शनिवार, 16 दिसंबर 2017

वायु प्रदूषण

#प्रदूषण #भाग - 2
बढ़ते वायु प्रदूषण और स्मॉग के बीच घर के भीतर शुद्ध वायु मिल सके, इसके उपाय करना बेहद जरूरी है। घर के भीतर भी वायु में हानिकारक गैसें व सूक्ष्मकण मौजूद रहते हैं, जोकि बाह्य वातावरण की तुलना में स्वास्थ्य के लिए कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकते हैं। दरअसल इमारत व फर्नीचर बनाने की सामग्री में कई ऐसे तत्वों की मौजूदगी रहती है, जो वायु में फॉरमलडिहाइड जैसे हानिकारक तत्व रिलीज करते हैं, जिनके संपर्क में लंबे समय तक रहने से कैंसर, अस्थमा व एलर्जी इत्यादि गंभीर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। इनसे बचने के लिए सहज व सस्ते विकल्प मौजूद हैं। इस क्रम में नेचुरल एयर प्यूरीफायर का काम करने वाले खूबसूरत इनडोर प्लांट्स को इंटीरियर डेकोरेशन का हिस्सा बनाना एक बेहतर विकल्प है --
1989 में हुए #नासा के ''#क्लीन_एयर_स्टडी'' से यह पता लगा कि घर की हवा को ताजा करने के लिए पौधे बेस्ट होते हैं। घर के अंदर की हवा में काफी मात्रा में बेंजीन, ट्राइक्लोरोथिलीन, अमोनिया जैसे कई तरह के नुकसान देने वाले रसायन होते हैं। लेकिन नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि घर के अंदर बढ़ते वायु-प्रदूषण को कम करने में ये पौधे हथियार के रूप में काम करते हैं। कुछ पौधे ऐसे होते हैं कि हमारे घरों, सार्वजनिक स्थलों और कार्यालयों के अंदर की हानिकारक गैसों को 85% तक अपने अंदर समा लेते हैं।ये पौधे सिर्फ़ हानिकारक गैसों से निपटारा ही नहीं करते, बल्कि घरों को सुंदर भी बनाते हैं। अच्छी सेहत और साफ हवा के लिए अपने घरों में इन पौधों को ज़रूर लगाएं।


1. #Anthurium_andraeanum ( राजहंस लिली ) --
राजहंस लिली हवा में नमी और वाष्प को बनाए रखती है. यह ज़ाइलीन और टोल्यूनि जैसी हानिकारक गैसों को अपने अंदर समा लेती हैं।
2. #Gerbera_jamesonii (ट्रांसवाल डेजी) --
यह उजले फूलों वाला पेड़ हवा में मौजूद विषेलै पदार्थों को खत्म कर देता हैं। इस पौधे को गर्म जगह पर रखना चाहिएं।
3. #Scindapsus (गोल्डन लोटस) --
गोल्डेन लोटस छाया में बढ़ने जहरीला पौधा वाला पौधा है। यह घर की हवा को साफ रखने के लिए बढ़िया हैं। इस पेड़ से बच्चों और जानवरों से दूर रखना चाहिए।
4. #Aglaonema (चीनी सदाबहार) --
इस सदाबहार पौधे को बढ़ने के लिए ज़्यादा प्रकाश की अावश्यकता नहीं होती। लेकिन इसे अधिक नमी वाली हवा की ज़रूरत होती है। यह पौधा हवा से बेंजीन जैसे पदार्थों को फिल्टर कर हवा को शुद्ध बना देता हैं।
5. #Chlorophytum ( ’मकड़ी संयंत्र’) --
अगर आप पौधों की देखभाल के लिए समय निकालने में असमर्थ हैं तो भी इस पौधे को घर के भीतर रखने में कोई परेशानी नहींहै। छोटे-छोटे सफेद फूलों व घनी पत्तियों वाला यह खूबसूरत पौधा समुचित देखभाल के अभाव में भी जीवित रहता है और वायु को शुद्ध करता है। लेदर, रबर और प्रिटिंग मैटेरियल में इस्तेमाल किए जाने वाले तत्व जाइलीन, बेन्जीन, फॉरमलडिहाइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसी विषैली गैसों से यह वातावरण
को मुक्त करता है। अगर आपके घर में पालतू जानवर हैं तो उनके लिहाज से भी यह पौधा सुरक्षित है।
6. #Ivy_or_Hedera (हेडरा) --
यह पौधा कम प्रकाश वाली जगह लगाया जाता है अौर घर में मौजूद हानिकारक गैसों को खत्म करने में मददगार साबित होता हैं।आइवी पौधा अपने रोपण के छह घंटे के भीतर ही हवा को शुद्ध करना शुरू कर देता है. यह हवा में मौजूद अवशिष्ट कणों को 58 प्रतिशत और हानिकारक विषाक्त कणों को 60 प्रतिशत तक दूर कर देता है.
7. #Azalea (अज़ेलिया) --
यह पौधा आपके प्लाईवुड, फर्नीचर और कार्पेट से आने वाली स्मेल को खत्म कर देता हैं। अगर इसको ध्यान से रखा जाए, तो यह काफी लंबे समय तक जीवित रहता हैं।
8. #Sansevieria (’मदर-इन-लॉ की जीभ’)
इस पौधे को मदर-इन-लॉज-टंग के नाम से भी जाना जाता है। वायु में मौजूद खतरनाक तत्व फॉरमलडिहाइड को फिल्टर करने के लिहाज से यह बेस्ट है। उपरोक्त हानिकारक तत्व आमतौर पर केमिकल बेस्ड क्लीनर्स, पेंट्स, टॉयलेट पेपर, टिश्यूज और पर्सनल केयर प्रोडक्टस के जरिए वातावरण में रिलीज होता रहता है। चूंकि इस पौधे को ज्यादा धूप की जरूरत नहीं होती और यह नमीयुक्त वातावरण में जीवित रह सकता है, इसलिए स्नेक प्लांट के गमले को बाथरूम में लगाना अच्छा आइडिया है। एक अन्य मामले में स्नेक प्लांट दूसरे पौधों से उलटा है। रात में यह कार्बन डाइ ऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन रिलीज करता है, इसलिए इसे बेडरूम में लगाना अच्छा रहता है।


