर मानता है। इस दिशा में घड़ी आपका ध्यान बा-बार अपनी ओर खींचेगा, जिसका स्पष्ट मतलब है कि आप नेगेटिव एनर्जी की ओर अट्रैक्ट हो रहे हैं। घड़ी का शीशा यदि टूट गया हो, तो इसे बदलवाने में आलस न करें, क्योंकि इससे आपका ही नुकसान है। परिवार के सदस्यों पर नकारात्मक असर पड़ता है। आप घड़ी को उत्तर, पश्चिम या पूर्व दिशा में लगा सकते हैं, जो पॉज़िटिव एनर्जी की दिशा है। लेकिन, यह घड़ी उस स्थान पर लगाएं ताकि घर में प्रवेश करते ही घर के भीतर कदम रखने वाले की पहली नजर घड़ी पर पड़े। खूबसूरत घड़ी ढूंढकर सिर्फ सही दिशा में लगा देने भर से बात नहीं बनेगी, बल्कि बीच-बीच में इसपर पड़ी धूल-मिट्टी की सफाई भी उतनी ही आवश्यक है। अच्छी और सॉफ्ट न्यूजिक वाली घड़ी को ड्रॉइंग रूम या फिर हॉल में रखना बेहतर बताया गया है। कुछ लोगों की घड़ी स्लो रहती है और वे इसपर ध्यान भी नहीं देना चाहते। संभलिए, क्योंकि यदि आप भी ऐसा करते हैं तो आपकी तरक्की आपसे मुंह मोड़ सकती है और आपके साने मुश्किलों का पहाड़ बन सकता है। घड़ी का हमेशा सही समय बताना ही अच्छा रहता है। घड़ी को कभी दरवाजे या मेन गेट के ठीक ऊपर न लगाएं। इससे आपका मानसिक तनाव बढ़ता है। घड़ी को तकिया के नीचे कभी नहीं रखना चाहिए। घड़ी की टिक-टिक का आपके दिमाग और हृदय पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए इसका तकिए के नीचे रखना अच्छा नहीं माना गया है। फेंगशुई की मानें तो घड़ी में मौजूद पेंडुलम और घड़ी की सूइयां पॉजिटिव एनर्जी के द्योतक हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि घर में बंद घड़ी न हो, क्योंकि यह हमारी तरक्की को रोक देता है।

