सोमवार, 28 अगस्त 2017

#गायत्री_मन्त्र

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि धियो, यो नः प्रचोदयात् ।।
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आकाश में अरबो तारे.... ये छोटे छोटे टिम टीमाते तारे इन में से ज्यादातर सूरज से कई कई गुना ज्यादा बड़े होते है। काम वो ही इन का भी जो सूरज करता है :- न्यूक्लियर फ्यूज़न, हाईड्रोजन के एटामिक न्यूक्लियस आपस में जुड़कर हीलियम के न्यूक्लियस में तब्दील होते रहते हैं। इस दौरान कुछ मैटर खत्म होकर एनर्जी (उर्जा) देते हैं ।
हम उस उर्जा की कल्पना भी नहीं कर सकते जैसे सूरज को ही ले लो 15 मिलियन डिग्री तापमान होता है एक सेकंड में 4 मिलियन टन तत्व बदल जाते हैं उर्जा में। तो सोचो उन तारो में क्या नहीं होता होगा । अरबो प्रकाश वर्ष दूर ये तारे।
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ऐसे ही अन्तरिक्ष में Quasar क्वासर भी होते हैं ये सूरज तारो जैसे नहीं होते। ये आकाशगंगा (Galaxy) जैसे भी नहीं होते। ये क्या होते है वो विजय सिंह ठकुराय Uday Singh जी ने पोस्ट में मिलेगा (लिंक कमेन्ट बॉक्स में )।
मैं अपनी भाषा में लिखता हूँ पहला क्वासर खोजा गया 1960 में टी० मैथ्यू तथा एंडसैन्सेज नामक खगोलज्ञों के द्वारा। इस का नाम रखा गया 3C 273. अब ज्यादा गहराई मैं नहीं जाते।
तो कुल मिला के क्वासर तारा नहीं है सूरज नहीं है आकाशगंगा नहीं है। इस को एक शक्ति पुंज समझ लो इस में इतनी उर्जा है जितनी 1 ट्रिलियन सूरज जैसे सितारों में होती है ये एक अनुमान है इस से भी ज्यादा हो सकती है इस से कई नई आकाशगंगाएं पैदा होती हैं।
खगोलवैज्ञानिक अभी तक भीषण ऊर्जा की इस पहेली को सुलझा नहीं पायें हैं। वैज्ञानिक यह नही समझ पा रहे हैं कि किस भौतिक प्रक्रिया के द्वारा क्वासर इतनी भीषण ऊर्जा, प्रकाश पैदा करते हैं। आज भी उन के लिए ये पहेली ही है वो इन के वर्ण कर्म को नहीं समझ पा रहे। (मेरे भी समझ नहीं आ रहा)
क्वासर में प्रकाश है उर्जा है ब्लैक होल है तीन शक्तियां हैं।
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अब और आसान भाषा में लिखता हूँ
Quasar क्वासर का जिक्र कूरान और बाइबल में भी है..... होगा ही जब वेदों में होगा तो दुनिया की हर किताब में कॉपी पेस्ट तो होगा ही।
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ऐसे ही अपना गायत्री मन्त्र दुनिया की हर भाषा में है।
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#तीन_शक्तियां
संतान धर्म में ट्रिनिटी त्रिदेव #ब्रह्मा_विष्णु_शिवा #क्रिएटर_मीडिएटर_डिस्ट्रॉयर ।
इनकी शक्ति माँ #सरस्वती_लक्ष्मी_पार्वती।
हिन्दू धर्म में मानव अवतारों को छोड़ कर सभी देवी देवता किसी न किसी तत्व का रूपकात्मक रूप है (COSMIC ALLEGORIES).