9. #Dracaena_marginata (ड्रकेना प्लांट) --
यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला पौधा हानिकारक गैस ज़ाइलीन अौर ट्राईक्लोरोइथीलीन को मिटा देता हैं।
10. #Philodendron (फ़िलडिन्ड्रन) --
इस पौधे को कम प्रकाश पर रखने पर भी इसके विकास पर कोई असर नहीं पड़ता। इसकी देखभाल करना तो आसान है लेकिन एक बात याद रखने योग्य ये है कि यह बच्चों और जानवरों के लिए खतरनाक हो सकता हैं।
11. #Nephrolepis (’बोस्टन फर्न’)
यह हवा में नमी कायम रखने और कार्बन मोनो ऑक्साइड को खत्म करने वाला पौधा हैं। इसे रोजाना पानी की आवश्यकता होती हैं।
12. #Spathiphyllum ( ’शांत लिली’)
पीस लिली घरों में आम दिखने वाला पौधा है, जो हर तरह की हानिकारक गैसों को निपटारा करता हैं। यह धूल को भी समाप्त करता है और घर की हवा को शुद्ध रखता हैं।पीस लिली का पौधा हवा में मौजूद हानिकारक कणों और रोगाणुओं को दूर करके हवा शुद्ध करता है. घर व आसपास की हवा को शुद्ध करने के लिए पीस लिली के तीन से चार पौधे पर्याप्त और प्रभावी हैं.
13. #Bamboo_palm (बांस पाम) --
यह पौधा भी हानिकारक गैसों को फिल्टर करने का काम करता हैं। इसे फर्नीचर के बगल में रखने पर यह उसमें मौजूद कैमिकल को वाष्प में बदल कर खत्म कर देता हैं।
आजकल ये पौधा काफी पसंद किया जा रहा है। घरों के अलावा इसे आॅफिस टेबल पर भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे आप घर में कहीं भी लगा सकते हैं। यह हवा से बेनजीन, फाॅर्मेल्डीहाइड और ट्राइक्लोरोथीन जैसे केमिकल्स को साफ करता है और हवा में नमी बनाए रखता है।
14. #Schefflera ( स्कीफलेरा) --
इस पौधे को कुछ देशों में ''अंब्रेला ट्री'' भी कहा जाता हैं। यह पौधा भी घर की हानिकारक गैसों को खत्म करता हैं।
15. #Chrysanthemum (गुलदाउदी) --
यह फूल का पौधा सिर्फ़ आपके घरों को डेकोरेट करने का काम ही नहीं करता, बल्कि विषैली गैसों को खत्म करने का भी काम करता हैं।
16.#तुलसी --
तुलसी को ऑक्सीजन को उत्पादित करने वाली फैक्टरी कहा जाये तो गलत नहीं होगा। क्योंकि हमें तुलसी और पीपल के पेड़ से 24 में से 20 घंटे ऑक्सीजन मिलती है। साथ ही यह हमारे आस पास के वातावरण को शुद्ध रखता है।
17. #एलोवेरा --
एलोवेरा हमारे शरीर के कई बीमारियों को दूर करने में सबसे अच्छा होता है। इसको साथ ही इसमें पाये जाने वाले ईथाइल एसिटेट, ऐसटोन, एमोनिया जैसे योगिक बाहरी प्रदूषण को सोख कर वातावरण को अच्छा बनाते है। इसकी पत्तियों से मिलने वाला पारदर्शी जेल हमारी त्वचा एवं शरीर में होने वाले विषाक्त पदार्थों के बाहर निकालकर त्वचा तो साफ सुंदर चमकदार बनाता है एवं शरीर को बीमारियों से बचाता है।
#विशेष - पर्यावरण को बनाए रखने के लिए हर साल भले ही लाखों रुपये खर्च कर भारी संख्या में पौधरोपण किया जा रहा हो, पर हरियाली बढ़ने के बजाए दिन ब दिन मिटती जा रही है। इसे विभाग की लापरवाही कहें या लोगों में जागरूकता की कमी, वजह जो भी हो, हरियाली बचाने के लिए सभी को आगे आना होगा।
जहरीली गैसों को कम करने के लिए ये पौधे बेहद काम आ सकते हैं। इन पौधों को एयर फिल्टरिंग प्लांट ऐसे ही नही कहा जाता है। खुजली, जलन, लगातार जुकाम, एलर्जी और आंखों में जलन से बचाव में ये पौधे आपकी सहायता करेंगे। भारत में इस तरह के पौधों में एलो वेरा, लिली, स्नेक प्लांट (नाग पौधा), पाइन प्लांट (देवदार का पौधा) मनी प्लांट, अरीका पाम और इंग्लिश आइवी जो आपको आसानी से उपलब्ध हो जाते है और इनकी कीमत 100 rs. से स्टार्ट है और मैक्स 500rs./प्लांट तक है और स्वच्छ सांसों के लिए बहोत कम कीमत है ।।

