शनिवार, 23 अगस्त 2014

श्री अच्युताष्टकम्



* श्री अच्युताष्टकम् *
रचना: आदि शङ्कराचार्य
अच्युतं केशवं रामनारायणं
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभं
जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥ 1 ॥
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं
माधवं श्रीधरं राधिका राधितम् ।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं
देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे ॥ 2 ॥
विष्णवे जिष्णवे शङ्कने चक्रिणे
रुक्मिणी राहिणे जानकी जानये ।
वल्लवी वल्लभायार्चिता यात्मने
कंस विध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥ 3 ॥
कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण
श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे ।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज
द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥ 4 ॥
राक्षस क्षोभितः सीतया शोभितो
दण्डकारण्यभू पुण्यताकारणः ।
लक्ष्मणोनान्वितो वानरैः सेवितो
अगस्त्य सम्पूजितो राघवः पातु माम् ॥ 5 ॥
धेनुकारिष्टका‌உनिष्टिकृद्-द्वेषिहा
केशिहा कंसहृद्-वंशिकावादकः ।
पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो
बालहोपालकः पातु मां सर्वदा ॥ 6 ॥
बिद्युदुद्-योतवत्-प्रस्फुरद्-वाससं
प्रावृडम्-भोदवत्-प्रोल्लसद्-विग्रहम् ।
वान्यया मालया शोभितोरः स्थलं
लोहिताङ्-घिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥ 7 ॥
कुञ्चितैः कुन्तलै भ्राजमानाननं
रत्नमौलिं लसत्-कुण्डलं गण्डयोः ।
हारकेयूरकं कङ्कण प्रोज्ज्वलं
किङ्किणी मञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥ 8 ॥
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं
प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् ।
वृत्ततः सुन्दरं कर्तृ विश्वम्भरः s
तस्य वश्यो हरि र्जायते सत्वरम् ॥
इति श्री शङ्कराचार्य विरचित श्री  अच्युताष्टकम् समाप्तं

रविवार, 17 अगस्त 2014

श्री बाल मुकुंद स्तोत्रं



***श्री बाल मुकुंद स्तोत्रं***
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् ।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ 
1 ॥
संहृत्य लोकान्वटपत्रमध्ये शयानमाद्यन्तविहीनरूपम् ।
सर्वेश्वरं सर्वहितावतारं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ 
2 ॥
इन्दीवरश्यामलकोमलाङ्गम् इन्द्रादिदेवार्चितपादपद्मम् ।
सन्तानकल्पद्रुममाश्रितानां बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ 
3 ॥
लम्बालकं लम्बितहारयष्टिं शृङ्गारलीलाङ्कितदन्तपङ्क्तिम् ।
बिम्बाधरं चारुविशालनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ 
4 ॥
शिक्ये निधायाद्यपयोदधीनि बहिर्गतायां व्रजनायिकायाम् ।
भुक्त्वा यथेष्टं कपटेन सुप्तं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ 
5 ॥
कलिन्दजान्तस्थितकालियस्य फणाग्ररङ्गेनटनप्रियन्तम् ।
तत्पुच्छहस्तं शरदिन्दुवक्त्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ 
6 ॥
उलूखले बद्धमुदारशौर्यम् उत्तुङ्गयुग्मार्जुन भङ्गलीलम् ।
उत्फुल्लपद्मायत चारुनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ 
7 ॥
आलोक्य मातुर्मुखमादरेण स्तन्यं पिबन्तं सरसीरुहाक्षम् ।
सच्चिन्मयं देवमनन्तरूपं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥ 
8 ॥