वास्तु विचार -परामर्श

..!! कैसा हो हिंदू घर?
घर को गृह भी कहते हैं। घर वास्तु अनुसार
होना चाहिए। घर सुगंधित तथा साफ-
सुथरा होना चाहिए। घर मंदिर के आस-पास ही हो,
जिससे की हमारे कर्तव्य के प्रति हम सजग रहे
तथा मंदिर दर्शन से उस ईश्वर की याद बनी रहे।
इसके मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक
कारण भी है। घर में मंदिर की जगह ध्यान कक्ष
होता है ना की मंदिर ।
वास्तु रचना :
1.घर का मुख्य द्वार चार में से किसी एक
दिशा में हो। वह चार दिशा है-ईशान, उत्तर, वायव
और पश्चिम।
2.घर के सामने आँगन और पीछे भी आँगन
हो जिसके बीच में तुलसी का एक पौधा लगा हो।
3.घर के सामने या निकट तिराहा-चौराह
नहीं होना चाहिए।
4.घर का दरवाजा दो पल्लों का होना चाहिए।
अर्थात बीच में से भीतर खुलने वाला हो। दरवाजे
की दीवार के दाएँ शुभ और बाएँ लाभ लिखा हो।
5.घर के प्रवेश द्वार के ऊपर स्वस्तिक
अथवा 'ॐ' की आकृति लगाएँ।
6 .घर के अंदर आग्नेय कोण में किचन, ईशान में
प्रार्थना-ध्यान का कक्ष हो, नैऋत्य कोण में
शौचालय, दक्षिण में भारी सामान रखने का स्थान
आदि हो।
7.घर में बहुत सारे देवी-देवताओं के चित्र
या मूर्ति ना रखें। घर में मंदिर ना बनाएँ।
8.घर के सारे कोने और ब्रह्म स्थान (बीच
का स्थान) खाली रखें।
9.घर की छत में किसी भी प्रकार का उजालदान
ना रखें।
10.घर हो मंदिर के आसपास तो घर में सकारात्मक
ऊर्जा बनी रहती है।
11.घर में किसी भी प्राकार की नाकारात्मक
वस्तुओं का संग्रह ना करें और
अटाला भी इकट्ठा ना करें।
12.घर में सीढ़ियाँ विषम संख्या (5,7, 9) में
होनी चाहिए।
13.उत्तर, पूर्व तथा उत्तर-पूर्व (ईशान) में
खुला स्थान अधिक रखना चाहिए।
14. घर के उपर केसरिया धवज लगाकर रखें।
16. घर में किसी भी तरह के नकारात्मक पौधे
या वृक्ष रोपित ना करें।
अंतत: किसी वास्तुकार से पूछकर-जानकर घर
को सजाया और संवारा जा सकता है। घर का वास्तु
सही है तो ग्रह-नक्षत्र भी सही ही रहते हैं। घर
में गृहकलह ना हो तो सभी तरह की सुख
शांति प्राप्त की जा सकती है। घर को पूर्णत:
हिंदू रीति अनुसार ही बनाएं, जो एक वैज्ञानिक ASTROLOGY- REMEDIES FOR EVERYONE !
कुछ ऐसे उपाय जोकि कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका लग्न अथवा ग्रह-स्थिति कुछ भी हो, कर सकता है और चाहे उसे अपनी जन्मतिथि और समय आदि भी न पता हो। उसे भी कुछ न कुछ लाभ ही होगा।
- सूर्य को जल देना, गायत्री मंत्र, हनुमान चालीसा, सुंदरकाण्ड, दुर्गा सप्तशदी, हरिद्यस्त्रोत, रामायण, गजेन्द्रमोक्ष, दुर्गा चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र आदि का पाठ।
- किसी भूखे व्यक्ति को खाना, सही मायने में जरूरतमन्द व्यक्ति को वस्त्र, दवाई, चप्पल/जूता, किताबें अथवा शिक्षा देना।
- गाय, कुत्तों, पक्षियों अथवा किसी भी जानवर को खाना, दना, पानी, दवाई, सेवा अथवा कोई भी अन्य सुविधा।
- किसी गरीब कि पढ़ाई, बहन-बेटी की शादी, इलाज़ आदि में सहायता।
-किसी मंदिर, गुरुद्वारा अथवा धार्मिक स्थान पर पूजा, शिवलिंग या अन्य देवमूर्ति पर दूध, जल, अथवा फूल आदि चढ़ाना।
- अनाथों, वृद्धों, विधवाओं, अपंगों, कोढ़ियो आदि की सेवा।
आप कोई भी दान/सेवा मन से करके देखिये, इसे मिलने वाला संतोष ही आपके आधे कष्टों को हर लेगा।
,,,, कल्य उत्थाय यो मर्त्यः स्पृशेद गां वै घृतं दधि ।
सर्षपं च प्रियंगुं च कलमषात प्रतिमुच्यते ।।
जो व्यक्ति प्रतिदिन सुबह नहाकर राई, सरसों, गाय, घी और दही का स्पर्श करता है वह कई पापों से मुक्त हो जाता है।,, जब मुझे यकीन है के भगवान मेरे साथ है।

तो इस से कोई फर्क नहीं पड़ता के कौन कौन मेरे खिलाफ है।।"