शनि 5 दिसंबर से 7 जनवरी तक अस्त

. समय कभी भी बदल सकता है. यही समय की पहचान है कि वो बदलता रहता है. यही बदलाव ही वो कारण जिससे लोगों को अच्छे-बुरे दिन जिन्दगी में सामना करना पड़ता है
आप को बता दें कि हर कोई ये जानना चाहता है कि उसका आने वाला समय कैसे रहने वाला है इसके लिए बहुत सारे लोग राशिफल पर भरोसा करते है. राशि के अनुसार बड़ा बदलाव होने वाल है जिसके बाद कई राशि के लोगों के लिए बड़ा बदलाव आने वाल है. इस बदलवा का सीधा असर लोगों के आने वाले समय पर पड़ेगा. समय के बदलाव में जहाँ कई लोगों को लाभ होगा वही कई लोगों को हानि भी हो सकती है.

हम में से अधिकतर लोग अपनी कुंडली जरुर बनवाते है जिससे उन्हें पता चल सके कि उनके जीवन में कौन से पड़ाव में कैसे समय का सामना करना पड़ेगा. कुंडली के अनुसार हमें अपने जीवन के विभिन्न समय में कई काम बड़ी घटनाओं का अंदाजा लग जाता है.

किसी इन्सान के जिन्दगी में शनि की दशा बहुत असर डालती है. शनि ने अगर नजर टेढ़ी कर दी तो आप के जीवन में बनते बनते काम भी बनते है. हर तरह से कोई न कोई निराशा लगी रहती है. शनि सबसे अधिक शक्तिशाली गृह में से एक है. लेकिन अगर शनि आप को सहयोग करने लगता है तो आप को इसका बहुत फायदा मिलता है. जीवन में खुशियाँ आपका पता पूछ कर आने लगती है.

आप सब को बता दें कि शनि आने वाले 5 दिसंबर से 7 जनवरी तक अस्त रहने वाल है जिसका असर सीधा आप के ऊपर पड़ेगा. शनि के अस्त रहेने का मुख्य असर 5 राशियों पर पड़ेगा. शनि के अस्त रहने से इन 5 राशियों के जातक के लिए बड़ी रहत रहेगी.