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त्रिदेव अधूरे है अपनी शक्ति के बिना :- शिव को विनाशकारी (डिस्ट्रॉयर) माना गया है शिव की शक्ति माँ पार्वती जो काली के रूप अंतिम संहारक है काली माँ और शिव की चित्र आपने देखे होंगे जहाँ शिव काली के चरणों में जिस पर बहुत सी कहानी बनी हैं असल में अंतिम संहारक है काली माँ #black_hole ब्लैक होल।
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ऐसे ही ब्रह्मा जी जो निर्माता हैं क्रिएटर हैं उन की शक्ति माँ सरस्वती जी जो प्रकाश की देवी है प्रकाश का रूपकात्मक रूप माँ सरस्वती। (सरस्वती, सवित्र गायत्री मन्त्र में “तत्सवितुर्वरेन्यं” और विज्ञान में QUASAR)
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ब्रह्मांड के निर्माण में माँ सावित्री की प्रमुख भूमिका है।
भगवान ब्रह्मा के आशीर्वाद के साथ, सावित्री ने चार वेदों को मानव जाति को सौंप दिया – (संस्कृत भाषा के सुंदर रूप श्रुतियों के माध्यम से।)
इन में ही एक श्रुति या मन्त्र या छंद जिस को “गायत्री मन्त्र” कहा जाता है
वैदिक मीटर में गायत्री मंत्र के 24 अक्षर के 3 छंद होते हैं ।
भगवद गीता के अध्याय 10 के 35 श्लोक में भगवान् कृष्ण जी ने भी जिक्र किया है ।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर: ॥
गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छन्दों में “गायत्री छन्द” हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसन्त मैं हूँ ॥
गायत्री मन्त्र का सूर्य से कुछ लेना देना नहीं| सूर्य इस पृथ्वी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है मगर ब्रह्मांड का एक मामूली सा हिस्सा है माँ सावत्री या क्वसार ऐसे अरबो सूर्य तारो की माता हैं |
7000 हज़ार साल पहले ऋग्वेद 3.62.19
तत सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि |
tat saviturvareṇyaṃ bhargho devasya dhīmahi |
May we attain that excellent glory of #Savitar_the_God:
हम माँ सावित्री के उस महान गौरव को प्राप्त कर सकते हैं
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ऋग्वेद 3.62.20
धियो यो नः परचोदयात |
dhiyo yo naḥ pracodayāt |
So May he stimulate our prayers.
इसलिए वह हमारी प्रार्थनाओं को प्रोत्साहित करने की कृपा करे ।
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ऋग्वेद 3.62.21
देवस्य सवितुर्वयं वाजयन्तः पुरन्ध्या |
devasya saviturvayaṃ vājayantaḥ purandhyā |
With understanding, earnestly, of Savitar the God we crave
हे देव हम समझदारी, ईमानदारी के साथ , माँ सावित्री से जुड़ना चाहते हैं (लालसा या तलाश)
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ऋग्वेद 3.62.23
देवं नरः सवितारं विप्रा यज्ञैः सुव्र्क्तिभिः |
devaṃ naraḥ savitāraṃ viprā yajñaiḥ suvṛktibhiḥ |
Men, singers worship Savitar the God with hymn and holy rites,
देव नर गायक हम सब माँ सावित्री की आराधना करते हैं