अघोर पन्थ

शैव संप्रदाय में साधना की एक रहस्यमयी शाखा है अघोरपंथ। अघोरी की कल्पना की जाए तो श्मशान में तंत्र क्रिया करने वाले किसी ऐसे साधु की तस्वीर जेहन में उभरती है जिसकी वेशभूषा डरावनी होती है। अघोरियों के वेश में कोई ढोंगी आपको ठग सकता है लेकिनअघोरियों की पहचान यही है कि वे किसी से कुछ मांगते नहीं है और बड़ी बात यह कितब ही संसार में दिखाई देते हैं जबकि वे पहले से नियुक्त श्मशान जा रहे हो या वहां से निकल रहे हों। दूसरा वे कुंभ में नजर आते हैं।अघोरी को कुछ लोग ओघड़ भी कहते हैं। अघोरियों को डरावना या खतरनाक साधु समझा जाता है लेकिन अघोर का अर्थ है अ+घोर यानी जो घोर नहीं हो, डरावना नहीं हो, जो सरल हो, जिसमें कोई भेदभाव नहीं हो। कहते हैं कि सरल बनना बड़ा ही कठिन होता है। सरल बनने के लिए ही अघोरी कठिन रास्ता अपनाते हैं। साधना पूर्ण होने के बाद अघोरी हमेशा- हमेशा के लिए हिमालय में लीन हो जाता है।जिनसे समाज घृणा करता है अघोरी उन्हें अपनाता है। लोग श्मशान, लाश, मुर्दे के मांस व कफन आदि से घृणा करते हैं लेकिन अघोर इन्हें अपनाता है। अघोर विद्या व्यक्ति को ऐसा बनाती है जिसमें वह अपने-पराए का भाव भूलकर हर व्यक्ति को समान रूप से चाहता है, उसके भले के लिए अपनी विद्या का प्रयोग करता है।अघोर विद्या सबसे कठिन लेकिन तत्काल फलित होने वाली विद्या है। साधना के पूर्वमोह-माया का त्याग जरूरी है। मूलत: अघोरी उसे कहते हैं जिसके भीतर से अच्छे-बुरे, सुगंध-दुर्गंध, प्रेम-नफरत, ईर्ष्या-मोह जैसे सारे भाव मिट जाएं। सभी तरह के वैराग्य को प्राप्त करने के लिए ये साधु श्मशान में कुछ दिन गुजारने केबाद पुन: हिमालय या जंगल में चले जाते हैं।अघोरी खाने-पीने में किसी तरह का कोई परहेज नहीं नहीं करता। रोटी मिले तो रोटी खा लें, खीर मिले खीर खा लें, बकरा मिले तो बकरा और मानव शव मिले तो उससेभी परहेज नहीं। यह तो ठीक है अघोरी सड़ते पशु का मांस भी बिना किसी हिचकिचाहट के खा लेता है। अघोरी लोग गाय का मांस छोड़कर बाकी सभी चीजों का भक्षण करते हैं। मानव मल से लेकर मुर्दे का मांस तक।घोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है। अघोरी जानना चाहता है कि मौत क्या होती है और वैराग्य क्या होता है।आत्मा मरने के बाद कहां चली जाती है? क्या आत्मा से बात की जा सकती है? ऐसे ढेर सारे प्रश्न है जिसके कारण अघोरी श्मशान में वास करना पसंद करते हैं। मान्यता है कि श्मशान में साधना करना शीघ्र ही फलदायक होता है। श्मशान में साधारण मानव जाता ही नहीं, इसीलिए साधना में विघ्न पड़ने का कोई प्रश्न नहीं।अघोरी मानते हैं कि जो लोग दुनियादारी और गलत कामों के लिए तंत्र साधना करते हैं अंत में उनका अहित ही होता है। श्मशान में तो शिव का वास है उनकी उपासना हमें मोक्ष की ओर ले जाती है।अघोरी श्मशान घाट में तीन तरह से साधना करते हैं- श्मशान साधना, शव साधना और शिव साधना।>>>>>>>>>>>शव साधना : मान्यता है कि इस साधना को करने के बाद मुर्दा बोल उठता है और आपकी इच्छाएं पूरी करता है। शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। इस साधना का मूल शिव की छाती पर पार्वती द्वारा रखा हुआ पांव है। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप मेंमांस और मदिरा चढ़ाया जाता है।शव और शिव साधना के अतिरिक्त तीसरी साधना होती है श्मशान साधना, जिसमें आम परिवारजनों को भी शामिल किया जा सकता है। इस साधना में मुर्दे की जगह शवपीठ कीपूजा की जाती है। उस पर गंगा जल चढ़ाया जाता है। यहां प्रसाद के रूप में भी मांस-मंदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता है।अघोरियों के पास भूतों से बचने के लिए एक खास मंत्र रहता है। साधना के पूर्व अघोरी अगरबत्ती, धूप लगाकर दीपदान करता है और फिर उस मंत्र को जपते हुए वह चिता के और अपने चारों ओर लकीर खींच देता है। फिर तुतई बजाना शुरू करता है और साधना शुरू हो जाती है। ऐसा करके अघोरी अन्य प्रेत-पिशाचों को चिता की आत्मा और खुद को अपनी साधना में विघ्न डालने से रोकता है। अघोरियों के बारे में मान्यता है कि वे बड़े ही जिद्दी होते हैं। अगर किसी से कुछ मांगेंगे, तो लेकरही जाएंगे। क्रोधित हो जाएंगे तो अपना तांडव दिखाएंगे या भला-बुरा कहकर उसे शाप देकर चले जाएंगे। एक अघोरी बाबा की आंखें लाल सुर्ख होती हैं लेकिन अघोरी की आंखों में जितना क्रोध दिखाई देता हैं बातों में उतनी ही शीतलता होती है। अघोरी की वेशभूषा...कफन के काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी बाबा के गले में धातु की बनी नरमुंड की माला लटकी होती है। नरमुंड न हो तो वे प्रतीक रूप में उसी तरह की माला पहनते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध और पूरे शरीर पर राखमलकर रहते हैं ये साधु। ये साधु अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को 'सींगी सेली' कहते हैं...
कुछ लोग अघोरी तथा नागा साधुऔ को लेकर बकवास करते है की उनके लींग की पुजा की जाती है !!!
सच यह है की सनातन परंपरा के अनुसार पुजा यञ हवन के पश्चात साधु संतो ओर पंडीतो को माध्यम मानकर उनके आशिरवाद लिया जाता है !...परंतु ????...कीसी अंग विशेश की कीसी भी तरह से मान नही होता है !!!
जाकीर नाईक,मुल्ले और अञानी लोग अपनी बकवास के जरीये सनातन को बदनाम कर रहे है !!!...तथा ???...इनका नीशाना अंजान हिन्दु होते है !!!!