"कुन्डलनी ध्यान विधी "




"कुन्डलनी ध्यान विधी "
नमस्कार मित्रो---- एक ओर ध्यान विधी मेरे अनुभव मे आइ है वो उसी एसे काम करती है जैसे एक रस्सी कुए से जल निकालती है उसी प्रकार वह कुन्डलनी शक्ति को आज्ञा चक्र तक लाने का काम कर सकती है । सबसे पहले साधारन बैठक मेबैठ जाए ,विधी यह है कि जब श्वास भीतर जाए तो ध्यान आज्ञा चक्र पर हो ओरजब बाहर निकले तो ध्यान रीड़ के निचले छोर पर हो जिसे हम मूलाधार कहते है । दो स्तो यह कमाल की विधी है ,जब सांस अदंर जाएगी तब आज्ञा चक्र पर ध्यान रखने से वहा उजॉ महसूस करेगे तथा बाहर निकालते वक्त ध्यान मूलाधार पर जब दे गे तो वही उजॉ एकाग्रता मे सहयोग करेगी ओरहम जानते है श्वास बाहर निकलते वक्त उपर की ओर आती है जो मूह या नासिका से बाहर निकल जाती है । उस एकाग्रता के कारन धीरे धीरे मूलाधार एक्टिव होने से कुन्डलनी शक्ति उपर की ओर चड़ने लगेगी । इसमे श्वास एक रस्सी है आज्ञा चक्र एक चरखी है एकाग्रता बरतन जो कुन्डलनी रूपी गगां धारा को उपर लाती है ।


निरतरं प्रयास से आप देखे गे की यह एक वतॅूल बन गया है जिसका एक छोर आज्ञा चक्र व दूसरा मूलाधार है तथा बीच मे अन्य चक्र है । अब एसा होगा की आपकी श्वास क्रिया उसी तरह हो जाएगी जैसे राम राम बोलते हूए वह मरा मे प्रवतिॅत हो जाता है व मरा मरा कहो तो राम उतपन हो जाता है ,अब श्वास भीतर लेते ही ध्यान दोनो ओर काम करेगा आज्ञा चक्र पर भी व रीड़ पर भी उस जगह जहा तक कुन्डलनी उपर की ओर आ चुकी होगी ।एसी स्थिति बनने पर काम दुगनी तेजी से होने लगेगा ,अब उजॉ दोनो ओर प्रकटहोगी ,व एकाग्रता भी दोनो तरफ बनेगी । इस विधी की शूरूआत से ही विचार शून्यता बड़ने लगेगी । व विधी के मध्य तक निरविचार अवस्था आ जाएगी । अब जो सपदंन रीड़ मे है वो विभिन्न चक्रो से होता हुआ आज्ञा चक्र पर मिलेगा ,जिसे आप कुन्डलनी शक्ति का आज्ञा चक्र तक पहूचनां भी कह सकते है । अब चाहे आप श्वास भीतर ले या बाहर छोड़े दोनो मे आपका सारा वॅतूल सपदितं होने लगेगा। दोस्तो हर बार मुझे स्थिति को बयान करने को शब्द अप्रयाप्त लगते है यह एक अधबूत अवस्था है जिसकी शुरूआत मे आप दृष्टा होगे व फिर साक्षी हो इस घटना को निहारेगे । शरीर बोध निरतंर जाता रहैगा व सारा शरीर मे धारा प्रवाह मे रूपातरितंह जाएगा ,व चक्रो के भीतर जो लोक है उनका अनुपम सोदयॅ से आप अवगत हो पाएगे । शरीर एक ब्रहमाडं का रूप ले लेगा ,जिसके भीतर आकाश ,व धरती ,जल वायू अग्नि सबते दशॅन हो सकतेहै । दोस्त जितने सिर के बाल है उतनी ही ध्यान विधीया हो सकती है पर आपकी तनलीनता व निरतरं प्रयास से ही फलित हो सकेगी । बाकि सब विधियों की तरह इसके लिए भी सुबह 4- 6 व् शाम को संध्या का समय उपुक्त हे , आप इसी समय इसका प्रयास करे , एकग्रता जिंतनी सक्षम होगी उतनी ही विधि अधिक फल्भुत होगी , जीवन में अनेक प्रकार के रोग हे चिंताए हे सब का एक ही इलाज हे ध्यान व् प्रेम ,ध्यान जब अकेले हो प्रेम जब आपके आस पास बीढ् हो | जिसे परमात्मा पर आस्था नहीं हो वो भी इससे प्रयोग करे यह कोई नास्तिक हो या आस्तिक हो इस पर निभर नहीं हे यह केवल आपके प्रयास का खेल हे | लक्ष्य केवल एक हे आप आन्दित रहे व् जीवन को उसकी समगर्ता से जिए | और आपने जीवन को नया मोड़ दे जिससे दुनिया के दुःख आपको छू बी न सके और चारो तरफ सुख की बरखा हो | कुछ लोग यह कह सकते हे में इतनी ध्यान विधियों पर प्रयोग क्यों करता हु जबकि एक ही ध्यान विधि काफी हे ,कारन हे की पर्वत के शिखर हे पर्वत के शिखर पर अनेक रस्ते ले आते हे ,कोण सा रास्ता किसके काम आ जाए , कोण किस रस्ते पर हो और उसे यह विधि भा जाए व जीवन सार्थक ता की और बढ़ जाए यह कोई नहीं जनता |