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एक मित्र बोले की गायत्री मन्त्र में की शुरुवात ॐ से नहीं होती
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं ।
ये मन्त्र यजुर्वेद में है
ॐ भूर्भुवः
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ॐ – “श्री यंत्र की ज्यामिति”
भू - "पृथ्वी"
भवस- "वायुमंडल"
स्वः - "प्रकाश"
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गायत्री मन्त्र को सावित्री मन्त्र भी बोला जाता है।
गायत्री मतलब :- ब्रह्म का अथर्व गान,
गायतो मुखाद् उदयपदिती गायत्री
परमात्मा से मुख से निकलने वाला प्रथम गीत
वो गायत्री कहलाता है
गायत्री मन्त्र में माँ सावित्री की आराधना होती है माँ सावित्री प्राण है जीवन शक्ति है
Quasar (क्वासर) माँ सावित्री ही है शक्ति पुंज है उर्जा का प्रकाश का और संहारक।
7000 हज़ार साल पहले ये ज्ञान विश्वामित्र ने दिया था विश्वामित्र मतलब विश्व का मित्र। और ये गोरे 1960 में ले कर आ रहे हैं जिस को अभी भाई नहीं सुलझा सके।
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#गायत्री_मन्त्र है #गायत्री_माता       
कोई नहीं।
बाकि वंदना आप किसी भी रूप में कर सकते हो जैसे सिम्पल मैं करता हूँ :-
हे सरस्वती माँ उर्जा की देवी मैं आपकी वंदना करता हूँ आप का स्वागत करता हूँ मेरे जीवन में मुझ पर कृपा बनाये रखना ।
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बाकि अपने ऋषि जो आज कल के खगोलज्ञों के भी गुरु थे उन का लिखा इतना छोटा नहीं हो सकता जिनता ये पंडे शंकराचार्य और संत बताते हैं।
इतना भी मुस्किल नहीं कुछ समझना मगर आपको तो डराया जाता है की गुरु बिन ज्ञान नहीं विवेक नहीं बुधि नहीं धन नहीं तो गुरु के साथ मिल कर बोलो :-
ॐ (परमात्मा) भूः (प्राण स्वरूप) भुवः (दुःख नाशक) स्वः (सुख स्वरूप) तत् (उस) सवितुः (तेजस्वी) वरेण्यं (श्रेष्ठ) भर्गः (पाप नाशक) देवस्य (दिव्य) धीमहि (धारण करें) धियो (बुद्धि) यः (जो) नः (हमारी) प्रचोदयात (प्रेरित करें)।
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उस प्राण स्वरूप, दुखनाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देव स्वरूप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करें।
"सुख दुःख में उलझे रहो गुरु के साथ"
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आने वाले समय में मम्मी बच्चो को गायत्री मन्त्र सुना के स्कूल भेजेगी और अर्थ बताएगी स्कूल की गायत्री मैडम जो पढाती है वो ही प्रकाश है उस से बुद्धि को सन्मार्ग मिलता है।
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बाकि आपके लिए ईश्वर से कामना करता हूँ की सावत्री माँ हम सब को अच्छे स्वास्थ्य, जीवन शक्ति, दीर्घायु, धन, सफलता, सहयोग, प्यार, बौद्धिक उन्नति और आत्म की दिव्यता का अनुभव कराये ।