|| इति श्री बाल मुकुंद स्तोत्रं संपूर्णम् ||

~~~श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व~~~

*****श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व की मंगलकामनाएँ *****



*गोविन्द दामोदर स्तोत्रं*


करारविन्देन पदार्विन्दं, मुखार्विन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटेशयानं, बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव।
जिव्हे पिबस्वा मृतमेव देव, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
विक्रेतुकामाखिल गोपकन्या, मुरारि पादार्पित चित्तवृतिः।
दध्यादिकं मोहावशादवोचद्, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
गृहे-गृहे गोपवधू कदम्बा:, सर्वे मिलित्वा समवाप्ययोगम्।
पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
सुखं शयाना निलये निजेऽपि, नामानि विष्णोः प्रवदन्तिमर्त्याः।
ते निश्चितं तन्मयतमां व्रजन्ति, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
जिह्‍वे दैवं भज सुन्दराणि, नामानि कृष्णस्य मनोहराणि।
समस्त भक्तार्ति विनाशनानि, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
सुखावसाने इदमेव सारं, दुःखावसाने इदमेव ज्ञेयम्।
देहावसाने इदमेव जाप्यं, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
जिह्‍वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं, सत्यं हितं त्वां परमं वदामि।
आवर्णये त्वं मधुराक्षराणि, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
त्वामेव याचे मन देहि जिह्‍वे, समागते दण्डधरे कृतान्ते।
वक्तव्यमेवं मधुरम सुभक्तया, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
श्री कृष्ण राधावर गोकुलेश, गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो।
जिह्‍वे पिबस्वा मृतमेवदेवं, गोविन्द दामोदर माधवेति॥
     

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

***भारतीय स्वतंत्रता दिवस ***

                                  * जय हिन्द *
  !! स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !!





!! भारतीय राष्ट्रीय गीत !!
वंदे मातरम् ।
सुजलाम् सुफलाम् मलयज् शीतलाम्
सस्यश्यामलम् मातरम् ।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिणिम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम् ।।
वंदे मातरम् ।



!!भारतीय राष्ट्रीय गान !!

जनगणमन-अधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलजलधितरंग
तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मागे,
गाहे तव जयगाथा।
जनगणमंगलदायक जय हे भारतभाग्यविधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

रविवार, 10 अगस्त 2014

**गायत्री कवच**

     

~~~~~~~~रक्षा बन्धन एवं गायत्री जन्मोत्सव महापर्व की हार्दिक शुभकामनाओं सहित~~~~~~~~ 



                                          **गायत्री कवच**

                                     
प्रथम निम्नलिखित वाक्य पढ़कर गायत्री -कवच का विनियोग करे -----
ॐ अस्य श्री गायत्रीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि र्गायत्री छंदों गायत्री देवता ॐ भू: बीजम भुव: शक्ति: स्व: कीलकम गायत्रीप्रीत्यर्थे जपे विनियोग : |
निम्नलिखित श्लोको से गायत्री माताका ध्यान करे 
                  पञ्च वक्त्राम दश भुजाम सूर्यकोटि समप्रभाम |
                 सावित्रीम ब्रहम वरदां चन्द्र कोटि सुशीतलाम ||
                  त्रिनेत्राम सितवक्त्राम च मुक्ताहार विराजिताम |
                  वरा भयांकुशकशा      हेमपात्राक्ष मालिकाम    ||
                  शंखचक्राब्ज युगलं कराभ्याम दधतिम वराम  |
                  सितपंकज संस्थाम च हंसारुढाम सुखस्मिताम ||
                 ध्यात्वेवं मानसाम्भोजे गायत्री कवचम जपेत   |
तदन्तर गायत्री कवच का पाठ करे --
                                    ॐ ब्रहमो वाच
विश्वामित्र ! महा प्राज्ञं ! गायत्री कवचम श्रुणु |
यस्य विज्ञानमात्रेण त्रेलोक्यम वशयेत क्षणात ||
सावित्री में शिर: पातु शिखायाम    मृतेश्वरी  |
ललाटं ब्रहम देवत्या भ्रुवों में पातु वैष्णवी  || 
कर्णों में पातु रुद्राणी सूर्या सावित्रिकाम्बिके |
गायत्री वदनं पातु     शारदा    दशनच्छदो  ||
द्विजान यज्ञप्रिया पातु रसनायां सरस्वती |
सांख्यायनी नासिकाम में कपोलो चंद्रहासिनी ||
चिबुकं वेदगर्भा च कण्ठं   पात्वघनाशिनी  |
स्तनों में पातु इद्राणी ह्रदयं    ब्रहमवादिनी ||
उदरं विश्वभोक्त्री च नाभो पातु सुर प्रिया  |
जघनं नारसिंही  च पृष्ठं    ब्रहमांडधारीणी ||
पार्स्वो में पातु पद्माक्षी गुह्यम गोगोप्त्रीकावतु |
उवोरोकार रूपा च जान्वो: संध्यात्मिका वतु ||
जघ्यो: पातु अक्षोभ्या गुल्फ्योर्ब्रहम शीर्षका |
सूर्या पदद्वयं   पातु  चन्द्रा  पादागुलीषु  च  ||
सर्वांग वेदजननी  पातु में सर्वदा नघा    |
इत्येतत कवचं ब्रहमन गायत्र्या: सर्व पावनम |
पुण्यं पवित्रं    पापघ्नं     सर्वरोगनिवारणं ||
त्रिसंध्यं यः पठे द्विद्वान सर्वान कामानवाप्नुयात |