यह विधी आपकी ध्यान यत्रा को नया आयाम दे सकती है जिससे आप आधायत्म की उच्च अवस्था व आन्नद का लाभ उठा सकते है ,जैसे जैसे अोर प्रयोग करूगां आप से जरूर निवेदन करूगां ,पोस्ट पड़ने के लिए धन्यावाद ।
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  कुण्डलिनी शक्ति केन्द्रों का जागरण ऊर्जा का उर्ध्वगमन
मानवी काया का संगठन छोटी-छोटी कोशिकाओं के माध्यम से होता है। समान संरचना और कार्यपद्धति वाले कोशिका समूह मिलकर ऊतकों का निर्माण करते हैं और ऊतकों से विभिन्न शारीरिक अंग अवयवों का विकास होता है। चेतना के सर्वव्यापी होने के कारण प्रत्येक कोशिका एक जीवन चैतन्य केन्द्र होती है और अपने-अपने स्तर की प्राण ऊर्जा की किरणें बखेरती रहती हैं जिससे शरीर के सामान्य क्रिया-कलाप सम्पन्न होते रहते हैं। मनुष्य शरीर के अन्दर कुछ विशिष्ट शक्ति केन्द्रों का भी निर्माण होता है जहाँ चैतन्य ऊर्जा की बहुलता होती है। शरीर की समस्त कोशिकाओं को जाग्रत एवं विकसित कर सकना हर किसी के लिए संभव नहीं है। अतः प्राण शक्ति की अधिकता वाले विशिष्ट केन्द्रों को ही सक्रिय बनाने-जाग्रत करने का प्रयत्न विभिन्न साधनाओं; यौगिक क्रियाओं के माध्यम से सिद्धि पथ के साधकों द्वारा किया जाता है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में चैतन्य ऊर्जा के केन्द्र कषाय-कल्मषों के तमसावरण में छिपे प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। इनमें सन्निहित गुप्त शक्तियाँ प्राण ऊर्जा के अपरिष्कृत होने के कारण अपना सही स्वरूप प्रकट नहीं कर पातीं। उनसे निकलने वाली ऊर्जा रश्मियों से मात्र काय कलेवर की विभिन्न गतिविधियाँ ही सम्पन्न होती रहती हैं और उनके धुँधलके प्रकाश में मनुष्य को पेट-प्रजनन के अतिरिक्त आगे की बात नहीं सूझती। आत्मोत्थान और लोक कल्याण की बात लोगों के समझ में नहीं आती। लोभ, मोह और संकीर्ण स्वार्थपरता के क्षुद्र दायरे में ही सिमटकर अपने जीवन की इति श्री कर लेते हैं।
प्राचीन ऋषियों, योगियों ने शरीरस्थ शक्ति स्रोतों को जाग्रत करने के लिए विज्ञान सम्मत साधना विज्ञान का आविष्कार किया था। जिसके अनुसार विभिन्न यौगिक क्रियाओं के नियमित एवं सतत् अभ्यास एवं गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश करने पर चैतन्य केन्द्रों का जागरण और प्रसुप्त शक्तियों का स्फुरण होता है। तंत्रशास्त और योगशास्त्रों में चैतन्य ऊर्जा केन्द्रों को “कमल” या “चक्र” के नाम से संबोधित किया गया है। शरीर शास्त्रियों एवं चिकित्सा-विशेषज्ञों ने इन केन्द्रों की संगति विशिष्ट ग्रंथों से बिठाई है जिन्हें “अंतःस्रावी ग्रंथियाँ” इण्डोक्राइन ग्लैण्ड कहते हैं। वैज्ञानिकों तथा एक्यूपंचर विशेषज्ञों ने इन्हें विशेष प्रकार के “बायोइलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड़” जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र माना है। तो कुछ ने इसे “नर्व फोर्स, वाइटल फोर्स, एक्टीनियम, बायोइलेक्ट्रिसिटी” आदि नामों से सम्बोधित किया है।
भारतीय योग शास्त्रों में मनुष्य शरीर के पृष्ठभाग में कशेरुकाओं के मध्य इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नामक तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन किया गया है। सुषुम्ना के अन्दर षट् चक्रों की उपस्थिति बताई गई है जिनकी स्थिति ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः सहस्रार, आज्ञा चक्र, विशुद्धि चक्र, अनाहत चक्र, मणिपूर चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र हैं। इसके अतिरिक्त शरीर के अन्दर अनेकों शक्ति श्रोत मर्म स्थान, उपत्यिकाएँ, मातृकाएँ आदि होती हैं जिनमें शक्ति का विपुल भाण्डागार छिपा होता है।
शरीर शास्त्रियों के अनुसार काया में तंत्रिका तंत्र और ग्रन्थि तंत्र दो प्रमुख प्रणालियाँ होती हैं जिनके माध्यम से समस्त शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों का संचालन और नियंत्रण होता रहता है। तंत्रिका तंत्र का प्रमुख केन्द्र मस्तिष्क है। तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञों के अनुसार मानव मस्तिष्क हैं तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञों के अनुसार मानव मस्तिष्क दो भागों में विभक्त होता है- दांया भाग और बाँया भाग। दोनों भाग चेतना से सम्बद्ध होते हैं। मस्तिष्क का बाँया भाग भाषा, गणित, तर्क आदि में व्यस्त रहता है। दाँये भाग को ज्ञान, विज्ञान एवं प्रज्ञा का केन्द्र माना जाता है। मस्तिष्क के मध्य में पिट्यूटरी नामक अंतःस्रावी ग्रन्थी होती है जिसे मस्तिष्क का चैतन्य केन्द्र कहते हैं। योगशास्त्रों में इसे ही सहस्रार- सहस्र दल कमल कहा गया है। यह स्थान अतीन्द्रिय क्षमताओं एवं दिव्यज्ञान का केन्द्र है जिसके विकसित होने पर सहस्र दल कमल से असंख्य ऊर्जा किरणें प्रस्फुटित होकर मस्तिष्क के सम्पूर्ण गुप्त केन्द्रों को बाँधती हुई सिर के चारों ओर प्रकाशमान घेरे का निर्माण करती है। इसे प्रभाव मंडल कहते हैं। सहस्रार के विकास के साथ अन्तः और बाह्य वृत्तियाँ शान्त और सुस्थिर हो जाती हैं। मन के कषाय-कल्मष समाप्त होने लगते हैं और अंतः प्रज्ञा जाग्रत हो जाती है। ऐसे साधक के व्यक्तित्व में ओजस, तेजस और वर्चस की झाँकी सुस्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। सहस्रार का विकास कैसल्य प्राप्ति का जीवन मुक्ति का परिचायक माना जाता है।