संत या साधु बनने की प्रक्रिया

सनातन धर्म में सन्यास लेने अर्थात संत या साधु बनने की प्रक्रिया
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ वैदिक हिन्दू सनातन धर्म में सन्यास लेने की एक शास्त्र सम्मत प्रक्रिया है और मर्यादा रेखा भी सुनिश्चित है |
वानप्रस्थ समाप्ति के पश्चात (७५ वर्ष की आयु के बाद ) सन्यास लेना श्रेयकर माना जाता है और इसे पन्द्रहवां संस्कार भी कहते हैं |
यदि किसी व्यक्ति की वानप्रस्थ में प्रवेश से पूर्व ही सांसारिक बन्धनों से विरक्ति हो जाती है तो वह व्यक्ति किसी सन्यासी द्वारा दीक्षा लेकर सन्यास आश्रम में प्रवेश पाने का अधिकारी होता है |

सन्यासी जीवन बेहद कठिन है, जिसमें कठिन तप से गुजरना पड़ता है। सभी इंद्रियों सहित काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और तृष्णा को समाप्त कर चित्त को इष्ट की आराधना में एकाग्र करना होता है।
सेवा भाव, इष्ट के प्रति समर्पण, मोक्ष की कामना और शून्यता की ओर लगातार अग्रसर होना सन्यासी की दिनचर्या है।
सन्यास आश्रम में प्रवेश लेने के लिए किसी अखाड़े में जाकर अपनी इच्छा व्यक्त करनी होती है |
इसके पश्चात अखाडा व्यक्ति के सांसारिक विरक्ति होने और ब्रह्मचर्य भाव की परीक्षा लेता है |
इस परीक्षा में उतीर्ण होने के पश्चात ही सन्यास की दीक्षा दी जाती है | परीक्षा इतनी कड़ी होती है कि कई बार वर्षों का समय लग जाता है |
एक बार व्यक्ति अखाडा की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया तब उसे पंच गुरु दीक्षा दी जाती है | जिसमे उसे लंगोटी, चोटी, भभूत, रुद्राक्ष एवं भगवा अलग - अलग गुरुओं द्वारा प्रदान किया जाता है |
इसके पश्चात विर्जा हवन दीक्षा दी जाती है जिसमें व्यक्ति जनेऊ पहन, हाथ में दण्ड - कमंडल लेकर नदी के तट पर जाता है। वहां पर उसे परिवार के सदस्यों सहित खुद का पिण्डदान करना होता है।
स्वयं का पिण्डदान करने के बाद ही उस महापुरुष का सन्यास जीवन में प्रवेश होता है और तब वह सन्यासी कहलाता है। इसके पश्चात उस व्यक्ति के लौकिक जगत के सभी बंधन समाप्त माने जाते हैं |
यह सन्यास का पहला चरण है, इसके पश्चात अपनी - अपनी इच्छा, सामर्थ्य, गुरु कृपा एवं भगवत कृपा के अनुरूप सन्यासी विभिन्न कठिन चरणों को पार करते हैं |
जिसने यह प्रक्रिया पूरी की हो वही सन्यासी कहलाने का अधिकारी है |
ऐसे किसी सन्यासी ने आज तक कोई पंथ नहीं चलाया है |
ऐसे सन्यासी न तो वेद निंदा करते हैं न ही किसी को चमत्कार का प्रलोभन देते हैं, न ही सड़कों पर कभी अराजकता फैलाते हैं | इनके पास एक से बढ़कर एक सिद्धियाँ मिल जाएंगीं पर ये लोग उसका उपयोग अपने चेले बढ़ाने और डेरा बनाने में नहीं करते |
अब प्रश्न यह है कि ओशो से लेकर आशाराम ....और राम - रहीम तक किस अखाड़े में दीक्षित हैं | कौन है इनका गुरु ..किसने इन्हें मर्यादा का ज्ञान दिया |
इन्होने विरक्ति और ब्रह्मचर्य की कौन सी परीक्षा पास की है | उत्तर सब जानते हैं ...
तब इन्हें किस अधिकार से सन्यासी , बाबा या साधू महराज कहा जाता है ?
स्पष्ट है कि ऐ लोग सन्यासी के पाँव की धूलि भी नहीं हैं |
फिर दोष तो उनका है जो इन आडम्बर झंडाधारियों को बाबा, साधू और सन्यासी की उपमा देते हैं |
दोष उस मानसिकता का है जो कर्म के सिद्धांत को न मानकर किसी ढोंगी में चमत्कार खोजती फिरती है |
यह समाज में विद्यमान तमाम ढोंगी चालबाजों के लिए सुनहरा अवसर होता है | इन लोगों को चमत्कार चटनी के दोनो से लेकर राधे अम्माँ की गोद तक में मिलने लगता है |
इन्हें सम्भोग में समाधि के दर्शन होने लगते हैं | इनको बंगाली बाबा से पुत्ररत्न मिलने लगता है और इन्हें राम - रहीम की चिलम में ईश्वर के साक्षात दर्शन होते हैं |
ऐसे चमत्कार लोलुप लोग पाला बदलने में भी समय नहीं लगाते ..
मुर्दों की कब्र यानी कि दरगाहों पर माथा रगड़ते भी यही मिलेंगे हैं | टेरेसा के एजेंडे को ऐसे ही लोगों की मानसिकता खाद पानी देती है |
चमत्कार के झांसे में ऐसे ही लोगों के घर की इज्जत नीलाम होती है |
आर्यपुत्र इस चमत्कार लोलुप मानसिकता को त्याग गीता वर्णित कर्म के सिद्धांत का अनुपालन करो, यह संसार चमत्कारों की चमक से नहीं भुजदंडों के कौशल से चलता है !!
आपका अपना ही !

