शनिवार, 9 नवंबर 2013

~~~श्री शनि चालीसा ~~~

                  * श्री शनि चालीसा *

                                      दोहा
                      जय गणेश गिरिजा सुवन मंगल करण कृपाल।
                   दीनन के दुख दूर करि कीजै नाथ निहाल॥
                   जय जय श्री शनिदेव प्रभु सुनहु विनय महाराज।
                   करहु कृपा हे रवि तनय राखहु जनकी लाज॥
                                     चौपाई 
         जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारि भुजा तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥
परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्‍टि भृकुटि विकराला॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिये माल मुक्तन मणि दमकै॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन। यम कोणस्थ रौद्र दुख भंजन॥
सौरी मन्द शनी दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥
पर्वतहू तृण होइ निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥
बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥
लषणहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥
रावण की गति- मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥
नृप विक्रम पर तुहिं पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
हार नौंलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥
हरिश्चंद्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरें डोम घर पानी॥
तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी- मीन कूद गई पानी॥
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥
तनिक वोलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥
शेष देव- लखि विनति लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥
तैसहि चारी चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदि अरु तामा॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥
समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
अद्भूत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशिब बलि ढीला॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
                                                दोहा
                      पाठ शनीश्‍चर देव को कीन्हों “भक्त” तैयार ।
                   करत पाठ  चालीस  दिन हो भवसागर पार ॥

*श्री हनुमान चालीसा *

           *श्री हनुमान चालीसा *

दोहा :
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥


चौपाई :
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै।
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥
दोहा :
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

~श्री राम रक्षा स्तोत्रम् ~


                ||ॐ ||श्री राम रक्षा स्तोत्रम् ||ॐ ||
विनियोग :

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः। श्री सीतारामचंद्रो देवता। अनुष्टुप्‌ छंदः। सीता शक्तिः। श्रीमान हनुमान्‌ कीलकम्‌। श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः।

अथ ध्यानम्‌ :
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌। वामांकारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालंकार दीप्तं दधतमुरुजटामंडलं रामचंद्रम।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥1॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमंडितम्‌ ॥2॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरांतकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥3॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवंदितः ।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
उरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्‌ ॥8॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥9॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्‌ ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥10॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न दृष्टुमति शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाऽभिरक्षितम्‌ ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥14॥
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥16॥
तरुणौ रूप सम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥
शरण्यौ सर्र्र्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥20॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयाऽन्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥

रामं दूवार्दलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥25॥
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌ ।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥26॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥
श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचंसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयलुर्नान्यं