सहस्रार दल के नीचे ललाट मध्य में दोनों भौंओं के नीचे “आज्ञाचक्र” स्थित होता है। इसे दिव्य दृष्टि अथवा तृतीय नेत्र भी कहते हैं। शरीर शास्त्रियों में आज्ञा चक्र की संगति “पीनियल ग्रन्थि” से बिठाई है जिसे मास्टर ग्लैण्ड के नाम से भी जाना जाता है। इस ग्रन्थि से निस्सृत रसायन शरीर के सम्पूर्ण ग्रन्थि तंत्र के परिष्कार से अनेकों शारीरिक एवं मानसिक विषमताओं का निराकरण होता है। मन में उठने वाले विभिन्न आवेग एवं आवेशों का शमन करने वाला यह केन्द्र जाग्रत होने पर साधक को ऊर्ध्वरेता एवं दिव्य दर्शन की क्षमता प्रदान करता है। तृतीय नेत्रोन्मीलन से गुप्त एवं प्रसुप्त अतीन्द्रिय शक्तियों के जागरण का विज्ञान साधक को हस्तगत हो जाता है। बहिर्मुखी प्रवृत्ति का स्थान अन्तर्मुखी स्वभाव ले लेता है और ऐसा व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में प्रगति कर सकता है।
काया के ग्रीवा वाले भाग में पाई जाने वाली अंतः स्रावी ग्रन्थि को “थाइराइड ग्लैण्ड” कहते हैं। शरीर शास्त्रियों अनुसार संरचना एवं कार्यिकी के दृष्टिकोण से शरीर में इस ग्रन्थि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। चयापचय की क्रिया-प्रक्रिया को कार्यान्वित एवं नियंत्रित करने में थाइराइड ग्रन्थि महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करती है। थाइराइड को सक्रिय बना लेने पर चयापचय सम्बन्धी सभी दोषों का शमन हो जाता है। मन की चंचलता को दूर करने में इस ग्रन्थि का बहुमूल्य योगदान होता है। योग विद्या विशारदों ने कंठ भाग में स्थित इस ग्रन्थि के आसपास स्नायु प्रवाह को विशुद्धि चक्र सम्बोधित किया है और इसे भावना शुद्धि का केन्द्र माना है। मानसिक असंतुलन को दूर करने के लिए विशुद्धि चक्र का शोधन आवश्यक माना गया है। कंठ कूप स्थित विशुद्धि चक्र पर ध्यान करने से भूख-प्यास जैसे सुख-दुःख कारक द्वंद्वों पर विजय पाई जा सकती है। आवेश जन्य गति विधियों पर नियंत्रण एवं नीचे के चैतन्य केन्द्रों के जागरण में आने वाली कठिनाइयों का सहज समाधान भी इस चक्र की साधना से सध जाता है।
अनाहत चक्र को हृदय स्थान स्थित चैतन्य शक्ति का भावना प्रधान केन्द्र माना गया है। शरीर शास्त्रियों ने इसे “थाइमसग्रन्थि” के आसपास स्थित माना है। मनुष्य की मस्तिष्कीय चेतना ज्ञान, बुद्धि एवं तर्क प्रधान होती है। हृदय स्थित चेतना का सम्बन्ध संवेदना प्रधान होने के कारण मनुष्य दुःख-सुख के छोटे-बड़े थपेड़ों से उद्वेलित एवं आनन्दित होता रहता है। अनाहत चक्र के जाग्रत होने पर द्वंद्व की स्थिति समाप्त हो जाती है और व्यक्ति के जीवन में अनिर्वचनीय आनन्द का साम्राज्य छा जाता है। अनाहत चक्र की साधना जीवन मृत्यु के वास्तविक रहस्य को सुलझाती है और उससे छुटकारा पाने का मार्ग उद्घाटित होता है।
हृदय के नीचे स्थान में मणिपूर चक्र स्थित होता है। प्राण ऊर्जा का केन्द्र होने के कारण वैज्ञानिकों ने इसे सोलर प्लेक्सस एवं पाचन संस्थान से जुड़े होने के कारण एपीगैस्ट्रियल प्लेक्सस नाम दिया है और इसका संबंध पैन्क्रियाज नामक ग्रन्थि तंत्र से भी जोड़ा है। शरीर शास्त्रियों ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि नाभि स्थान स्थित चैतन्य केन्द्र का सम्बन्ध स्नायु तंत्र से होता है। इसमें स्नायु तंतुओं का जाल सा बिछा होता है तथा मस्तिष्क की भाँति इसमें भी एक लिबलिवा भूरा पदार्थ- “ग्रे मैटर” भरा होता है इस केन्द्र को “एबडामिनल बे्रन” की संज्ञा दी गई है और बताया गया है कि चेतना शक्ति का वह प्रमुख केन्द्र है जिसकी साधना करने से शरीर में प्राण ऊर्जा का - तेजस् शक्ति का अभिवर्धन और पाचन संस्थान का शुद्धिकरण होता है।
नाभि चक्र के नीचे पेडू के पास स्वाधिष्ठान चक्र स्थित होता है। इसे “जीवनी शक्ति केन्द्र” भी कहते हैं। वैज्ञानिकों ने इसे एड्रीनल ग्रन्थि माना है और कहा है कि यह भाग वीर्य रक्षा एवं जीवनी शक्ति के पोषण-रक्षण का मुख्य केन्द्र है। स्वाधिष्ठान चक्र की साधना करने से काम वासना पर नियंत्रण सधता है और साधक ब्रह्मचारी एवं ऊर्ध्वरेता बनता है।