शनिवार, 19 अगस्त 2017

यह है नक्षत्र वाणी


यह है नक्षत्र वाणी



पुष्य नक्षत्र वेद मंत्र :👇
जब किसी व्यक्ति को विशेष कष्ट हो तब निदान हेतु जन्म नक्षत्र के मंत्र का जप करना या कराना चाहिए |मंत्र नीचे दे रहा हूँ :-
वैदिक ज्योतिष में महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों के वेद मंत्र निम्नलिखित हैं
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अश्विनी नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ अश्विनौ तेजसाचक्षु: प्राणेन सरस्वती वीर्य्यम वाचेन्द्रो बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम । ॐ अश्विनी कुमाराभ्यो नम: ।
भरणी नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ यमायत्वा मखायत्वा सूर्य्यस्यत्वा तपसे देवस्यत्वा सवितामध्वा नक्तु पृथ्विया स गवं स्पृशस्पाहिअर्चिरसि शोचिरसि तपोसी।
कृतिका नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ अयमग्नि सहत्रिणो वाजस्य शांति गवं वनस्पति: मूर्द्धा कबोरीणाम । ॐ अग्नये नम: ।
रोहिणी नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ ब्रहमजज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमत: सूरुचोवेन आव: सबुधन्या उपमा अस्यविष्टा: स्तश्चयोनिम मतश्चविवाह ( सतश्चयोनिमस्तश्चविध: ) ॐ ब्रहमणे नम: ।
मृगशिरा नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ सोमधेनु गवं सोमाअवन्तुमाशु गवं सोमोवीर: कर्मणयन्ददाति यदत्यविदध्य गवं सभेयम्पितृ श्रवणयोम । ॐ चन्द्रमसे नम: ।
आर्द्रा नक्षत्र वेद मंत्र👇
ॐ नमस्ते रूद्र मन्यवSउतोत इषवे नम: बाहुभ्यां मुतते नम: । ॐ रुद्राय नम: ।

पुनर्वसु नक्षत्र वेद मंत्र :👇
ॐ अदितिद्योरदितिरन्तरिक्षमदिति र्माता: स पिता स पुत्र: विश्वेदेवा अदिति: पंचजना अदितिजातम अदितिर्रजनित्वम । ॐ आदित्याय नम: ।
ॐ बृहस्पते अतियदर्यौ अर्हाद दुमद्विभाति क्रतमज्जनेषु । यददीदयच्छवस ॠतप्रजात तदस्मासु द्रविण धेहि चित्रम । ॐ बृहस्पतये नम: ।
अश्लेषा नक्षत्र वेद मंत्र :👇
ॐ नमोSस्तु सर्पेभ्योये के च पृथ्विमनु:। ये अन्तरिक्षे यो देवितेभ्य: सर्पेभ्यो नम: । ॐ सर्पेभ्यो नम:।
मघा नक्षत्र वेद मंत्र :👇
ॐ पितृभ्य: स्वधायिभ्य स्वाधानम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: । प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य स्वधानम: अक्षन्न पितरोSमीमदन्त: पितरोतितृपन्त पितर:शुन्धव्म । ॐ पितरेभ्ये नम: ।
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र वेद मंत्र👇
ॐ भगप्रणेतर्भगसत्यराधो भगे मां धियमुदवाददन्न: । भगप्रजाननाय गोभिरश्वैर्भगप्रणेतृभिर्नुवन्त: स्याम: । ॐ भगाय नम: ।
उत्तराफालगुनी नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ दैव्या वद्धर्व्यू च आगत गवं रथेन सूर्य्यतव्चा । मध्वायज्ञ गवं समञ्जायतं प्रत्नया यं वेनश्चित्रं देवानाम ।
ॐ अर्यमणे नम: ।
हस्त नक्षत्र वेद मंत्र :👇