जाने नैव जाने न जाने ॥30॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघुनन्दनम्‌ ॥31॥
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥34॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥35॥
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां राम रामेति गर्जनम्‌ ॥36॥
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रामेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥37॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥
॥ इति रामरक्षास्तोत्र संपूर्णम्‌ ॥




शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

कनकधारा स्तोत्र

 दीपावली पर्व पर माँ महालक्ष्मीकी स्तुति कनकधारा स्तोत्र से करें और जीवन में सुख समृद्धि का विस्तार करें|

|| ॐ|| कनकधारा स्तोत्र || ॐ||


अंग हरे  पुलकभूषणमाश्रयंती , भृंगागनेव  मुकुलाभरणं  तमालम |
अंगीकृताखिलविभूतिर पांग  लीला, मांगल्यदास्तु  मम मंगदेवताया  || १ ||

मुग्धा  मुहुर्विदधाति  वदने  मुरारेः ,  प्रेमत्रपाप्रणिहितानि  गतागतानि |
माला  दुशोर्मधुकरीय  महोत्पले  या, सा  में  श्रियं  दिशतु  सागरसंभवायाः || २ ||

विश्वासमरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष , मानन्दहेतुरधिकं  मधुविद्विषो  पि  |
इषन्निषीदतु    मयी  क्षणमीक्षर्णा, मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः  || ३ ||

आमीलिताक्षमधिगम्य  मुदा मुकुन्द, मानन्दकन्मनिमेषमनंगतन्त्रम   |
आकेकरस्थितिकनीकिमपक्ष्म  नेत्रं, भूत्यै  भवेन्मम  भुजंगशयांगनायाः  || ४ ||

बाह्यंतरे   मधुजितः  श्रितकौस्तुभे  या, हारावलीव  हरीनिलमयी  विभाति  |
कामप्रदा  भागवतोपी  कटाक्ष  माला, कल्याणमावहतु  मे  कमलालायायाः  || ५ ||

कालाम्बुदालितलिसोरसी  कैटमारे, धरिधरे स्फुरति या तु  तडंग  दन्यै |
मातुः  समस्तजगताम  महनीयमूर्ति , र्भद्राणि  मे दिशतु  भार्गवनन्दनायाः  || ६ ||

प्राप्तम पदं  प्रथमतः  किल  यत्प्रभावान, मांगल्यभाजि  मधुमाथिनी  मन्मथेन   |
मययापतेत्तदिह  मन्थन  मीक्षर्णा, मन्दालसम  च  मकरालयकन्यकायाः   || ७ ||

दाद  दयानुपवनो  द्रविणाम्बुधारा, मस्मिन्न  वि  किंधनविहंगशिशौ  विपाणे  |
दुष्कर्मधर्म  मापनीय  चिराय  दूरं, नारायणप्रगणयिनीनयनाम्बुवाहः  || ८ ||

इष्ट  विशिष्टमतयोपी  यया  दयार्द्र, दुष्टया त्रिविष्टपपदं  सुलभं  लर्भते  |
दृष्टिः  प्रहष्टकमलोदरदीप्तिरीष्टां, पुष्टि  कृपीष्ट  मम  पुष्करविष्टरायाः   || ९ ||

गीर्तेवतेती  गरुड़ध्वजभामिनीति, शाकम्भरीति  शशिशेखरवल्लभेति  |
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु  संस्थितायै, तस्यै  नमास्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुन्यै  || १० ||

क्ष्फत्यै  नमोस्तु  शुभकर्मफलप्रसूत्यै,  रत्यै  नमोस्तु  रमणीयगुणार्णवायै   |
शक्त्यै  नमोस्तु  शतपनिकेतनायै, पुष्ट्यै  नमोस्तु  पुरुषोत्तम वल्लभायै || ११ ||

नमोस्तु  नालीकनिभान्नायै, नमोस्तु  दुग्धोदधिजन्म  भूत्यै |
नमोस्तु  सोमामृतसोदरायै , नमोस्तु  नारायणवल्लभायै   || १२ |

सम्पत्कराणि  सकलेन्द्रियनन्दनानि, साम्राज्यदान विभवानि  सरोरुहाक्षि  |
त्वद्वन्द्वनानि  दुरिताहरणोद्यतानी , मामेव मातरनिशं कलयन्तु  नान्यम  || १३ ||

यत्कटाक्ष समुपासनाविधिः, सेवकस्य सकलार्थ सम्पदः  |
संतनोति  वचनांगमान, सैस्त्वां  मुरारीहृदयेश्वरीं भजे  || १४ ||

सरसीजनिलये  सरोजहस्ते, धवलतमांशु -कगंधमाल्य  शोभे  |
भगवती  हरिवल्लभे  मनोज्ञे, त्रिभुवन भूतिकरि  प्रसीद  मह्यं  || १५ ||

दिग्धस्तिभिः  कनककुम्भमुखावसृष्ट, स्वर्वाहिनीतिमलाचरूजलप्तुतांगम  |
प्रातर्नमामि  जगताम  जननीमशेष, लोकाधिनाथ  गृहिणीम मृताब्धिपुत्रिम || १६ ||

कमले  कमलाक्षवल्लभे, त्वम्, करुणापूरतरंगितैपरपाडयै    |
अवलोकय  ममाकिंचनानां, प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः  || १७ ||

स्तुवन्ति  ये  स्तुतिभिरमू भिरन्वहं, त्रयोमयीं  त्रिभुवनमातरम  रमाम  |
गुणाधिका  गुरुतरभाग्यभामिनी, भवन्ति  ते  भुवि  बुधभाविताशयाः    || १८ ||

संकट नाशन गणेश स्तोत्र

* संकट नाशन गणेश स्तोत्र *

प्रणम्य शिरसा देवं  गौरी  पुत्रं  विनायकं |
भक्तावासं  स्मरेन्नित्य-मायुः  कामार्थ  सिद्धये  || 1 ||

प्रथमं  वक्रतुंडम  च एकदंतं  व्दितीयकम |
तृतीयं कृष्ण - पिंगाक्षं  गजवक्त्रं  चतुर्थकम  || 2 ||

लम्बोदरं पंचमं च  षष्ठं  विकटमेव  च  |
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं  धूम्रवर्णं  तथाष्टकम  || 3 ||

नवमं  भलाचंद्रम  च  दशमं  तु  विनायकं |
एकादशं  गणपति व्दादशम  तु  गजाननं || 4 ||

व्दाद -शैतानी  नामानी  त्रिसंध्यं  यः  पठैन्नरः   |
न  च  विघ्नभयं  तस्य  सर्वसिद्धिकरं   परम  || 5 ||

विद्यार्थी लभते  विद्यां धनार्थी  लभते  धनम  |
पुत्रार्थी  लभते  पुत्रान  मोक्षार्थी  लभते  गतिम्  || 6 ||

जपेद  गणपति-स्तोत्रं  षड्भिर्मासै:   फलं  लभेत |
संवत्सरेण  सिद्धिं च लभते  नात्र  संशयः || 7 ||

अष्ठभ्यो  ब्राह्मनेभ्यश्च लिखित्वा  यः  समर्पयेत |
तस्य  विद्या भवेत् सर्व गणेशस्य प्रसादतः || 8 ||

| इति  श्री नारद  पुराने संकट नाशनं गणेश स्तोत्रं  सम्पूर्णं  |