सर्व शास्त्रार्थतत्वज्ञं: स भवे  द्वे  दवित्तम: ||
सर्वयज्ञफलं प्राप्य ब्रह्मान्ते समवाप्नुयात |
प्राप्नोति जप मात्रेण पुरुषार्था श्चतुर्विधान ||
 || श्री विश्वामित्र संहितोक्तं गायत्री कवचं सम्पूर्णं ||

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

*अमरनाथ की अमर कथा *

                 * अमरनाथ की अमर कथा *

अमरनाथ की अमर कथा शिव कहें सुनै थी पार्वती |
उत्तराखण्ड में लगा के आसन जा बैठे कैलाशापती ||
कैलाशी अविनाशी काशी उत्तराखण्ड बनाई थी |
बैठ गुफा में शिव जी ने गौरा को कथा सुनाई थी ||
अमृत वाणी सुनी उमा नैनां निद्रा भर आई थी |
पूरी कथा एक तोते के बच्चे ने सुन पाई थी ||
हुंकारा देता तोता शिव कहें अर्थ सब समुझाई |
सुआ सुनै था कथा वहीं पर सोती थी गौरा माई ||
पार ब्रह्म का खेल हुआ औ उस तोते की बढ़ी रती |
उत्तराखण्ड में लगा के आसन जा बैठे कैलाशापती ||
हुई कथा सम्पूरण शिव ने गौरा को बुलवाया था |
गिरजा कहे नाथ जी मैंने कुछ भी न सुन पाया था ||
तब शिव जी ने कहा कि मुझको हुंकारा किसने दीन्हा |
दो जनों के बीच तीसरा क्यों करके वह आया था ||
बढ़ा  क्रोध शिव शंकर को कर में त्रिशूल उठाया था |
उसी वक्त तोते का बच्चा उड़ करके वह आया था ||
दौड़े शिव उसके पीछे निकल गया वह सुमतमती |
उत्तराखण्ड में लगा के आसन जा बैठे कैलाशापती ||
तीन लोक में उड़ा वह तोता मिला न कहीं ठिकाना था |
उड़ते –उड़ते वह तोता अपने मन अति घबराना था ||
एक पतिव्रता करे स्नान थी ,उसको उसने पहचाना था |
दौड़ के तोता जाय के फिर उसके मुख में समाना था ||
वहाँ चले क्या जोर किसी का क्यों कर उसको पाना था |
तब शिव जी ने कहा कि तोता यह तो बड़ा सयाना था ||
हुये वही शुकदेव व्यास के पुत्र बड़े ही यती सती |
उत्तराखण्ड में लगा के आसन जा बैठे कैलाशापती ||
अमरकथा का बड़ा महात्तम जो कोई जन गावै है |
श्रवण करे सो होय अमर वह फिर जग में नही आवै है ||
चारों वेद , पुराण अठारह ,छहों शास्त्र यह गावै है |
अमर कथा शुकदेव व्यास जी अपने मुख से गावै है ||
ये तो पंडित बड़े ही सयाने अमर कथा जो गावै है |
और दूसरा बोल न इनके मन को नैक भावै है ||
जब शिव जी ने कही कथा सुनकर नर पावै अमरगती |
उत्तराखण्ड में लगा के आसन जा बैठे कैलाशापती ||
अजब नगर यह बसा जहाँ की झाँकी अब्बल खासी |
बहां जाकर प्रगट भये है अमरनाथ औ अविनाशी ||
साल भरे में मेला लागे श्रावण की पूरनमासी |
जो दर्शन को वहाँ जायेगा जोगी जती और सन्यासी ||
वहाँ तलक तो वही जायेगा ,जिसकी करनी है खासी |
देवीदास यूँ कहें कि वह नर कभी न पावै चौरासी ||
पढ़े सुने नर अमरकथा को भक्ति में नित बढ़ेरती |
 उत्तराखण्ड में लगा के आसन जा बैठे कैलाशापती ||