ॐ विभ्राडवृहन्पिवतु सोम्यं मध्वार्य्युदधज्ञ पत्त व विहुतम वातजूतोयो अभि रक्षतित्मना प्रजा पुपोष: पुरुधाविराजति । ॐ सावित्रे नम: ।
चित्रा नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ त्वष्टातुरीयो अद्धुत इन्द्रागी पुष्टिवर्द्धनम । द्विपदापदाया: च्छ्न्द इन्द्रियमुक्षा गौत्र वयोदधु: । त्वष्द्रेनम: । ॐ विश्वकर्मणे नम: ।
स्वाती नक्षत्र वेद मंत्र :👇
ॐ वायरन्नरदि बुध: सुमेध श्वेत सिशिक्तिनो युतामभि श्री तं वायवे सुमनसा वितस्थुर्विश्वेनर: स्वपत्थ्या निचक्रु:। ॐ वायव नम: ।
विशाखा नक्षत्र वेद मंत्र :👇

ॐ इन्द्रान्गी आगत गवं सुतं गार्भिर्नमो वरेण्यम । अस्य पात घियोषिता । ॐ इन्द्रान्गीभ्यां नम: !
अनुराधा नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ नमो मित्रस्यवरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत गवं सपर्यत दूरंदृशे देव जाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्योयश गवं सत । ॐ मित्राय नम: ।
ज्येष्ठा नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ त्राताभिंद्रमबितारमिंद्र गवं हवेसुहव गवं शूरमिंद्रम वहयामि शक्रं पुरुहूतभिंद्र गवं स्वास्ति नो मधवा धात्विन्द्र: । ॐ इन्द्राय नम: ।
मूल नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ मातेवपुत्रम पृथिवी पुरीष्यमग्नि गवं स्वयोनावभारुषा तां विश्वेदैवॠतुभि: संविदान: प्रजापति विश्वकर्मा विमुञ्च्त । ॐ निॠतये नम: ।
पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र वेद मंत्र :👇
ॐ अपाघ मम कील्वषम पकृल्यामपोरप: अपामार्गत्वमस्मद यदु: स्वपन्य-सुव: । ॐ अदुभ्यो नम: ।
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र वेद मंत्र :👇
ॐ विश्वे अद्य मरुत विश्वSउतो विश्वे भवत्यग्नय: समिद्धा: विश्वेनोदेवा अवसागमन्तु विश्वेमस्तु द्रविणं बाजो अस्मै ।
श्रवण नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ विष्णोरराटमसि विष्णो श्नपत्रेस्थो विष्णो स्युरसिविष्णो धुर्वोसि वैष्णवमसि विष्नवेत्वा ।
ॐ विष्णवे नम: ।
धनिष्ठा नक्षत्र वेद मंत्र :👇
ॐ वसो:पवित्रमसि शतधारंवसो: पवित्रमसि सहत्रधारम । देवस्त्वासविता पुनातुवसो: पवित्रेणशतधारेण सुप्वाकामधुक्ष: । ॐ वसुभ्यो नम:।
शतभिषा नक्षत्र वेद मंत्र :👇

ॐ वरुणस्योत्त्मभनमसिवरुणस्यस्कुं मसर्जनी स्थो वरुणस्य ॠतसदन्य सि वरुण स्यॠतमदन ससि वरुणस्यॠतसदनमसि । ॐ वरुणाय नम: ।
पूर्वभाद्रपद नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ उतनाहिर्वुधन्य: श्रृणोत्वज एकपापृथिवी समुद्र: विश्वेदेवा ॠता वृधो हुवाना स्तुतामंत्रा कविशस्ता अवन्तु । ॐ अजैकपदे नम:।
उत्तरभाद्रपद नक्षत्र वेद मंत्र:👇
ॐ शिवोनामासिस्वधितिस्तो पिता नमस्तेSस्तुमामाहि गवं सो निर्वत्तयाम्यायुषेSत्राद्याय प्रजननायर रायपोषाय ( सुप्रजास्वाय ) ।
ॐ अहिर्बुधाय नम: ।
रेवती नक्षत्र वेद मंत्र :👇
ॐ पूषन तव व्रते वय नरिषेभ्य कदाचन । स्तोतारस्तेइहस्मसि । ॐ पूषणे नम: ।