सुषुम्ना के सबसे निचले भाग में मूलाधार चक्र स्थित होता है। इसकी स्थिति गुदा द्वार एवं जननांगों के मध्य बताई गई है। योगशास्त्रों में इसे चेतन शक्ति का प्राण ऊर्जा केन्द्र कहा गया है। इसी आधार केन्द्र में कुण्डलिनी महाशक्ति कुण्डली मारे प्रसुप्त मुद्रा में दबी पड़ी रहती है और यौगिक साधनाओं के माध्यम से जाग्रत होने पर षट्चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार की यात्रा करती है तथा अनेकानेक अतीन्द्रिय दिव्य क्षमताओं का गुह्य भाण्डागार साधक के सामने खोल देती है। मस्तिष्क को प्राण विद्युत की शक्तिधारा की आपूर्ति इसी केन्द्र के द्वारा होती रहती है। वैज्ञानिकों ने इस केन्द्र का सम्बन्ध प्रजनन ग्रंथों से जोड़ा है। यह शक्ति केन्द्र है जिसमें काम वासना की अधिकता होती है और इसे साधित, नियंत्रित एवं परिष्कृत करके उच्चस्तरीय शक्तियों का स्वामी बना जा सकता हैं मूलाधार चक्र, की साधना करने वाला साधक वीर्यवान एवं ओजस्वी तेजस्वी बनता है। वह अद्वितीय एवं अनुपम मेधा शक्ति का धनी प्रतिभावान व्यक्तित्व वाला होता है।
योगविद्या विशारदों के अनुसार सृष्टि संरचना में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की तरह मनुष्य के शरीर में भी चैतन्य ऊर्जा के दो प्रमुख स्त्रोत हैं। पहला मस्तिष्क मध्य में सहस्रार और दूसरा जननांगों और गुदाद्वार के मध्य स्थान सुषुम्ना के निम्नवर्ती आधार में स्थित मूलाधार चक्र है। दोनों ध्रुवों के मध्य आदान-प्रदान होते रहने-तालमेल बने रहने पर ही मानवी काया के सभी क्रिया कलाप संतुलित एवं सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न होते रहते हैं। यदि इनमें से एक ने एक ने भी अपना अनुदान सहयोग देना बन्द कर दिया अथवा उसमें कटौती कर दी तो दूसरे के समस्त क्रिया कलाप लड़खड़ा जाते हैं और व्यक्तित्व में असन्तुलन पैदा हो जाता है। मनुष्य दीन-हीन, दयनीय स्थिति में पहुँच जाता है।