***जय जय बाबा अमर नाथ *** 

रविवार, 3 अगस्त 2014

*श्री शिव प्रार्थना *

*श्री शिव प्रार्थना *

हे नाथ जानि अनाथ बालक विश्वनाथ महेश्वरम |
करके कृपा दीजो दरश अविनाशी शंकर सुन्दरम ||
आया शरण हूँ आपकी इतनी अनुग्रह कीजिये |
जय चन्द्रमौलि कृपालु अब तुम दरश मोकंह दीजिये ||
ले राम नाम निशंक कीन्हो है गरल आहार तुम |
भव सिन्धु से नैया मेरी कर देना भोला पार तुम ||
मनसा व् वाचा कर्मणा से पाप अति हमने कियो |
आयो शरण शरणागती की सुधि नही अब तक लियो ||
अब तो तुम्हारे हाँथ है गिरजापति मेरी गति |
जय पशुपति जय पशुपति जय पशुपति जय पशुपति ||
जय जयति योगेश्वर तुम्ही बल बुद्धि के हो प्रकाश तुम |
मन मंद बीच निवास करिये जानि जन सुचि राशि तुम ||

लज्जा हमारी राखना शिव आप ही के हाँथ है |
तुमसा न कोई दयालु भक्त कृपालु दीनानाथ है ||
जय ताप मोचन जय त्रिलोचन पुण्य पारावार जय |
कैलाशवासी सिद्धकाशी दया के आधार तुम ||
शिव कृपा के सिन्धु हो जन है शरण जनि फेरिये |
करके कृपा की कोर शंकर दीन जन दिश हेरिये ||
बेल के कुछ पत्र है कुछ पुष्प है मंदार के |
फल है धतूरे के धरे कुछ संग अक्षत धारि के ||
सेवा हमारी तुच्छ है फल कामना मन में बड़ी |
पर आश भोलेनाथ से रहती ह्रदय में हर घड़ी ||
हे विश्वनाथ महेश कृपया भक्ति अपनी दीजिये |
निर्भय निडर निशंक करिए शक्ति अपनी दीजिये ||
हों सत्य व्रतधारी ह्रदय में भावना ऐसी भरे |
जय जय हरे जय जय हरे जय जय हरे जय जय हरे ||
मण्डित जटा में गंग धारा ताप लोकों के हरे |
शशिभाल तब यश चन्द्रिका सब के ह्रदय शीतल करे ||
वर दे वरद वरदानियों धन धान्य से धरती भरे |
जय शिव हरे जय शिव हरे जय शिव हरे जय शिव हरे ||       
   *****हर हर महादेव ******