सभी " राष्ट्रवादी हिन्दु " ! कृप्या ये पेज लाइक करके हमसे जुड़कर देश को मजबूत बनाने में अपना अहम योगदान देने से हिचकिचायें ना ! यथाशीध्र इस पेज को लाइक कर हमारे प्रयास को बल देकर हमारे देश एवम् धर्म का सम्मान बढ़ायें ! जय हिन्द ! जय श्री राम !

*श्री राधा चालीसा*




   *श्री राधा चालीसा*



श्री राधे वृषभानुजा, भक्तिन प्राणाधार।
वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रणवौं बारंबार॥
जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम।
चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम॥
॥ चौपाई ॥
जय वृषभानु कुँवरि श्री श्यामा, कीरति नंदिनी शोभा धामा॥ (१)
नित्य बिहारिनि श्याम अधारा, अमित मोद मंगल दातारा॥ (२)
रास विलासिनि रस विस्तारिनि, सहचरि सुभग यूथ मन भावनि॥ (३)
नित्य किशोरी राधा गोरी, श्याम प्राण धन अति जिय भोरी॥ (४)
करुणा सागर हिय उमंगिनि, ललितादिक सखियन की संगिनी॥ (५)
दिनकर कन्या कूल विहारिनि, कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि॥ (६)
नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं, राधा राधा कहि हरषावैं॥ (७)
मुरली में नित नाम उचारें, तुम कारण लीला वपु धारें॥ (८)
प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी, श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी॥ (९)
नवल किशोरी अति छवि धामा, धुति लघु लगै कोटि रति कामा॥ (१०)
गोरांगी शशि निंदक बदना, सुभग चपल अनियारे नयना॥ (११)
जावक युत युग पंकज चरना, नुपूर धुनि प्रीतम मन हरना॥ (१२)
संतत सहचरि सेवा करहीं, महा मोद मंगल मन भरहीं॥ (१३)
रसिकन जीवन प्राण अधारा, राधा नाम सकल सुख सारा॥ (१४)
अगम अगोचर नित्य स्वरूपा, ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा॥ (१५)
उपजेउ जासु अंश गुण खानी, कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी॥ (१६)
नित्य धाम गौलोक विहारिनि, जन रक्षक दुख दोष नसावनि॥ (१७)
शिव अज मुनि सनकादिक नारद, पार न पायँ शेष अरु शारद॥ (१८)
राधा शुभ गुण रूप उजारी, निरखि प्रसन्न होत बनवारी॥ (१९)
ब्रज जीवन धन राधा रानी, महिमा अमित न जाय बखानी॥ (२०)
प्रीतम संग देइ गलबाँही, बिहरत नित्य वृन्दावन माँही॥ (२१)
राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा, एक रूप दोउ प्रीत अगाधा॥ (२२)
श्री राधा मोहन मन हरनी, जन सुख दायक प्रफ़ुलित बदनी॥ (२३)
कोटिक रूप धरें नंद नंन्दा, दर्श करन हित गोकुल चन्दा॥ (२४)
रास केलि करि तुम्हें रिझावें, मान करौ जब अति दुख पावें॥ (२५)
प्रफ़ुलित होत दर्श जब पावें, विविध भाँति नित विनय सुनावें॥ (२६)
वृन्दारण्य विहारिनि श्यामा, नाम लेत पूरण सब कामा॥ (२७)
कोटिन यज्ञ तपस्या करहू, विविध नेम ब्रत हिय में धरहू॥ (२८)
तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें, जब लगि राधा नाम न गावें॥ (२९)
वृन्दाविपिन स्वामिनि राधा, लीला वपु तब अमित अगाधा॥ (३०)
स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा, और तुम्हैं को जानन हारा॥ (३१)
श्री राधा रस प्रीति अभेदा, सादर गान करत नित वेदा॥ (३२)
राधा त्यागि कृष्ण को भजि हैं, ते सपनेहुं जग जलधि न तरि हैं॥ (३३)
कीरति कुँवरि लाड़िली राधा, सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा॥ (३४)
नाम अमंगल मूल नसावन, त्रिविध ताप हर हरि मनभावन॥ (३५)
राधा नाम लेय जो कोई, सहजहिं दामोदर बस होई॥ (३६)
राधा नाम परम सुखदाई, भजतहिं कृपा करहिं यदुराई॥ (३७)
यशुमति नन्दन पीछे फ़िरिहैं, जो कोउ राधा नाम सुमिरिहैं॥ (३८)
रास विहारिनि श्यामा प्यारी, करहु कृपा बरसाने वारी॥ (३९)
वृन्दावन है शरण तिहारी, जय जय जय वृषभानु दुलारी॥ (४०)
॥ दोहा ॥
श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम।
करहुँ निरन्तर वास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