इस संदर्भ में शरीर विज्ञानियों का कहना है कि प्राण ऊर्जा का प्रवाह निम्न गामी होने पर वह अतृप्त वासनाओं एवं कुँठाओं को जन्म देता है। शरीर के एक छोर पर मस्तिष्क मध्य में द्विदलीय चक्र रूप में पिट्यूटरी ग्रन्थि स्थित होती है तो दूसरे सिरे पर जननाँगों से सम्बन्धित एड्रीनल ग्रन्थि। फिजियोलॉजी की दृष्टि से इन दोनों ग्रन्थियों की उपयोगिता बहुत महत्वपूर्ण होती है। इनका मनुष्य के आचरण, व्यवहार और स्वभाव से सीधा सम्बन्ध होता है। एड्रीनल ग्रन्थि काम वासना के आवेग को उत्तेजित करती है तो पिट्यूटरी ग्रन्थि उस आवेश को शान्त कर देती है अथवा उसकी दिशाधारा को उत्कृष्टता की रचनात्मक प्रवृत्तियों की ओर मोड़ देती है। इसी कारण ग्रंथि तंत्र का शुद्धिकरण जैव ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन का सर्वश्रेष्ठ उपाय माना गया है।
स्थूल शरीर के अंदर गहराई में छिपे ये मर्मस्थल वस्तुतः विराट शक्ति के भाण्डागार हैं। परमाणु का विखंडन करके जिस प्रकार बड़े परिमाण में ऊर्जा उपलब्ध की जाती है, लेसर व मेसर ऊर्जा के माध्यम से जिस प्रकार अगणित असंभव समझे जाने वाले कार्यों को सम्पन्न कर लिया जाता है, ठीक उसी प्रकार चेतना के ईंधन शब्द शक्ति का सुनियोजन कर ध्यान धारणा द्वारा सुपात्र साधक सुयोग्य मार्गदर्शन में इन शक्ति केन्द्रों को प्रस्फुटित करते व उपलब्धियों की आध्यात्मिक फलश्रुतियों से लाभान्वित होते हैं। यह एक असाधारण स्तर का योग पुरुषार्थ है। बहुधा इसे हल्की फुलकी, चर्चा के स्तर पर ऐसा मान लिया जाता है, मानों स्विच ऑन करने की तरह यह भी एक याँत्रिक प्रक्रिया है। यह क्रम जहाँ तक संभव हो दूर किया जाना चाहिए। साथ ही एक और तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि योगग्रन्थों में वर्णित षट्चक्रों की जो संगतियाँ शरीरगत ग्रंथियों और गुच्छकों से बिठाई जाती हैं, वस्तुतः वह शरीर विज्ञानियों के अन्दर स्थूल रूप में आत्मा नाम की संरचना खोजते रहे हैं और समस्त संभावनाओं को काय कलेवर की परिधि में ही लपेटते रहे हैं। अन्यथा ये सभी शक्ति केन्द्र अति सूक्ष्म होते हैं तथा योगाभ्यास, विचारणा-भावना की पवित्रता एवं गुण कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता के आधार पर विकसित हुई अन्तःप्रज्ञा द्वारा अनुभूत होते हैं।